नाम का मतलब
ऊंची जगहें (जन्नत-दोज़ख के दरमियान एक ऊंचे मुकाम की तरफ इशारा)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-आराफ कुरआन की सातवीं और मक्की सूरतों में सबसे लंबी सूरह है। इसमें आदम अलैहिस्सलाम से लेकर मूसा अलैहिस्सलाम तक कई नबियों और उनकी कौमों के वाकियात तफ्सील से बयान किए गए हैं। इसका नाम उस ऊंची जगह से लिया गया है जहां जन्नत और दोज़ख के दरमियान कुछ लोग खड़े होंगे। यह सूरह हक और बातिल के दरमियान फर्क को कई कौमों की मिसालों से वाज़ेह करती है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह नबियों की तारीख और उनकी कौमों के अंजाम पर गौर करने के लिए खास अहमियत रखती है, जो हमें नसीहत और इबरत हासिल करने की दावत देती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓصٓ
الٓمٓصٓ
अलिफ़ लाम मीम सोआद
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰
तफ़्सीर:
(अलिफ़, लाम, मीम, साद) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
كِتَـٰبٌ أُنزِلَ إِلَيْكَ فَلَا يَكُن فِى صَدْرِكَ حَرَجٌۭ مِّنْهُ لِتُنذِرَ بِهِۦ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ
كِتَـٰبٌ
ये किताब
أُنزِلَ
नाज़िल की गई है
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
فَلَا
पस ना
يَكُن
हो
فِى
in
صَدْرِكَ
आपके सीने में
حَرَجٌۭ
कोई तंगी
مِّنْهُ
इससे
لِتُنذِرَ
ताकि आप डराऐं
بِهِۦ
साथ इसके
وَذِكْرَىٰ
और नसीहत है
لِلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
यह एक किताब है, जो तुम्हारी ओर उतारी गई है - अतः इससे तुम्हारे सीने में कोई तंगी न हो - ताकि तुम इसके द्वारा सचेत करो और यह ईमानवालों के लिए एक प्रबोधन है;
तफ़्सीर:
क़ुरआन-ए-करीम एक पुस्तक है, जिसे अल्लाह ने (ऐ रसूल!) आपपर उतारा है। अतः आपके सीने में उसके संबंध में कोई तंगी या संदेह न हो। अल्लाह ने इसे आपकी ओर इसलिए अवतरित किया है, ताकि आप उसके द्वारा लोगों को डराएँ और तर्क स्थापित करें, तथा उसके द्वारा ईमान वालों को नसीहत करें। क्योंकि वही लोग नसीहत से लाभान्वित होते हैं।
आयत 3
ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ۗ قَلِيلًۭا مَّا تَذَكَّرُونَ
ٱتَّبِعُوا۟
पैरवी करो
مَآ
उसकी जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكُم
तरफ़ तुम्हारे
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَلَا
और ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
مِن
from
دُونِهِۦٓ
इसके सिवा
أَوْلِيَآءَ ۗ
सरपरस्तों की (और)
قَلِيلًۭا
Little
مَّا
कितना कम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते हो
जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, उस पर चलो और उसे छोड़कर दूसरे संरक्षक मित्रों का अनुसरण न करो। तुम लोग नसीहत थोड़े ही मानते हो
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) उस किताब का अनुसरण करो, जो तुम्हारे पालनहार ने तुमपर उतारी है, तथा अपने नबी की सुन्नत का पालन करो, और उन शैतानों या दुष्ट रब्बियों की इच्छाओं का पालन न करो, जिन्हें तुम अपने संरक्षक समझते हो, उनकी इच्छाएँ जो कुछ निर्देशित करती हैं उसकी ख़ातिर तुम उसे छोड़कर, जो तुमपर उतारा गया है, उनसे दोस्ती करते हो। दरअसल, तुम बहुत ही कम शिक्षा ग्रहण करते हो; क्योंकि यदि तुम शिक्षा ग्रहण करते, तो तुम सत्य पर उसके अलावा को तरजीह न देते, और अवश्य तुम उसका अनुसरण करते जो तुम्हारे रसूल लेकर आए हैं, तथा उसपर अमल करते और उसके सिवा अन्य चीज़ों को छोड़ देते।
आयत 4
وَكَم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَـٰهَا فَجَآءَهَا بَأْسُنَا بَيَـٰتًا أَوْ هُمْ قَآئِلُونَ
وَكَم
और कितनी ही
مِّن
of
قَرْيَةٍ
बस्तियाँ
أَهْلَكْنَـٰهَا
हलाक कर दिया हमने उन्हें
فَجَآءَهَا
पस आया उनके पास
بَأْسُنَا
अज़ाब हमारा
بَيَـٰتًا
रात के वक़्त
أَوْ
या
هُمْ
वो
قَآئِلُونَ
क़ैलूला कर रहे थे
कितनी ही बस्तियाँ थीं, जिन्हें हमने विनष्टम कर दिया। उनपर हमारी यातना रात को सोते समय आ पहुँची या (दिन-दहाड़) आई, जबकि वे दोपहर में विश्राम कर रहे थे
तफ़्सीर:
कितनी ही बस्तियाँ ऐसी हैं, जिन्हें हमने अपने अज़ाब से विनष्ट कर दिया, जब वे अपने इनकार तथा गुमराही पर अडिग रहीं। चुनाँचे उनपर हमारा गंभीर अज़ाब रात या दिन में उनकी ग़फ़लत के समय आ पहुँचा। फिर वे अपने आपसे अज़ाब को नहीं हटा सके, और न ही उसे उनसे उनके तथाकथित पूज्यों ने हटाया।
आयत 5
فَمَا كَانَ دَعْوَىٰهُمْ إِذْ جَآءَهُم بَأْسُنَآ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
فَمَا
तो ना
كَانَ
थी
دَعْوَىٰهُمْ
पुकार उनकी
إِذْ
जब
جَآءَهُم
आया उनके पास
بَأْسُنَآ
अज़ाब हमारा
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
जब उनपर यातना आ गई तो इसके सिवा उनके मुँह से कुछ न निकला कि वे पुकार उठे, "वास्तव में हम अत्याचारी थे।"
तफ़्सीर:
फिर यातना के उतर जाने के बाद उनसे इसके सिवा कुछ न बन पड़ा कि उन्होंने अल्लाह का इनकार करके अपने ऊपर अत्याचार करने के अपराध को स्वीकार कर लिया।
आयत 6
فَلَنَسْـَٔلَنَّ ٱلَّذِينَ أُرْسِلَ إِلَيْهِمْ وَلَنَسْـَٔلَنَّ ٱلْمُرْسَلِينَ
فَلَنَسْـَٔلَنَّ
पस अलबत्ता हम ज़रूर सवाल करेंगे
ٱلَّذِينَ
उन लोगों से
أُرْسِلَ
भेजे गए (रसूल)
إِلَيْهِمْ
तरफ़ जिनके
وَلَنَسْـَٔلَنَّ
और अलबत्ता हम ज़रूर सवाल करेंगे
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों से
अतः हम उन लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिनके पास रसूल भेजे गए थे, और हम रसूलों से भी अवश्य पूछेंगे
तफ़्सीर:
हम क़ियामत के दिन उन समुदायों से अवश्य पूछेंगे, जिनकी ओर हमने अपने रसूल भेजे थे कि उन्होंने रसूलों को क्या जवाब दिया, तथा हम उन रसूलों से भी उस संदेश को पहुँचाने के बारे में अवश्य पूछेंगे जिसके पहुँचाने का उन्हें आदेश दिया गया था, और इस बारे में कि उनके समुदायों ने उन्हें क्या जवाब दिया।
आयत 7
فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيْهِم بِعِلْمٍۢ ۖ وَمَا كُنَّا غَآئِبِينَ
فَلَنَقُصَّنَّ
पस अलबत्ता हम ज़रूर बयान करेंगे
عَلَيْهِم
उन पर
بِعِلْمٍۢ ۖ
साथ इल्म के
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
थे हम
غَآئِبِينَ
ग़ायब
फिर हम पूरे ज्ञान के साथ उनके सामने सब बयान कर देंगे। हम कही ग़ायब नहीं थे
तफ़्सीर:
फिर हम समस्त लोगों के सामने अपने पूर्ण ज्ञान के साथ उनके उन कामों का वर्णन करेंगे जो उन्होंने इस संसार में किए थे। क्योंकि हम उनके सब कामों से अवगत थे, उनमें से कोई भी चीज़ हमसे ओझल नहीं थी, तथा हम किसी भी समय उनसे ग़ायब नहीं थे।
आयत 8
وَٱلْوَزْنُ يَوْمَئِذٍ ٱلْحَقُّ ۚ فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
وَٱلْوَزْنُ
और वज़न
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
ٱلْحَقُّ ۚ
हक़ होगा
فَمَن
तो जो कोई
ثَقُلَتْ
भारी हुए
مَوَٰزِينُهُۥ
मीज़ान/तराज़ू उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
और बिल्कुल पक्का-सच्चा वज़न उसी दिन होगा। अतः जिनके कर्म वज़न में भारी होंगे, वही सफलता प्राप्त करेंगे
तफ़्सीर:
तथा क़ियामत के दिन कर्मों को न्याय (इंसाफ़) के साथ तौला जाएगा, जिसके साथ कोई अन्याय या अत्याचार नहीं होगा। फिर जिसकी नेकियों का पलड़ा उसके पापों के पलड़े से भारी हो गया, तो वही वे लोग हैं जो अपनी वांछित चीज़ को प्राप्त करने में सफल हो गए और उस चीज़ से बच गए जिसका उन्हें भय था।
आयत 9
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُم بِمَا كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَظْلِمُونَ
وَمَنْ
और जो कोई
خَفَّتْ
हल्के हुए
مَوَٰزِينُهُۥ
मीज़ान/तराज़ू उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُم
अपने नफ़्सों को
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ हमारी आयात के
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
और वे लोग जिनके कर्म वज़न में हलके होंगे, तो वही वे लोग हैं, जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला, क्योंकि वे हमारी आयतों का इनकार औऱ अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
तफ़्सीर:
तथा जिसके पापों का पलड़ा उसकी नेकियों के पलड़े से भारी हो गया, तो यही लोग हैं जिन्होंने, अल्लाह की आयतों का इनकार करने के कारण, क़ियामत के दिन अपने आपको विनाश के घाट उतार कर खुद को घाटे में डाल दिया।
आयत 10
وَلَقَدْ مَكَّنَّـٰكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَـٰيِشَ ۗ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
مَكَّنَّـٰكُمْ
ठिकाना दिया हमने तुम्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
مَعَـٰيِشَ ۗ
ज़िन्दगी के सामान
قَلِيلًۭا
Little
مَّا
कितना कम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र करते हो
और हमने धरती में तुम्हें अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीवन-सामग्री रखी। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो
तफ़्सीर:
(ऐ आदम की औलाद!) हमने धरती में तुम्हें अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीने के साधन बनाए। इसलिए तुम्हें इसपर अल्लाह का शुक्रिया अदा करना चाहिए था, लेकिन तुम बहुत कम शुक्र करते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आदम अलैहिस्सलाम की पैदाइश और इबलीस के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि घमंड इंसान को गुमराह करता है, जैसे इबलीस अपने घमंड की वजह से रांदा गया, इसलिए हमेशा तवाज़ो अपनानी चाहिए।
आयत 11
وَلَقَدْ خَلَقْنَـٰكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنَـٰكُمْ ثُمَّ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ لَمْ يَكُن مِّنَ ٱلسَّـٰجِدِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया हमने तुम्हें
ثُمَّ
फिर
صَوَّرْنَـٰكُمْ
सूरत बनाई हमने तुम्हारी
ثُمَّ
फिर
قُلْنَا
कहा हमने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों को
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِـَٔادَمَ
आदम को
فَسَجَدُوٓا۟
तो उन्होंने सजदा किया
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
لَمْ
ना
يَكُن
था वो
مِّنَ
of
ٱلسَّـٰجِدِينَ
सजदा करने वालों में से
हमने तुम्हें पैदा करने का निश्चय किया; फिर तुम्हारा रूप बनाया; फिर हमने फ़रिश्तों से कहो, "आदम को सजदा करो।" तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इबलीस के। वह (इबलीस) सदजा करनेवालों में से न हुआ
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) हमने तुम्हारे पिता आदम को बनाया, फिर हमने उसे सबसे अच्छा रूप और सबसे अच्छा आकार दिया, फिर हमने फ़रिश्तों को उसके सम्मान में सजदा करने का आदेश दिया। तो उन्होंने पालन किया और सजदा किया, सिवाय इबलीस के। उसने अहंकार और हठ करते हुए सजदा करने से इनकार कर दिया।
आयत 12
قَالَ مَا مَنَعَكَ أَلَّا تَسْجُدَ إِذْ أَمَرْتُكَ ۖ قَالَ أَنَا۠ خَيْرٌۭ مِّنْهُ خَلَقْتَنِى مِن نَّارٍۢ وَخَلَقْتَهُۥ مِن طِينٍۢ
قَالَ
फ़रमाया
مَا
किसने
مَنَعَكَ
मना किया तुझे
أَلَّا
कि ना
تَسْجُدَ
तू सजदा करे
إِذْ
जब कि
أَمَرْتُكَ ۖ
हुक्म दिया था मैंने तुझे
قَالَ
वो बोला
أَنَا۠
मैं
خَيْرٌۭ
बेहतर हूँ
مِّنْهُ
उससे
خَلَقْتَنِى
पैदा किया तूने मुझे
مِن
from
نَّارٍۢ
आग से
وَخَلَقْتَهُۥ
और पैदा किया तूने उसे
مِن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
कहा, "तुझे किसने सजका करने से रोका, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?" बोला, "मैं उससे अच्छा हूँ। तूने मुझे अग्नि से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने इबलीस को फटकार लगाते हुए कहा : आदम को सजदा करने की मेरी आज्ञा का पालन करने से तुझे किस बात ने रोका? इबलीस ने अपने रब को जवाब देते हुए कहा : मुझे इस बात ने रोका कि मैं उससे बेहतर हूँ। क्योंकि तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से बनाया, और आग मिट्टी से अधिक प्रतिष्ठित है।
आयत 13
قَالَ فَٱهْبِطْ مِنْهَا فَمَا يَكُونُ لَكَ أَن تَتَكَبَّرَ فِيهَا فَٱخْرُجْ إِنَّكَ مِنَ ٱلصَّـٰغِرِينَ
قَالَ
फ़रमाया
فَٱهْبِطْ
पस उतर जा
مِنْهَا
इससे
فَمَا
पस नहीं
يَكُونُ
है
لَكَ
तेरे लिए
أَن
कि
تَتَكَبَّرَ
तू तकब्बुर करे
فِيهَا
इसमें
فَٱخْرُجْ
पस निकल जा
إِنَّكَ
बेशक तू
مِنَ
(are) of
ٱلصَّـٰغِرِينَ
ज़लील होने वालों में से है
कहा, "उतर जा यहाँ से! तुझे कोई हक़ नहीं है कि यहाँ घमंड करे, तो अब निकल जा; निश्चय ही तू अपमानित है।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उससे कहा : जन्नत से उतर जा। तुझे यहाँ अहंकार करने का अधिकार नहीं है; क्योंकि यह अच्छे तथा पवित्र लोगों का घर है। इसलिए तेरा इसमें रहना उचित नहीं है। निश्चय - ऐ इबलीस! - तू तुच्छ और अपमानित है, भले ही तू अपने आपको आदम से अधिक प्रतिष्ठित समझता हो।
आयत 14
قَالَ أَنظِرْنِىٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
قَالَ
उसने कहा
أَنظِرْنِىٓ
मोहलत दे मुझे
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
उस दिन तक
يُبْعَثُونَ
वो उठाए जाऐंगे (जब)
बोला, "मुझे एक दिन तक मुहल्लत दे, जबकि लोग उठाए जाएँगे।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मुझे पुणः जीवित किए जाने के दिन तक का समय दे, ताकि मैं उन लोगों को बहका सकूँ जिन्हें मैं बहका सकता हूँ।
आयत 15
قَالَ إِنَّكَ مِنَ ٱلْمُنظَرِينَ
قَالَ
फ़रमाया
إِنَّكَ
बेशक तू
مِنَ
(are) of
ٱلْمُنظَرِينَ
मोहलत दिए जाने वालों में से है
कहा, "निस्संदेह तुझे मुहल्लत है।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उससे कहा : निःसंदेह - ऐ इबलीस! - तू उन मोहलत दिए जाने वालों में से है, जिनकी मृत्यु सूर में प्रथम फूँक मारने के दिन लिखी गई है, जब सारी सृष्टि मर जाएगी, और केवल उनका स्रष्टा बाक़ी रहेगा।
आयत 16
قَالَ فَبِمَآ أَغْوَيْتَنِى لَأَقْعُدَنَّ لَهُمْ صِرَٰطَكَ ٱلْمُسْتَقِيمَ
قَالَ
उसने कहा
فَبِمَآ
पस बवजह उसके जो
أَغْوَيْتَنِى
गुमराह किया तूने मुझे
لَأَقْعُدَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर बैठूँगा
لَهُمْ
उनके लिए
صِرَٰطَكَ
तेरे रास्ते
ٱلْمُسْتَقِيمَ
सीधे पर
बोला, "अच्छा, इस कारण कि तूने मुझे गुमराही में डाला है, मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उनके लिए घात में अवश्य बैठूँगा
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : इस कारण कि तूने मुझे गुमराह किया, कि मैंने आदम को सजदा करने के तेरे आदेश का पालन करना छोड़ दिया, मैं अवश्य ही आदम की संतान के लिए तेरे सीधे रास्ते पर बैठूँगा; ताकि मैं उन्हें उससे भटका दूँ और उन्हें पथभ्रष्ट कर दूँ, जिस तरह मैं उनके पिता आदम को सजदा करने से भटक गया।
आयत 17
ثُمَّ لَـَٔاتِيَنَّهُم مِّنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ وَعَنْ أَيْمَـٰنِهِمْ وَعَن شَمَآئِلِهِمْ ۖ وَلَا تَجِدُ أَكْثَرَهُمْ شَـٰكِرِينَ
ثُمَّ
फिर
لَـَٔاتِيَنَّهُم
अलबत्ता मैं ज़रूर आऊँगा उनके पास
مِّنۢ
from
بَيْنِ
before
أَيْدِيهِمْ
उनके सामने से
وَمِنْ
and from
خَلْفِهِمْ
और उनके पीछे से
وَعَنْ
and from
أَيْمَـٰنِهِمْ
और उनके दाऐं से
وَعَن
and from
شَمَآئِلِهِمْ ۖ
और उनके बाऐं से
وَلَا
और ना
تَجِدُ
तू पाएगा
أَكْثَرَهُمْ
उनकी अक्सरियत को
شَـٰكِرِينَ
शुक्र गुज़ार
"फिर उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाएँ और उनके बाएँ से उनके पास आऊँगा। और तू उनमें अधिकतर को कृतज्ञ न पाएगा।"
तफ़्सीर:
फिर मैं उनके पास हर तरफ़ से आख़िरत के प्रति अरुचि पैदा करने, दुनिया के प्रति रुचि पैदा करने, दिलों में संदेह डालने और इच्छाओं को सुसज्जित करने के साथ आऊँगा। तथा मैं उनके अंदर कुफ़्र की बात इस क़दर डालूँगा कि तू उनमें से अधिकतर लोगों को अपना आभारी नहीं पाएगा।
आयत 18
قَالَ ٱخْرُجْ مِنْهَا مَذْءُومًۭا مَّدْحُورًۭا ۖ لَّمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكُمْ أَجْمَعِينَ
قَالَ
फ़रमाया
ٱخْرُجْ
निकल जा
مِنْهَا
इससे
مَذْءُومًۭا
मज़म्मत किया हुआ
مَّدْحُورًۭا ۖ
रहमत से दूर किया हुआ
لَّمَن
अलबत्ता जो
تَبِعَكَ
पैरवी करेगा तेरी
مِنْهُمْ
उनमें से
لَأَمْلَأَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर भर दूँगा
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
مِنكُمْ
तुमसे
أَجْمَعِينَ
सबके सबसे
कहा, "निकल जा यहाँ से! निन्दित ठुकराया हुआ। उनमें से जिस किसी ने भी तेरा अनुसरण किया, मैं अवश्य तुम सबसे जहन्नम को भर दूँगा।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उससे कहा : (ऐ इबलीस!) तू निंदित और अल्लाह की दया से धुत्कारा हुआ जन्नत से निकल जा। निश्चय मैं क़ियामत के दिन जहन्नम को तुझसे और हर उस व्यक्ति से अवश्य भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेगा और तेरी बात मानेगा और अपने रब की आज्ञा का उल्लंघन करेगा।
आयत 19
وَيَـٰٓـَٔادَمُ ٱسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ ٱلْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَيَـٰٓـَٔادَمُ
और ऐ आदम
ٱسْكُنْ
रहो
أَنتَ
तुम
وَزَوْجُكَ
और बीवी तुम्हारी
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
فَكُلَا
पस दोनों खाओ
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
شِئْتُمَا
तुम दोनों चाहो
وَلَا
और ना
تَقْرَبَا
तुम दोनों क़रीब जाना
هَـٰذِهِ
this
ٱلشَّجَرَةَ
इस दरख़्त के
فَتَكُونَا
वरना तुम दोनों हो जाओगे
مِنَ
among
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों में से
और "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत में रहो-बसो, फिर जहाँ से चाहो खाओ, लेकिन इस वृक्ष के निकट न जाना, अन्यथा अत्याचारियों में से हो जाओगे।"
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने आदम से कहा : ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी हव्वा जन्नत में रहो। अतः उसमें जो अच्छी चीजें हैं, उनमें से जो चाहो खाओ, और इस पेड़ (एक पेड़ जिसे अल्लाह ने उनके लिए निर्दिष्ट किया) से मत खाओ। क्योंकि यदि तुम मेरे मना करने के बाद भी उसमें से कुछ खाओगे, तो तुम अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वालों में से हो जाओगे।
आयत 20
فَوَسْوَسَ لَهُمَا ٱلشَّيْطَـٰنُ لِيُبْدِىَ لَهُمَا مَا وُۥرِىَ عَنْهُمَا مِن سَوْءَٰتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَىٰكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةِ إِلَّآ أَن تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ ٱلْخَـٰلِدِينَ
فَوَسْوَسَ
पस वसवसा डाला
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
لِيُبْدِىَ
ताकि वो ज़ाहिर कर दे
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
مَا
what
وُۥرِىَ
जो छुपाई गई थीं
عَنْهُمَا
उन दोनों से
مِن
of
سَوْءَٰتِهِمَا
शर्मगाहें उन दोनों की
وَقَالَ
और कहा
مَا
नहीं
نَهَىٰكُمَا
रोका तुम दोनों को
رَبُّكُمَا
तुम्हारे रब ने
عَنْ
from
هَـٰذِهِ
this
ٱلشَّجَرَةِ
इस दरख़्त से
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَكُونَا
तुम दोनों हो जाओ
مَلَكَيْنِ
दो फरिश्ते
أَوْ
या
تَكُونَا
तुम दोनों हो जाओ
مِنَ
of
ٱلْخَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वालों में से
फिर शैतान ने दोनों को बहकाया, ताकि उनकी शर्मगाहों को, जो उन दोनों से छिपी थीं, उन दोनों के सामने खोल दे। और उसने (इबलीस ने) कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस वृक्ष से रोका है, तो केवल इसलिए कि ऐसा न हो कि तुम कहीं फ़रिश्ते हो जाओ या कही ऐसा न हो कि तुम्हें अमरता प्राप्त हो जाए।"
तफ़्सीर:
फिर इबलीस ने उन दोनों के मन में एक गुप्त बात डाली, ताकि उनके लिए प्रकट कर दे जो कुछ उनके गुप्तांगों में से उनसे छिपाया गया था। उसने उन दोनों से कहा : अल्लाह ने तुम दोनों को इस पेड़ से खाने से केवल इसलिए मना किया है कि कहीं तुम दोनों फ़रिश्ते न हो जाओ, अथवा जन्नत में हमेशा रहने वालों में से न हो जाओ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शैतान की खुली दुश्मनी और आदम-हव्वा के वाकिये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि शैतान हमें वसवसों से बहकाता है, इसलिए हमेशा होशियार रहना चाहिए।
आयत 21
وَقَاسَمَهُمَآ إِنِّى لَكُمَا لَمِنَ ٱلنَّـٰصِحِينَ
وَقَاسَمَهُمَآ
और उसने क़सम खाई उन दोनों से
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمَا
तुम दोनों के लिए
لَمِنَ
among
ٱلنَّـٰصِحِينَ
अलबत्ता ख़ैरख़्वाहों में से हूँ
और उसने उन दोनों के आगे क़समें खाई कि "निश्चय ही मैं तुम दोनों का हितैषी हूँ।"
तफ़्सीर:
तथा उसने उन दोनों से अल्लाह की क़सम खाकर कहा : निश्चय (ऐ आदम और हव्वा!) मैंने तुम दोनों से जो बात कही है, उसमें मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ।
आयत 22
فَدَلَّىٰهُمَا بِغُرُورٍۢ ۚ فَلَمَّا ذَاقَا ٱلشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْءَٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ ٱلْجَنَّةِ ۖ وَنَادَىٰهُمَا رَبُّهُمَآ أَلَمْ أَنْهَكُمَا عَن تِلْكُمَا ٱلشَّجَرَةِ وَأَقُل لَّكُمَآ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ لَكُمَا عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
فَدَلَّىٰهُمَا
पस उसने खींच लिया उन दोनों को
بِغُرُورٍۢ ۚ
साथ धोखे के
فَلَمَّا
फिर जब
ذَاقَا
दोनों ने चखा
ٱلشَّجَرَةَ
उस दरख़्त को
بَدَتْ
ज़ाहिर हो गईं
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
سَوْءَٰتُهُمَا
शर्मगाहें उन दोनों की
وَطَفِقَا
और वो दोनों शुरु हो गए
يَخْصِفَانِ
वो दोनों चिपकाने लगे
عَلَيْهِمَا
अपने ऊपर
مِن
from
وَرَقِ
पत्तों से
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत के
وَنَادَىٰهُمَا
और पुकारा उन दोनों को
رَبُّهُمَآ
उनके रब ने
أَلَمْ
क़्या नहीं
أَنْهَكُمَا
मैंने रोका था तुम दोनों को
عَن
from
تِلْكُمَا
this
ٱلشَّجَرَةِ
उस दरख़्त से
وَأَقُل
और मैंने कहा था
لَّكُمَآ
तुम दोनों को
إِنَّ
बेशक
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
لَكُمَا
तुम दोनों का
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
इस प्रकार धोखा देकर उसने उन दोनों को झुका लिया। अन्ततः जब उन्होंने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनकी शर्मगाहे एक-दूसरे के सामने खुल गए और वे अपने ऊपर बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम दोनों को इस वृक्ष से रोका नहीं था और तुमसे कहा नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है?"
तफ़्सीर:
इस तरह उसने उन दोनों को धोखे से उस स्थान से नीचे उतार लिया, जहाँ वे थे। चुनाँचे जब उन दोनों ने उस पेड़ से खाया, जिसमें से उन्हें खाने से मना किया गया था, तो उनके लिए उनके गुप्तांग प्रकट हो गए और दोनों अपने गुप्तांगों को ढकने के लिए अपने आपपर जन्नत के पत्ते चिपकाने लगे। तथा उनके रब ने उन्हें यह कहते हुए आवाज़ दी : क्या मैंने तुम दोनों को इस पेड़ से खाने के लिए मना नहीं किया था और तुम्हें सावधान करते हुए नहीं कहा था : निःसंदेह शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?!
आयत 23
قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَآ أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
قَالَا
उन दोनों ने कहा
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ظَلَمْنَآ
ज़ुल्म किया हमने
أَنفُسَنَا
अपनी जानों पर
وَإِن
और अगर
لَّمْ
ना
تَغْفِرْ
You forgive
لَنَا
तूने बख़्शा हमें
وَتَرْحَمْنَا
और (ना) तूने रहम किया हम पर
لَنَكُونَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से
दोनों बोले, "हमारे रब! हमने अपने आप पर अत्याचार किया। अब यदि तूने हमें क्षमा न किया और हम पर दया न दर्शाई, फिर तो हम घाटा उठानेवालों में से होंगे।"
तफ़्सीर:
आदम और हव्वा ने कहा : ऐ हमारे रब! जो तूने हमें पेड़ से खाने से मना किया था उसका इर्तिकाब करके हमने अपने आप पर अत्याचार किया है। यदि तूने हमारे पापों को क्षमा नहीं किया और अपनी दयालुता से हमपर दया नहीं की, तो निश्चय हम दुनिया एवं आख़िरत में अपना भाग्य खोकर घाटा उठाने वालों में से हो जाएँगे।
आयत 24
قَالَ ٱهْبِطُوا۟ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّۭ ۖ وَلَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّۭ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍۢ
قَالَ
फ़रमाया
ٱهْبِطُوا۟
उतर जाओ
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारे
لِبَعْضٍ
बाज़ के
عَدُوٌّۭ ۖ
दुश्मन हैं
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُسْتَقَرٌّۭ
एक जाय क़रार है
وَمَتَـٰعٌ
और कुछ फ़ायदा उठाना है
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
कहा, "उतर जाओ! तुम परस्पर एक-दूसरे के शत्रु हो और एक अवधि कर तुम्हारे लिए धरती में ठिकाना और जीवन-सामग्री है।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आदम, हव्वा और इबलीस से कहा : जन्नत से पृथ्वी पर उतरो, तुम एक-दूसरे के दुश्मन होगे। तथा तुम्हारे लिए एक ज्ञात समय तक पृथ्वी पर ठहरने का स्थान और एक निर्धारित अवधि के लिए उसमें जो कुछ है उससे लाभ उठाने का अवसर है।
आयत 25
قَالَ فِيهَا تَحْيَوْنَ وَفِيهَا تَمُوتُونَ وَمِنْهَا تُخْرَجُونَ
قَالَ
फ़रमाया
فِيهَا
उसी में
تَحْيَوْنَ
तुम जियोगे
وَفِيهَا
और उसी में
تَمُوتُونَ
तुम मरोगे
وَمِنْهَا
और उसी से
تُخْرَجُونَ
तुम निकाले जाओगे
कहा, "वहीं तुम्हें जीना और वहीं तुम्हें मरना है और उसी में से तुमको निकाला जाएगा।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आदम, हव्वा तथा उनकी संतान को संबोधित करते हुए कहा : तुम इसी धरती में उस अवधि तक जीवित रहोगे जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए निर्धारित की है, तथा इसी में मरोगे और दफ़न किए जाओगे, और अपनी क़ब्रों ही से क़ियामत (महा प्रलय) के लिए निकाले जाओगे।
आयत 26
يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًۭا يُوَٰرِى سَوْءَٰتِكُمْ وَرِيشًۭا ۖ وَلِبَاسُ ٱلتَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌۭ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
ءَادَمَ
ऐ बनी आदम
قَدْ
तहक़ीक़
أَنزَلْنَا
उतारा हमने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
لِبَاسًۭا
लिबास
يُوَٰرِى
जो छुपाता है
سَوْءَٰتِكُمْ
शर्मगाहें तुम्हारी
وَرِيشًۭا ۖ
और ज़ीनत (भी) है
وَلِبَاسُ
और लिबास
ٱلتَّقْوَىٰ
तक़वा का
ذَٰلِكَ
ये
خَيْرٌۭ ۚ
बेहतर है
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(is) from
ءَايَـٰتِ
निशानियों में से है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَذَّكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हारे लिए वस्त्र उतारा है कि तुम्हारी शर्मगाहों को छुपाए और रक्षा और शोभा का साधन हो। और धर्मपरायणता का वस्त्र - वह तो सबसे उत्तम है, यह अल्लाह की निशानियों में से है, ताकि वे ध्यान दें
तफ़्सीर:
ऐ आदम की संतान! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारे गुप्तांगों को ढकने के लिए एक आवश्यक वस्त्र बनाया है, तथा हमने तुम्हारे लिए एक विलासिता का वस्त्र बनाया है, जिससे तुम लोगों के बीच अपने आपको सुशोभित करते हो। तथा तक़्वा (अर्थात् अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसके निषेधों से बचने) का पोशाक, इस संवेदी पोशाक से बेहतर है। यह उपर्युक्त वस्त्र अल्लाह की उन निशानियों में से है जो उसकी शक्ति को इंगित करने वाली है। ताकि तुम अपने ऊपर अल्लाह कि नेमतों को याद करो और उनका शुक्र अदा करो।
आयत 27
يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ كَمَآ أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ ٱلْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْءَٰتِهِمَآ ۗ إِنَّهُۥ يَرَىٰكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُۥ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا ٱلشَّيَـٰطِينَ أَوْلِيَآءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
ءَادَمَ
ऐ बनी आदम
لَا
(Let) not
يَفْتِنَنَّكُمُ
हरगिज़ ना फ़ितने में डाले तुम्हें
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
كَمَآ
जैसा कि
أَخْرَجَ
उसने निकलवा दिया
أَبَوَيْكُم
तुम्हारे वालिदैन को
مِّنَ
from
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत से
يَنزِعُ
उसने उतरवा दिया
عَنْهُمَا
उन दोनों से
لِبَاسَهُمَا
लिबास उन दोनों का
لِيُرِيَهُمَا
ताकि वो दिखाए उन्हें
سَوْءَٰتِهِمَآ ۗ
शर्मगाहें उन दोनों की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَرَىٰكُمْ
वो देखता है तुम्हें
هُوَ
वो
وَقَبِيلُهُۥ
और क़बीला उसका
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَا
not
تَرَوْنَهُمْ ۗ
नहीं तुम देखते उन्हें
إِنَّا
बेशक हमने
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلشَّيَـٰطِينَ
शैतानों को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
لِلَّذِينَ
उनका जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
ऐ आदम की सन्तान! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस प्रकार उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके वस्त्र उनपर से उतरवा दिए थे, ताकि उनकी शर्मगाहें एक-दूसरे के सामने खोल दे। निस्सदेह वह और उसका गिरोह उस स्थान से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। हमने तो शैतानों को उन लोगों का मित्र बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते
तफ़्सीर:
ऐ आदम की संतान! शैतान तुम्हारे लिए, गुप्त अंगों को ढकने के लिए संवेदी वस्त्र को त्यागने या तक़्वा (धर्मपरायणता) की पोशाक को त्यागने की अवज्ञा को सुशोभित करके तुम्हें हरगिज़ धोखे में न डाले। क्योंकि उसने तुम्हारे माता-पिता को पेड़ से खाने को सुसज्जित करके धोखा दिया था, यहाँ तक कि उसका परिणाम यह हुआ कि उसने उन्हें जन्नत से निकाल दिया और उनके लिए उनके गुप्तांग प्रकट हो गए। निःसंदेह शैतान और उसका वंश तुम्हें देखते हैं, लेकिन तुम उन्हें नहीं देखते। अतः तुम्हें उससे और उसके वंश से सावधान रहना होगा। हमने शैतानों को ऐसे लोगों का मित्र बना दिया है, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते। रहे ईमान वाले, जो अच्छे कर्म करते हैं, तो उनपर उन (शैतानों) का कोई रास्ता नहीं है।
आयत 28
وَإِذَا فَعَلُوا۟ فَـٰحِشَةًۭ قَالُوا۟ وَجَدْنَا عَلَيْهَآ ءَابَآءَنَا وَٱللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
وَإِذَا
और जब
فَعَلُوا۟
वो करते हैं
فَـٰحِشَةًۭ
कोई बेहयाई
قَالُوا۟
वो कहते हैं
وَجَدْنَا
पाया हमने
عَلَيْهَآ
उस पर
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
أَمَرَنَا
हुक्म दिया है हमें
بِهَا ۗ
उसका
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَأْمُرُ
नहीं वो हुक्म देता
بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ
बेहयाई का
أَتَقُولُونَ
क्या तुम कहते हो
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مَا
वो जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
और उनका हाल यह है कि जब वे लोग कोई अश्लील कर्म करते है तो कहते है कि "हमने अपने बाप-दादा को इसी तरीक़े पर पाया है और अल्लाह ही ने हमें इसका आदेश दिया है।" कह दो, "अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। क्या अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहते हो, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?"
तफ़्सीर:
और जब मुश्रिक लोग कोई अति घृणित काम करते हैं, जैसे शिर्क तथा निर्वस्त्र होकर काबा का तवाफ़ करना आदि, तो वे यह बहाना पेश करते हैं कि उन्होंने अपने बाप-दादा को ऐसा करते पाया है और यह कि अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने का आदेश दिया है। (ऐ मुहम्मद!) आप उनके जवाब में कह दें : अल्लाह गुनाहों का आदेश नहीं देता, बल्कि वह उनसे मना करता है। तो फिर तुम अल्लाह पर कैसे इसका दावा करते हो? क्या (ऐ मुश्रिको!) तुम झूठ बोलते हुए और झूठा आरोप लगाते हुए अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहते हो, जो तुम नहीं जानते?!
आयत 29
قُلْ أَمَرَ رَبِّى بِٱلْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا۟ وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍۢ وَٱدْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَمَرَ
हुक्म दिया है
رَبِّى
मेरे रब ने
بِٱلْقِسْطِ ۖ
इन्साफ़ का
وَأَقِيمُوا۟
और सीधे करो
وُجُوهَكُمْ
अपने चेहरे
عِندَ
at
كُلِّ
every
مَسْجِدٍۢ
हर नमाज़ के वक़्त
وَٱدْعُوهُ
और पुकारो उसे
مُخْلِصِينَ
ख़ालिस करते हुए
لَهُ
उसके लिए
ٱلدِّينَ ۚ
दीन को
كَمَا
जैसा कि
بَدَأَكُمْ
उसने इब्तिदा की थी तुम्हारी
تَعُودُونَ
तुम लौटोगे (वैसे ही)
कह दो, "मेरे रब ने तो न्याय का आदेश दिया है और यह कि इबादत के प्रत्येक अवसर पर अपना रुख़ ठीक रखो और निरे उसी के भक्त एवं आज्ञाकारी बनकर उसे पुकारो। जैसे उसने तुम्हें पहली बार पैदा किया, वैसे ही तुम फिर पैदा होगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) इन मुश्रिकों से कह दें : अल्लाह ने न्याय का आदेश दिया है, अश्लीलता और बुराई का आदेश नहीं दिया है। तथा उसने आदेश दिया है कि तुम इबादत को सामान्य रूप से और विशेष रूप से मस्जिदों में उसी के लिए ख़ालिस करो, और यह कि तुम केवल उसे ही पुकारो आज्ञाकारिता को उसी के लिए विशिष्ट करते हुए। जिस तरह उसने तुम्हें पहली बार अनस्तित्व से पैदा किया, उसी तरह वह तुम्हें दोबारा जीवित करेगा। क्योंकि जो तुम्हें पहली बार पैदा करने में सक्षम है, वह तुम्हें वापस लौटाने और तुम्हें पुनर्जीवित करने में भी सक्षम है।
आयत 30
فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلضَّلَـٰلَةُ ۗ إِنَّهُمُ ٱتَّخَذُوا۟ ٱلشَّيَـٰطِينَ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
فَرِيقًا
एक गिरोह को
هَدَىٰ
उसने हिदायत दी
وَفَرِيقًا
और एक गिरोह
حَقَّ
चसपाँ हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلضَّلَـٰلَةُ ۗ
गुमराही
إِنَّهُمُ
बेशक वो
ٱتَّخَذُوا۟
उन्होंने बना लिया
ٱلشَّيَـٰطِينَ
शयातीन को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَيَحْسَبُونَ
और वो समझते हैं
أَنَّهُم
बेशक वो
مُّهْتَدُونَ
हिदायत याफ़्ता हैं
एक गिरोह को उसने मार्ग दिखाया। परन्तु दूसरा गिरोह ऐसा है, जिसके लोगों पर गुमराही चिपककर रह गई। निश्चय ही उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपने मित्र बनाए और समझते यह है कि वे सीधे मार्ग पर हैं
तफ़्सीर:
अल्लाह ने लोगों के दो समूह बनाए हैं : तुममें से एक समूह को उसने सीधी राह दिखाई, उसके लिए मार्गदर्शन के कारणों को आसान बनाया और उसकी बाधाओं को दूर कर दिया, जबकि दूसरे समूह पर सच्चाई के मार्ग से भटकना अनिवार्य (सिद्ध) हो चुका है।क्योंकि उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को दोस्त बना लिया, और अज्ञानता में उनका पालन किया, हालाँकि वे यह समझते हैं कि वे सीधे रास्ते पर चल रहे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लिबास और ज़ीनत (सजावट) के सही तरीके का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़ाहिरी लिबास के साथ तक़वा का लिबास (अच्छा किरदार) भी ज़रूरी है।
आयत 31
۞ يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ خُذُوا۟ زِينَتَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍۢ وَكُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ وَلَا تُسْرِفُوٓا۟ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُسْرِفِينَ
۞ يَـٰبَنِىٓ
O Children
ءَادَمَ
ऐ बनी आदम
خُذُوا۟
इख़्तियार करो
زِينَتَكُمْ
ज़ीनत अपनी
عِندَ
at
كُلِّ
every
مَسْجِدٍۢ
हर नमाज़ के वक़्त
وَكُلُوا۟
और खाओ
وَٱشْرَبُوا۟
और पियो
وَلَا
और ना
تُسْرِفُوٓا۟ ۚ
तुम इसराफ़ करो
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْمُسْرِفِينَ
इसराफ़ करने वालों को
ऐ आदम की सन्तान! इबादत के प्रत्येक अवसर पर शोभा धारण करो; खाओ और पियो, परन्तु हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बदनेवालों को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
ऐ आदम की संतान! नमाज़ तथा तवाफ़ के समय ऐसा साफ़-सुथरा एवं पवित्र वस्त्र पहनो, जो तुम्हारे गुप्तांगों को छिपाए और तुम्हें सुंदरता प्रदान करे। तथा अल्लाह की हलाल की हुई पाक चीज़ों में से जो चाहो खाओ और पियो, परंतु संतुलन की सीमा को पार न करो एवं हलाल से हराम की ओर न जाओ। निश्चय ही अल्लाह संतुलन की सीमा को पार करने वालों को पसंद नहीं करता।
आयत 32
قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ ٱللَّهِ ٱلَّتِىٓ أَخْرَجَ لِعِبَادِهِۦ وَٱلطَّيِّبَـٰتِ مِنَ ٱلرِّزْقِ ۚ قُلْ هِىَ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا خَالِصَةًۭ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
مَنْ
किसने
حَرَّمَ
हराम की
زِينَةَ
ज़ीनत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَخْرَجَ
उसने निकाली
لِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों के लिए
وَٱلطَّيِّبَـٰتِ
और पाकीज़ा चीज़ें
مِنَ
of
ٱلرِّزْقِ ۚ
रिज़्क़ में से
قُلْ
कह दीजिए
هِىَ
ये हैं
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
فِى
during
ٱلْحَيَوٰةِ
the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी में
خَالِصَةًۭ
ख़ालिसतन (होंगी)
يَوْمَ
(on the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के दिन
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نُفَصِّلُ
हम खोल कर बयान करते है
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
कहो, "अल्लाह की उस शोभा को जिसे उसने अपने बन्दों के लिए उत्पन्न किया है औऱ आजीविका की पवित्र, अच्छी चीज़ो को किसने हराम कर दिया?" कह दो, "यह सांसारिक जीवन में भी ईमानवालों के लिए हैं; क़ियामत के दिन तो ये केवल उन्हीं के लिए होंगी। इसी प्रकार हम आयतों को उन लोगों के लिए सविस्तार बयान करते है, जो जानना चाहे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जो मुश्रिक अल्लाह के हलाल किए हुए वस्त्र और अच्छे भोजन और अन्य चीजों को हराम ठहराते हैं, उनका खंडन करते हुए कह दें : तुम्हारे लिए उस वस्त्र को किसने हराम किया है, जो तुम्हारी शोभा है? तथा खाने-पीने आदि की अच्छी चीज़ों को तुम्हारे लिए किसने हराम किया है, जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान की हैं? (ऐ रसूल!) आप कह दें : ये अच्छी चीज़ें दुनिया के जीवन में ईमान वालों के लिए हैं, और अगर दूसरे लोग (भी) इस दुनिया में उन्हें साझा करते हैं, परंतु क़ियामत के दिन ये केवल मोमिनों के लिए विशिष्ट होंगी, कोई काफिर इसमें उनके साथ साझी नहीं होगा; क्योंकि जन्नत काफ़िरों पर हराम कर दी गई है। इसी विवरण की तरह, हम उन लोगों के लिए आयतों का विवरण करते हैं जो समझते हैं; क्योंकि वही इनसे लाभ उठाते हैं।
आयत 33
قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّىَ ٱلْفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَٱلْإِثْمَ وَٱلْبَغْىَ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَأَن تُشْرِكُوا۟ بِٱللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِۦ سُلْطَـٰنًۭا وَأَن تَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
حَرَّمَ
हराम किया
رَبِّىَ
मेरे रब ने
ٱلْفَوَٰحِشَ
बेहयाई के कामों को
مَا
जो
ظَهَرَ
ज़ाहिरी हों
مِنْهَا
उनमें से
وَمَا
और जो
بَطَنَ
पोशीदा हों
وَٱلْإِثْمَ
और गुनाह को
وَٱلْبَغْىَ
और सरकशी को
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَأَن
और ये कि
تُشْرِكُوا۟
तुम शरीक ठहराओ
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
مَا
जो
لَمْ
नहीं
يُنَزِّلْ
उसने उतारी
بِهِۦ
उसकी
سُلْطَـٰنًۭا
कोई दलील
وَأَن
और ये कि
تَقُولُوا۟
तुम कहो
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
कह दो, "मेरे रब ने केवल अश्लील कर्मों को हराम किया है - जो उनमें से प्रकट हो उन्हें भी और जो छिपे हो उन्हें भी - और हक़ मारना, नाहक़ ज़्यादती और इस बात को कि तुम अल्लाह का साझीदार ठहराओ, जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा और इस बात को भी कि तुम अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहो जिसका तुम्हें ज्ञान न हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अल्लाह की हलाल की हुई वस्तुओं को हराम ठहराने वाले इन मुश्रिकों से कह दें : अल्लाह ने तो अपने बंदों पर केवल अनैतिक कार्यों, अर्थात् घृणित पापों को हराम किया है, चाहे वे प्रत्यक्ष हों या छिपे हुए, तथा सभी अवज्ञाओं, और लोगों पर उनके खून, धन तथा सम्मान (सतीत्व) के संबंध में अन्यायपूर्ण तरीके से ज़्यादती करने को हराम किया है। इसी तरह उसने तुम्हारे लिए बिना किसी प्रमाण के किसी को अल्लाह का साझी ठहराने एवं बिना ज्ञान के उसके नामों, गुणों, कार्यों तथा उसकी शरीयत के संबंध में बात करने को हराम क़रार दिया है।
आयत 34
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌۭ ۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةًۭ ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
وَلِكُلِّ
And for every
أُمَّةٍ
और हर उम्मत के लिए
أَجَلٌۭ ۖ
एक वक़्त मुक़र्रर है
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाता है
أَجَلُهُمْ
मुक़र्रर वक़्त उनका
لَا
(they can) not
يَسْتَأْخِرُونَ
नहीं वो पीछे हो सकते
سَاعَةًۭ ۖ
एक घड़ी
وَلَا
और ना
يَسْتَقْدِمُونَ
वो आगे बढ़ सकते हैं
प्रत्येक समुदाय के लिए एक नियत अवधि है। फिर जब उसका नियत समय आ जाता है, तो एक घड़ी भर न पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है
तफ़्सीर:
हर पीढ़ी के लिए उनकी समय सीमा के लिए एक निर्धारित अवधि और समय है। जब उनका नियत समय आ जाता है, तो वे कुछ समय के लिए भी, भले ही वह थोड़ा-सा क्यों न हो, न उससे पीछे हटते हैं और न उससे आगे बढ़ते हैं।
आयत 35
يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ إِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ رُسُلٌۭ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِى ۙ فَمَنِ ٱتَّقَىٰ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
ءَادَمَ
ऐ बनी आदम
إِمَّا
अगर
يَأْتِيَنَّكُمْ
आ जाऐं तुम्हारे पास
رُسُلٌۭ
रसूल
مِّنكُمْ
तुम में से
يَقُصُّونَ
जो बयान करते हों
عَلَيْكُمْ
तुम पर
ءَايَـٰتِى ۙ
मेरी आयात
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱتَّقَىٰ
तक़वा करे
وَأَصْلَحَ
और इस्लाह कर ले
فَلَا
तो ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
ऐ आदम की सन्तान! यदि तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल आएँ; तुम्हें मेरी आयतें सुनाएँ, तो जिसने डर रखा और सुधार कर लिया तो ऐसे लोगों के लिए न कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे
तफ़्सीर:
ऐ आदम की संतान! यदि तुम्हारे पास तुम्हारी ही जातियों में से मेरे कुछ रसूल आएँ, जो तुम्हें वह किताबें पढ़कर सुनाएँ, जो मैंने उनपर उतारी है, तो उनकी बात मानो और जो कुछ वे लेकर आए हैं उसका पालन करो। अतः जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरते हैं और अपने कामों को सुधार लेते हैं, उन्हें क़ियामत के दिन कोई भय नहीं होगा, और न ही वे दुनिया के छूटे हुए सुख और आनंद पर शोक करेंगे।
आयत 36
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَٱسْتَكْبَرُوا۟ عَنْهَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَٱسْتَكْبَرُوا۟
और तकब्बुर किया
عَنْهَآ
उनसे
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई; वही आगवाले हैं, जिसमें वे सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
जहाँ तक उन काफ़िरों की बात है, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उन पर ईमान नहीं लाए, तथा जो कुछ उनके रसूल उनके पास लाए थे, अहंकार करते हुए उसपर अमल नहीं किया, तो वही आग (जहन्नम) वाले हैं जो हमेशा उसी में रहने वाले हैं।
आयत 37
فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَنَالُهُمْ نَصِيبُهُم مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَتْهُمْ رُسُلُنَا يَتَوَفَّوْنَهُمْ قَالُوٓا۟ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ قَالُوا۟ ضَلُّوا۟ عَنَّا وَشَهِدُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ كَـٰفِرِينَ
فَمَنْ
तो कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَوْ
या
كَذَّبَ
वो झुठलाऐ
بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۚ
उसकी आयात को
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يَنَالُهُمْ
पहुँचेगा उन्हें
نَصِيبُهُم
हिस्सा उनका
مِّنَ
from
ٱلْكِتَـٰبِ ۖ
लिखे हुए में से
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَتْهُمْ
आ जाऐंगे उनके पास
رُسُلُنَا
भेजे हुए हमारे
يَتَوَفَّوْنَهُمْ
वो फ़ौत करेंगे उन्हें
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
أَيْنَ
कहाँ हैं
مَا
जिन्हें
كُنتُمْ
थे तुम
تَدْعُونَ
तुम पुकारते
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
قَالُوا۟
वो कहेंगे
ضَلُّوا۟
गुम हो गए
عَنَّا
हम से
وَشَهِدُوا۟
और वो गवाही देंगे
عَلَىٰٓ
against
أَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों पर
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
كَـٰفِرِينَ
काफ़िर
अब उससे बढ़कर अत्याचारी कौन है, जिसने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया या उसकी आयतों को झुठलाया? ऐसे लोगों को उनके लिए लिखा हुआ हिस्सा पहुँचता रहेगा, यहाँ तक कि जब हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके प्राण ग्रस्त करने के लिए उनके पास आएँगे तो कहेंगे, "कहाँ हैं, वे जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे?" कहेंगे, "वे तो हमसे गुम हो गए।" और वे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि वास्तव में वे इनकार करनेवाले थे
तफ़्सीर:
उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं है, जो अल्लाह पर झूठा आरोप लगाते हुऐ किसी को उसका साझी ठहराए, या उसकी ओर कमी की निस्बत करे, या उसके बारे में ऐसी बात कहे जो उसने नहीं कही है, या उसकी सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करने वाली स्पष्ट आयतों को झुठलाए। उक्त गुणों से विशेषित इन लोगों को उनका वह हिस्सा मिलेगा, जो लौहे महफूज़ में उनके लिए अच्छा या बुरा हिस्सा लिखा गया है। यहाँ तक कि जब मौत का फ़रिश्ता और उसके सहयोगी फरिश्ते उनके प्राण निकालने के लिए उनके पास आएँगे, तो उन्हें फटकार लगाते हुए उनसे कहेंगे : कहाँ हैं वे पूज्य जिनकी तुम अल्लाह के अलावा पूजा करते थे?! उन्हें पुकारो कि वे तुम्हें लाभ पहुँचाएँ। मुश्रिक लोग फरिश्तों से कहेंगे : जिन पूज्यों की हम पूजा करते थे वे हमसे लुप्त हो गए, इसलिए हम नहीं जानते कि वे कहाँ हैं। तथा वे अपने आप स्वीकार करेंगे कि वे काफ़िर थे, लेकिन उस समय उनकी स्वीकृति उनके विरुद्ध एक तर्क होगी और इससे उन्हें कोई लाभ नहीं होगा।
आयत 38
قَالَ ٱدْخُلُوا۟ فِىٓ أُمَمٍۢ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِكُم مِّنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ فِى ٱلنَّارِ ۖ كُلَّمَا دَخَلَتْ أُمَّةٌۭ لَّعَنَتْ أُخْتَهَا ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا ٱدَّارَكُوا۟ فِيهَا جَمِيعًۭا قَالَتْ أُخْرَىٰهُمْ لِأُولَىٰهُمْ رَبَّنَا هَـٰٓؤُلَآءِ أَضَلُّونَا فَـَٔاتِهِمْ عَذَابًۭا ضِعْفًۭا مِّنَ ٱلنَّارِ ۖ قَالَ لِكُلٍّۢ ضِعْفٌۭ وَلَـٰكِن لَّا تَعْلَمُونَ
قَالَ
वो फ़रमाएगा
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
فِىٓ
among
أُمَمٍۢ
जमाअतों में
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
जो गुज़र चुकी हैं
مِن
from
قَبْلِكُم
तुम से पहले
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
the jinn
وَٱلْإِنسِ
जिन्न व इन्स में से
فِى
in
ٱلنَّارِ ۖ
आग में
كُلَّمَا
जब कभी
دَخَلَتْ
दाख़िल होगी
أُمَّةٌۭ
कोई जमाअत
لَّعَنَتْ
लानत करेगी
أُخْتَهَا ۖ
अपनी बहन को
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
ٱدَّارَكُوا۟
वो जमा हो जाऐंगे
فِيهَا
उसमें
جَمِيعًۭا
सबके सब
قَالَتْ
कहेगी
أُخْرَىٰهُمْ
पिछली उनकी
لِأُولَىٰهُمْ
अपनी पहली को
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं वो लोग
أَضَلُّونَا
जिन्होंने गुमराह किया हमें
فَـَٔاتِهِمْ
पस दे इन्हें
عَذَابًۭا
अज़ाब
ضِعْفًۭا
दोगुना
مِّنَ
of
ٱلنَّارِ ۖ
आग से
قَالَ
वो फ़रमाएगा
لِكُلٍّۢ
हर एक के लिए
ضِعْفٌۭ
दोगुना है
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
वह कहेगा, "जिन्न और इनसान के जो गिरोह तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन्हीं के साथ सम्मिलित होकर तुम भी आग में प्रवेश करो।" जब भी कोई जमाअत प्रवेश करेगी, तो वह अपनी बहन पर लानत करेगी, यहाँ तक कि जब सब उसमें रल-मिल जाएँगे तो उनमें से बाद में आनेवाले अपने से पहलेवाले के विषय में कहेंगे, "हमारे रब! हमें इन्हीं लोगों ने गुमराह किया था; तो तू इन्हें आग की दोहरी यातना दे।" वह कहेगा, "हरेक के लिए दोहरी ही है। किन्तु तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते उनसे कहेंगे : (ऐ मुश्रिको!) जिन्नों और इनसानों में से जो जातियाँ तुमसे पहले कुफ़्र तथा गुमराही पर गुज़र चुकी हैं, उनके साथ जहन्नम में प्रवेश कर जाओ। जब भी कोई जाति प्रवेश करेगी अपने से पहले आग में आने वाली जाति पर लानत करेगी। यहाँ तक कि जब वे सभी उसमें एकत्र हो जाएँगे, तो उनमें से अंतिम में प्रवेश करने वाले, जो कि दीन और अनुयायी लोग होंगे, उनमें से सबसे पहले प्रवेश करने वाले प्रमुखों तथा सरदारों के बारे में कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! यही बड़े लोग हैं जिन्होंने हमें मार्गदर्शन के रास्ते से भटका दिया था, इसलिए उन्हें हमारे लिए पथभ्रष्टता को अलंकृत करने के लिए दोहरी सज़ा दे। अल्लाह उनके जवाब में कहेगा : तुममें से हर समूह के लिए दोहरा दंड है, लेकिन तुम उससे अनजान हो और तुम्हें उसका एहसास नहीं।
आयत 39
وَقَالَتْ أُولَىٰهُمْ لِأُخْرَىٰهُمْ فَمَا كَانَ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍۢ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْسِبُونَ
وَقَالَتْ
और कहेगी
أُولَىٰهُمْ
पहली उनकी
لِأُخْرَىٰهُمْ
उनकी पिछली को
فَمَا
पस ना
كَانَ
हुई
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَلَيْنَا
हम पर
مِن
any
فَضْلٍۢ
कोई फ़ज़ीलत
فَذُوقُوا۟
पस चखो
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْسِبُونَ
तुम कमाई करते
और उनमें से पहले आनेवाले अपने से बाद में आनेवालों से कहेंगे, "फिर हमारे मुक़ावाले में तुम्हें कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं, तो जैसी कुछ कमाई तुम करते रहे हो, उसके बदले में तुम यातना का मज़ा चखो!"
तफ़्सीर:
तथा अनुसरण किए गए सरदार अपने अनुयायियों से कहेंगे : (ऐ अनुयायियो!) तुम्हें हमपर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है कि जिसके कारण तुम इस बात के पात्र हो कि तुम्हारी यातना कम कर दी जाए। क्योंकि यहाँ केवल तुम्हारे किए हुए कर्मों का एतिबार है, और असत्य का पालन करने के लिए तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं है। अतः हमारी तरह (ऐ अनुयायियो!) तुम भी यातना का मज़ा चखो, उस कुफ़्र और पापों के कारण, जो तुम किया करते थे।
आयत 40
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَٱسْتَكْبَرُوا۟ عَنْهَا لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَٰبُ ٱلسَّمَآءِ وَلَا يَدْخُلُونَ ٱلْجَنَّةَ حَتَّىٰ يَلِجَ ٱلْجَمَلُ فِى سَمِّ ٱلْخِيَاطِ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُجْرِمِينَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَٱسْتَكْبَرُوا۟
और उन्होंने तकब्बुर किया
عَنْهَا
उनसे
لَا
(will) not
تُفَتَّحُ
नहीं खोले जाऐंगे
لَهُمْ
उनके लिए
أَبْوَٰبُ
दरवाज़े
ٱلسَّمَآءِ
आसमान के
وَلَا
और ना
يَدْخُلُونَ
वो दाख़िल होंगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَلِجَ
दाख़िल हो जाए
ٱلْجَمَلُ
ऊँट
فِى
through
سَمِّ
नाके में
ٱلْخِيَاطِ ۚ
सूई के
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देंगे
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों को
जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई, उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जाएँगे और न वे जन्नत में प्रवेश करेंग जब तक कि ऊँट सुई के नाके में से न गुज़र जाए। हम अपराधियों को ऐसा ही बदला देते है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने हमारी स्पष्ट आयतों को झुठलाया और अहंकार करते हुए उन्हें मानने और उनके अधीन होने से इनकार कर दिया, वे हर प्रकार की भलाई से निराश हैं। उनके कुफ़्र के कारण उनके कार्यों के लिए आसमान के द्वार नहीं खोले जाएँगे, न ही उनकी आत्माओं के लिए जब वे मर जाएँगे। तथा वे कभी भी जन्नत में प्रवेश नहीं करेंगे जब तक कि ऊँट - जो सबसे बड़े जानवरों में से एक है - सुई के छेद में प्रवेश न कर जाए, जो कि सबसे संकीर्ण चीज़ों में से है। और यह असंभव है। इसलिए जो चीज़ इसपर लंबित है यानी उनका जन्नत में प्रवेश करना, वह भी असंभव है। इसी बदले के समान अल्लाह उन लोगों को बदला देता है जिनके पाप बहुत बड़े हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हलाल-हराम में एतिदाल (संतुलन) की ताकीद है। यह सबक हमें सिखाता है कि दीन में न ज़्यादती करनी चाहिए न कोताही, हर मामले में संतुलन ज़रूरी है।
आयत 41
لَهُم مِّن جَهَنَّمَ مِهَادٌۭ وَمِن فَوْقِهِمْ غَوَاشٍۢ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلظَّـٰلِمِينَ
لَهُم
उनके लिए
مِّن
of
جَهَنَّمَ
जहन्नम से
مِهَادٌۭ
बिछौना है
وَمِن
and from
فَوْقِهِمْ
और उनके ऊपर से
غَوَاشٍۢ ۚ
ओढ़ना है
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देंगे
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
उनके लिए बिछौना जहन्नम का होगा और ओढ़ना भी उसी का। अत्याचारियों को हम ऐसा ही बदला देते है
तफ़्सीर:
इन अहंकारी झुठलाने वालों के लिए जहन्नम ही का बिछौना होगा और उनके ऊपर आग के ओढ़ने (कंबल) होंगे। इसी तरह का बदला हम उन लोगों को देते हैं, जो अल्लाह का इनकार करके और उससे मुँह मोड़कर उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं।
आयत 42
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَا
not
نُكَلِّفُ
नहीं हम तकलीफ़ देते
نَفْسًا
किसी जान को
إِلَّا
मगर
وُسْعَهَآ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
इसके विपरित जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए - हम किसी पर उसकी सामर्थ्य से बढ़कर बोझ नहीं डालते - वही लोग जन्नतवाले है। वे उसमें सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
और जो लोग अपने रब पर ईमान लाए और जितना हो सका अच्छे कर्म किए - और अल्लाह किसी आत्मा पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता - वही जन्नत वाले हैं, जो उसमें प्रवेश करके हमेशा के लिए उसी में रहेंगे।
आयत 43
وَنَزَعْنَا مَا فِى صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهِمُ ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ وَقَالُوا۟ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى هَدَىٰنَا لِهَـٰذَا وَمَا كُنَّا لِنَهْتَدِىَ لَوْلَآ أَنْ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ ۖ لَقَدْ جَآءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِٱلْحَقِّ ۖ وَنُودُوٓا۟ أَن تِلْكُمُ ٱلْجَنَّةُ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَنَزَعْنَا
और निकाल लेंगे हम
مَا
जो
فِى
(is) in
صُدُورِهِم
उनके सीनों में होगा
مِّنْ
of
غِلٍّۢ
कोई कीना
تَجْرِى
बहती होंगी
مِن
from
تَحْتِهِمُ
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ
नहरें
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
वो जिसने
هَدَىٰنَا
रहनुमाई की हमारी
لِهَـٰذَا
इसके लिए
وَمَا
और ना
كُنَّا
थे हम
لِنَهْتَدِىَ
कि हम हिदायत पाते
لَوْلَآ
अगर ना (होता)
أَنْ
ये कि
هَدَىٰنَا
हिदायत देता हमें
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَتْ
आ गए
رُسُلُ
रसूल
رَبِّنَا
हमारे रब के
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
وَنُودُوٓا۟
और वो पुकारे जाऐंगे
أَن
कि
تِلْكُمُ
ये
ٱلْجَنَّةُ
जन्नत है
أُورِثْتُمُوهَا
वारिस बनाए गए हो तुम इसके
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
उनके सीनों में एक-दूसरे के प्रति जो रंजिश होगी, उसे हम दूर कर देंगे; उनके नीचें नहरें बह रही होंगी और वे कहेंगे, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने इसकी ओर हमारा मार्गदर्शन किया। और यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करतो तो हम कदापि मार्ग नहीं पा सकते थे। हमारे रब के रसूल निस्संदेह सत्य लेकर आए थे।" और उन्हें आवाज़ दी जाएगी, "यह जन्नत है, जिसके तुम वारिस बनाए गए। उन कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे थे।"
तफ़्सीर:
जन्नत में उनके आनंद की पूर्णता में से एक यह है कि अल्लाह उनके दिलों में जो भी द्वेष और ईर्ष्या होगी निकालकर दूर कर देगा और उनके नीचे से नहरें जारी कर देगा। तथा वे अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को स्वीकार करते हुए कहेंगे : हर प्रकार की स्तुति अल्लाह के लिए है, जिसने हमें इस नेक कार्य की तौफ़ीक़ दी जिसके कारण हमें यह स्थान प्राप्त हुआ। तथा हम अपने दम पर इसमें सफल नहीं हो सकते थे, यदि ऐसा न होता कि अल्लाह ने हमें उसकी ओर मार्गदर्शन किया। निश्चय हमारे रब के रसूल निर्विवाद सत्य तथा वा'दे और वईद (धमकी) में सच्चाई के साथ आए, और एक पुकारने वाला उनके बीच पुकारकर कहेगा : यही वही जन्नत है जिसके बारे में मेरे रसूलों ने तुम्हें दुनिया में बताया था। यह जन्नत अल्लाह ने तुम्हें उन नेक कामों के बदले में दी है जो तुम करते थे, जिनसे तुम अल्लाह की प्रसन्नता चाहते थे।
आयत 44
وَنَادَىٰٓ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ أَصْحَـٰبَ ٱلنَّارِ أَن قَدْ وَجَدْنَا مَا وَعَدَنَا رَبُّنَا حَقًّۭا فَهَلْ وَجَدتُّم مَّا وَعَدَ رَبُّكُمْ حَقًّۭا ۖ قَالُوا۟ نَعَمْ ۚ فَأَذَّنَ مُؤَذِّنٌۢ بَيْنَهُمْ أَن لَّعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَنَادَىٰٓ
और पुकारेंगे
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत वाले
أَصْحَـٰبَ
(to the) companions
ٱلنَّارِ
आग वालों को
أَن
कि
قَدْ
तहक़ीक़
وَجَدْنَا
पा लिया हमने
مَا
जो
وَعَدَنَا
वादा किया था हम से
رَبُّنَا
हमारे रब ने
حَقًّۭا
सच्चा
فَهَلْ
तो क्या
وَجَدتُّم
पा लिया तुमने
مَّا
जो
وَعَدَ
वादा किया था
رَبُّكُمْ
तुम्हारे रब ने
حَقًّۭا ۖ
सच्चा
قَالُوا۟
वो कहेंगे
نَعَمْ ۚ
हाँ
فَأَذَّنَ
तो पुकारेगा
مُؤَذِّنٌۢ
एक पुकारने वाला
بَيْنَهُمْ
उनके दर्मियान
أَن
कि
لَّعْنَةُ
लानत हो
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَى
(is) on
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों पर
जन्नतवाले आगवालों को पुकारेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुमसे तुम्हारे रब ने जो वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है अत्याचारियों पर।"
तफ़्सीर:
जब जन्नत वाले जन्नत में और जहन्नम वाले जहन्नम में चले जाएँगे, तो जन्नत के निवासी जहन्नम वालों को आवाज़ देंगे : हमारे रब ने हमसे जिस जन्नत का वादा किया था, निश्चय हमने उसे सच्चा व सिद्ध पाया और हम उसमें प्रवेश पा चुके हैं। तो क्या (ऐ काफ़िरों!) अल्लाह ने तुम्हें जिस जहन्नम की धमकी दी थी तुमने उसको सच्चा व सिद्ध पाया? काफिर कहेंगे : वास्तव में, हमने भी उसे सच्चा पाया जो उसने हमें जहन्नम की धमकी दी थी। फिर एक आवाज़ देने वाला अल्लाह से दुआ करते हुए आवाज़ देगा कि अल्लाह ज़ालिमों को अपनी दया से दूर कर दे। क्योंकि उसने दुनिया के जीवन में उनके लिए अपनी दया के द्वार खोल दिए, परंतु उन्होंने उससे मुँह फेर लिया।
आयत 45
ٱلَّذِينَ يَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًۭا وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ كَـٰفِرُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَصُدُّونَ
रोकते थे
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
وَيَبْغُونَهَا
और वो तलाश करते थे उसमें
عِوَجًۭا
टेढ़ापन
وَهُم
और वो
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले थे
जो अल्लाह के मार्ग से रोकते और उसे टेढ़ा करना चाहते है और जो आख़िरत का इनकार करते है,
तफ़्सीर:
ये ज़ालिम वही हैं, जो खुद भी अल्लाह की राह से दूर रहते थे और दूसरों को भी उससे दूर कर रहे थे, और आशा करते थे कि सत्य का रास्ता टेढ़ा हो जाए, ताकि लोग उसपर न चलें, तथा ये लोग आख़िरत का इनकार करने वाले हैं, उसके लिए तैयारी करने वाले नहीं हैं।
आयत 46
وَبَيْنَهُمَا حِجَابٌۭ ۚ وَعَلَى ٱلْأَعْرَافِ رِجَالٌۭ يَعْرِفُونَ كُلًّۢا بِسِيمَىٰهُمْ ۚ وَنَادَوْا۟ أَصْحَـٰبَ ٱلْجَنَّةِ أَن سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمْ ۚ لَمْ يَدْخُلُوهَا وَهُمْ يَطْمَعُونَ
وَبَيْنَهُمَا
और दर्मियान उन दोनों के
حِجَابٌۭ ۚ
एक हिजाब होगा
وَعَلَى
and on
ٱلْأَعْرَافِ
और आराफ़ पर
رِجَالٌۭ
कुछ लोग होंगे
يَعْرِفُونَ
वो पहचानते होंगे
كُلًّۢا
हर एक को
بِسِيمَىٰهُمْ ۚ
उनकी अलामत से
وَنَادَوْا۟
और वो पुकारेंगे
أَصْحَـٰبَ
(to the) companions
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत वालों को
أَن
कि
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَيْكُمْ ۚ
तुम पर
لَمْ
नहीं
يَدْخُلُوهَا
वो दाख़िल हुए होंगे उसमें
وَهُمْ
और वो
يَطْمَعُونَ
वो उम्मीद रखते होंगे
और इन दोनों के मध्य एक ओट होगी। और ऊँचाइयों पर कुछ लोग होंगे जो प्रत्येक को उसके लक्षणों से पहचानते होंगे, और जन्नतवालों से पुकारकर कहेंगे, "तुम पर सलाम है।" वे अभी जन्नत में प्रविष्ट तो नहीं हुए होंगे, यद्यपि वे आस लगाए होंगे
तफ़्सीर:
इन दो समूहों : जन्नत के निवासियों तथा दोज़ख के निवासियों के बीच एक ऊँची आड़ होगी, जिसका नाम 'आराफ़' है, और इस ऊँची आड़ पर वे लोग होंगे जिनके अच्छे और बुरे कर्म बराबर होंगे। वे जन्नतियों को उनके लक्षणों, जैसे कि उनके चेहरे की सफेदी से, तथा जहन्नमियों को उनके लक्षणों, जैसे कि उनके चेहरों के कालेपन से पहचान लेंगे। ये लोग जन्नत वालों को उनके सम्मान में आवाज़ देकर कहेंगे : "तुम पर शांति हो"। 'आराफ़' वाले अभी जन्नत में दाखिल नहीं हुए होंगे और वे अल्लाह की दया से उसमें प्रवेश करने की आशा रखते होंगे।
आयत 47
۞ وَإِذَا صُرِفَتْ أَبْصَـٰرُهُمْ تِلْقَآءَ أَصْحَـٰبِ ٱلنَّارِ قَالُوا۟ رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
۞ وَإِذَا
और जब
صُرِفَتْ
फेरी जाऐंगी
أَبْصَـٰرُهُمْ
निगाहें उनकी
تِلْقَآءَ
तरफ़
أَصْحَـٰبِ
(the) companions
ٱلنَّارِ
आग वालों के
قَالُوا۟
वो कहेंगे
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَا
(Do) not
تَجْعَلْنَا
ना तू कर हमें
مَعَ
with
ٱلْقَوْمِ
साथ उन लोगों के
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
और जब उनकी निगाहें आगवालों की ओर फिरेंगी, तो कहेंगे, "हमारे रब, हमें अत्याचारी लोगों में न सम्मिलित न करना।"
तफ़्सीर:
और जब 'आराफ़' वालों की निगाहें आग वालों की ओर फेरी जाएँगी और वे उनकी गंभीर यातना को देखेंगे, तो अल्लाह से प्रार्थना करते हुए कहेंगे : ऐ हमारे रब! हमें कुफ़्र एवं शिर्क करने वाले इन ज़ालिमों के साथ मत कर।
आयत 48
وَنَادَىٰٓ أَصْحَـٰبُ ٱلْأَعْرَافِ رِجَالًۭا يَعْرِفُونَهُم بِسِيمَىٰهُمْ قَالُوا۟ مَآ أَغْنَىٰ عَنكُمْ جَمْعُكُمْ وَمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ
وَنَادَىٰٓ
और पुकारेंगे
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
ٱلْأَعْرَافِ
आराफ़ वाले
رِجَالًۭا
कुछ लोगों को
يَعْرِفُونَهُم
वो पहचानते होंगे उन्हें
بِسِيمَىٰهُمْ
उनकी अलामत से
قَالُوا۟
वो कहेंगे
مَآ
ना
أَغْنَىٰ
काम आई
عَنكُمْ
तुम्हें
جَمْعُكُمْ
जमाअत तुम्हारी
وَمَا
और जो कुछ
كُنتُمْ
थे तुम
تَسْتَكْبِرُونَ
तुम तकब्बुर करते
और ये ऊँचाइयोंवाले कुछ ऐसे लोगों से, जिन्हें ये उनके लक्षणों से पहचानते हैं, कहेंगे, "तुम्हारे जत्थे तो तुम्हारे कुछ काम न आए और न तुम्हारा अकड़ते रहना ही।
तफ़्सीर:
और 'आराफ़' वाले काफ़िरों में से कुछ नरकवासी लोगों को, जिन्हें वे उनके लक्षणों, जैसे कि उनके चेहरे के कालेपन और उनकी आँखों के नीलेपन से पहचानते होंगे, आवाज़ देकर कहेंगे : तुम्हारा धन और संख्या में बहुत अधिक होना तुम्हारे कुछ काम न आया, और न ही अभिमान और अहंकार में तुम्हारे सत्य से मुँह फेर लेने से तुम्हें कुछ फायदा हुआ।
आयत 49
أَهَـٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ أَقْسَمْتُمْ لَا يَنَالُهُمُ ٱللَّهُ بِرَحْمَةٍ ۚ ٱدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمْ وَلَآ أَنتُمْ تَحْزَنُونَ
أَهَـٰٓؤُلَآءِ
क्या यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
أَقْسَمْتُمْ
क़सम खाई थी तुमने
لَا
(that) not
يَنَالُهُمُ
नहीं पहुँचाएगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِرَحْمَةٍ ۚ
कोई रहमत
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
لَا
नहीं
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَلَآ
और ना
أَنتُمْ
तुम
تَحْزَنُونَ
तुम ग़मगीन होगे
"क्या ये वही हैं ना, जिनके विषय में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर अपनी दया-दृष्टि न करेगा।" "जन्नत में प्रवेश करो, तुम्हारे लिए न कोई भय है और न तुम्हें कोई शोक होगा।"
तफ़्सीर:
और अल्लाह काफ़िरों को फटकार लगाते हुए कहेगा : क्या ये वही लोग हैं, जिनके बारे में तुमने क़सम खाई थी कि अल्लाह उन्हें अपने पास से कोई दया प्रदान नहीं करेगा?! तथा अल्लाह मोमिनों से कहेगा : (ऐ मोमिनो!) जन्नत में प्रवेश कर जाओ। न तुम्हें आगे कोई डर है और न ही तुम दुनिया के छूटे हुए आनंद पर शोक करोगे; क्योंकि तुम्हें शाश्वत आनंद प्राप्त हो चुका है।
आयत 50
وَنَادَىٰٓ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ أَصْحَـٰبَ ٱلْجَنَّةِ أَنْ أَفِيضُوا۟ عَلَيْنَا مِنَ ٱلْمَآءِ أَوْ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ ۚ قَالُوٓا۟ إِنَّ ٱللَّهَ حَرَّمَهُمَا عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَنَادَىٰٓ
और पुकारेंगे
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
ٱلنَّارِ
आग वाले
أَصْحَـٰبَ
(to the) companions
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत वालों को
أَنْ
कि
أَفِيضُوا۟
डालो
عَلَيْنَا
हम पर
مِنَ
[of]
ٱلْمَآءِ
कुछ पानी
أَوْ
या
مِمَّا
उससे जो
رَزَقَكُمُ
रिज़्क़ दिया तुम्हें
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
حَرَّمَهُمَا
हराम कर दिया उन दोनों को
عَلَى
to
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
आगवाले जन्नतवालों को पुकारेंगे कि ,"थोड़ा पानी हमपर बहा दो, या उन चीज़ों में से कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं।" वे कहेंगे, "अल्लाह ने तो ये दोनों चीज़ें इनकार करनेवालों के लिए वर्जित कर दी है।"
तफ़्सीर:
नरक वाले जन्नत के निवासियों को आवाज़ देकर उनसे याचना करते हुए कहेंगे : (ऐ जन्नत वालो!) हमपर थोड़ा-सा पानी बहा दो, अथवा उस खाने में से कुछ (दे दो) जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान किया है। जन्नत वाले जवाब देंगे : अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें काफ़िरों पर उनके कुफ़्र के कारण हराम कर दी हैं और हम उस चीज़ के साथ तुम्हारी कदापि मदद नहीं करेंगे जो अल्लाह ने तुमपर हराम कर दी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नती और दोज़खी लोगों के मुकालमे और आराफ (ऊंची जगह) वालों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि आखिरत में हर अमल का हिसाब होगा, इसलिए दुनिया में सोच-समझकर अमल करना चाहिए।
आयत 51
ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ دِينَهُمْ لَهْوًۭا وَلَعِبًۭا وَغَرَّتْهُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا ۚ فَٱلْيَوْمَ نَنسَىٰهُمْ كَمَا نَسُوا۟ لِقَآءَ يَوْمِهِمْ هَـٰذَا وَمَا كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَجْحَدُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिया
دِينَهُمْ
अपने दीन को
لَهْوًۭا
शुग़ल
وَلَعِبًۭا
और खेल
وَغَرَّتْهُمُ
और धोखे में डाला उनको
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी ने
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
فَٱلْيَوْمَ
तो आज
نَنسَىٰهُمْ
हम भुला देंगे उन्हें
كَمَا
जैसा कि
نَسُوا۟
उन्होंने भुला दिया
لِقَآءَ
मुलाक़ात को
يَوْمِهِمْ
(of) their day
هَـٰذَا
अपने उस दिन की
وَمَا
और जो
كَانُوا۟
थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात का
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते
उनके लिए जिन्होंने अपना धर्म खेल-तमाशा ठहराया और जिन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल दिया, तो आज हम भी उन्हें भुला देंगे, जिस प्रकार वे अपने इस दिन की मुलाक़ात को भूले रहे और हमारी आयतों का इनकार करते रहे
तफ़्सीर:
ये काफ़िर वही लोग हैं, जिन्होंने अपने धर्म को उपहास और मनोरंजन बना लिया और दुनिया के जीवन ने उन्हें अपने अलंकरण और शोभा से धोखे में डाल दिया। इसलिए क़ियामत के दिन अल्लाह उन्हें भुला देगा और उन्हें यातना भुगतने के लिए छोड़ देगा, जिस तरह वे क़ियामत के दिन की भेंट को भूल गए थे। जिसके कारण उन्होंने इसके लिए काम नहीं किया और तैयारी नहीं की। और इसलिए भी कि वे अल्लाह के तर्कों और प्रमाणों को नकारते तथा यह जानने के बावजूद कि वह सत्य है उसका इनकार करते थे।
आयत 52
وَلَقَدْ جِئْنَـٰهُم بِكِتَـٰبٍۢ فَصَّلْنَـٰهُ عَلَىٰ عِلْمٍ هُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْنَـٰهُم
लाए हम उनके पास
بِكِتَـٰبٍۢ
एक किताब
فَصَّلْنَـٰهُ
खोल कर बयान किया हमने उसे
عَلَىٰ
with
عِلْمٍ
इल्म की बिना पर
هُدًۭى
हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान रखते हैं
और निश्चय ही हम उनके पास एक ऐसी किताब ले आए है, जिसे हमने ज्ञान के आधार पर विस्तृत किया है, जो ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है
तफ़्सीर:
निश्चय हम उनके पास यह क़ुरआन लाए हैं, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी गई एक किताब है। हमने उसे अपने ज्ञान के आधार पर स्पष्ट रूप से बयान किया है। यह किताब मोमिनों को धार्मिकता और सच्चाई के मार्ग पर ले जाने वाली है, तथा उनके लिए एक दया है क्योंकि इसमें दुनिया और आख़िरत की भलाई के बारे में मार्गदर्शन मौजूद है।
आयत 53
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا تَأْوِيلَهُۥ ۚ يَوْمَ يَأْتِى تَأْوِيلُهُۥ يَقُولُ ٱلَّذِينَ نَسُوهُ مِن قَبْلُ قَدْ جَآءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِٱلْحَقِّ فَهَل لَّنَا مِن شُفَعَآءَ فَيَشْفَعُوا۟ لَنَآ أَوْ نُرَدُّ فَنَعْمَلَ غَيْرَ ٱلَّذِى كُنَّا نَعْمَلُ ۚ قَدْ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
هَلْ
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार करते
إِلَّا
मगर
تَأْوِيلَهُۥ ۚ
उसके अंजाम का
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتِى
आ जाएगा
تَأْوِيلُهُۥ
अंजाम उसका
يَقُولُ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जो
نَسُوهُ
भूल गए थे उसे
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَتْ
लाए थे
رُسُلُ
रसूल
رَبِّنَا
हमारे रब के
بِٱلْحَقِّ
हक़
فَهَل
पस क्या हैं
لَّنَا
हमारे लिए
مِن
any
شُفَعَآءَ
कोई सिफ़ारिशी
فَيَشْفَعُوا۟
कि वो सिफ़ारिश करें
لَنَآ
हमारे लिए
أَوْ
या
نُرَدُّ
हम लौटाए जाऐं
فَنَعْمَلَ
फिर हम अमल करें
غَيْرَ
अलावा
ٱلَّذِى
उसके जो
كُنَّا
थे हम
نَعْمَلُ ۚ
हम अमल करते
قَدْ
तहक़ीक़
خَسِرُوٓا۟
उन्होंने ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَضَلَّ
और खो गए
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ते
क्या वे लोग केवल इसी की प्रतीक्षा में है कि उसकी वास्तविकता और परिणाम प्रकट हो जाए? जिस दिन उसकी वास्तविकता सामने आ जाएगी, तो वे लोग इससे पहले उसे भूले हुए थे, बोल उठेंगे, "वास्तव में, हमारे रब के रसूल सत्य लेकर आए थे। तो क्या हमारे कुछ सिफ़ारिशी है, जो हमारी सिफ़ारिश कर दें या हमें वापस भेज दिया जाए कि जो कुछ हम करते थे उससे भिन्न कर्म करें?" उन्होंने अपने आपको घाटे में डाल दिया और जो कुछ वे झूठ घढ़ते थे, वे सब उनसे गुम होकर रह गए
तफ़्सीर:
काफ़िर लोग केवल उस दर्दनाक यातना के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिसके बारे में उन्हें बताया गया है और जो आख़िरत में उनका अंजाम होने वाले है। जिस दिन वह यातना आ जाएगी जिसके बारे में उन्हें बताया गया है और वह प्रतिफल भी सामने आ जाएगा जिसके बारे में ईमान वालों को बताया गया है, तो वे लोग जिन्होंने इस दुनिया में क़ुरआन को भुला दिया और उसके निर्देशों के अनुसार काम नहीं किया, कहेंगे : निश्चय हमारे रब के रसूल उस सच्चाई के साथ आए थे जिसमें कोई संदेह नहीं, और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह अल्लाह की ओर से है। तो काश! हमारे लिए कोई मध्यस्थ होते जो हमारे लिए अल्लाह के पास सिफ़ारिश करते कि वह हमें यातना से मुक्त कर दे, या काश! हम दुनिया के जीवन में वापस भेज दिए जाते ताकि हम उन बुरे कामों के बजाय जो हम किया करते थे, अच्छे कर्म करके मोक्ष प्राप्त कर लेते। इन काफ़िरों ने अपने कुफ़्र के कारण अपने आपको विनाश के संसाधनों पर लाकर खुद को घाटे में डाल दिया, और जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा करते थे, वे उनसे लुप्त हो गए, इसलिए वे उनके कुछ भी काम न आए।
आयत 54
إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ يُغْشِى ٱلَّيْلَ ٱلنَّهَارَ يَطْلُبُهُۥ حَثِيثًۭا وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ وَٱلنُّجُومَ مُسَخَّرَٰتٍۭ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ أَلَا لَهُ ٱلْخَلْقُ وَٱلْأَمْرُ ۗ تَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكُمُ
रब तुम्हारा
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ٱلَّذِى
जिस ने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छः दिनों में
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰ
वो बुलन्द हुआ
عَلَى
on
ٱلْعَرْشِ
अर्श पर
يُغْشِى
वो ढाँप देता है
ٱلَّيْلَ
रात को
ٱلنَّهَارَ
दिन पर
يَطْلُبُهُۥ
जो तलब करता है उसे
حَثِيثًۭا
तेज़ी से
وَٱلشَّمْسَ
और सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद
وَٱلنُّجُومَ
और सितारे
مُسَخَّرَٰتٍۭ
जो मुसख़्ख़र किए हुए हैं
بِأَمْرِهِۦٓ ۗ
उसके हुक्म के
أَلَا
ख़बरदार
لَهُ
उसके लिए है
ٱلْخَلْقُ
पैदा करना
وَٱلْأَمْرُ ۗ
और हुक्म देना
تَبَارَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छह दिनों में पैदा किया - फिर राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। वह रात को दिन पर ढाँकता है जो तेज़ी से उसका पीछा करने में सक्रिय है। और सूर्य, चन्द्रमा और तारे भी बनाए, इस प्रकार कि वे उसके आदेश से काम में लगे हुए है। सावधान रहो, उसी की सृष्टि है और उसी का आदेश है। अल्लाह सारे संसार का रब, बड़ी बरकतवाला है
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ लोगो!) तुम्हारा रब वह अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को बिना किसी पूर्व उदाहरण के छः दिनों में बनाया। फिर वह सर्वशक्तिमान अपनी महिमा के अनुरूप अर्श पर बुलंद हुआ, जिसकी कैफ़ियत (विवरण) हम नहीं जानते। वह दिन के उजाले से रात के अँधेरे को और रात के अँधेरे से दिन के उजाले को दूर करता है। रात और दिन में से प्रत्येक दूसरे के पीछे इस तरह तेज़ी से पहुँच जाता है कि उससे विलंब नहीं होता। एक गया कि दूसरा आ गया। तथा उस महिमावान ने सूरज बनाया, चाँद बनाया और सितारे बनाए, इस हाल में कि वे उसके आदेश के अधीन किए हुए हैं। सुन लो! सारी चीज़ों का पैदा करना केवल अल्लाह ही का काम है, तो क्या उसके अलावा भी कोई पैदा करने वाला है?! तथा केवल उसी का काम है आदेश देना। उसकी भलाई महान और उसका उपकार बहुत अधिक है। क्योंकि वह ऐश्वर्य और पूर्णता के गुणों से विशेषित है, जो सारे संसारों का पालनहार है।
आयत 55
ٱدْعُوا۟ رَبَّكُمْ تَضَرُّعًۭا وَخُفْيَةً ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ
ٱدْعُوا۟
पुकारो
رَبَّكُمْ
अपने रब को
تَضَرُّعًۭا
आजिज़ी से
وَخُفْيَةً ۚ
और चुपके-चुपके
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْمُعْتَدِينَ
हद से तजावुज़ करने वालों को
अपने रब को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) अपने रब को पूरी विनम्रता के साथ और गुप्त रूप से पुकारो, निष्ठावान होकर केवल उसी से दुआ करो, दिखावा करने वाले या दुआ में उसके साथ किसी को साझी करने वाले न हो। निःसंदेह वह उन लोगों को पसंद नहीं करता, जो दुआ में उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं, और दुआ में उसकी सीमाओं का सबसे बड़ा उल्लंघन उसके साथ किसी अन्य को पुकारना है, जैसा कि बहुदेववादी करते हैं।
आयत 56
وَلَا تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَـٰحِهَا وَٱدْعُوهُ خَوْفًۭا وَطَمَعًا ۚ إِنَّ رَحْمَتَ ٱللَّهِ قَرِيبٌۭ مِّنَ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَلَا
और ना
تُفْسِدُوا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بَعْدَ
after
إِصْلَـٰحِهَا
बाद उसकी इस्लाह के
وَٱدْعُوهُ
और पुकारो उसे
خَوْفًۭا
ख़ौफ
وَطَمَعًا ۚ
और उम्मीद से
إِنَّ
बेशक
رَحْمَتَ
रहमत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
قَرِيبٌۭ
क़रीब है
مِّنَ
for
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों के
और धरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ न पैदा करो। भय और आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है
तफ़्सीर:
तथा पाप करके धरती में बिगाड़ न फैलाओ, जबकि अल्लाह ने रसूलों को भेजकर और उसे केवल अपनी आज्ञाकारिता के साथ आबाद करके उसे सुधारा है। और केवल अल्लाह को पुकारो, उसकी सज़ा से डर महसूस करते हुए, और उसके प्रतिफल के प्राप्त होने की प्रतीक्षा करते हुए। निःसंदेह अल्लाह की दया अच्छे कर्म करने वालों के क़रीब है, अतः तुम भी उन्हीं में शामिल हो जाओ।
आयत 57
وَهُوَ ٱلَّذِى يُرْسِلُ ٱلرِّيَـٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَقَلَّتْ سَحَابًۭا ثِقَالًۭا سُقْنَـٰهُ لِبَلَدٍۢ مَّيِّتٍۢ فَأَنزَلْنَا بِهِ ٱلْمَآءَ فَأَخْرَجْنَا بِهِۦ مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ ۚ كَذَٰلِكَ نُخْرِجُ ٱلْمَوْتَىٰ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُرْسِلُ
भेजता है
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
بُشْرًۢا
ख़ुशख़बरी बनाकर
بَيْنَ
from
يَدَىْ
आगे-आगे
رَحْمَتِهِۦ ۖ
अपनी रहमत के
حَتَّىٰٓ
हत्ता कि
إِذَآ
जब
أَقَلَّتْ
वो उठा लेती हैं
سَحَابًۭا
बादल
ثِقَالًۭا
बोझल
سُقْنَـٰهُ
चलाते/हाँकते हैं हम उसे
لِبَلَدٍۢ
तरफ़ ज़मीन
مَّيِّتٍۢ
मुर्दा के
فَأَنزَلْنَا
फिर उतारते हैं हम
بِهِ
साथ इसके
ٱلْمَآءَ
पानी को
فَأَخْرَجْنَا
फिर निकालते हैं हम
بِهِۦ
साथ इसके
مِن
(of)
كُلِّ
all (kinds)
ٱلثَّمَرَٰتِ ۚ
हर तरह के फलों से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نُخْرِجُ
हम निकालेंगे
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
और वही है जो अपनी दयालुता से पहले शुभ सूचना देने को हवाएँ भेजता है, यहाँ तक कि जब वे बोझल बादल को उठा लेती है तो हम उसे किसी निर्जीव भूमि की ओर चला देते है, फिर उससे पानी बरसाते है, फिर उससे हर तरह के फल निकालते है। इसी प्रकार हम मुर्दों को मृत अवस्था से निकालेगे - ताकि तुम्हें ध्यान हो
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही है जो बारिश की शुभ सूचना देने वाली हवाओं को भेजता है, यहाँ तक कि जब हवाएँ पानी से लदे बादल को उठाती हैं, तो हम बादल को किसी बंजर भूमि की ओर ले जाते हैं। फिर हम उस भूमि पर पानी बरसाते हैं। फिर पानी से सभी प्रकार के कुछ फल पैदा करते हैं। इस रूप से फल को निकालने के समान ही, हम मृतकों को उनकी कब्रों से जीवित करके निकालेंगे। हमने ऐसा इस आशा में किया है कि (ऐ लोगो!) तुम अल्लाह की शक्ति और उसके अद्भुत कार्य को याद रखो, और यह कि वह मरे हुओं को पुनर्जीवित करने में सक्षम है।
आयत 58
وَٱلْبَلَدُ ٱلطَّيِّبُ يَخْرُجُ نَبَاتُهُۥ بِإِذْنِ رَبِّهِۦ ۖ وَٱلَّذِى خَبُثَ لَا يَخْرُجُ إِلَّا نَكِدًۭا ۚ كَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَشْكُرُونَ
وَٱلْبَلَدُ
और ज़मीन
ٱلطَّيِّبُ
पाकीज़ा
يَخْرُجُ
निकलती है
نَبَاتُهُۥ
नबातात उसकी
بِإِذْنِ
इज़्न से
رَبِّهِۦ ۖ
उसके रब के
وَٱلَّذِى
और वो जो
خَبُثَ
ख़राब हो गई
لَا
(does) not
يَخْرُجُ
नहीं निकलती (उससे)
إِلَّا
मगर
نَكِدًۭا ۚ
नाक़िस
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نُصَرِّفُ
हम फेर-फेर कर लाते है
ٱلْـَٔايَـٰتِ
निशानियाँ
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَشْكُرُونَ
जो शुक्र करते हैं
और अच्छी भूमि के पेड़-पौधे उसके रब के आदेश से निकलते है और जो भूमि ख़राब हो गई है तो उससे निकम्मी पैदावार के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। इसी प्रकार हम निशानियों को उन लोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते है, जो कृतज्ञता दिखानेवाले है
तफ़्सीर:
अच्छी भूमि अल्लाह की अनुमति से अपने पौधे अच्छे और पूर्ण रूप से निकालती है। यही हाल ईमान वाले का है, वह उपदेश को सुनता और उससे लाभ उठाता है, जिसके परिणामस्वरूप वह अच्छे कार्य करता है। जबकि दलदली और खारी भूमि अपना पौधा कठिनाई से निकालती है, जिसमें कोई अच्छाई नहीं होती। यही हाल काफ़िर का है, वह उपदेशों से लाभ नहीं उठाता है, इसलिए उसके परिणामस्वरूप वह नेक कार्य नहीं करता है, जिससे उसे लाभ प्राप्त हो। इस अद्भुत विविधीकरण की तरह, हम उन लोगों के लिए सत्य को साबित करने के लिए प्रमाणों और तर्कों में विविधता लाते हैं, जो अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करते हैं। इसलिए वे उनकी नाशुक्री नहीं करते हैं, और अपने रब की आज्ञा का पालन करते हैं।
आयत 59
لَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَقَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
نُوحًا
नूह को
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
तरफ़ उसकी क़ौम के
فَقَالَ
तो उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह
غَيْرُهُۥٓ
उसके सिवा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of the) Day
عَظِيمٍۢ
बड़े दिन के
हमने नूह को उसकी क़ौम के लोगों की ओर भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। मैं तुम्हारे लिए एक बड़े दिन का यातना से डरता हूँ।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने नूह को उनकी जाति की ओर रसूल बनाकर भेजा, जो उन्हें अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानने और उसके अलावा की पूजा छोड़ने के लिए बुला रहे थे। चुनाँचे उन्होंने अपनी जाति से कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! केवल अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि उसके सिवा तुम्हारा कोई सत्य पूज्य नहीं है। निश्चय मुझे तुमपर एक महान दिन की यातना का डर है, यदि तुम अपने कुफ़्र पर अड़े रहे।
आयत 60
قَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِهِۦٓ إِنَّا لَنَرَىٰكَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
قَالَ
कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
مِن
of
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम में से
إِنَّا
बेशक हम
لَنَرَىٰكَ
अलबत्ता हम देखते हैं तुझे
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली-खुली
उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हम तो तुम्हें खुली गुमराही में पड़ा देख रहे है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के सरदारों और प्रमुखों ने उनसे कहा : निःसंदेह (ऐ नूह!) हम तुम्हें सत्य से स्पष्ट दूरी पर देख रहे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात की तख्लीक और दुआ के आदाब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुआ मांगते वक्त गिड़गिड़ाकर और आहिस्ता मांगनी चाहिए, हद से तजावुज़ नहीं करनी चाहिए।
आयत 61
قَالَ يَـٰقَوْمِ لَيْسَ بِى ضَلَـٰلَةٌۭ وَلَـٰكِنِّى رَسُولٌۭ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَيْسَ
नहीं है
بِى
मुझ में
ضَلَـٰلَةٌۭ
कोई गुमराही
وَلَـٰكِنِّى
और लेकिन मैं
رَسُولٌۭ
रसूल हूँ
مِّن
from
رَّبِّ
(the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन की तरफ़ से
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! किसी गुमराही का मुझसे सम्बन्ध नहीं, बल्कि मैं सारे संसार के रब का एक रसूल हूँ। -
तफ़्सीर:
नूह ने अपनी जाति के प्रमुखों से कहा : जैसा तुम कहते हो, मैं पथभ्रष्ट नहीं हूँ। मैं तो अपने रब की ओर से मार्गदर्शन पर हूँ। क्योंकि मैं उस अल्लाह की ओर से तुम्हारी ओर भेजा हुआ (रसूल) हूँ, जो मेरा रब, तुम्हारा रब और सारे संसारों का रब है।
आयत 62
أُبَلِّغُكُمْ رِسَـٰلَـٰتِ رَبِّى وَأَنصَحُ لَكُمْ وَأَعْلَمُ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
أُبَلِّغُكُمْ
मैं पहुँचाता हूँ तुम्हें
رِسَـٰلَـٰتِ
पैग़ामात
رَبِّى
अपने रब के
وَأَنصَحُ
और मैं ख़ैरख़्वाही करता हूँ
لَكُمْ
तुम्हारी
وَأَعْلَمُ
और मैं जानता हूँ
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
"अपने रब के सन्देश पहुँचता हूँ और तुम्हारा हित चाहता हूँ, और मैं अल्लाह की ओर से वह कुछ जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने मेरी ओर जो वह़्य की है, उसमें से जिसके साथ अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है, उसे मैं तुम्हें पहुँचाता हूँ। तथा तुम्हें अल्लाह के आदेश का पालन करने और उसपर निष्कर्षित होने वाले प्रतिफल के लिए प्रोत्साहित करके, तथा तुम्हें उसके निषेधों को करने और उसपर निष्कर्षित होने वाले दंड से भयभीत करके, मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ। और मैं सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से वह (बातें) जानता हूँ जो तुम नहीं जानते, जो उसने मुझे वह़्य के माध्यम से सिखाया है।
आयत 63
أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَآءَكُمْ ذِكْرٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍۢ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوا۟ وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
أَوَعَجِبْتُمْ
क्या भला ताज्जुब हुआ तुम्हें
أَن
कि
جَآءَكُمْ
आई तुम्हारे पास
ذِكْرٌۭ
एक नसीहत
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
عَلَىٰ
on
رَجُلٍۢ
एक शख़्स पर
مِّنكُمْ
तुम ही में से
لِيُنذِرَكُمْ
ताकि वो डराए तुम्हें
وَلِتَتَّقُوا۟
और ताकि तुम बचो
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इस पार आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई? ताकि वह तुम्हें सचेत कर दे और ताकि तुम डर रखने लगो और शायद कि तुमपर दया की जाए
तफ़्सीर:
क्या यह बात तुम्हारे आश्चर्य और विस्मय का कारण है कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से वह़्य तथा उपदेश तुममें से एक ऐसे व्यक्ति द्वारा आया, जिसे तुम पहचानते हो?! क्योंकि वह तुम्हारे ही बीच पला-बढ़ा, और वह न तो झूठा था, न पथभ्रष्ट था, न ही किसी अन्य जाति का था। वह तुम्हारे पास तुम्हें अल्लाह की सज़ा से डराने के लिए आया था, यदि तुमने झुठलाया और अवज्ञा किया, और ताकि तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरो, तथा इस आशा में कि तुम पर दया की जाए, अगर तुम उसपर ईमान ले आओ।
आयत 64
فَكَذَّبُوهُ فَأَنجَيْنَـٰهُ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ وَأَغْرَقْنَا ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًا عَمِينَ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठला दिया उसे
فَأَنجَيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَٱلَّذِينَ
और उन्हें जो
مَعَهُۥ
उसके साथ थे
فِى
in
ٱلْفُلْكِ
कश्ती में
وَأَغْرَقْنَا
और ग़र्क़ कर दिया हमने
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَآ ۚ
हमारी आयात को
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَوْمًا
लोग
عَمِينَ
अँधे
किन्तु उन्होंने झुठला दिया। अन्ततः हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ एक नौका में थे, बचा लिया और जिन लोगों ने हमारी आयतों को ग़लत समझा, उन्हें हमने डूबो दिया। निश्चय ही वे अन्धे लोग थे
तफ़्सीर:
परंतु उनकी क़ौम ने उन्हें झुठला दिया और उनपर ईमान न लाए, बल्कि अपने कुफ़्र पर बने रहे। इसलिए नूह अलैहिस्सलाम ने उनपर बद्दुआ की कि अल्लाह उन्हें विनष्ट कर दे। अतः हमने उन्हें और उनके साथ नाव में सवार मोमिनों को डूबने से बचा लिया और उन लोगों को, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और अपने झुठलाने की रीति पर बने रहे, उनके लिए दंड के रूप में उतरने वाले तूफ़ान (बाढ़) में डुबोकर नष्ट कर दिया। निश्चय उनके हृदय सत्य से अंधे थे।
आयत 65
۞ وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًۭا ۗ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ
۞ وَإِلَىٰ
और तरफ़
عَادٍ
आद के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
هُودًۭا ۗ
हूद को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
not
لَكُم
नहीं तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥٓ ۚ
उसके सिवा
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
और आद की ओर उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तो क्या (इसे सोचकर) तुम डरते नहीं?"
तफ़्सीर:
और हमने आद के गोत्र की ओर उन्ही में से एक व्यक्ति हूद - अलैहिस्सलाम - को रसूल बनाकर भेजा। उन्होंने कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! केवल अल्लाह की इबादत करो। क्योंकि उसके सिवा तुम्हारा कोई सत्य पूज्य नहीं। तो क्या तुम उसके आदेशों का पालन करके तथा उसके निषेधों से बचकर, उससे नहीं डरते, ताकि तुम उसकी यातना से बच जाओ?!
आयत 66
قَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦٓ إِنَّا لَنَرَىٰكَ فِى سَفَاهَةٍۢ وَإِنَّا لَنَظُنُّكَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
قَالَ
कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया था
مِن
from
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम में से
إِنَّا
बेशक हम
لَنَرَىٰكَ
अलबत्ता हम देखते हैं तुझे
فِى
in
سَفَاهَةٍۢ
बेवक़ूफी में
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَظُنُّكَ
अलबत्ता हम गुमान करते हैं तुझे
مِنَ
(are) of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों में से
उसकी क़ौम के इनकार करनेवाले सरदारों ने कहा, "वास्तव में, हम तो देखते है कि तुम बुद्धिहीनता में ग्रस्त हो और हम तो तुम्हें झूठा समझते है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के प्रमुख तथा सरदार, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया और उसके रसूल को झुठलाया था, कहने लगे : निश्चय हम जानते हैं कि (ऐ हूद!) तुम मंदबुद्धिता और मूर्खता से ग्रस्त हो, जब तुम हमें अकेले अल्लाह की इबादत करने और मूर्तिपूजा को त्यागने के लिए आमंत्रित करते हो। तथा हमारा निश्चित रूप से मानना है कि तुम अपने रसूल होने के दावे में बिलकुल झूठे हो।
आयत 67
قَالَ يَـٰقَوْمِ لَيْسَ بِى سَفَاهَةٌۭ وَلَـٰكِنِّى رَسُولٌۭ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَيْسَ
नहीं है
بِى
मुझ में
سَفَاهَةٌۭ
कोई बेवक़ूफ़ी
وَلَـٰكِنِّى
और लेकिन मैं तो
رَسُولٌۭ
रसूल हूँ
مِّن
from
رَّبِّ
(the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन की तरफ़ से
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं बुद्धिहीनता में कदापि ग्रस्त नहीं हूँ। परन्तु मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ।-
तफ़्सीर:
हूद ने अपनी क़ौम को उत्तर देते हुए कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे अंदर कोई मंदबुद्धिता और मूर्खता नहीं है। बल्कि मैं सारे संसारों के पालनहार की ओर से भेजा हुआ (दूत) हूँ।
आयत 68
أُبَلِّغُكُمْ رِسَـٰلَـٰتِ رَبِّى وَأَنَا۠ لَكُمْ نَاصِحٌ أَمِينٌ
أُبَلِّغُكُمْ
मैं पहुँचाता हूँ तुम्हें
رِسَـٰلَـٰتِ
पैग़ामात
رَبِّى
अपने रब के
وَأَنَا۠
और मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
نَاصِحٌ
ख़ैरख़्वाह हूँ
أَمِينٌ
अमानतदार हूँ
"तुम्हें अपने रब के संदेश पहुँचता हूँ और मैं तुम्हारा विश्वस्त हितैषी हूँ
तफ़्सीर:
मैं तुम्हें अल्लाह की वह तौहीद (एकेश्वरवाद) और उसकी शरीयत पहुँचाता हूँ, जिसका उसने मुझे तुमको पहुँचाने का आदेश दिया है, तथा जो मुझे पहुँचाने का आदेश दिया गया है, उसमें मैं तुम्हारा विश्वस्त हितैषी हूँ, न तो उसमें कुछ वृद्धि करता हूँ और न ही उसमें कमी करता हूँ।
आयत 69
أَوَعَجِبْتُمْ أَن جَآءَكُمْ ذِكْرٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍۢ مِّنكُمْ لِيُنذِرَكُمْ ۚ وَٱذْكُرُوٓا۟ إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَآءَ مِنۢ بَعْدِ قَوْمِ نُوحٍۢ وَزَادَكُمْ فِى ٱلْخَلْقِ بَصْۜطَةًۭ ۖ فَٱذْكُرُوٓا۟ ءَالَآءَ ٱللَّهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
أَوَعَجِبْتُمْ
क्या भला ताज्जुब हुआ तुम्हें
أَن
कि
جَآءَكُمْ
आई तुम्हारे पास
ذِكْرٌۭ
एक नसीहत
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
عَلَىٰ
on
رَجُلٍۢ
एक शख़्स पर
مِّنكُمْ
तुम में से
لِيُنذِرَكُمْ ۚ
ताकि वो डराए तुम्हें
وَٱذْكُرُوٓا۟
और याद करो
إِذْ
जब
جَعَلَكُمْ
उसने बनाया तुम्हें
خُلَفَآءَ
जानशीन
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
قَوْمِ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह के
وَزَادَكُمْ
और उसने ज़्यादा दी तुम्हें
فِى
in
ٱلْخَلْقِ
तख़्लीक़ में
بَصْۜطَةًۭ ۖ
फ़राख़ी/फैलाव
فَٱذْكُرُوٓا۟
पस याद करो
ءَالَآءَ
नेअमतों को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फलाह पा जाओ
"क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इसपर आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई, ताकि वह तुम्हें सचेत करे? और याद करो, जब उसने नूह की क़ौम के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और शारीरिक दृष्टि से भी तुम्हें अधिक विशालता प्रदान की। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारो को याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।"
तफ़्सीर:
क्या तुम्हें इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से एक ऐसे व्यक्ति के माध्यम से सदुपदेश आया जो तुम्हारी ही जाति में से है, फ़रिश्तों या जिन्नो की जाति से नहीं है, ताकि वह तुम्हें सचेत करे?! तुम अपने पालनहार की स्तुति करो और उसका शुक्र अदा करो कि उसने तुम्हें धरती में प्रभुत्व प्रदान किया और तुम्हें नूह की जाति का उत्तराधिकारी बनाया, जिन्हें अल्लाह ने उनके कुफ़्र के कारण नष्ट कर दिया था। तथा अल्लाह का शुक्र अदा करो कि उसने तुम्हें भारी-भरकम डील-डौल और शक्ति-बल प्रदान की, और अपने ऊपर अल्लाह की विशाल नेमतों को याद करो, इस आशा में कि तुम अपनी वांछित चीज़ को प्राप्त कर सको और उस चीज़ से बच सको जिससे तुम डरते हो।
आयत 70
قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ ٱللَّهَ وَحْدَهُۥ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَا ۖ فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَجِئْتَنَا
क्या तू आया है हमारे पास
لِنَعْبُدَ
कि हम इबादत करें
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَحْدَهُۥ
अकेले उसी की
وَنَذَرَ
और हम छोड़ दें
مَا
जिनकी
كَانَ
थे
يَعْبُدُ
इबादत करते
ءَابَآؤُنَا ۖ
हमारे आबा ओ अजदाद
فَأْتِنَا
पस ले आओ हमारे पास
بِمَا
उसे जो
تَعِدُنَآ
तू धमकी देता है हमें
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
वे बोले, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि अकेले अल्लाह की हम बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे है, उन्हें छोड़ दें? अच्छा, तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, उसे हमपर ले आओ, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : (ऐ हूद!) क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमें अकेले अल्लाह की इबादत का आदेश दो, और ताकि हम उन्हें छोड़ दें जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते थे?! तो हमपर वह अज़ाब ले आओ जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कौम के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक की दावत में सब्र और मुसलसल कोशिश ज़रूरी है, चाहे कौम कितनी भी मुखालिफत करे।
आयत 71
قَالَ قَدْ وَقَعَ عَلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ رِجْسٌۭ وَغَضَبٌ ۖ أَتُجَـٰدِلُونَنِى فِىٓ أَسْمَآءٍۢ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّا نَزَّلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍۢ ۚ فَٱنتَظِرُوٓا۟ إِنِّى مَعَكُم مِّنَ ٱلْمُنتَظِرِينَ
قَالَ
उसने कहा
قَدْ
तहक़ीक़
وَقَعَ
पड़ चुकी
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
رِجْسٌۭ
नापाकी/गन्दगी
وَغَضَبٌ ۖ
और ग़ज़ब
أَتُجَـٰدِلُونَنِى
क्या तुम झगड़ते हो मुझसे
فِىٓ
concerning
أَسْمَآءٍۢ
चंद नामों के बारे में
سَمَّيْتُمُوهَآ
नाम रख लिया तुमने उनका
أَنتُمْ
तुमने
وَءَابَآؤُكُم
और तुम्हारे आबा ओ अजदाद ने
مَّا
नहीं
نَزَّلَ
उतारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَا
इसकी
مِن
any
سُلْطَـٰنٍۢ ۚ
कोई दलील
فَٱنتَظِرُوٓا۟
पस इन्तिज़ार करो
إِنِّى
बेशक मैं
مَعَكُم
साथ तुम्हारे
مِّنَ
of
ٱلْمُنتَظِرِينَ
इन्तिज़ार करने वालों में से हूँ
उसने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की ओर से नापाकी थोप दी गई है और प्रकोप टूट पड़ा है। क्या तुम मुझसे उन नामों के लिए झगड़ते हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े है, जिनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा? अच्छा, तो तुम भी प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
तफ़्सीर:
हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा : निश्चय तुम अल्लाह की यातना और प्रकोप के हक़दार बन चुके हो, इसलिए वह निश्चित रूप से तुमपर टूट पड़ने वाला है। क्या तुम मुझसे उन मूर्तियों के बारे में बहस करते हो, जिन्हें तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने पूज्य का नाम दे दिया है, जबकि उनकी कोई वास्तविकता नहीं है?! क्योंकि अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा है, जिसे तुम इनके पूज्य होने के अपने दावे पर तर्क बना सको। अतः जिस यातना को जल्दी लाने की तुमने माँग की है, उसकी प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालों में से हूँ। क्योंकि उसे तो आना ही है।
आयत 72
فَأَنجَيْنَـٰهُ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍۢ مِّنَّا وَقَطَعْنَا دَابِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا ۖ وَمَا كَانُوا۟ مُؤْمِنِينَ
فَأَنجَيْنَـٰهُ
पस निजात दे दी हमने उसे
وَٱلَّذِينَ
और उन्हें जो
مَعَهُۥ
उसके साथ थे
بِرَحْمَةٍۢ
साथ रहमत के
مِّنَّا
अपनी तरफ़ से
وَقَطَعْنَا
और काट दी हमने
دَابِرَ
जड़
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا ۖ
हमारी आयात को
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
फिर हमने अपनी दयालुता से उसको और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया और उन लोगों की जड़ काट दी, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था और ईमानवाले न थे
तफ़्सीर:
अंततः हमने हूद - अलैहिस्सलाम - तथा उनके साथ जो मोमिन थे, उन्हें अपनी दया से बचा लिया और उन लोगों को नष्ट कर दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया। वे ईमान वाले न थे, बल्कि वे झुठलाने वाले थे। इस कारण वे यातना के भागी थे।
आयत 73
وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَـٰلِحًۭا ۗ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ قَدْ جَآءَتْكُم بَيِّنَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ هَـٰذِهِۦ نَاقَةُ ٱللَّهِ لَكُمْ ءَايَةًۭ ۖ فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِىٓ أَرْضِ ٱللَّهِ ۖ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍۢ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَإِلَىٰ
और तरफ़
ثَمُودَ
समूद के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
صَـٰلِحًۭا ۗ
सालेह को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥ ۖ
उसके अलावा
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَتْكُم
आ गई तुम्हारे पास
بَيِّنَةٌۭ
खुली दलील
مِّن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
هَـٰذِهِۦ
ये
نَاقَةُ
ऊँटनी है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَةًۭ ۖ
एक निशानी
فَذَرُوهَا
पस छोड़ दो उसे
تَأْكُلْ
वो चरती फिरे
فِىٓ
on
أَرْضِ
ज़मीन में
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
وَلَا
और ना
تَمَسُّوهَا
तुम छूना उसे
بِسُوٓءٍۢ
साथ बुराई के
فَيَأْخُذَكُمْ
वरना पकड़ लेगा तुम्हें
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
और समूद की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। अतः इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए। और तकलीफ़ पहुँचाने के लिए इसे हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक दुखद यातना आ लेगी।-
तफ़्सीर:
और हमने 'समूद' के गोत्र की ओर उनके भाई सालेह - अलैहिस्सलाम - को भेजा, कि वह उन्हें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) और उसकी इबादत की ओर बुलाएँ। सालेह ने उनसे कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! केवल अल्लाह की इबादत करो। क्योंकि तुम्हारे लिए उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, जो इबादत के योग्य हो। तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से उस चीज़ की सच्चाई पर स्पष्ट निशानी आ चुकी है, जो कुछ मैं तुम्हारे पास लेकर आया हूँ, जो एक चट्टान से निकलने वाली एक ऊँटनी के रूप में है। उसके पानी पीने का एक समय निर्धारित है और तुम्हारे पीने का भी एक ज्ञात दिन है। अतः उसे अल्लाह की भूमि में खाने के लिए छोड़ दो, क्योंकि तुमपर इसके भोजन में से किसी चीज़ की ज़िम्मेदारी नहीं है, तथा उसे कोई नुक़सान न पहुँचाओ। क्योंकि उसे नुक़सान पहुँचाने के कारण तुम्हें दर्दनाक यातना का सामना करना पड़ेगा।
आयत 74
وَٱذْكُرُوٓا۟ إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَآءَ مِنۢ بَعْدِ عَادٍۢ وَبَوَّأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ تَتَّخِذُونَ مِن سُهُولِهَا قُصُورًۭا وَتَنْحِتُونَ ٱلْجِبَالَ بُيُوتًۭا ۖ فَٱذْكُرُوٓا۟ ءَالَآءَ ٱللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
وَٱذْكُرُوٓا۟
और याद करो
إِذْ
जब
جَعَلَكُمْ
उसने बनाया तुम्हें
خُلَفَآءَ
जानशीन
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
عَادٍۢ
आद के
وَبَوَّأَكُمْ
और उसने ठिकाना दिया तुम्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
تَتَّخِذُونَ
तुम बनाते हो
مِن
from
سُهُولِهَا
उसकी नर्म मिट्टी से
قُصُورًۭا
महल्लात
وَتَنْحِتُونَ
और तुम तराशते हो
ٱلْجِبَالَ
पहाड़ों को
بُيُوتًۭا ۖ
घरों में
فَٱذْكُرُوٓا۟
पस याद करो
ءَالَآءَ
नेअमतों को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَلَا
और ना
تَعْثَوْا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُفْسِدِينَ
मुफ़सिद बनकर
और याद करो जब अल्लाह ने आद के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और धरती में तुम्हें ठिकाना प्रदान किया। तुम उसके समतल मैदानों में महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-छाँट कर भवनों का रूप देते हो। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारों को याद करो और धरती में बिगाड़ पैदा करते न फिरो।"
तफ़्सीर:
अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो, जब उसने तुम्हें 'आद' जाति का उत्तराधिकारी बनाया और तुम्हें तुम्हारी भूमि में उतारा, जिससे तुम लाभान्वित होते हो और अपने उद्देश्यों को प्राप्त करते हो। ऐसा आद जाति को विनाश करने के बाद हुआ, जब वे अपने कुफ़्र तथा झुठलाने में चरम पर पहुँच गए। तुम पृथ्वी के मैदानों में महलों का निर्माण करते हो और पहाड़ों को तराश कर अपने लिए घर बनाते हो। सो अपने ऊपर अल्लाह की इन नेमतों को याद करो, ताकि उनपर अल्लाह का शुक्रिया अदा कर सको। तथा अल्लाह पर अविश्वास और पापों को त्यागकर, धरती में बिगाड़ फैलाना छोड़ दो।
आयत 75
قَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ لِلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا۟ لِمَنْ ءَامَنَ مِنْهُمْ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ صَـٰلِحًۭا مُّرْسَلٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ ۚ قَالُوٓا۟ إِنَّا بِمَآ أُرْسِلَ بِهِۦ مُؤْمِنُونَ
قَالَ
कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوا۟
तकब्बुर किया
مِن
among
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
لِلَّذِينَ
उन्हें जो
ٱسْتُضْعِفُوا۟
कमज़ोर समझे जाते थे
لِمَنْ
उनको जो
ءَامَنَ
ईमान ले आए थे
مِنْهُمْ
उनमें से
أَتَعْلَمُونَ
क्या तुम जानते हो
أَنَّ
बेशक
صَـٰلِحًۭا
सालेह
مُّرْسَلٌۭ
भेजा हुआ है
مِّن
from
رَّبِّهِۦ ۚ
अपने रब की तरफ़ से
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
بِمَآ
साथ उस चीज़ के जो
أُرْسِلَ
वो भेजा गया
بِهِۦ
उस पर
مُؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले हैं
उसकी क़ौम के सरदार, जो बड़े बने हुए थे, उन कमज़ोर लोगों से, जो उनमें ईमान लाए थे, कहने लगे, "क्या तुम जानते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ (पैग़म्बर) है?" उन्होंने कहा, "निस्संदेह जिस चीज़ के साथ वह भेजा गया है, हम उसपर ईमान रखते है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के घमंडी प्रमुखों और सरदारों ने उनकी जाति के मोमिनों से कहा, जिन्हें वे कमज़ोर समझते थे : क्या (ऐ ईमान वालो!) तुम जानते हो कि सालेह सच में अल्लाह का रसूल है? मोमिनों ने उन्हें उत्तर दिया : निःसंदेह सालेह - अलैहिस्सलाम - को जो कुछ देकर हमारी ओर भेजा गया है, हम उसकी पुष्टि करते, स्वीकारते और अनुसरण करते हैं तथा उनकी लाई हुई शरीयत के अनुसार कार्य करने वाले हैं।
आयत 76
قَالَ ٱلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوٓا۟ إِنَّا بِٱلَّذِىٓ ءَامَنتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوٓا۟
तकब्बुर किया
إِنَّا
बेशक हम
بِٱلَّذِىٓ
जिस चीज़ पर
ءَامَنتُم
तुम ईमान लाए हो
بِهِۦ
उसका
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले हैं
उन घमंड करनेवालों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम ईमान लाए हो, हम तो उसको नहीं मानते।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के अभिमानी लोगों ने कहा : निःसंदेह हम उसका इनकार करने वाले हैं, जिसपर (ऐ मोमिनो!) तुम ईमान लाए हो। अतः हम उसपर ईमान नहीं लाएँगे और उसकी शरीयत के अनुसार कार्य नहीं करेंगे।
आयत 77
فَعَقَرُوا۟ ٱلنَّاقَةَ وَعَتَوْا۟ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ وَقَالُوا۟ يَـٰصَـٰلِحُ ٱئْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
فَعَقَرُوا۟
पस उन्होंने कूँचें काट डालीं
ٱلنَّاقَةَ
ऊँटनी की
وَعَتَوْا۟
और उन्होंने सरकशी की
عَنْ
towards
أَمْرِ
हुक्म से
رَبِّهِمْ
अपने रब के
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
يَـٰصَـٰلِحُ
ऐ सालेह
ٱئْتِنَا
ले आ हमारे पास
بِمَا
जिसकी
تَعِدُنَآ
तू धमकी देता है हमें
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों में से
फिर उन्होंने उस ऊँटनी की कूचें काट दीं और अपने रब के आदेश की अवहेलना की और बोले, "ऐ सालेह! हमें तू जिस चीज़ की धमकी देता है, उसे हमपर ले आ, यदि तू वास्तव में रसूलों में से है।"
तफ़्सीर:
फिर उन्होंने अहंकार में आकर अल्लाह के आदेश की अवहेलना करते हुए, उस ऊँटनी का वध कर दिया, जिसे सालेह अलैहिस्सलाम ने कोई नुक़सान पहुँचाने से उन्हें मना किया था। तथा सालेह अलैहिस्सलाम ने उन्हें जिस चीज़ की धमकी दी थी, उसका मज़ाक़ उड़ाते हुए और उसे खारिज करते हुए उन्होंने कहा : ऐ सालेह! यदि तू वास्तव में अल्लाह के रसूलों में से है, तो वह दर्दनाक यातना हमपर ले आ, जिसकी तूने हमें धमकी दी थी।
आयत 78
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دَارِهِمْ جَـٰثِمِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ
पस पकड़ लिया उन्हें
ٱلرَّجْفَةُ
ज़लज़ले ने
فَأَصْبَحُوا۟
तो वो हो गए
فِى
in
دَارِهِمْ
अपने घरों में
جَـٰثِمِينَ
औंधे मुँह गिरने वाले
अन्ततः एक हिला मारनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया और वे अपने घरों में आँधे पड़े रह गए
तफ़्सीर:
अतः काफ़िरों पर वह यातना आ गई, जिसके लिए उन्होंने जल्दी मचा रखी थी, जब उन्हें भयंकर भूकंप ने पकड़ लिया। फिर वे इस हाल में गिरे पड़े थे कि उनके मुँह और घुटने भूमि से चिपके हुए थे, और उनमें से कोई भी विनाश से नहीं बचा।
आयत 79
فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَـٰقَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّى وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَـٰكِن لَّا تُحِبُّونَ ٱلنَّـٰصِحِينَ
فَتَوَلَّىٰ
पस वो मुँह मोड़ कर चला गया
عَنْهُمْ
उनसे
وَقَالَ
और कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَبْلَغْتُكُمْ
पहुँचा दिया था मैंने तुम्हें
رِسَالَةَ
पैग़ाम
رَبِّى
अपने रब का
وَنَصَحْتُ
और ख़ैरख़्वाही की मैंने
لَكُمْ
तुम्हारी
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
not
تُحِبُّونَ
नहीं तुम पसंद करते
ٱلنَّـٰصِحِينَ
नसीहत करने वालों को
फिर वह यह कहता हुआ उनके यहाँ से फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मैं तो तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा चुका और मैंने तुम्हारा हित चाहा। परन्तु तुम्हें अपने हितैषी पसन्द ही नहीं आते।"
तफ़्सीर:
सालेह - अलैहिस्सलाम - अपनी जाति के स्वीकरण से निराश होकर, उनसे मुँह फेर लिए और बोले : ऐ मेरी जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम्हें वह संदेश पहुँचा चुका, जिसे अल्लाह ने मुझे तुम तक पहुँचाने का आदेश दिया था, और तुम्हें कभी प्रेरित करके और कभी भयभीत करके नसीहत की, लेकिन तुम ऐसे लोग हो कि उन नसीहत करने वालों को पसंद नहीं करते, जो तुम्हें भलाई के लिए मार्गदर्शन करने और बुराई से दूर रखने के इच्छुक हैं।
आयत 80
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ أَتَأْتُونَ ٱلْفَـٰحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍۢ مِّنَ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَلُوطًا
और लूत को (भेजा)
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِۦٓ
अपनी क़ौम से
أَتَأْتُونَ
क्या तुम आते हो
ٱلْفَـٰحِشَةَ
बेहयाई को
مَا
नहीं
سَبَقَكُم
सबक़त की तुम पर
بِهَا
साथ इसके
مِنْ
any
أَحَدٍۢ
किसी एक ने
مِّنَ
of
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों में से
और हमने लूत को भेजा। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "क्या तुम वह प्रत्यक्ष अश्लील कर्म करते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले किसी ने नहीं किया?"
तफ़्सीर:
और लूत को याद करो, जब उन्होंने अपनी जाति की निंदा करते हुए कहा : क्या तुम पुरुषों के साथ संभोग का यह घिनौना और निंदनीय काम करते हो?! यह कार्य जो तुमने आविष्कार किया है, तुमसे पहले इसे किसी ने नहीं किया!
आज की ज़िंदगी में सबक़
हूद अलैहिस्सलाम और आद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ताकत और वसाइल पर घमंड करना आखिरकार तबाही की तरफ ले जाता है।
आयत 81
إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلرِّجَالَ شَهْوَةًۭ مِّن دُونِ ٱلنِّسَآءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ مُّسْرِفُونَ
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَتَأْتُونَ
अलबत्ता तुम आते हो
ٱلرِّجَالَ
मर्दों के पास
شَهْوَةًۭ
शहवत के लिए
مِّن
from
دُونِ
अलावा
ٱلنِّسَآءِ ۚ
औरतों के
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
قَوْمٌۭ
लोग हो
مُّسْرِفُونَ
हद से गुज़रने वाले
तुम स्त्रियों को छोड़कर मर्दों से कामेच्छा पूरी करते हो, बल्कि तुम नितान्त मर्यादाहीन लोग हो
तफ़्सीर:
तुम काम-वासना को पूरा करने के लिए पुरुषों के पास आते हो, उन महिलाओं को छोड़कर जिन्हें इसे पूरा करने के लिए बनाया गया है। अतः तुमने अपने इस कार्य में बुद्धि, या धर्म, या मानव प्रकृति का पालन नहीं किया। बल्कि, तुम मानव संयम की सीमा से निकलकर और स्वस्थ बुद्धि् और अच्छी प्रकृति की अपेक्षाओं से विचलित होकर, अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हो।
आयत 82
وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ أَخْرِجُوهُم مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌۭ يَتَطَهَّرُونَ
وَمَا
और ना
كَانَ
था
جَوَابَ
जवाब
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम का
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَخْرِجُوهُم
निकाल दो उन्हें
مِّن
of
قَرْيَتِكُمْ ۖ
अपनी बस्ती से
إِنَّهُمْ
बेशक वो
أُنَاسٌۭ
कुछ लोग हैं
يَتَطَهَّرُونَ
जो बहुत पाक बनते हैं
उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके अतिरिक्त और कुछ न था कि वे बोले, "निकालो, उन लोगों को अपनी बस्ती से। ये ऐसे लोग है जो बड़े पाक-साफ़ है!"
तफ़्सीर:
जब लूत - अलैहिस्सलाम - ने अपनी जाति के इस अनैतिक काम करने वालों का खंडन किया, तो उनका उत्तर इसके सिवा कुछ न था कि उन्होंने सत्य से मुँह मोड़ते हुए कहा : लूत और उसके परिवार को अपने गाँव से निकाल दो। ये ऐसे लोग हैं जो हमारे इस काम से बड़े पाक बनते हैं। इसलिए उनका हमारे बीच रहना हमारे लिए उचित नहीं है।
आयत 83
فَأَنجَيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
فَأَنجَيْنَـٰهُ
पस निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥٓ
और उसके घर वालों को
إِلَّا
सिवाय
ٱمْرَأَتَهُۥ
उसकी बीवी के
كَانَتْ
थी वो
مِنَ
of
ٱلْغَـٰبِرِينَ
पीछे रह जाने वालों में से
फिर हमने उसे और उसके लोगों को छुटकारा दिया, सिवाय उसकी स्त्री के कि वह पीछे रह जानेवालों में से थी
तफ़्सीर:
सो हमने उन्हें और उनके परिवार को बचा लिया, क्योंकि हमने उन्हें रात ही में उस गाँव से निकल जाने का आदेश दे दिया था, जिसपर यातना आने वाली थी। उनकी पत्नी को छोड़कर, जो अपनी जाति के बाकी लोगों के साथ हो गई थी, अतः वह भी उस यातना से पीड़ित हुई, जो उनपर आई थी।
आयत 84
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًۭا ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُجْرِمِينَ
وَأَمْطَرْنَا
और बरसाई हमने
عَلَيْهِم
उन पर
مَّطَرًۭا ۖ
एक बारिश
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों का
और हमने उनपर एक बरसात बरसाई, तो देखो अपराधियों का कैसा परिणाम हुआ
तफ़्सीर:
और हमने उनपर एक भीषण बारिश बरसाई। हमने उन पर मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाए और गाँव को उलट दिया। चुनाँचे उसके ऊपरी हिस्से को नीचे कर दिया। अतः (ऐ रसूल!) विचार करें कि लूत की जाति के अपराधियों का परिणाम कैसा हुआ? निश्चय उनका परिणाम विनाश और अनंत अपमान था।
आयत 85
وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًۭا ۗ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ قَدْ جَآءَتْكُم بَيِّنَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَٱلْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَـٰحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِلَىٰ
And to
مَدْيَنَ
और तरफ़ मदयन के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
شُعَيْبًۭا ۗ
शुऐब को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥ ۖ
उसके सिवा
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَتْكُم
आ चुकी तुम्हारे पास
بَيِّنَةٌۭ
वाज़ेह दलील
مِّن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَأَوْفُوا۟
पस पूरा करो
ٱلْكَيْلَ
नाप
وَٱلْمِيزَانَ
और तौल को
وَلَا
और ना
تَبْخَسُوا۟
तुम कम करके दो
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أَشْيَآءَهُمْ
चीज़ें उनकी
وَلَا
और ना
تُفْسِدُوا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بَعْدَ
बाद
إِصْلَـٰحِهَا ۚ
उसकी इस्लाह के
ذَٰلِكُمْ
ये बात
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान वाले
और मदयनवालों की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। तो तुम नाप और तौल पूरी-पूरी करो, और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो, और धरती में उसकी सुधार के पश्चात बिगाड़ पैदा न करो। यही तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम ईमानवाले हो
तफ़्सीर:
हमने मदयन के गोत्र की ओर उनके भाई शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा। उन्होंने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं, जो इबादत के योग्य हो। मैं अपने रब की ओर से तुम्हारे पास जो कुछ लेकर आया हूँ उसकी सच्चाई का अल्लाह की ओर से तुम्हारे पास एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। अतः नाप और तौल पूरे करके लोगों को उनके अधिकार दो। तथा लोगों का उनके सामान में दोष निकालकर और उसके प्रति अरुचि जगाकर, या उनके मालिकों को धोखा देकर घाटा न करो। इससे पहले नबियों के द्वारा धरती पर सुधार होने के बाद, कुफ़्र और पाप करके उसमें बिगाड़ न फैलाओ। यदि तुम मोमिन हो, तो जो कुछ उल्लेख किया गया है तुम्हारे लिए बेहतर और अधिक लाभकारी है। क्योंकि इसमें अल्लाह के निषेधों से बचने हेतु पापों का परित्याग करना शामिल है, और क्योंकि इसमें अल्लाह के आदेशों का पालन करके उसके क़रीब आना शामिल है।
आयत 86
وَلَا تَقْعُدُوا۟ بِكُلِّ صِرَٰطٍۢ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ مَنْ ءَامَنَ بِهِۦ وَتَبْغُونَهَا عِوَجًۭا ۚ وَٱذْكُرُوٓا۟ إِذْ كُنتُمْ قَلِيلًۭا فَكَثَّرَكُمْ ۖ وَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُفْسِدِينَ
وَلَا
और ना
تَقْعُدُوا۟
तुम बैठो
بِكُلِّ
on every
صِرَٰطٍۢ
हर रास्ते पर
تُوعِدُونَ
तुम धमकाते हो
وَتَصُدُّونَ
और तुम रोकते हो
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
مَنْ
उसे जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
بِهِۦ
उस पर
وَتَبْغُونَهَا
और तुम तलाश करते हो उसमें
عِوَجًۭا ۚ
टेढ़ापन
وَٱذْكُرُوٓا۟
और याद करो
إِذْ
जब
كُنتُمْ
थे तुम
قَلِيلًۭا
थोड़े
فَكَثَّرَكُمْ ۖ
तो उसने ज़्यादा कर दिया तुम्हें
وَٱنظُرُوا۟
और देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों का
"और प्रत्येक मार्ग पर इसलिए न बैठो कि धमकियाँ दो और उस व्यक्ति को अल्लाह के मार्ग से रोकने लगो जो उसपर ईमान रखता हो और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, वह समय जब तुम थोड़े थे, फिर उसने तुम्हें अधिक कर दिया। और देखो, बिगाड़ पैदा करनेवालो का कैसा परिणाम हुआ
तफ़्सीर:
और प्रत्येक मार्ग पर इस कारण न बैठो कि उसपर चलने वाले लोगों को धमकाओ ताकि उनका धन लूट लो, तथा उस व्यक्ति को अल्लाह के धर्म से रोक दो जो उससे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहे। तुम्हारी इच्छा है कि अल्लाह का मार्ग टेढ़ा हो ताकि लोग उसपर न चलें। तथा अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो, ताकि तुम उसपर उसका शुक्र अदा करो। क्योंकि तुम्हारी संख्या कम थी, तो उसने तुम्हें अधिक कर दिया। तथा विचार करो कि तुमसे पहले घरती में बिगाड़ पैदा करने वालों का परिणाम कैसा हुआ। निश्चय उनका परिणाम तबाही और विनाश था।
आयत 87
وَإِن كَانَ طَآئِفَةٌۭ مِّنكُمْ ءَامَنُوا۟ بِٱلَّذِىٓ أُرْسِلْتُ بِهِۦ وَطَآئِفَةٌۭ لَّمْ يُؤْمِنُوا۟ فَٱصْبِرُوا۟ حَتَّىٰ يَحْكُمَ ٱللَّهُ بَيْنَنَا ۚ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْحَـٰكِمِينَ
وَإِن
और अगरचे
كَانَ
है
طَآئِفَةٌۭ
एक गिरोह
مِّنكُمْ
तुम में से
ءَامَنُوا۟
जो ईमान लाया
بِٱلَّذِىٓ
उस चीज़ पर जो
أُرْسِلْتُ
भेजा गया हूँ मैं
بِهِۦ
साथ जिसके
وَطَآئِفَةٌۭ
और एक गिरोह
لَّمْ
नहीं
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाया
فَٱصْبِرُوا۟
पस सब्र करो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَحْكُمَ
फ़ैसला कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
بَيْنَنَا ۚ
दर्मियान हमारे
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतरीन है
ٱلْحَـٰكِمِينَ
फ़ैसला करने वालों में
"और यदि तुममें एक गिरोह ऐसा है, जो उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और एक गिरोह ऐसा है, जो उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और एक गिरोह ईमान नहीं लाया, तो धैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला कर दे। और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
तफ़्सीर:
और यदि तुम में से एक समूह उसपर ईमान लाया है, जो मैं अपने रब की ओर से लाया हूँ और दूसरा समूह उसपर ईमान नहीं लाया, तो (ऐ झुठलाने वालो!) प्रतीक्षा करो कि अल्लाह तुम्हारे बीच क्या निर्णय करता है। वह निर्णय करने वालों में सबसे अच्छा और न्याय करने वालों में सबसे अधिक न्यायशील है।
आयत 88
۞ قَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ لَنُخْرِجَنَّكَ يَـٰشُعَيْبُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَكَ مِن قَرْيَتِنَآ أَوْ لَتَعُودُنَّ فِى مِلَّتِنَا ۚ قَالَ أَوَلَوْ كُنَّا كَـٰرِهِينَ
۞ قَالَ
कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوا۟
तकब्बुर किया
مِن
among
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
لَنُخْرِجَنَّكَ
अलबत्ता हम ज़रूर निकाल देंगे तुझे
يَـٰشُعَيْبُ
ऐ शुऐब
وَٱلَّذِينَ
और उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हैं
مَعَكَ
साथ तेरे
مِن
from
قَرْيَتِنَآ
अपनी बस्ती से
أَوْ
या
لَتَعُودُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर पलटोगे
فِى
to
مِلَّتِنَا ۚ
हमारी मिल्लत में
قَالَ
उसने कहा
أَوَلَوْ
क्या भला अगरचे
كُنَّا
हों हम
كَـٰرِهِينَ
नापसंद करने वाले
उनकी क़ौम के सरदारों ने, जो घमंड में पड़े थे, कहा, "ऐ शुऐब! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को, जो ईमान लाए है, अपनी बस्ती से निकालकर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पन्थ में लौट आओ।" उसने कहा, "क्या (तुम यही चाहोगे) यद्यपि यह हमें अप्रिय हो जब भी?
तफ़्सीर:
शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम के घमंडी प्रमुखाें और बड़े लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम से कहा : (ऐ शुऐब!) हम तुझे और तेरे साथ तेरी बात मानने वालों काे अपने इस गाँव से अवश्य निकाल देंगे, या तुम अवश्य ही हमारे धर्म में वापस आ जाओगे। तो शुऐब अलैहिस्सलाम ने इनकार करते हुए और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा : क्या हम तुम्हारे धर्म पर चलने लगें, अगरचे हम उसे नापसंद ही करते हों, क्योंकि हम जानते हैं कि तुम्हारा धर्म असत्य है?!
आयत 89
قَدِ ٱفْتَرَيْنَا عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا إِنْ عُدْنَا فِى مِلَّتِكُم بَعْدَ إِذْ نَجَّىٰنَا ٱللَّهُ مِنْهَا ۚ وَمَا يَكُونُ لَنَآ أَن نَّعُودَ فِيهَآ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّنَا ۚ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَىْءٍ عِلْمًا ۚ عَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلْنَا ۚ رَبَّنَا ٱفْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِٱلْحَقِّ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْفَـٰتِحِينَ
قَدِ
तहक़ीक़
ٱفْتَرَيْنَا
गढ़ लिया हमने
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
إِنْ
अगर
عُدْنَا
पलटें हम
فِى
in
مِلَّتِكُم
तुम्हारी मिल्लत में
بَعْدَ
बाद इसके
إِذْ
जब
نَجَّىٰنَا
निजात दी हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنْهَا ۚ
उससे
وَمَا
और नहीं
يَكُونُ
है (जायज़)
لَنَآ
हमारे लिए
أَن
कि
نَّعُودَ
हम पलटें
فِيهَآ
उसमें
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّنَا ۚ
जो रब है हमारा
وَسِعَ
घेर रखा है
رَبُّنَا
हमारे रब ने
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ पर
عِلْمًا ۚ
इल्म के ऐतबार से
عَلَى
Upon
ٱللَّهِ
अल्लाह ही पर
تَوَكَّلْنَا ۚ
तवक्कल किया हमने
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱفْتَحْ
फ़ैसला कर दे
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَ
और दर्मियान
قَوْمِنَا
हमारी क़ौम के
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَأَنتَ
और तू
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْفَـٰتِحِينَ
सब फ़ैसला करने वालों से
"हम अल्लाह पर झूठ घड़नेवाले ठहरेंगे, यदि तुम्हारे पन्थ में लौट आएँ, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमें पलट कर जाएँ, बल्कि हमारे रब अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। ज्ञान की स्पष्ट से हमारा रब हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है। हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है। हमारे रब, हमारे और हमारी क़ौम के बीच निश्चित अटल फ़ैसला कर दे। और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
तफ़्सीर:
यदि हम भी तुम्हारी ही तरह शिर्क व कुफ़्र का अक़ीदा रखने लगें, जबकि अल्लाह ने हमें अपनी कृपा से उससे बचा लिया है, तो हम अल्लाह पर झूठ गढ़ने वाले ठहरेंगे। और हमसे यह भी नहीं हो सकता कि तुम्हारे असत्य धर्म की ओर लौट आएँ। परंतु यह कि हमारा पालनहार अल्लाह ऐसा चाहे। क्योंकि सब उसी के इरादे के अधीन हैं। हमारे पालनहार ने प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान के दायरे में ले रखा है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है। केवल अल्लाह ही पर हमारा भरोसा है कि वह हमें सीधे रास्ते पर सुदृढ़ रखेगा और जहन्नम के रास्तों से बचाएगा। ऐ हमारे पालनहार! हमारे और हमारी काफ़िर जाति के बीच न्याय के साथ निर्णय कर दे। अतः सत्यवादी मज़लूम को हठी ज़ालिम के विरुद्ध विजय प्रदान कर। क्योंकि तू ही (ऐ हमारे पालनहार!) सबसे उत्तम निर्णय करने वाला है।
आयत 90
وَقَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ لَئِنِ ٱتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا إِنَّكُمْ إِذًۭا لَّخَـٰسِرُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِن
among
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
لَئِنِ
अलबत्ता अगर
ٱتَّبَعْتُمْ
पैरवी की तुमने
شُعَيْبًا
शुऐब की
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
إِذًۭا
तब
لَّخَـٰسِرُونَ
अलबत्ता ख़सारा पाने वाले हो
और क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, बोले, "यदि तुम शुऐब के अनुयायी बने तो तुम घाटे में पड़ जाओगे।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के काफ़िर एवं तौहीद के आह्वान को ठुकराने वाले प्रमुखों तथा सरदारों ने शुऐब अलैहिस्सलाम और उनके धर्म से सावधान करते हुए कहा : (ऐ हमारी जाति के लोगो!) अगर तुमने शुऐब का धर्म अपना लिया तथा अपना और अपने बाप-दादा का धर्म छोड़ दिया, तो निश्चित रूप से तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सालेह अलैहिस्सलाम और समूद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की दी निशानियों की बेहुरमती करना सख्त अंजाम का सबब बनता है।
आयत 91
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دَارِهِمْ جَـٰثِمِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ
पस पकड़ लिया उन्हें
ٱلرَّجْفَةُ
ज़लज़ले ने
فَأَصْبَحُوا۟
तो उन्होंने सुबह की
فِى
in
دَارِهِمْ
अपने घरों में
جَـٰثِمِينَ
औंधे मुँह
अन्ततः एक दहला देनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया। फिर वे अपने घर में औंधे पड़े रह गए,
तफ़्सीर:
चुनाँचे उन्हें भयंकर भूकंप ने पकड़ लिया, तो वे अपने घरों में विनष्ट हो गए, इस हाल में कि अपने घुटनों और चेहरों के बल अपने घरों में मृत और बेजान पड़े हुए थे।
आयत 92
ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ شُعَيْبًۭا كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَا ۚ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ شُعَيْبًۭا كَانُوا۟ هُمُ ٱلْخَـٰسِرِينَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
شُعَيْبًۭا
शुऐब को
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
ना
يَغْنَوْا۟
वो बसे थे
فِيهَا ۚ
उनमें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
شُعَيْبًۭا
शुऐब को
كَانُوا۟
थे
هُمُ
वो ही
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वाले
शुऐब को झुठलानेवाले, मानो कभी वहाँ बसे ही न थे। शुऐब को झुठलानेवाले ही घाटे में रहे
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, वे सब के सब विनष्ट हो गए, और वे ऐसे हो गए जैसे वे अपने घरों में बसे ही न थे और उन्होंने इसका आनंद ही नहीं लिया था। जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, वही लोग घाटे में रहे; इसलिए कि उन्होंने अपना और अपनी धन-संपत्ति का विनाश किया। जबकि उनकी जाति के मोमिनों का कोई घाटा नहीं हुआ, जैसा कि इन झुठलाने वाले काफ़िरों ने दावा किया था।
आयत 93
فَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَـٰقَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَـٰلَـٰتِ رَبِّى وَنَصَحْتُ لَكُمْ ۖ فَكَيْفَ ءَاسَىٰ عَلَىٰ قَوْمٍۢ كَـٰفِرِينَ
فَتَوَلَّىٰ
तो उसने मुँह फेर लिया
عَنْهُمْ
उनसे
وَقَالَ
और कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَبْلَغْتُكُمْ
पहुँचा दिए मैंने तुम्हें
رِسَـٰلَـٰتِ
पैग़ामात
رَبِّى
अपने रब के
وَنَصَحْتُ
और ख़ैरख़्वाही की मैंने
لَكُمْ ۖ
तुम्हारी
فَكَيْفَ
तो क्यों कर
ءَاسَىٰ
मैं अफ़सोस करूँ
عَلَىٰ
for
قَوْمٍۢ
ऐसे लोगों पर
كَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
तब वह उनके यहाँ से यह कहता हुआ फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देश तुम्हें पहुँचा दिए और मैंने तुम्हारा हित चाहा। अब मैं इनकार करनेवाले लोगो पर कैसे अफ़सोस करूँ!"
तफ़्सीर:
जब उनका विनाश हो गया, तो उनके पैगंबर शुऐब अलैहिस्सलाम उनसे विमुख हो गए और उन्हें संबोधित करते हुए बोले : ऐ मेरी जाति के लोगो! मैंने तुम्हें वह संदेश पहुँचा दिया था जिसका मेरे पालनहार ने मुझे तुमको पहुँचाने का आदेश दिया था, तथा मैं तुम्हारा हितैषी व शुभ चिंतक बना रहा, किंतु तुमने मेरी ख़ैर-ख़्वाही (शुभचिंतन) को स्वीकार नहीं किया और मेरे मार्गदर्शन पर चलने को तैयार न हुए। तो भला मैं ऐसे लोगों पर शोक कैसे करूँ, जो अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाले हैं और अपने कुफ़्र पर अडिग हैं?
आयत 94
وَمَآ أَرْسَلْنَا فِى قَرْيَةٍۢ مِّن نَّبِىٍّ إِلَّآ أَخَذْنَآ أَهْلَهَا بِٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
فِى
in
قَرْيَةٍۢ
किसी बस्ती में
مِّن
any
نَّبِىٍّ
कोई नबी
إِلَّآ
मगर
أَخَذْنَآ
पकड़ लिया हमने
أَهْلَهَا
उसके रहने वालों को
بِٱلْبَأْسَآءِ
साथ सख़्ती
وَٱلضَّرَّآءِ
और तकलीफ़ के
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَضَّرَّعُونَ
वो गिड़ गिड़ाऐं/आजिज़ी करें
हमने जिस बस्ती में भी कभी कोई नबी भेजा, तो वहाँ के लोगों को तंगी और मुसीबत में डाला, ताकि वे (हमारे सामने) गिड़गि़ड़ाए
तफ़्सीर:
तथा हमने किसी बस्ती में अपना जो भी रसूल भेजा, फिर उसके वासियों ने नबी को झुठला दिया और कुफ्र का मार्ग अपनाया, तो हमने उन्हें कठिनाई, ग़रीबी और बीमारी से पीड़ित कर दिया, ताकि वे अल्लाह के सामने अपनी विनम्रता प्रकट करें। जिसके परिणामस्वरूप वे अपने कुफ़्र और अहंकार को छोड़ दें। यह झुठलाने वाले समुदायों के बारे में अल्लाह की परंपरा का उल्लेख करके क़ुरैश के लिए तथा सभी इनकार करने और झुठलाने वालों के लिए एक चेतावनी है।
आयत 95
ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ ٱلسَّيِّئَةِ ٱلْحَسَنَةَ حَتَّىٰ عَفَوا۟ وَّقَالُوا۟ قَدْ مَسَّ ءَابَآءَنَا ٱلضَّرَّآءُ وَٱلسَّرَّآءُ فَأَخَذْنَـٰهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
ثُمَّ
फिर
بَدَّلْنَا
बदल दिया हमने
مَكَانَ
जगह
ٱلسَّيِّئَةِ
बुराई के
ٱلْحَسَنَةَ
भलाई को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
عَفَوا۟
वो ज़्यादा हो गए
وَّقَالُوا۟
और वो कहने लगे
قَدْ
तहक़ीक़
مَسَّ
पहुँची थी
ءَابَآءَنَا
हमारे आबा ओ अजदाद को (भी)
ٱلضَّرَّآءُ
तकलीफ़
وَٱلسَّرَّآءُ
और ख़ुशी
فَأَخَذْنَـٰهُم
तो पकड़ लिया हमने उन्हें
بَغْتَةًۭ
अचानक
وَهُمْ
और वो
لَا
(did) not
يَشْعُرُونَ
वो शऊर ना रखते थे
फिर हमने बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले और कहने लगे, "ये दुख और सुख तो हमारे बाप-दादा को भी पहुँचे हैं।" अनततः जब वे बेखबर थे, हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया
तफ़्सीर:
फिर हमने तंगी और बीमारी से ग्रस्त करने के बाद उन्हें अच्छाई, विस्तार और सुरक्षा प्रदान की, यहाँ तक कि उनकी संख्या अधिक हो गई तथा उनकी धन-संपत्ति में वृद्धि हो गई और वे कहने लगे : हमें जो बुराई और अच्छाई पहुँची है, वह एक नियमित आदत है, जो पहले हमारे पूर्वजों को भी पहुँच चुकी है। उन्हें इस बात का एहसास नहीं हुआ कि वे जिस दुर्दशा से पीड़ित हुए थे, उससे उन्हें सीख लेना चाहिए था, तथा उन्हें जो नेमतें प्राप्त हुई थीं, उनका उद्देश्य ढील देना था। अतः हमने अचानक उन्हें यातना द्वारा पकड़ लिया और उन्हें यातना का एहसास भी नहीं हुआ और न ही वे इसकी कल्पना करते थे।
आयत 96
وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ ٱلْقُرَىٰٓ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّقَوْا۟ لَفَتَحْنَا عَلَيْهِم بَرَكَـٰتٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ وَلَـٰكِن كَذَّبُوا۟ فَأَخَذْنَـٰهُم بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
وَلَوْ
और अगर
أَنَّ
बेशक
أَهْلَ
people
ٱلْقُرَىٰٓ
बस्तियों वाले
ءَامَنُوا۟
ईमान ले आते
وَٱتَّقَوْا۟
और तक़वा करते
لَفَتَحْنَا
अलबत्ता खोल देते हम
عَلَيْهِم
उन पर
بَرَكَـٰتٍۢ
बरकतें
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन से
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
فَأَخَذْنَـٰهُم
तो पकड़ लिया हमने उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
यदि बस्तियों के लोग ईमान लाते और डर रखते तो अवश्य ही हम उनपर आकाश और धरती की बरकतें खोल देते, परन्तु उन्होंने तो झुठलाया। तो जो कुछ कमाई वे करते थे, उसके बदले में हमने उन्हें पकड़ लिया
तफ़्सीर:
और यदि इन बस्तियों के वासी, जिनकी ओर हमने अपने रसूलों को भेजा था, उन बातों पर विश्वास करते जो उनके रसूल उनके पास लेकर आए थे, तथा अपने पालनहार से, कुफ़्र और गुनाहों को छोड़कर और उसके आदेशों का पालन करके, डरते, तो हम उनके लिए चारों ओर से भलाई के द्वार खोल देते, लेकिन उन्होंने न तो विश्वास किया और न डरे, बल्कि अपने रसूलों के लाए हुए संदेश को झुठलाया। अतः हमने उन्हें उनके किए हुए गुनाहों और पापों के कारण अचानक यातना से ग्रस्त कर दिया।
आयत 97
أَفَأَمِنَ أَهْلُ ٱلْقُرَىٰٓ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا بَيَـٰتًۭا وَهُمْ نَآئِمُونَ
أَفَأَمِنَ
क्या भला बेख़ौफ़ हो गए
أَهْلُ
(the) people
ٱلْقُرَىٰٓ
बस्तियों वाले
أَن
कि
يَأْتِيَهُم
आ जाए उन पर
بَأْسُنَا
अज़ाब हमारा
بَيَـٰتًۭا
रात को
وَهُمْ
और वो
نَآئِمُونَ
सो रहे हों
फिर क्या बस्तियों के लोगों को इस और से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि रात में उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे सोए हुए हो?
तफ़्सीर:
तो क्या इन झुठलाने वाली बस्तियों के लोग इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना रात के समय आ जाए और वे अपने आराम और शांति में लीन होकर सो रहे हैं?
आयत 98
أَوَأَمِنَ أَهْلُ ٱلْقُرَىٰٓ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًۭى وَهُمْ يَلْعَبُونَ
أَوَأَمِنَ
या क्या बेख़ौफ़ हो गए
أَهْلُ
(the) people
ٱلْقُرَىٰٓ
बस्तियों वाले
أَن
कि
يَأْتِيَهُم
आ जाए उन पर
بَأْسُنَا
अज़ाब हमारा
ضُحًۭى
चाश्त के वक़्त
وَهُمْ
और वो
يَلْعَبُونَ
वो खेलते हों
और क्या बस्तियों के लोगो को इस ओर से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि दिन चढ़े उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे खेल रहे हों?
तफ़्सीर:
और क्या वे इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना दिन की शुरुआत में आ जाए और वे अपनी दुनिया में व्यस्त होने की वजह से बेपरवाह और ग़ाफ़िल हों?!
आयत 99
أَفَأَمِنُوا۟ مَكْرَ ٱللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
أَفَأَمِنُوا۟
क्या भला वो बेख़ौफ़ हो गए
مَكْرَ
(from the) plan
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की तदबीर से
فَلَا
पस नहीं
يَأْمَنُ
बेख़ौफ़ हुआ करते
مَكْرَ
(from the) plan
ٱللَّهِ
अल्लाह की तदबीर से
إِلَّا
मगर
ٱلْقَوْمُ
वो लोग
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
आख़िर क्या वे अल्लाह की चाल से निश्चिन्त हो गए थे? तो (समझ लो उन्हें टोटे में पड़ना ही था, क्योंकि) अल्लाह की चाल से तो वही लोग निश्चित होते है, जो टोटे में पड़नेवाले होते है
तफ़्सीर:
देखो, अल्लाह ने उन्हे किस क़दर मोहलत दी है, और ढील देते हुए शक्ति तथा विस्तृत जीविका प्रदान की है; तो क्या इन नगरों के ये झुठलनाने वाले लोग अल्लाह की चाल और उसके गुप्त उपाय से निश्चिंत हो गए हैं? तो (याद रखो!) अल्लाह के गुप्त उपाय से निश्चिंत केवल वही लोग होते हैं, जिनके भाग्य में विनाश लिखा हो। रही बात तौफ़ीक़ वाले लोगों की, तो वे उसके गुप्त उपाय से डरते हैं। यही कारण है कि उसकी नेमतों से धोखा नहीं खाते, बल्कि उसके एहसान के आभारी रहते हैं और उसका शुक्रिया अदा करते हैं।
आयत 100
أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِ أَهْلِهَآ أَن لَّوْ نَشَآءُ أَصَبْنَـٰهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَهْدِ
रहनुमाई की
لِلَّذِينَ
उन लोगों की जो
يَرِثُونَ
वारिस बनते हैं
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन के
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
أَهْلِهَآ
उसके रहने वालों के
أَن
कि (इस बात ने )
لَّوْ
अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
أَصَبْنَـٰهُم
पकड़ लें हम उन्हें
بِذُنُوبِهِمْ ۚ
बवजह उनके गुनाहों के
وَنَطْبَعُ
और हम मोहर लगा दें
عَلَىٰ
over
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
فَهُمْ
फिर वो
لَا
(do) not
يَسْمَعُونَ
ना वो सुनें
क्या जो धरती के, उसके पूर्ववासियों के पश्चात उत्तराधिकारी हुए है, उनपर यह तथ्य प्रकट न हुआ कि यदि हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें आ पकड़े? हम तो उनके दिलों पर मुहर लगा रहे हैं, क्योंकि वे कुछ भी नहीं सुनते
तफ़्सीर:
तो क्या उन लोगों के सामने यह तथ्य स्पष्ट नहीं हुआ, जो अपने पूर्वजों के बाद धरती के वारिस हुए, जिन्हें उनके गुनाहों के कारण विनष्ट कर दिया गया था, फिर उन्होंने उनपर उतरने वाली यातना से शिक्षा ग्रहण नहीं की, बल्कि उन्हीं जैसे कर्म करते रहे। क्या इन लोगों के सामने यह तथ्य स्पष्ट नहीं हुआ कि अगर अल्लाह उन्हें उनके गुनाहों के कारण पकड़ना चाहे, तो अपनी रीति के अनुसार पकड़ ले और उनके दिलों पर मुहर लगा दे, फिर उन्हें न किसी उपदेश से लाभ हो, न किसी याद-दहानी से फ़ायदा?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत अलैहिस्सलाम की कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बेहयाई और फहाशी को आम करने वाला समाज तबाही से नहीं बच सकता।
आयत 101
تِلْكَ ٱلْقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآئِهَا ۚ وَلَقَدْ جَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَمَا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوا۟ بِمَا كَذَّبُوا۟ مِن قَبْلُ ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
تِلْكَ
ये
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियाँ हैं
نَقُصُّ
हम बयान कर रहे हैं
عَلَيْكَ
आप पर
مِنْ
of
أَنۢبَآئِهَا ۚ
उनकी ख़बरों में से
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَتْهُمْ
आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ खुली निशानियों के
فَمَا
पस ना
كَانُوا۟
थे वो
لِيُؤْمِنُوا۟
कि वो ईमान लाते
بِمَا
बवजह उसके जो
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
مِن
from
قَبْلُ ۚ
इस से पहले
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَطْبَعُ
मोहर लगा देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
on
قُلُوبِ
दिलों पर
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के
ये है वे बस्तियाँ जिनके कुछ वृत्तान्त हम तुमको सुना रहे है। उनके पास उनके रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए परन्तु वे ऐसे न हुए कि ईमान लाते। इसका कारण यह था कि वे पहले से झुठलाते रहे थे। इसी प्रकार अल्लाह इनकार करनेवालों के दिलों पर मुहर लगा देता है
तफ़्सीर:
ये पिछली बस्तियाँ हैं (अर्थात नूह, हूद, सालेह, लूत और शुऐब अलैहिमुस्सलाम की बस्तियाँ), जिनकी खबरें और उनके झुठलाने तथा हठधर्मी की दास्तानें और उनके विनाश का विवरण हम आपको सुना रहे हैं, ताकि यह शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए एक शिक्षा और नसीहत हासिल करने वालों के लिए एक नसीहत हो। इन बस्तियों वालों के पास उनके रसूल अपने सच्चे रसूल होने के स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे, परंतु उनसे यह न हो सका कि जब रसूल आ गए, तो उन्हें मान लेते, क्योंकि यह बात पहले ही से अल्लाह के ज्ञान में थी कि वे उन्हें झुठला देंगे। जिस तरह इन बस्तियों वालों के दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी थी, वैसे ही अल्लाह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वालों के दिलों पर भी मुहर लगा देगा, फिर वे ईमान की राह प्राप्त नहीं कर सकेंगे।
आयत 102
وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِم مِّنْ عَهْدٍۢ ۖ وَإِن وَجَدْنَآ أَكْثَرَهُمْ لَفَـٰسِقِينَ
وَمَا
और नहीं
وَجَدْنَا
पाया हमने
لِأَكْثَرِهِم
उनकी अक्सरियत के लिए
مِّنْ
any
عَهْدٍۢ ۖ
कोई अहद
وَإِن
और बेशक
وَجَدْنَآ
पाया हमने
أَكْثَرَهُمْ
उनकी अक्सरियत को
لَفَـٰسِقِينَ
अलबत्ता फ़ासिक़
हमने उनके अधिकतर लोगो में प्रतिज्ञा का निर्वाह न पाया, बल्कि उनके बहुतों को हमने उल्लंघनकारी ही पाया
तफ़्सीर:
जिन समुदायों की ओर रसूल भेजे गए थे, उनमें से अधिकांश में हमने अल्लाह के आदेशों के प्रति प्रतिबद्धता और प्रतिज्ञा पालन नहीं पाया, तथा हमने उन्हें उसकी आज्ञाओं का पालन करते हुए नहीं पाया। बल्कि हमने उनमें से अधिकांश को अल्लाह की अवज्ञा करते हुए ही पाया।
आयत 103
ثُمَّ بَعَثْنَا مِنۢ بَعْدِهِم مُّوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَظَلَمُوا۟ بِهَا ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُفْسِدِينَ
ثُمَّ
फिर
بَعَثْنَا
भेजा हमने
مِنۢ
from
بَعْدِهِم
बाद उनके
مُّوسَىٰ
मूसा को
بِـَٔايَـٰتِنَآ
साथ अपनी निशानियों के
إِلَىٰ
तरफ़
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन के
وَمَلَإِي۟هِۦ
और उसके सरदारों के
فَظَلَمُوا۟
तो उन्होंने ज़ुल्म किया
بِهَا ۖ
साथ उनके
فَٱنظُرْ
पस देखिए
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों का
फिर उनके पश्चात हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, परन्तु उन्होंने इनकार और स्वयं पर अत्याचार किया। तो देखो, इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का कैसा परिणाम हुआ!
तफ़्सीर:
फिर हमने उन रसूलों के बाद मूसा अलैहिस्सलाम को अपने तर्कों और स्पष्ट प्रमाणों के साथ, जो उनके सच्चे नबी होने को स्पष्ट कर रहे थे, फ़िरऔन और उसके प्रमुखों के पास भेजा। परंतु उन्होंने उन आयतों का इनकार कर दिया और उनपर विश्वास नहीं किया। तो (ऐ रसूल!) आप ग़ौर करें कि फ़िरऔन और उसकी जाति का परिणाम कैसा रहा?! अल्लाह ने उन्हें डुबोकर नष्ट कर दिया और दुनिया तथा आख़िरत में उनके पीछे लानत लगा दिया।
आयत 104
وَقَالَ مُوسَىٰ يَـٰفِرْعَوْنُ إِنِّى رَسُولٌۭ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
يَـٰفِرْعَوْنُ
ऐ फ़िरऔन
إِنِّى
बेशक मैं
رَسُولٌۭ
एक रसूल हूँ
مِّن
from
رَّبِّ
(the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन की तरफ़ से
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ
तफ़्सीर:
जब अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन के पास भेजा और वह उसके पास आए, तो कहा : ऐ फ़िरऔन! निःसंदेह मैं सारी सृष्टि के रचयिता, उनके स्वामी और उनके मामलों के व्यवस्थापक की ओर से भेजा हुआ रसूल हूँ।
आयत 105
حَقِيقٌ عَلَىٰٓ أَن لَّآ أَقُولَ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْحَقَّ ۚ قَدْ جِئْتُكُم بِبَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ فَأَرْسِلْ مَعِىَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
حَقِيقٌ
क़ायम हूँ
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
لَّآ
ना
أَقُولَ
मैं कहूँ
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
إِلَّا
मगर
ٱلْحَقَّ ۚ
हक़ (बात)
قَدْ
तहक़ीक़
جِئْتُكُم
लाया हूँ मैं तुम्हारे पास
بِبَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह निशानी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَأَرْسِلْ
पस भेज दो
مَعِىَ
साथ मेरे
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
"मैं इसका अधिकारी हूँ कि अल्लाह से सम्बद्ध करके सत्य के अतिरिक्त कोई बात न कहूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण लेकर आ गया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तान को मेरे साथ जाने दो।"
तफ़्सीर:
मूसा ने कहा : चूँकि मैं अल्लाह की ओर से भेजा गया हूँ, इसलिए मैं उसके बारे में सत्य के अलावा कुछ भी कहने के योग्य नहीं हूँ। निश्चय मैं तम्हारे पास एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ, जो मेरे सच्चे होने और मेरे अपने पालनहार की ओर से तुम्हारे पास भेजे हुए (रसूल) होने को दर्शाता है। अतः बनी इसराईल को क़ैद तथा उत्पीड़न से आज़ाद करके मेरे साथ जाने दे।
आयत 106
قَالَ إِن كُنتَ جِئْتَ بِـَٔايَةٍۢ فَأْتِ بِهَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالَ
उसने कहा
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
جِئْتَ
लाया तू
بِـَٔايَةٍۢ
कोई निशानी
فَأْتِ
तो ले आ
بِهَآ
उसे
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
बोला, "यदि तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो उसे पेश करो, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : यदि तुम कोई प्रमाण (चमत्कार) लेकर आए हो, जैसा कि तुम्हारा दावा है, तो उसे प्रस्तुत करो, यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 107
فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ ثُعْبَانٌۭ مُّبِينٌۭ
فَأَلْقَىٰ
तो उसने डाला
عَصَاهُ
असा अपना
فَإِذَا
तो यकायक
هِىَ
वो
ثُعْبَانٌۭ
अज़दहा था
مُّبِينٌۭ
वाज़ेह
तब उसने अपनी लाठी डाल दी। क्या देखते है कि वह प्रत्यक्ष अजगर है
तफ़्सीर:
फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी फेंकी, तो वह एक महान साँप में बदल गई, जो उसे देखने वालों के लिए प्रत्यक्ष था।
आयत 108
وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِىَ بَيْضَآءُ لِلنَّـٰظِرِينَ
وَنَزَعَ
और उसने बाहर निकाला
يَدَهُۥ
हाथ अपना
فَإِذَا
तो यकायक
هِىَ
वो
بَيْضَآءُ
सफ़ेद चमकता हुआ था
لِلنَّـٰظِرِينَ
देखने वालों के लिए
और उसने अपना हाथ निकाला, तो क्या देखते है कि वह सब देखनेवालों के सामने चमक रहा है
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने अपने सीने के पास से अपनी कमीज़ की छेद से, या अपने बग़ल के नीचे से अपना हाथ निकाला, तो वह बरस (सफ़ेद कुष्ठ रोग) के बिना बिलकुल सफ़ेद निकला, जो इतना सफ़ेद था कि देखने वालों के लिए चमक रहा था।
आयत 109
قَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ إِنَّ هَـٰذَا لَسَـٰحِرٌ عَلِيمٌۭ
قَالَ
कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
مِن
of
قَوْمِ
क़ौम में से
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन की
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَسَـٰحِرٌ
अलबत्ता जादूगर है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म रखने वाला
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "अरे, यह तो बडा कुशल जादूगर है!
तफ़्सीर:
फ़िरऔन की जाति के बड़ों और प्रमुखों ने जब मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी का साँप बन जाना और उनके हाथ का बरस के बिना सफ़ेद हो जाना देखा, तो बोल उठे : मूसा एक दक्ष जादूगर के अलावा कुछ नहीं है।
आयत 110
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُمْ ۖ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ
يُرِيدُ
वो चाहता है
أَن
कि
يُخْرِجَكُم
वो निकाल दे तुम्हें
مِّنْ
from
أَرْضِكُمْ ۖ
तुम्हारी ज़मीन से
فَمَاذَا
तो क्या
تَأْمُرُونَ
तुम हुक्म (मशवरा ) देते हो
"तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल देना चाहता है। तो अब क्या कहते हो?"
तफ़्सीर:
वह चाहता है कि अपने जादू के बल से तुम्हें, तुम्हारी इस धरती मिस्र से निकाल दे। फिर फ़िरऔन ने उनसे मूसा अलैहिस्सलाम के बारे में परामर्श करते हुए कहा : तुम मुझे क्या सलाह देते हो?
आज की ज़िंदगी में सबक़
शुऐब अलैहिस्सलाम और नाप-तोल में कमी करने वाली कौम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कारोबार में ईमानदारी और सही नाप-तोल रखना अल्लाह का हुक्म है।
आयत 111
قَالُوٓا۟ أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَأَرْسِلْ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَـٰشِرِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَرْجِهْ
इन्तिज़ार में रखो इसे
وَأَخَاهُ
और इसके भाई को
وَأَرْسِلْ
और भेज दो
فِى
in
ٱلْمَدَآئِنِ
शहरों में
حَـٰشِرِينَ
इकट्ठा करने वाले
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को प्रतीक्षा में रखो और नगरों में हरकारे भेज दो,
तफ़्सीर:
उन्होंने फ़िरऔन से कहा : मूसा तथा उसके भाई के मामले को स्थगित कर दे और मिस्र के शहरों में जादूगरों को इकट्ठा करने के लिए किसी को भेज दे।
आयत 112
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَـٰحِرٍ عَلِيمٍۢ
يَأْتُوكَ
वो ले आऐंगे तेरे पास
بِكُلِّ
हर
سَـٰحِرٍ
जादूगर
عَلِيمٍۢ
माहिर को
"कि वे हर कुशल जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।"
तफ़्सीर:
ये लोग जिन्हें तूने शहरों से जादूगरों को इकट्ठा करने के लिए भेजा है, वे हर कुशल और दक्ष जादूगर को तेरे पास ले आएँ।
आयत 113
وَجَآءَ ٱلسَّحَرَةُ فِرْعَوْنَ قَالُوٓا۟ إِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ ٱلْغَـٰلِبِينَ
وَجَآءَ
और आए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन के पास
قَالُوٓا۟
वो कहने लगे
إِنَّ
बेशक
لَنَا
हमारे लिए
لَأَجْرًا
अलबत्ता अजर (इनाम ) होगा
إِن
अगर
كُنَّا
हुए हम
نَحْنُ
हम
ٱلْغَـٰلِبِينَ
ग़ालिब
अतएव जादूगर फ़िरऔन के पास आ गए। कहने लगे, "यदि हम विजयी हुए तो अवश्य ही हमें बड़ा बदला मिलेगा?"
तफ़्सीर:
चुनाँचे फ़िरऔन ने जादूगरों को जमा करने के लिए हरकारे भेज दिए। फिर जब जादूगर फिरऔन के पास आए, तो उन्होंने उससे पूछा : क्या उन्हें कोई इनाम मिलेगा यदि उन्होंने मूसा को अपने जादू से हरा दिया और उस पर जीत हासिल की?
आयत 114
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ لَمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
قَالَ
उसने कहा
نَعَمْ
हाँ
وَإِنَّكُمْ
और बेशक तुम
لَمِنَ
surely (will be) of
ٱلْمُقَرَّبِينَ
अलबत्ता मुक़र्रबीन में से होगे
उसने कहा, "हाँ, और बेशक तुम (मेरे) क़रीबियों में से हो जाओगे।"
तफ़्सीर:
तो फिरऔन ने जवाब दिया कि हाँ, तुम्हें उसका बदला और पुरस्कार मिलेगा और तुम्हें ऐसे पद भी दिए जाएँगे कि मेरे निकटवर्ती बन जाओगे।
आयत 115
قَالُوا۟ يَـٰمُوسَىٰٓ إِمَّآ أَن تُلْقِىَ وَإِمَّآ أَن نَّكُونَ نَحْنُ ٱلْمُلْقِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِمَّآ
या
أَن
ये कि
تُلْقِىَ
तुम डालो
وَإِمَّآ
और या
أَن
ये कि
نَّكُونَ
हम हों
نَحْنُ
हम ही
ٱلْمُلْقِينَ
डालने वाले
उन्होंने कहा, "ऐ मूसा! या तुम डालो या फिर हम डालते हैं?"
तफ़्सीर:
जादूगरों ने मूसा पर अपनी जीत के बारे में आश्वस्त होकर, घमंड और अहंकार से कहा : (ऐ मूसा!) आप जो चाहें चुन लें, कि आप उस चीज़ को फेंकने की शुरुआत करेंगे जो आप फेंकना चाहते हैं, यह हम ही उसकी शुरुआत करें।
आयत 116
قَالَ أَلْقُوا۟ ۖ فَلَمَّآ أَلْقَوْا۟ سَحَرُوٓا۟ أَعْيُنَ ٱلنَّاسِ وَٱسْتَرْهَبُوهُمْ وَجَآءُو بِسِحْرٍ عَظِيمٍۢ
قَالَ
उसने कहा
أَلْقُوا۟ ۖ
तुम डालो
فَلَمَّآ
तो जब
أَلْقَوْا۟
उन्होंने डाला
سَحَرُوٓا۟
उन्होंने मसहूर कर दिया
أَعْيُنَ
निगाहों को
ٱلنَّاسِ
लोगों की
وَٱسْتَرْهَبُوهُمْ
और उन्होंने ख़ौफ़ज़दा कर दिया उन्हें
وَجَآءُو
और वो लाए
بِسِحْرٍ
जादू
عَظِيمٍۢ
बहुत बड़ा
उसने कहा, "तुम ही डालो।" फिर उन्होंने डाला तो लोगो की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया। उन्होंने एक बहुत बड़े जादू का प्रदर्शन किया
तफ़्सीर:
मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपने पालनहार की मदद पर भरोसा करते हुए, उनकी परवाह न करते हुए, उन्हें जवाब दिया : तुम्हीं अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंको। तो जब उन्होंने रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं, तो लोगों की आँखों को, उन्हें शुद्ध बोध से विचलित करके, मंत्रमुग्ध कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया तथा वे देखने वालों की आँखों में शक्तिशाली जादू लेकर आए।
आयत 117
۞ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَإِذَا هِىَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ
۞ وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰٓ
तरफ़ मूसा के
أَنْ
ये कि
أَلْقِ
फेंको तुम
عَصَاكَ ۖ
लाठी अपनी
فَإِذَا
तो यकायक
هِىَ
वो
تَلْقَفُ
वो निगल रही थी
مَا
उसे जो
يَأْفِكُونَ
वो गढ़ लाए थे
हमने मूसा की ओर प्रकाशना कि कि "अपनी लाठी डाल दे।" फिर क्या देखते है कि वह उनके रचें हुए स्वांग को निगलती जा रही है
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने अपने नबी तथा कलीम मूसा अलैहिस्सलाम को वह़्य की कि अपनी लाठी फेंको। चुनाँचे उन्होंने अपनी लाठी फेंकी। और देखते ही देखते लाठी साँप बनकर उनकी रस्सियाें तथा लाठियाें को निगलने लगी, जिनका प्रयोग वे तथ्यों को बदलने और लोगों को इस भ्रम में डालने के लिए करते थे कि ये दौड़ते हुए साँप हैं।
आयत 118
فَوَقَعَ ٱلْحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
فَوَقَعَ
तो साबित हो गया
ٱلْحَقُّ
हक़
وَبَطَلَ
और बातिल हो गया
مَا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
इस प्रकार सत्य प्रकट हो गया और जो कुछ वे कर रहे थे, मिथ्या होकर रहा
तफ़्सीर:
अतः सत्य प्रकट हो गया तथा मूसा अलैहिस्सलाम जो कुछ लेकर आए थे, उसकी सच्चाई स्पष्ट हो गई और जादूगरों ने जो जादू बनाया था, उसका झूठा होना जग-ज़ाहिर हो गया।
आयत 119
فَغُلِبُوا۟ هُنَالِكَ وَٱنقَلَبُوا۟ صَـٰغِرِينَ
فَغُلِبُوا۟
पस मग़लूब कर दिए गए
هُنَالِكَ
उसी जगह
وَٱنقَلَبُوا۟
और वो पलटे
صَـٰغِرِينَ
ज़लील होकर
अतः वे पराभूत हो गए और अपमानित होकर रहे
तफ़्सीर:
अंततः वे उस अवसर पर पराजित हुए और हार गए तथा मूसा अलैहिस्सलाम को उनपर विजय प्राप्त हुआ। और वे लोग अपमानित और मग़लूब होकर लौटे।
आयत 120
وَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سَـٰجِدِينَ
وَأُلْقِىَ
और डाल दिए गए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
سَـٰجِدِينَ
सजदे में
और जादूगर सहसा सजदे में गिर पड़े
तफ़्सीर:
जब जादूगरों ने अल्लाह की महान शक्ति और स्पष्ट निशानियों को देखा, तो बे-साख्ता पवित्र अल्लाह के सामने सजदे में गिर गए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम और फिरऔन के मुकाबले का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक और बातिल के मुकाबले में आखिरकार हक ही ग़ालिब आता है।
आयत 121
قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِرَبِّ
in (the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन पर
बोले, "हम सारे संसार के रब पर ईमान ले आए;
तफ़्सीर:
जादूगरों ने कहा : हम सारी सृष्टि के पालनहार पर ईमान लाए।
आयत 122
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ
رَبِّ
जो रब है
مُوسَىٰ
मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून का
"मूसा और हारून के रब पर।"
तफ़्सीर:
मूसा तथा हारून अलैहिमस्सलाम के पालनहार पर, क्योंकि वही उपासना का हक़दार है। उसके सिवा अन्य तथाकथित पूज्य उपासना के हक़दार नहीं हैं।
आयत 123
قَالَ فِرْعَوْنُ ءَامَنتُم بِهِۦ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَمَكْرٌۭ مَّكَرْتُمُوهُ فِى ٱلْمَدِينَةِ لِتُخْرِجُوا۟ مِنْهَآ أَهْلَهَا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
قَالَ
कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
ءَامَنتُم
ईमान लाए तुम
بِهِۦ
उस पर
قَبْلَ
इससे पहले
أَنْ
कि
ءَاذَنَ
मैं इजाज़त दूँ
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَمَكْرٌۭ
अलबत्ता चाल थी
مَّكَرْتُمُوهُ
चाल चली तुमने ये
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
शहर में
لِتُخْرِجُوا۟
ताकि तुम निकाल ले जाओ
مِنْهَآ
इससे
أَهْلَهَا ۖ
इसके रहने वालों को
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
फ़िरऔन बोला, "इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तं उसपर ईमान ले आए! यह तो एक चाल है, जो तुम लोग नगर में चले हो, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो। अच्छा, तो अब तुम्हें जल्द की मालूम हुआ जाता है!
तफ़्सीर:
जब वे एक अल्लाह पर ईमान ले आए, तो फ़िरऔन ने उन्हें धमकी देते हुए कहा : मेरी अनुमति से पहले ही तुमने मूसा को सच्चा मान लिया? निश्चय तुम्हारा मूसा पर ईमान लाना और उसके लाए हुए धर्म को सत्य मानना एक धोखा और साज़िश है, जो तुमने और मूसा ने इस नगर के निवासियों को यहाँ से निकालने के लिए रची है। तो (ऐ जादूगरो!) तुम्हें शीघ्र ही पता चल जाएगा कि तुम्हें कैसी सज़ा और यातना का सामना करना पड़ता है।
आयत 124
لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَـٰفٍۢ ثُمَّ لَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ
لَأُقَطِّعَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर काट दूँगा
أَيْدِيَكُمْ
हाथ तुम्हारे
وَأَرْجُلَكُم
और पाँव तुम्हारे
مِّنْ
of
خِلَـٰفٍۢ
मुख़ालिफ़ सिम्त से
ثُمَّ
फिर
لَأُصَلِّبَنَّكُمْ
अलबत्ता मैं ज़रूर सूली चढ़ाऊँगा तुम्हें
أَجْمَعِينَ
सबके-सबको
"मैं तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशाओं से काट दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ाकर रहूँगा।"
तफ़्सीर:
मैं अवश्य तुममें से प्रत्येक व्यक्ति का दाहिना हाथ और बायाँ पैर, या उसका बायाँ हाथ और दाहिना पैर काट दूँगा। फिर मैं तुम सभी को खजूर के पेड़ के तने पर लटका दूँगा। ऐसा तुम्हें भयंकर सज़ा देने और इस स्थिति में तुम्हें देखने वाले सभी लोगों को डराने के लिए किया जाएगा।
आयत 125
قَالُوٓا۟ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَىٰ
to
رَبِّنَا
तरफ़ अपने रब के
مُنقَلِبُونَ
पलटने वाले हैं
उन्होंने कहा, "हम तो अपने रब ही की और लौटेंगे
तफ़्सीर:
जादूगरों ने फिरऔन की धमकी के जवाब में कहा : निश्चय हम अकेले अपने पालनहार ही की ओर लौटने वाले हैं। इसलिए हमें तुम्हारी धमकी की परवाह नहीं है।
आयत 126
وَمَا تَنقِمُ مِنَّآ إِلَّآ أَنْ ءَامَنَّا بِـَٔايَـٰتِ رَبِّنَا لَمَّا جَآءَتْنَا ۚ رَبَّنَآ أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًۭا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ
وَمَا
और नहीं
تَنقِمُ
तुम नाराज़ होते
مِنَّآ
हमसे
إِلَّآ
मगर
أَنْ
ये कि
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِـَٔايَـٰتِ
निशानियों पर
رَبِّنَا
अपने रब की
لَمَّا
जब
جَآءَتْنَا ۚ
वो आईं हमारे पास
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَفْرِغْ
उँडेल दे
عَلَيْنَا
हम पर
صَبْرًۭا
सब्र
وَتَوَفَّنَا
और फ़ौत कर हमें
مُسْلِمِينَ
इस हाल में कि मुसलमान हों
"और तू केबल इस क्रोध से हमें कष्ट पहुँचाने के लिए पीछे पड़ गया है कि हम अपने रब की निशानियों पर ईमान ले आए। हमारे रब! हमपर धैर्य उड़ेल दे और हमें इस दशा में उठा कि हम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो।"
तफ़्सीर:
और तुम्हारे निकट (ऐ फिरऔन!) हमारा दोष केवल यह है कि हमने अपने रब की निशानियों को सत्य मान लिया, जब वे मूसा अलैहिसल्लाम के हाथ पर हमारे पास आईं। यदि यह कोई दोष दिया जाने वाला पाप है, तो यह हमारा पाप है। फिर वे विनयपूर्वक अपने रब से दुआ करने लगे : ऐ हमारे पालनहार! हमपर धैर्य उड़ेल दे, ताकि हम सत्य पर अडिग रहें। तथा हमें इस हाल में मौत दे कि हम तेरे प्रति समर्पित हों, तेरे आदेश का पालन करने वाले तथा तेरे रसूल का अनुसरण करने वाले हों।
आयत 127
وَقَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ أَتَذَرُ مُوسَىٰ وَقَوْمَهُۥ لِيُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَيَذَرَكَ وَءَالِهَتَكَ ۚ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبْنَآءَهُمْ وَنَسْتَحْىِۦ نِسَآءَهُمْ وَإِنَّا فَوْقَهُمْ قَـٰهِرُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
مِن
of
قَوْمِ
क़ौम में से
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन की
أَتَذَرُ
क्या तुम छोड़ दोगे
مُوسَىٰ
मूसा को
وَقَوْمَهُۥ
और उसकी क़ौम को
لِيُفْسِدُوا۟
कि वो फ़साद फैलाऐं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَيَذَرَكَ
और छोड़ दें तुझे
وَءَالِهَتَكَ ۚ
और तेरे इलाहों को
قَالَ
उसने कहा
سَنُقَتِّلُ
ज़रूर हम ख़ूब क़त्ल कर देंगे
أَبْنَآءَهُمْ
उनके बेटों को
وَنَسْتَحْىِۦ
और हम ज़िंदा छोड़ देंगे
نِسَآءَهُمْ
उनकी औरतों को
وَإِنَّا
और बेशक हम
فَوْقَهُمْ
ऊपर उनके
قَـٰهِرُونَ
ज़बरदस्त हैं
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "क्या तुम मूसा और उसकी क़ौम को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में बिगाड़ पैदा करें और वे तुम्हें और तुम्हारे उपास्यों को छोड़ बैठे?" उसने कहा, "हम उनके बेटों को बुरी तरह क़त्ल करेंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रखेंगे। निश्चय ही हमें उनपर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन की जाति के प्रमुखों और बड़े लोगों ने, उसे मूसा तथा उनके साथ मोमिनों के खिलाफ भड़काते हुए कहा : क्या (ऐ फ़िरऔन!) तुम मूसा और उसकी जाति को छोड़े रखोगे कि वे देश में बिगाड़ फैलाएँ, तथा वे तुमसे और तुम्हारे पूज्यों से किनारा कर लें और (लोगों को) अकेले अल्लाह की इबादत की ओर बुलाएँ?! फ़िरऔन ने कहा : हम बनी इसराईल के बेटों को मार डालेंगे, और उनकी स्त्रियों को सेवा करने के लिए बाक़ी रखेंगे। और निश्चय हमें उनपर ज़ोर, ग़लबा और प्रभुत्व प्राप्त है।
आयत 128
قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ ٱسْتَعِينُوا۟ بِٱللَّهِ وَٱصْبِرُوٓا۟ ۖ إِنَّ ٱلْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ وَٱلْعَـٰقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِقَوْمِهِ
अपनी क़ौम से
ٱسْتَعِينُوا۟
मदद माँगो तुम
بِٱللَّهِ
अल्लाह से
وَٱصْبِرُوٓا۟ ۖ
और सब्र करो
إِنَّ
बेशक
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
يُورِثُهَا
वो वारिस बनाता है उसका
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ ۖ
अपने बन्दों में से
وَٱلْعَـٰقِبَةُ
और अंजाम
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए है
मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "अल्लाह से सम्बद्ध होकर सहायता प्राप्त करो और धैर्य से काम लो। धरती अल्लाह की है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसका वारिस बना देता है। और अंतिम परिणाम तो डर रखनेवालों ही के लिए है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के लोगों को वसीयत करते हुए कहा : ऐ लोगों! केवल एक अल्लाह से सहायता माँगो कि वह तुम्हारी मुसीबत दूर कर दे तथा तुम्हें लाभ पहुँचाए, और जिस आज़माइश से तुम पीड़ित हो, उसपर धैर्य रखो। क्योंकि यह धरती अकेले अल्लाह की है। फ़िरऔन या उसके सिवा किसी और की नहीं कि वह उसमें जो चाहे, करता फिरे। अल्लाह अपनी इच्छा अनुसार लोगों को बारी-बारी उसमें अवसर देता रहता है। लेकिन धरती पर अच्छा परिणाम केवल उन ईमान वालों के लिए है, जो अपने पालनहार के आदेशों का पालन करते हैं और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते हैं। अंततः यह उन्हीं के लिए है, यद्यपि उन्हें कुछ आज़माइशों और परीक्षाओं से गुज़रना पड़े।
आयत 129
قَالُوٓا۟ أُوذِينَا مِن قَبْلِ أَن تَأْتِيَنَا وَمِنۢ بَعْدِ مَا جِئْتَنَا ۚ قَالَ عَسَىٰ رَبُّكُمْ أَن يُهْلِكَ عَدُوَّكُمْ وَيَسْتَخْلِفَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أُوذِينَا
अज़ियत दिए गए हम
مِن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
تَأْتِيَنَا
तू आए हमारे पास
وَمِنۢ
from
بَعْدِ
और बाद इसके
مَا
जो
جِئْتَنَا ۚ
तू आ गया हमारे पास
قَالَ
उसने जवाब दिया
عَسَىٰ
क़रीब है
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
أَن
कि
يُهْلِكَ
हलाक कर दे
عَدُوَّكُمْ
तुम्हारे दुश्मन को
وَيَسْتَخْلِفَكُمْ
और जानशीन बनाए तुम्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرَ
फिर वो देखे
كَيْفَ
किस तरह
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
उन्होंने कहा, "तुम्हारे आने से पहले भी हम सताए गए और तुम्हारे आने के बाद भी।" उसने कहा, "निकट है कि तुम्हारा रब तुम्हारे शत्रुओं को विनष्ट कर दे और तुम्हें धरती में ख़लीफ़ा बनाए, फिर यह देखे कि तुम कैसे कर्म करते हो।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम की जाति बनी इसराईल ने उनसे कहा : हम तुम्हारे आने से पहले भी फ़िरऔन के हाथों सताए गए। वह हमारे पुत्रों को मार देता और हमारी स्त्रियों को जीवित रहने देता था। और तुम्हारे आने के पश्चात् भी सताए जा रहे हैं! मूसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें समझाते हुए और मुसीबत से छुटकारे की खुशख़बरी देते हुए कहा : निकट है कि तुम्हारा पालनहार तुम्हारे शत्रु फिरऔन तथा उसकी जाति को विनष्ट कर दे और उनके बाद धरती में तुम्हारा आधिपत्य क़ायम कर दे, और फिर देखे कि तुम उसके बाद क्या करते हो, शुक्र या नाशुक्री?
आयत 130
وَلَقَدْ أَخَذْنَآ ءَالَ فِرْعَوْنَ بِٱلسِّنِينَ وَنَقْصٍۢ مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَخَذْنَآ
पकड़ा हमने
ءَالَ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन को
بِٱلسِّنِينَ
साथ क़हतसालियों के
وَنَقْصٍۢ
और कमी के
مِّنَ
of
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों में से
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَذَّكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
और हमने फ़िरऔनियों को कई वर्ष तक अकाल और पैदावार की कमी में ग्रस्त रखा कि वे चेतें
तफ़्सीर:
हमने फ़िरऔन की जाति को सूखे और अकाल से दंडित किया, तथा हमने उनका धरती के फलों और उसकी पैदावार की कमी के साथ परीक्षण किया। इस आशा में कि वे सीख और उपदेश ग्रहण करें कि उनके साथ यह जो कुछ घटित हुआ है, वह उनके कुफ़्र की सज़ा के तौर पर है, इसलिए वे अल्लाह के सामने तौबा कर लें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जादूगरों के ईमान लाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई सामने आने पर उसे कबूल करने में देर नहीं करनी चाहिए, चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो।
आयत 131
فَإِذَا جَآءَتْهُمُ ٱلْحَسَنَةُ قَالُوا۟ لَنَا هَـٰذِهِۦ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌۭ يَطَّيَّرُوا۟ بِمُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ ۗ أَلَآ إِنَّمَا طَـٰٓئِرُهُمْ عِندَ ٱللَّهِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَتْهُمُ
आती उनके पास
ٱلْحَسَنَةُ
भलाई
قَالُوا۟
वो कहते
لَنَا
हमारे लिए है
هَـٰذِهِۦ ۖ
ये
وَإِن
और अगर
تُصِبْهُمْ
पहुँचती उन्हें
سَيِّئَةٌۭ
कोई बुराई
يَطَّيَّرُوا۟
वो बदशगूनी लेते
بِمُوسَىٰ
मूसा से
وَمَن
और उनसे जो
مَّعَهُۥٓ ۗ
साथ थे उसके
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّمَا
बेशक
طَـٰٓئِرُهُمْ
नहूसत उनकी
عِندَ
(are) with
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास है
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
फिर जब उन्हें अच्छी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तो है ही हमारे लिए।" और उन्हें बुरी हालत पेश आए तो वे उसे मूसा और उसके साथियों की नहूसत (अशकुन) ठहराएँ। सुन लो, उसकी नहूसत तो अल्लाह ही के पास है, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
जब फ़िरऔन की जाति पर उर्वरता, अच्छे फलों और सस्ते दामों के रूप में सुखद स्थिति आती, तो वे कहते : हमें यह इसलिए दिया गया क्योंकि हम इसके हक़दार हैं और यह हमारे ही लिए विशिष्ट है। और अगर उनपर अकाल, सूखे, बीमारियों की अधिकता तथा अन्य विपत्तियों के रूप में कोई मुसीबत आती, तो वे मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथ मौजूद बनी इसराईल से अपशकुन लेते। जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें इस तरह की जो भी चीज़ पहुँचती है, वह केवल अल्लाह की नियति (तक़दीर) के अनुसार पहुँचती है। इससे उनका और मूसा अलैहिस्सलाम का कोई लेना देना नहीं है, सिवाय मूसा अलैहिस्सलाम के उनपर बद्-दुआ करने के। लेकिन उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते, इसलिए वे इसे अल्लाह के अलावा किसी और से संबद्ध करते हैं।
आयत 132
وَقَالُوا۟ مَهْمَا تَأْتِنَا بِهِۦ مِنْ ءَايَةٍۢ لِّتَسْحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
مَهْمَا
जो भी
تَأْتِنَا
you bring us
بِهِۦ
तू लाएगा हमारे पास
مِنْ
of
ءَايَةٍۢ
कोई निशानी
لِّتَسْحَرَنَا
कि तू मसहूर कर दे हमें
بِهَا
साथ उसके
فَمَا
तो नहीं
نَحْنُ
हम
لَكَ
तुझ पर
بِمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वे बोले, "तू हमपर जादू करने के लिए चाहे कोई भी निशानी हमारे पास ले आए, हम तुझपर ईमान लानेवाले नहीं।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन की जाति ने मूसा अलैहिस्सलाम से, सत्य से दुश्मनी के कारण कहा : तुम हमारे पास जो निशानी भी ले आओ, और हमें हमारे धर्म से फेरने के लिए उसे ग़लत साबित करने और अपने धर्म की सच्चाई सिद्ध करने के लिए जो भी तर्क और प्रमाण ले आओ, हम तुमपर कभी विश्वास नहीं करेंगे।
आयत 133
فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلطُّوفَانَ وَٱلْجَرَادَ وَٱلْقُمَّلَ وَٱلضَّفَادِعَ وَٱلدَّمَ ءَايَـٰتٍۢ مُّفَصَّلَـٰتٍۢ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ وَكَانُوا۟ قَوْمًۭا مُّجْرِمِينَ
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजा हमने
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلطُّوفَانَ
तूफ़ान
وَٱلْجَرَادَ
और टिड्डियाँ
وَٱلْقُمَّلَ
और जुएँ
وَٱلضَّفَادِعَ
और मेंढक
وَٱلدَّمَ
और ख़ून
ءَايَـٰتٍۢ
निशानियाँ
مُّفَصَّلَـٰتٍۢ
अलग-अलग
فَٱسْتَكْبَرُوا۟
तो उन्होंने तकब्बुर किया
وَكَانُوا۟
और थे वो
قَوْمًۭا
लोग
مُّجْرِمِينَ
मुजरिम
अन्ततः हमने उनपर तूफ़ान और टिड्डियों और छोटे कीड़े और मेंढक और रक्त, कितनी ही निशानियाँ अलग-अलग भेजी, किन्तु वे घमंड ही करते रहे। वे थे ही अपराधी लोग
तफ़्सीर:
अंततः हमने उनके झुठलाने और हठ पर सज़ा के रूप में उनपर बहुत सारा पानी भेजा, जिसने उनकी फसलों और फलों को डुबो दिया। और हमने उन पर टिड्डियाँ भेजीं, जो उनकी फसलें खा गईं। और हमने उनपर जुएँ भेजीं, जो खेतियों को लग जाती हैं या इनसान के बाल में रहकर उसे कष्ट देती हैं, और हमने उन पर मेंढक भेजे, जो उनके बर्तनों में भर गए, उनके खाने-पीने की चीज़ों को खराब कर दिए और उनकी नींदें उड़ा दीं। और हमने उनपर रक्त भेजा, जिससे उनके कुएँ और उनकी नहरें रक्तमय हो गईं। हमने ये सब अलग-अलग और स्पष्ट निशानियाँ भेजीं, जो एक के बाद एक आती रहीं। परंतु ये सारी सज़ाएँ आने के बावजूद वे अल्लाह पर ईमान लाने और मूसा अलैहिस्सलाम के लाए हुए संदेश को मानने से अभिमान करते रहे। और वे ऐसे लोग थे जो पाप किया करते थे, वे न असत्य दूर रहते थे और न सत्य की राह पकड़ते थे।
आयत 134
وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيْهِمُ ٱلرِّجْزُ قَالُوا۟ يَـٰمُوسَى ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ ۖ لَئِن كَشَفْتَ عَنَّا ٱلرِّجْزَ لَنُؤْمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرْسِلَنَّ مَعَكَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
وَلَمَّا
और जब
وَقَعَ
वाक़ेअ हुआ
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلرِّجْزُ
अज़ाब
قَالُوا۟
कहने लगे
يَـٰمُوسَى
ऐ मूसा
ٱدْعُ
दुआ कर
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
بِمَا
बवजह उसके जो
عَهِدَ
उसने अहद किया
عِندَكَ ۖ
पास तेरे
لَئِن
अलबत्ता अगर
كَشَفْتَ
हटा दे तू
عَنَّا
हमसे
ٱلرِّجْزَ
अज़ाब
لَنُؤْمِنَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर ईमान ले आऐंगे
لَكَ
तुझ पर
وَلَنُرْسِلَنَّ
और अलबत्ता हम ज़रूर भेजेंगे
مَعَكَ
साथ तेरे
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
जब कभी उनपर यातना आ पड़ती, कहते है, "ऐ मूसा, हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसने तुमसे कर रखी है। तुमने यदि हमपर से यह यातना हटा दी, तो हम अवश्य ही तुमपर ईमान ले आएँगे और इसराईल की सन्तान को तुम्हारे साथ जाने देंगे।"
तफ़्सीर:
और जब उनपर ये सारी यातनाएँ आ पड़ीं, तो वे मूसा अलैहिस्सलाम के पास पहुँचे और कहने लगे : ऐ मूसा! तुम अपने पालनहार से, उस नुबुव्वत के हवाले से जो उसने तुम्हें प्रदान की है और उसके हवाले से जो उसने तौबा के द्वारा यातना दूर करने का तुमहें वचन दिया है, हमारे लिए दुआ करो कि हमारे ऊपर आई हुई यातना को हमसे दूर कर दे। अगर तुमने हमसे यह यातना दूर कर दी, तो अवश्य ही हम तुमपर ईमान ले आएँगे और बनी इसराईल को आज़ाद करके तुम्हारे साथ भेज देंगे।
आयत 135
فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ ٱلرِّجْزَ إِلَىٰٓ أَجَلٍ هُم بَـٰلِغُوهُ إِذَا هُمْ يَنكُثُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
كَشَفْنَا
हटा देते हम
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلرِّجْزَ
अज़ाब को
إِلَىٰٓ
till
أَجَلٍ
एक वक़्त तक
هُم
वो
بَـٰلِغُوهُ
पहुँचने वाले थे जिसे
إِذَا
यकायक
هُمْ
वो
يَنكُثُونَ
वो अहद तोड़ डालते
किन्तु जब हम उनपर से यातना को एक नियत समय के लिए जिस तक वे पहुँचनेवाले ही थे, हटा लेते तो क्या देखते कि वे वचन-भंग करने लग गए
तफ़्सीर:
फिर जब हम उन्हें सागर में डुबोकर विनष्ट करने से पहले, एक निश्चित अवधि के लिए उनसे यातना को दूर कर देते, तो अचानक वे मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाने और बनी इसराईल को भेजने का अपना किया हुआ वादा तोड़ देत। चुनाँचे वे अपने कुफ़्र ही पर क़ायम रहते और बनी इसराईल को मूसा अलैहिस्सलाम के साथ भेजने से मुकर जाते।
आयत 136
فَٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَكَانُوا۟ عَنْهَا غَـٰفِلِينَ
فَٱنتَقَمْنَا
पस इन्तिक़ाम लिया हमने
مِنْهُمْ
उनसे
فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ
फ़िर ग़र्क़ कर दिया हमने उन्हें
فِى
in
ٱلْيَمِّ
समुन्दर में
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि उन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठला दिया था
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَكَانُوا۟
और थे वो
عَنْهَا
उनसे
غَـٰفِلِينَ
ग़ाफ़िल
फिर हमने उनसे बदला लिया और उन्हें गहरे पानी में डूबो दिया, क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को ग़लत समझा और उनसे ग़ाफिल हो गए
तफ़्सीर:
फिर जब उनके विनाश का निश्चित समय आ गया, तो हमने उन्हें समुद्र में डुबोकर उनपर अपनी सज़ा उतार दी, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की निशानियों को झुठलाया और उनसे इंगति होने वाले उस सत्य से उपेक्षा किया था, जिसमें कोई संदेह नहीं।
आयत 137
وَأَوْرَثْنَا ٱلْقَوْمَ ٱلَّذِينَ كَانُوا۟ يُسْتَضْعَفُونَ مَشَـٰرِقَ ٱلْأَرْضِ وَمَغَـٰرِبَهَا ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا ۖ وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ ٱلْحُسْنَىٰ عَلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ بِمَا صَبَرُوا۟ ۖ وَدَمَّرْنَا مَا كَانَ يَصْنَعُ فِرْعَوْنُ وَقَوْمُهُۥ وَمَا كَانُوا۟ يَعْرِشُونَ
وَأَوْرَثْنَا
और वारिस बना दिया हमने
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
يُسْتَضْعَفُونَ
वो कमज़ोर समझे जाते
مَشَـٰرِقَ
(the) eastern (parts)
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन के मशरिक़ों का
وَمَغَـٰرِبَهَا
और उसके मग़रिबों का
ٱلَّتِى
वो जो
بَـٰرَكْنَا
बरकत दी थी हमने
فِيهَا ۖ
उसमें
وَتَمَّتْ
और पूरी हो गई
كَلِمَتُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब के
ٱلْحُسْنَىٰ
भलाई वाली
عَلَىٰ
ऊपर
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के
بِمَا
बवजह उसके जो
صَبَرُوا۟ ۖ
उन्होंने सब्र किया
وَدَمَّرْنَا
और बरबाद कर दिया हमने
مَا
जो
كَانَ
था
يَصْنَعُ
बनाता
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन
وَقَوْمُهُۥ
और उसकी क़ौम के लोग
وَمَا
और जो कुछ
كَانُوا۟
थे वो
يَعْرِشُونَ
वो बुलन्द करते
और जो लोग कमज़ोर पाए जाते थे, उन्हें हमने उस भू-भाग के पूरब के हिस्सों और पश्चिम के हिस्सों का उत्तराधिकारी बना दिया, जिसे हमने बरकत दी थी। और तुम्हारे रब का अच्छा वादा इसराईल की सन्तान के हक़ में पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धैर्य से काम लिया और फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ हमने विनष्ट कर दिया, जिसे वे बनाते और ऊँचा उठाते थे
तफ़्सीर:
हमने बनी इसराईल को, जिन्हें फिरऔन और उसकी जाति के लोग कमज़ोर समझ रहे थे, धरती के पूर्व और पश्चिम के भूभागों का वारिस बना दिया। इस धरती से अभिप्राय शाम के देश (लेवंत) हैं, ये वे देश हैं जिनमें अल्लाह ने उनकी फसलों और फलों को पूरी तरह से पैदा करके बरकत रखी है। और इस प्रकार (ऐ नबी!) आपके पालनहार की सर्वश्रेष्ठ बात पूरी हो गई। वह बात अल्लाह सर्वशक्तिमान के इस कथन में उल्लिखित है : {وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا فِي الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِينَ} (القصص: ٥) ''हम चाहते हैं कि उन लोगों पर उपकार करें, जो धरती में कमज़ोर समझ लिए गए थे और उन्हें 'इमाम' बना दें और उन्हें वारिस बना दें।'' (सूरतुल-क़सस : 5)। अतः अल्लाह ने उन्हें फ़िरऔन और उसकी जाति की ओर से पहुँचने वाले कष्ट पर धैर्य के कारण धरती में प्रभुत्व प्रदान कर दिया। तथा हमने फ़िरऔन के बनाए हुए खेतों तथा घरों और उनके द्वारा निर्मित महलों को ध्वस्त कर दिया।
आयत 138
وَجَـٰوَزْنَا بِبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱلْبَحْرَ فَأَتَوْا۟ عَلَىٰ قَوْمٍۢ يَعْكُفُونَ عَلَىٰٓ أَصْنَامٍۢ لَّهُمْ ۚ قَالُوا۟ يَـٰمُوسَى ٱجْعَل لَّنَآ إِلَـٰهًۭا كَمَا لَهُمْ ءَالِهَةٌۭ ۚ قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌۭ تَجْهَلُونَ
وَجَـٰوَزْنَا
और पार उतार दिया हमने
بِبَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
ٱلْبَحْرَ
समुन्दर के
فَأَتَوْا۟
तो वो आए
عَلَىٰ
upon
قَوْمٍۢ
ऐसे लोगों पर
يَعْكُفُونَ
जो जमे बैठे थे
عَلَىٰٓ
to
أَصْنَامٍۢ
बुतों पर
لَّهُمْ ۚ
अपने
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰمُوسَى
ऐ मूसा
ٱجْعَل
बना
لَّنَآ
हमारे लिए
إِلَـٰهًۭا
कोई इलाह
كَمَا
जैसा कि
لَهُمْ
उन लोगों के लिए
ءَالِهَةٌۭ ۚ
इलाह हैं
قَالَ
कहा
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
قَوْمٌۭ
लोग
تَجْهَلُونَ
तुम जहालत बरत रहे हो
और इसराईल की सन्तान को हमने सागर से पार करा दिया, फिर वे ऐसे लोगों को पास पहुँचे जो अपनी कुछ मूर्तियों से लगे बैठे थे। कहने लगे, "ऐ मूसा! हमारे लिए भी कोई ऐसा उपास्य ठहरा दे, जैसे इनके उपास्य है।" उसने कहा, "निश्चय ही तुम बड़े ही अज्ञानी लोग हो
तफ़्सीर:
और हमने बनी इसराईल को समुद्र पार करा दिया, जब मूसा ने उसमें अपनी लाठी मारी और वह फट गया। चुनाँचे उसे पार करने के बाद वे ऐसी जाति के पास से गुज़रे, जो अपनी कुछ मूर्तियों की पूजा में लगी हुई थी, जिन्हें वह अल्लाह को छोड़कर पूजती थी। उसे देखकर बनी इसराईल ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : ऐ मूसा! हमारे लिए एक ऐसी मूर्ति बना दीजिए जिसकी हम पूज करें, जैसे कि इन लोगों के पास कुछ मूर्तियों हैं, जिनकी वे अल्लाह के सिवा पूजा करते हैं। तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! निश्चय तुम ऐसे लोग हो जो इस बात से अनभिज्ञ हो कि अल्लाह के लिए क्या सम्मान और एकेश्वरवाद अनिवार्य है, और उसके लिए क्या चीज़ अशोभनीय है जैसे कि शिर्क और उसके अलावा की पूजा।
आयत 139
إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ مُتَبَّرٌۭ مَّا هُمْ فِيهِ وَبَـٰطِلٌۭ مَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
إِنَّ
बेशक
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये सब
مُتَبَّرٌۭ
बरबाद होने वाला है
مَّا
जो
هُمْ
वो हैं
فِيهِ
उसमें
وَبَـٰطِلٌۭ
और बातिल/ग़लत हैं
مَّا
जो कुछ
كَانُوا۟
हैं वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
“निश्चय ही वह लोग लगे हुए है, बरबाद होकर रहेगा। और जो कुछ ये कर रहे है सर्वथा व्यर्थ है।"
तफ़्सीर:
ये लोग जो अपनी मूर्तियों की पूजा में लगे हुए हैं, वे अल्लाह के अलावा की पूजा के जिस काम में लगे हुए हैं, वह नष्ट किया जाने वाला है और वे जो कुछ नेकी के कार्य करते चले आ रहे हैं, वह व्यर्थ (अमान्य) है, क्योंकि उन्होंने इबादत में अल्लाह के साथ दूसरों को साझी बनाया है।
आयत 140
قَالَ أَغَيْرَ ٱللَّهِ أَبْغِيكُمْ إِلَـٰهًۭا وَهُوَ فَضَّلَكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالَ
कहा
أَغَيْرَ
क्या ग़ैर
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَبْغِيكُمْ
मैं तलाश करूँ तुम्हारे लिए
إِلَـٰهًۭا
कोई इलाह
وَهُوَ
हालाँकि वो
فَضَّلَكُمْ
उसने फ़ज़ीलत बख़्शी तुम्हें
عَلَى
over
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों पर
उसने कहा, "क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई और उपास्य ढूढूँ, हालाँकि उसी ने सारे संसारवालों पर तुम्हें श्रेष्ठता प्रदान की?"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति से कहा : मैं तुम्हारे लिए भला अल्लाह के सिवा कोई पूज्य कैसे तलाश करूँ, जिसकी तुम इबादत करो, जबकि तुमने अल्लाह की बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखी हैं, और अल्लाह ने तुम्हारे दुश्मनों को विनष्ट करके और तुम्हें धरती का उत्तराधिकारी बनाकर और उसमें तुम्हें प्रभुत्व प्रदान करके, तुम्हें तुम्हारे समय के सारे संसार वासियों पर श्रेष्ठता प्रदान की है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन की कौम पर आए अज़ाब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बार-बार निशानियां देखकर भी इनकार करने वाली कौम पर आखिरकार अल्लाह का अज़ाब आता है।
आयत 141
وَإِذْ أَنجَيْنَـٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ ۖ يُقَتِّلُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌۭ
وَإِذْ
और जब
أَنجَيْنَـٰكُم
निजात दी हमने तुम्हें
مِّنْ
from
ءَالِ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन से
يَسُومُونَكُمْ
वो चखाते थे तुम्हें
سُوٓءَ
बुरा
ٱلْعَذَابِ ۖ
अज़ाब
يُقَتِّلُونَ
वो खूब क़त्ल करते
أَبْنَآءَكُمْ
तुम्हारे बेटों को
وَيَسْتَحْيُونَ
और वो ज़िन्दा छोड़ देते
نِسَآءَكُمْ ۚ
तुम्हारी औरतों को
وَفِى
And in
ذَٰلِكُم
और इसमें
بَلَآءٌۭ
आज़माइश थी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ी
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुटकारा दिया जो तुम्हें बुरी यातना में ग्रस्त रखते थे। तुम्हारे बेटों को मार डालते और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे। और वह (छुटकारा दिलाना) तुम्हारे रब की ओर से बड़ा अनुग्रह है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ बनी इसराईल!) वह समय याद करो, जब हमने तुम्हें फ़िरऔन और उसकी जाति के अपमानजनक व्यवहार से बचाकर तुम्हें मुक्ति दिलाई, क्योंकि वे तुम्हें तरह-तरह से सताते थे; तुम्हारे पुत्रों को बुरी तरह क़त्ल कर देते थे और तुम्हारी स्त्रियों को अपनी सेवा के लिए जीवित रहने देते थे। तथा तुम्हें फ़िरऔन और उसकी जाति के चंगुल से मुक्त करने की इस घटना में तुम्हारे पालनहार की ओर से बहुत बड़ी परीक्षा है, जिसके लिए तुम्हें आभार प्रकट करने की आवश्यकता है।
आयत 142
۞ وَوَٰعَدْنَا مُوسَىٰ ثَلَـٰثِينَ لَيْلَةًۭ وَأَتْمَمْنَـٰهَا بِعَشْرٍۢ فَتَمَّ مِيقَـٰتُ رَبِّهِۦٓ أَرْبَعِينَ لَيْلَةًۭ ۚ وَقَالَ مُوسَىٰ لِأَخِيهِ هَـٰرُونَ ٱخْلُفْنِى فِى قَوْمِى وَأَصْلِحْ وَلَا تَتَّبِعْ سَبِيلَ ٱلْمُفْسِدِينَ
۞ وَوَٰعَدْنَا
और वादा लिया हमने
مُوسَىٰ
मूसा से
ثَلَـٰثِينَ
तीस
لَيْلَةًۭ
रात का
وَأَتْمَمْنَـٰهَا
और पूरा किया हमने उन्हें
بِعَشْرٍۢ
साथ दस के
فَتَمَّ
तो पूरा हुआ
مِيقَـٰتُ
मुक़र्रर वक़्त
رَبِّهِۦٓ
उसके रब का
أَرْبَعِينَ
चालीस
لَيْلَةًۭ ۚ
रात का
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِأَخِيهِ
to his brother
هَـٰرُونَ
अपने भाई हारून से
ٱخْلُفْنِى
जानशीनी करो मेरी
فِى
in
قَوْمِى
मेरी क़ौम में
وَأَصْلِحْ
और इस्लाह करो
وَلَا
और ना
تَتَّبِعْ
तुम पैरवी करो
سَبِيلَ
रास्ते की
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों के
और हमने मूसा से तीस रातों का वादा ठहराया, फिर हमने दस और बढ़ाकर उसे पूरा किया। इसी प्रकार उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई और मूसा ने अपने भाई हारून से कहा, "मेरे पीछे तुम मेरी क़ौम में मेरा प्रतिनिधित्व करना और सुधारना और बिगाड़ पैदा करनेवालों के मार्ग पर न चलना।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अपने रसूल मूसा अलैहिस्सलाम से बात करने के लिए, उनसे तीस रातों का वादा किया और फिर दस रातें बढ़ाकर यह अवधि पूरी कर दी। इस तरह यह (अवधि) चालीस रातों की हो गई। तथा मूसा ने अपने भाई हारून से, अपने पालनहार से बात करने के लिए जाते समय कहा : ऐ हारून! मेरी जाति में मेरा उत्तराधिकारी बनकर रहना और उनके मामलों को अच्छी नीति और उनके साथ नरमी के व्यवहार के साथ ठीक रखना, और पापों को अंजाम देकर भ्रष्टाचारियों के रास्ते पर मत चलना और अवज्ञाकारियों का सहायक मत बनना।
आयत 143
وَلَمَّا جَآءَ مُوسَىٰ لِمِيقَـٰتِنَا وَكَلَّمَهُۥ رَبُّهُۥ قَالَ رَبِّ أَرِنِىٓ أَنظُرْ إِلَيْكَ ۚ قَالَ لَن تَرَىٰنِى وَلَـٰكِنِ ٱنظُرْ إِلَى ٱلْجَبَلِ فَإِنِ ٱسْتَقَرَّ مَكَانَهُۥ فَسَوْفَ تَرَىٰنِى ۚ فَلَمَّا تَجَلَّىٰ رَبُّهُۥ لِلْجَبَلِ جَعَلَهُۥ دَكًّۭا وَخَرَّ مُوسَىٰ صَعِقًۭا ۚ فَلَمَّآ أَفَاقَ قَالَ سُبْحَـٰنَكَ تُبْتُ إِلَيْكَ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَ
आया
مُوسَىٰ
मूसा
لِمِيقَـٰتِنَا
हमारे मुक़र्रर वक़्त पर
وَكَلَّمَهُۥ
और कलाम किया उससे
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَرِنِىٓ
दिखा मुझे
أَنظُرْ
मैं देखूँ
إِلَيْكَ ۚ
तेरी तरफ़
قَالَ
फ़रमाया
لَن
हरगिज़ ना
تَرَىٰنِى
तुम देख सकोगे मुझे
وَلَـٰكِنِ
और लेकिन
ٱنظُرْ
देखो
إِلَى
at
ٱلْجَبَلِ
तरफ़ पहाड़ के
فَإِنِ
फिर अगर
ٱسْتَقَرَّ
वो क़ायम रहे
مَكَانَهُۥ
अपनी जगह पर
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
تَرَىٰنِى ۚ
तुम देख लोगे मुझे
فَلَمَّا
तो जब
تَجَلَّىٰ
तजल्ली की
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
لِلْجَبَلِ
पहाड़ पर
جَعَلَهُۥ
उसने कर दिया उसे
دَكًّۭا
रेज़ा-रेज़ा
وَخَرَّ
और गिर पड़ा
مُوسَىٰ
मूसा
صَعِقًۭا ۚ
बेहोश होकर
فَلَمَّآ
फिर जब
أَفَاقَ
होश में आया
قَالَ
उसने कहा
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
تُبْتُ
तौबा करता हूँ मैं
إِلَيْكَ
तेरी तरफ़
وَأَنَا۠
और मैं
أَوَّلُ
सब से पहला हूँ
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में
अब मूसा हमारे निश्चित किए हुए समय पर पहुँचा और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह करने लगा, "मेरे रब! मुझे देखने की शक्ति प्रदान कर कि मैं तुझे देखूँ।" कहा, "तू मुझे कदापि न देख सकेगा। हाँ, पहाड़ की ओर देख। यदि वह अपने स्थान पर स्थिर पर स्थिर रह जाए तो फिर तू मुझे देख लेगा।" अतएव जब उसका रब पहाड़ पर प्रकट हुआ तो उसे चकनाचूर कर दिया और मूसा मूर्छित होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया तो कहा, "महिमा है तेरी! मैं तेरे समझ तौबा करता हूँ और सबसे पहला ईमान लानेवाला मैं हूँ।"
तफ़्सीर:
जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने पालनहार से बात करने के लिए उसके लिए निर्धारित समय पर अर्थात् चालीस रातें पूरी होने के बाद आए, और उनके पालनहार ने उनसे आदेशों, निषेधों और अन्य चीजों के बारे में बात की, तो मूसा अलैहिस्सलाम के मन में अपने पालनहार को देखने की लालसा पैदा हुई और उससे अपना दर्शन कराने का अनुरोध कर दिया। तो अल्लाह ने उसे जवाब दिया : तुम दुनिया के जीवन में मुझे कदापि नहीं देखोगे। क्योंकि तुम्हारे पास इसकी क्षमता नहीं है। लेकिन पहाड़ को देखो, जब मैं खुद को उसके सामने प्रकट करूँ। अगर वह अपने स्थान पर स्थिर रहा, प्रभावित नहीं हुआ, तो तुम मुझे देख लोगे। और अगर वह धरती के साथ समतल हो गया, तो तुम मुझे इस संसार में हरगिज़ नहीं देख सकोगे। चुनाँचे जब अल्लाह ने स्वयं को पहाड़ पर प्रकट किया, तो उसे धरती के साथ समतल कर दिया, और मूसा अलैहिस्सलाम बेहोश होकर गिर पड़े। फिर जब होश में आए तो कहने लगे : (ऐ मेरे पालनहार!) मैं तुझे उन सभी चीज़ों से पवित्र मानता हूँ, जो तेरे लिए शोभनीय नहीं हैं। देख, मैं दुनिया में तेरे दर्शन की माँग करने की भूल से तौबा करता हूँ और मैं अपनी जाति का प्रथम मोमिन व्यक्ति हूँ।
आयत 144
قَالَ يَـٰمُوسَىٰٓ إِنِّى ٱصْطَفَيْتُكَ عَلَى ٱلنَّاسِ بِرِسَـٰلَـٰتِى وَبِكَلَـٰمِى فَخُذْ مَآ ءَاتَيْتُكَ وَكُن مِّنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ
قَالَ
फ़रमाया
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِنِّى
बेशक मैं
ٱصْطَفَيْتُكَ
चुन लिया मैंने तुझे
عَلَى
over
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
بِرِسَـٰلَـٰتِى
साथ अपने पैग़ामात के
وَبِكَلَـٰمِى
और सात अपने कलाम के
فَخُذْ
पस ले लो
مَآ
जो
ءَاتَيْتُكَ
दिया मैंने तुझे
وَكُن
और हो जाओ
مِّنَ
among
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों में से
उसने कहा, "ऐ मूसा! मैंने दूसरे लोगों के मुक़ाबले में तुझे चुनकर अपने संदेशों और अपनी वाणी से तुझे उपकृत किया। अतः जो कुछ मैं तुझे दूँ उसे ले और कृतज्ञता दिखा।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : ऐ मूसा! मैंने तुम्हें चुन लिया और अपने संदेशों के साथ लोगों पर तुम्हें श्रेष्ठता प्रदान की जब मैंने तुम्हें उनके पास भेजा, और मैंने तुम्हें बिना किसी मध्यस्थ के अपनी वार्ता का सौभाग्य प्रदान किया। अतः हमारे दिए हुए इस उदार सम्मान को ले लो और इस महान प्रदान पर अल्लाह का शुक्रिया अदा करने वालों में से हो जाओ।
आयत 145
وَكَتَبْنَا لَهُۥ فِى ٱلْأَلْوَاحِ مِن كُلِّ شَىْءٍۢ مَّوْعِظَةًۭ وَتَفْصِيلًۭا لِّكُلِّ شَىْءٍۢ فَخُذْهَا بِقُوَّةٍۢ وَأْمُرْ قَوْمَكَ يَأْخُذُوا۟ بِأَحْسَنِهَا ۚ سَأُو۟رِيكُمْ دَارَ ٱلْفَـٰسِقِينَ
وَكَتَبْنَا
और लिख दी हमने
لَهُۥ
उसके लिए
فِى
in
ٱلْأَلْوَاحِ
तख़्तियों में
مِن
of
كُلِّ
every
شَىْءٍۢ
हर चीज़ के बारे में
مَّوْعِظَةًۭ
नसीहत
وَتَفْصِيلًۭا
और तफ़सील
لِّكُلِّ
वास्ते हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
فَخُذْهَا
पस पकड़ लो उसे
بِقُوَّةٍۢ
मज़बूती से
وَأْمُرْ
और हुक्म दो
قَوْمَكَ
अपनी क़ौम को
يَأْخُذُوا۟
वो ले लें
بِأَحْسَنِهَا ۚ
उनके बेहतरीन को
سَأُو۟رِيكُمْ
अनक़रीब मैं दिखाऊँगा तुम्हें
دَارَ
घर
ٱلْفَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़ों के
और हमने उसके लिए तख़्तियों पर उपदेश के रूप में हर चीज़ और हर चीज़ का विस्तृत वर्णन लिख दिया। अतः उनको मज़बूती से पकड़। उनमें उत्तम बातें है। अपनी क़ौम के लोगों को हुक्म दे कि वे उनको अपनाएँ। मैं शीघ्र ही तुम्हें अवज्ञाकारियों का घर दिखाऊँगा
तफ़्सीर:
हमने मूसा के लिए लकड़ी अथवा अन्य किसी वस्तु से बनी तख़्तियों में, हर वह चीज़ लिख दी, जिसकी बनी इसराईल को उनके धर्म और दुनिया के मामलों में ज़रूरत थी, ताकि उनमें से उपदेश ग्रहण करने वालों के लिए उपदेश और उन नियमों का विवरण हो जाए, जिनके विवरण की आवश्यकता हो। अब (ऐ मूसा!) इस तौरात को पूरी शक्ति से थाम लो, और अपनी जाति बनी इसराईल को आदेश दो कि वे इसकी उत्तम चीज़ों को पकड़ लें, जिनका बदला बहुत बड़ा है, जैसे आदेशों का संपूर्ण तरीके से पालन करना, और जैसे कि धैर्य रखना और माफ़ करना। मैं शीघ्र ही तुम्हें उन लोगों का परिणाम दिखाऊँगा, जिन्होंने मेरे आदेश का उल्लंघन किया और मेरी आज्ञाकारिता से निकल गए, तथा उन्हें किस तरह के विनाश और तबाही का सामना करना पड़ेगा।
आयत 146
سَأَصْرِفُ عَنْ ءَايَـٰتِىَ ٱلَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَإِن يَرَوْا۟ كُلَّ ءَايَةٍۢ لَّا يُؤْمِنُوا۟ بِهَا وَإِن يَرَوْا۟ سَبِيلَ ٱلرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًۭا وَإِن يَرَوْا۟ سَبِيلَ ٱلْغَىِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًۭا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَكَانُوا۟ عَنْهَا غَـٰفِلِينَ
سَأَصْرِفُ
अनक़रीब मैं फेर दूँगा
عَنْ
from
ءَايَـٰتِىَ
अपनी निशानियों से
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जो
يَتَكَبَّرُونَ
तकब्बुर करते हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देख लें
كُلَّ
हर
ءَايَةٍۢ
निशानी
لَّا
not
يُؤْمِنُوا۟
नहीं वो ईमान लाऐंगे
بِهَا
उस पर
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देख लें
سَبِيلَ
रास्ता
ٱلرُّشْدِ
हिदायत का
لَا
not
يَتَّخِذُوهُ
नहीं वो बनाऐंगे उसे
سَبِيلًۭا
रास्ता
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देख लें
سَبِيلَ
रास्ता
ٱلْغَىِّ
गुमराही का
يَتَّخِذُوهُ
वो बना लेंगे उसे
سَبِيلًۭا ۚ
रास्ता
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि उन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَكَانُوا۟
और थे वो
عَنْهَا
उनसे
غَـٰفِلِينَ
ग़ाफ़िल
जो लोग धरती में नाहक़ बड़े बनते है, मैं अपनी निशानियों की ओर से उन्हें फेर दूँगा। यदि वे प्रत्येक निशानी देख ले तब भी वे उस पर ईमान नहीं लाएँगे। यदि वे सीधा मार्ग देख लें तो भी वे उसे अपना मार्ग नहीं बनाएँगे। लेकिन यदि वे पथभ्रष्ट का मार्ग देख लें तो उसे अपना मार्ग ठहरा लेंगे। यह इसलिए की उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे
तफ़्सीर:
मैं संसार एवं इनसान के अंदर मौजूद अपनी निशानियों से सीख ग्रहण करने और मेरी किताब की आयतों को समझने से उन लोगों को विचलित कर दूँगा, जो अल्लाह के बंदों पर और सत्य पर नाहक़ अभिमान करते हैं। और जिनका हाल यह है कि यदि वे हर प्रकार की निशानियाँ देखते हैं, तो भी उन्हें नहीं मानते हैं; क्योंकि वे उनपर आपत्ति करते और उनसे मुँह फेरते हैं, तथा इसलिए भी कि वे अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं। और यदि वे सत्य का मार्ग देखते हैं, जो अल्लाह की प्रसन्नता की ओर ले जाता है, तो वे उसका पालन नहीं करते हैं और न उसमें कोई दिलचस्पी रखते हैं। और अगर वे अल्लाह के क्रोध की ओर ले जाने वाले गुमराही के रास्ते को देखते हैं, तो उसका अनुसरण करते हैं। यह मुसीबत जो उनपर आई, केवल इस कारण आई कि उन्होंने रसूलों के लाए हुए संदेश की सच्चाई को दर्शाने वाली अल्लाह की महान निशानियों को झुठलाया, और इसलिए कि उन्होंने उनपर सोच-विचार करने से उपेक्षा की।
आयत 147
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَلِقَآءِ ٱلْـَٔاخِرَةِ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी निशानियों को
وَلِقَآءِ
और मुलाक़ात को
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत की
حَبِطَتْ
ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ ۚ
आमाल उनके
هَلْ
नहीं
يُجْزَوْنَ
वो बदला दिए जाऐंगे
إِلَّا
मगर
مَا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जिन लोगों ने हमारी आयतों को और आख़िरत के मिलन को झूठा जाना, उनका तो सारा किया-धरा उनकी जान को लागू हुआ। जो कुछ वे करते रहे क्या उसके सिवा वे किसी और चीज़ का बदला पाएँगे?
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने हमारे रसूलों की सच्चाई को दर्शाने वाली हमारी आयतों को झुठलाया तथा क़ियामत के दिन अल्लाह से मिलने को झुठलाया, उनके वे कर्म व्यर्थ हो गए, जो इबादत के वर्ग से हैं। चुनाँचे उन्हें उनका प्रतिफल नहीं मिलेगा। क्योंकि उसकी शर्त अर्थ ईमान ही मौजूद नहीं है। और क़ियामत के दिन उन्हें उसी कुफ़्र और शिर्क का बदला दिया जाएगा, जो वे किया करते थे। और उसका बदला हमेशा के लिए जहन्नम में रहना है।
आयत 148
وَٱتَّخَذَ قَوْمُ مُوسَىٰ مِنۢ بَعْدِهِۦ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلًۭا جَسَدًۭا لَّهُۥ خُوَارٌ ۚ أَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّهُۥ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْدِيهِمْ سَبِيلًا ۘ ٱتَّخَذُوهُ وَكَانُوا۟ ظَـٰلِمِينَ
وَٱتَّخَذَ
और बना लिया
قَوْمُ
क़ौम ने
مُوسَىٰ
मूसा की
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ
उसके पीछे से
مِنْ
from
حُلِيِّهِمْ
अपने ज़ेवरात में से
عِجْلًۭا
एक बछ्ड़ा
جَسَدًۭا
जिस्म वाला
لَّهُۥ
उसकी
خُوَارٌ ۚ
गाय की आवाज़ थी
أَلَمْ
क्या नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَا
(could) not
يُكَلِّمُهُمْ
नहीं वो कलाम करता था उनसे
وَلَا
और ना
يَهْدِيهِمْ
वो रहनुमाई करता था उनकी
سَبِيلًا ۘ
किसी रास्ते (की तरफ़)
ٱتَّخَذُوهُ
उन्होंने बना लिया उसे (माबूद)
وَكَانُوا۟
और थे वो
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
और मूसा के पीछे उसकी क़ौम ने अपने ज़ेवरों से अपने लिए एक बछड़ा बना दिया, जिसमें से बैल की-सी आवाज़ निकलती थी। क्या उन्होंने देखा नहीं कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई राह दिखाता है? उन्होंने उसे अपना उपास्य बना लिया, औऱ वे बड़े अत्याचारी थे
तफ़्सीर:
जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने पालनहार से बात करने के लिए गए, तो उनकी जाति के लोगों ने अपने गहनों से बछड़े की एक मूर्ति बना ली, जिसमें कोई आत्मा नहीं थी, जबकि उसकी एक आवाज़ थी। क्या उन्हें पता नहीं कि यह बछड़ा न तो उनसे बात करता है, न किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भलाई का मार्ग दिखाता है और न उन्हें कोई लाभ पहुँचाता है या उनसे कोई हानि दूर करता है?! उन्होंने उसे पूज्य बना लिया तथा ऐसा करके वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले थे।
आयत 149
وَلَمَّا سُقِطَ فِىٓ أَيْدِيهِمْ وَرَأَوْا۟ أَنَّهُمْ قَدْ ضَلُّوا۟ قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ يَرْحَمْنَا رَبُّنَا وَيَغْفِرْ لَنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
وَلَمَّا
और जब
سُقِطَ
वो गिराए गए
فِىٓ
into
أَيْدِيهِمْ
अपने हाथों में (नादिम हुए)
وَرَأَوْا۟
और उन्होंने देखा
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
قَدْ
तहक़ीक़
ضَلُّوا۟
वो भटक गए हैं
قَالُوا۟
वो कहने लगे
لَئِن
यक़ीनन अगर
لَّمْ
ना
يَرْحَمْنَا
रहम किया हम पर
رَبُّنَا
हमारे रब ने
وَيَغْفِرْ
और (ना) उसने बख़्शिश फ़रमाई
لَنَا
हमारी
لَنَكُونَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से
और जब (चेताबनी से) उन्हें पश्चाताप हुआ और उन्होंने देख लिया कि वास्तव में वे भटक गए हैं तो कहने लगे, "यदि हमारे रब ने हमपर दया न की और उसने हमें क्षमा न किया तो हम घाटे में पड़ जाएँगे!"
तफ़्सीर:
और जब वे (अपने किए पर) लज्जित और चकित हुए तथा समझ गए कि वे अल्लाह के साथ बछड़े को पूज्य बनाने के कारण सही मार्ग से भटक गए हैं, तो अल्लाह से विनयपूर्वक प्रार्थना करते हुए कहने लगे : यदि हमारे पालनहार ने अपने आज्ञापालन की तौफ़ीक़ देकर हमपर दया नहीं की, और हमने बछड़े की पूजा करके जो पाप किया है, उसे क्षमा नहीं किया, तो हम निश्चित रूप से उन लोगों में से हो जाएँगे जिन्होंने अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों का घाटा किया।
आयत 150
وَلَمَّا رَجَعَ مُوسَىٰٓ إِلَىٰ قَوْمِهِۦ غَضْبَـٰنَ أَسِفًۭا قَالَ بِئْسَمَا خَلَفْتُمُونِى مِنۢ بَعْدِىٓ ۖ أَعَجِلْتُمْ أَمْرَ رَبِّكُمْ ۖ وَأَلْقَى ٱلْأَلْوَاحَ وَأَخَذَ بِرَأْسِ أَخِيهِ يَجُرُّهُۥٓ إِلَيْهِ ۚ قَالَ ٱبْنَ أُمَّ إِنَّ ٱلْقَوْمَ ٱسْتَضْعَفُونِى وَكَادُوا۟ يَقْتُلُونَنِى فَلَا تُشْمِتْ بِىَ ٱلْأَعْدَآءَ وَلَا تَجْعَلْنِى مَعَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَمَّا
और जब
رَجَعَ
पलटा
مُوسَىٰٓ
मूसा
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
तरफ़ अपनी क़ौम के
غَضْبَـٰنَ
बहुत ग़ुस्से में
أَسِفًۭا
अफ़सोस करते हुए
قَالَ
उसने कहा
بِئْسَمَا
कितनी बुरी है जो
خَلَفْتُمُونِى
जानशीनी की तुमने मेरी
مِنۢ
from
بَعْدِىٓ ۖ
बाद मेरे
أَعَجِلْتُمْ
क्या जल्दी की तुमने
أَمْرَ
हुक्म से
رَبِّكُمْ ۖ
अपने रब के
وَأَلْقَى
और उसने डाल दीं
ٱلْأَلْوَاحَ
तख़्तियाँ
وَأَخَذَ
और उसने पकड़ लिया
بِرَأْسِ
सर
أَخِيهِ
अपने भाई का
يَجُرُّهُۥٓ
वो खींचने लगा उसे
إِلَيْهِ ۚ
तरफ़ अपने
قَالَ
उसने कहा
ٱبْنَ
O son
أُمَّ
ऐ मेरी माँ के बेटे
إِنَّ
बेशक
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों ने
ٱسْتَضْعَفُونِى
कमज़ोर समझा मुझे
وَكَادُوا۟
और क़रीब था कि
يَقْتُلُونَنِى
वो क़त्ल कर देते मुझे
فَلَا
पस ना
تُشْمِتْ
तू हँसा
بِىَ
मुझ पर
ٱلْأَعْدَآءَ
दुश्मनों को
وَلَا
और ना
تَجْعَلْنِى
तू शामिल कर मुझे
مَعَ
with
ٱلْقَوْمِ
साथ उन लोगों के
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम है
और जब मूसा क्रोध और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम की ओर लौटा तो उसने कहा, "तुम लोगों ने मेरे पीछे मेरी जगह बुरा किया। क्या तुम अपने रब के हुक्म से पहले ही जल्दी कर बैठे?" फिर उसने तख़्तियाँ डाल दी और अपने भाई का सिर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। वह बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! लोगों ने मुझे कमज़ोर समझ लिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः शत्रुओं को मुझपर हुलसने का अवसर न दे और अत्याचारी लोगों में मुझे सम्मिलित न कर।"
तफ़्सीर:
जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने पालनहार से वार्तालाप करके अपनी जाति के पास इस हाल में वापस आए कि वह उन्हें बछड़े की इबादत में लीन पाकर उन पर क्रोध और शोक से भरे हुए थे, तो कहने लगे : यह बहुत बुरी स्थिति है जिसके साथ तुमने (ऐ मेरी जाति के लोगो!) मेरे जाने के बाद मेरा उत्तराधिकार निभाया है, क्योंकि इसका परिणाम विनाश और दुर्भाग्य है। क्या तुम मेरी प्रतीक्षा करते-करते थक गए थे, तो बछड़े की पूजा करने लगे?! उन्होंने अपने क्रोध और शोक की तीव्रता से तख़्तियाँ फेंक दीं और अपने भाई हारून का सिर और दाढ़ी पकड़कर अपनी ओर खींचने लगे, क्योंकि वह उनके साथ रहे और उन्हें बछड़े की पूजा करते देखकर उन्हें नहीं रोका। ऐसे में हारून अलैहिस्सलाम ने मूसा अलैहिस्सलाम के आगे अपनी सफ़ाई पेश करते हुए और नर्म व्यवहार का मुतालबा करते हुए कहा : ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी जाति के लोगों ने मुझे कमज़ोर समझकर दबा दिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः मुझे ऐसी सज़ा न दें जो मेरे शत्रुओं को प्रसन्न करे, और मुझपर अपने क्रोध के कारण मुझे उन लोगों में शामिल न करें, जो अल्लाह के सिवा अन्य की पूजा के कारण अत्याचारी हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बनी इस्राईल की आज़ादी और बछड़े की पूजा के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमत मिलने के फौरन बाद नाशुक्री और गुमराही में पड़ जाना इंसान की कमज़ोरी है, जिससे बचना चाहिए।
आयत 151
قَالَ رَبِّ ٱغْفِرْ لِى وَلِأَخِى وَأَدْخِلْنَا فِى رَحْمَتِكَ ۖ وَأَنتَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱغْفِرْ
बख़्श दे
لِى
मुझे
وَلِأَخِى
और मेरे भाई को
وَأَدْخِلْنَا
और दाख़िल कर हमें
فِى
into
رَحْمَتِكَ ۖ
अपनी रहमत में
وَأَنتَ
और तू
أَرْحَمُ
सबसे ज़्यादा रहम वाला है
ٱلرَّٰحِمِينَ
सब रहम करने वालों से
उसने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। तू तो सबसे बढ़कर दयावान हैं।"
तफ़्सीर:
मूसा ने अपने पालनहार से प्रार्थना करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! मुझे तथा मेरे भाई हारून को क्षमा कर दे और हमें अपनी दया में दाखिल कर दे और उसे इस तरह कर दे कि हर तरफ़ से हमें घेरे हुए हो। और तू (ऐ हमारे पालनहार!) हमपर हर दया करने वाले से अधिक दया करने वाला है।
आयत 152
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ ٱلْعِجْلَ سَيَنَالُهُمْ غَضَبٌۭ مِّن رَّبِّهِمْ وَذِلَّةٌۭ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُفْتَرِينَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिया
ٱلْعِجْلَ
बछड़े को (माबूद)
سَيَنَالُهُمْ
अनक़रीब पहुँचेगा उन्हें
غَضَبٌۭ
ग़ज़ब
مِّن
from
رَّبِّهِمْ
उनके रब की तरफ़ से
وَذِلَّةٌۭ
और रुसवाई
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُفْتَرِينَ
झूठ बाँधने वालों को
जिन लोगों ने बछड़े को अपना उपास्य बनाया, वे अपने रब की ओर से प्रकोप और सांसारिक जीवन में अपमान से ग्रस्त होकर रहेंगे; और झूठ घड़नेवालों को हम ऐसा ही बदला देते है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने बछड़े को पूज्य बनाकर उसकी पूजा शुरू कर दी, वे अपने पालनहार को क्रुद्ध करने और इसके द्वारा उसका अपमान करने के कारण, शीघ्र ही अपने पालनहार की ओर से सख़्त क्रोध और इस सांसारिक जीवन में अपमान से पीड़ित होंगे। और हम अल्लाह पर झूठ गढ़ने वालों को इसी तरह का बदला देते हैं।
आयत 153
وَٱلَّذِينَ عَمِلُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ثُمَّ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِهَا وَءَامَنُوٓا۟ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعْدِهَا لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग
عَمِلُوا۟
जिन्होंने अमल किए
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरे
ثُمَّ
फिर
تَابُوا۟
तौबा कर ली
مِنۢ
from
بَعْدِهَا
बाद उसके
وَءَامَنُوٓا۟
और वो ईमान ले आए
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
مِنۢ
from
بَعْدِهَا
बाद उसके
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो इसके बाद तो तुम्हारा रब बड़ा ही क्षमाशील, दयाशील है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, जैसे अल्लाह के साथ शिर्क और पाप करना आदि, फिर अल्लाह की ओर लौट आए, अर्थात् उसपर ईमान ले आए और जो पाप किया करते थे उससे रुक गए, तो (ऐ नबी!) निश्चय आपका पालनहार इस तौबा और शिर्क से ईमान की ओर तथा पापों से आज्ञाकारिता की ओर वापसी के बाद अवश्य उनके गुनाहों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 154
وَلَمَّا سَكَتَ عَن مُّوسَى ٱلْغَضَبُ أَخَذَ ٱلْأَلْوَاحَ ۖ وَفِى نُسْخَتِهَا هُدًۭى وَرَحْمَةٌۭ لِّلَّذِينَ هُمْ لِرَبِّهِمْ يَرْهَبُونَ
وَلَمَّا
और जब
سَكَتَ
थम गया
عَن
from
مُّوسَى
मूसा से
ٱلْغَضَبُ
ग़ज़ब
أَخَذَ
उसने ले लीं
ٱلْأَلْوَاحَ ۖ
तख़्तियाँ
وَفِى
and in
نُسْخَتِهَا
और उनकी तहरीर में
هُدًۭى
हिदायत
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत थी
لِّلَّذِينَ
उन लोगों के लिए
هُمْ
वो जो
لِرَبِّهِمْ
अपने रब से
يَرْهَبُونَ
वो डरते थे
और जब मूसा का क्रोध शान्त हुआ तो उसने तख़्तियों को उठा लिया। उनके लेख में उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता थी जो अपने रब से डरते है
तफ़्सीर:
फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम का क्रोध शांत हो गया, तो उसने उन तख़्तियों को उठा लिया, जिन्हें उसने क्रोध में आकर फेंक दिया था। ये तख़्तियाँ पथभ्रष्टता से मार्गदर्शन और सत्य के बयान पर आधारित थीं, तथा उन लोगों के लिए दया पर आधारित थीं, जो अपने पालनहार का भय रखते और उसकी यातना से डरते हैं।
आयत 155
وَٱخْتَارَ مُوسَىٰ قَوْمَهُۥ سَبْعِينَ رَجُلًۭا لِّمِيقَـٰتِنَا ۖ فَلَمَّآ أَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ قَالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُم مِّن قَبْلُ وَإِيَّـٰىَ ۖ أَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَّآ ۖ إِنْ هِىَ إِلَّا فِتْنَتُكَ تُضِلُّ بِهَا مَن تَشَآءُ وَتَهْدِى مَن تَشَآءُ ۖ أَنتَ وَلِيُّنَا فَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَا ۖ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْغَـٰفِرِينَ
وَٱخْتَارَ
और मुन्तख़िब कर लिए
مُوسَىٰ
मूसा ने
قَوْمَهُۥ
अपनी क़ौम से
سَبْعِينَ
सत्तर
رَجُلًۭا
आदमी
لِّمِيقَـٰتِنَا ۖ
हमारे मुक़र्रर वक़्त के लिए
فَلَمَّآ
फिर जब
أَخَذَتْهُمُ
पकड़ लिया उन्हें
ٱلرَّجْفَةُ
ज़लज़ले ने
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
لَوْ
अगर
شِئْتَ
चाहता तू
أَهْلَكْتَهُم
हलाक कर देता तू इन्हें
مِّن
from
قَبْلُ
इससे पहले
وَإِيَّـٰىَ ۖ
और मुझे भी
أَتُهْلِكُنَا
क्या तू हलाक करता है हमें
بِمَا
बवजह उसके जो
فَعَلَ
किया
ٱلسُّفَهَآءُ
कुछ नादानों ने
مِنَّآ ۖ
हम में से
إِنْ
नहीं है
هِىَ
ये
إِلَّا
मगर
فِتْنَتُكَ
आज़माइश तेरी
تُضِلُّ
तू गुमराह करता है
بِهَا
साथ इसके
مَن
जिसे
تَشَآءُ
तू चाहता है
وَتَهْدِى
और तू हिदायत देता है
مَن
जिसे
تَشَآءُ ۖ
तू चाहता है
أَنتَ
तू ही
وَلِيُّنَا
दोस्त है हमारा
فَٱغْفِرْ
पस बख़्श दे
لَنَا
हमें
وَٱرْحَمْنَا ۖ
और रहम फ़रमा हम पर
وَأَنتَ
और तू
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْغَـٰفِرِينَ
सब बख़्शने वालों से
मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट़ कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है
तफ़्सीर:
और मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के सत्तर नेक लोगों को चुन लिया, ताकि वे अपने पालनहार से उस गुनाह की क्षमा माँगें, जो उनके मूर्खों ने बछड़े की पूजा की है। और अल्लाह ने उनसे एक निर्धारित समय का वादा किया जिसमें वे उपस्थित हों। लेकिन जब वे उपस्थित हुए, तो अल्लाह पर दुस्साहस कर बैठे और मूसा अलैहिस्सलाम से मुतालबा किया कि उन्हें आँखों से (खुल्लम-खुल्ला) अल्लाह का दर्शन कराएँ। इसपर उन्हें भूकंप ने अपनी चपेट में ले लिया और वे उसकी भयावहता से बेहोश होकर मर गए। ऐसे में मूसा ने अपने पालनहार से विनयपूर्वक विनती करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! अगर तू उन्हें तथा उनके साथ मुझे उनके यहाँ आने से पहले ही विनष्ट करना चाहता, तो विनष्ट कर देता। क्या तू हमें उसके कारण विनष्ट करता है जो हममें से अल्प बुद्धि वाले लोगों ने किया है? दरअसल मेरी जाति के लोगों का बछड़े की पूजा में लगना एक आज़माइश और परीक्षा है, जिसके द्वारा तू जिसे चाहता है, मार्ग से हटा देता है और जिसे चाहता है, सीधे रास्ते पर लगा देता है। तू ही हमारे मामले का संरक्षक है। अतः हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे, और अपनी व्यापक दया के साथ हम पर दया कर। तू ही सबसे बेहतर पाप को क्षमा करने वाला और गुनाह को माफ़ करने वाला है।
आयत 156
۞ وَٱكْتُبْ لَنَا فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا حَسَنَةًۭ وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ إِنَّا هُدْنَآ إِلَيْكَ ۚ قَالَ عَذَابِىٓ أُصِيبُ بِهِۦ مَنْ أَشَآءُ ۖ وَرَحْمَتِى وَسِعَتْ كُلَّ شَىْءٍۢ ۚ فَسَأَكْتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلَّذِينَ هُم بِـَٔايَـٰتِنَا يُؤْمِنُونَ
۞ وَٱكْتُبْ
और लिख दे
لَنَا
हमारे लिए
فِى
in
هَـٰذِهِ
this
ٱلدُّنْيَا
इस दुनिया में
حَسَنَةًۭ
भलाई
وَفِى
and in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
إِنَّا
बेशक हम
هُدْنَآ
रुजूअ किया हमने
إِلَيْكَ ۚ
तेरी तरफ़
قَالَ
फ़रमाया
عَذَابِىٓ
अज़ाब मेरा
أُصِيبُ
मैं पहुँचाता हूँ
بِهِۦ
उसको
مَنْ
जिसे
أَشَآءُ ۖ
मैं चाहता हूँ
وَرَحْمَتِى
और रहमत मेरी
وَسِعَتْ
छाई हुई है
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ ۚ
चीज़ पर
فَسَأَكْتُبُهَا
पस ज़रूर मैं लिख दूँगा उसे
لِلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जो
يَتَّقُونَ
डरते हैं
وَيُؤْتُونَ
और वो अदा करते हैं
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُم
वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
"और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे और आख़िरत में भी। हम तेरी ही ओर उन्मुख हुए।" उसने कहा, "अपनी यातना में मैं तो उसी को ग्रस्त करता हूँ, जिसे चाहता हूँ, किन्तु मेरी दयालुता से हर चीज़ आच्छादित है। उसे तो मैं उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो डर रखते और ज़कात देते है और जो हमारी आयतों पर ईमान लाते है
तफ़्सीर:
हमें उन लोगों में से बना दे, जिन्हें तूने इस जीवन में नेमतों और शांति से सम्मानित किया है और सत्कर्म की तौफ़ीक़ दी है, और आख़िरत में अपने उन नेक बंदों में से बना दे, जिनके लिए तूने जन्नत तैयार कर रखी है। निःसंदेह हमने तेरे समक्ष पश्चाताप किया और हम अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए वापस आए हैं। इसपर अल्लाह ने फरमाया : मैं दुर्भाग्य के कारणों को अपनाने वाले लोगों में से जिसे चाहता हूँ, अपनी यातना से ग्रस्त करता हूँ, और मेरी दया इस दुनिया में हर चीज़ को व्याप्त है; अतः कोई भी प्राणी नहीं है परंतु अल्लाह की दया उसके पास पहुँच गई है और उसके अनुग्रह और उपकार ने उसे घेर रखा है। इसलिए मैं आख़िरत में अपनी दया को उन लोगों के लिए लिख दूँगा, जो अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से दूर रहकर डरते हैं, और जो अपने धन की ज़कात उसके हक़दारों को अदा करते हैं और जो हमारी निशानियों पर विश्वास रखते हैं।
आयत 157
ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلرَّسُولَ ٱلنَّبِىَّ ٱلْأُمِّىَّ ٱلَّذِى يَجِدُونَهُۥ مَكْتُوبًا عِندَهُمْ فِى ٱلتَّوْرَىٰةِ وَٱلْإِنجِيلِ يَأْمُرُهُم بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَىٰهُمْ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ ٱلْخَبَـٰٓئِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ إِصْرَهُمْ وَٱلْأَغْلَـٰلَ ٱلَّتِى كَانَتْ عَلَيْهِمْ ۚ فَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِهِۦ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَٱتَّبَعُوا۟ ٱلنُّورَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ مَعَهُۥٓ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَتَّبِعُونَ
पैरवी करेंगे
ٱلرَّسُولَ
इस रसूल
ٱلنَّبِىَّ
नबी की
ٱلْأُمِّىَّ
जो उम्मी है
ٱلَّذِى
वो जो
يَجِدُونَهُۥ
वो पाते हैं उसे
مَكْتُوبًا
लिखा हुआ
عِندَهُمْ
अपने पास
فِى
in
ٱلتَّوْرَىٰةِ
तौरात में
وَٱلْإِنجِيلِ
और इंजील में
يَأْمُرُهُم
वो हुक्म देता है
بِٱلْمَعْرُوفِ
नेकी का
وَيَنْهَىٰهُمْ
और वो रोकता है उन्हें
عَنِ
from
ٱلْمُنكَرِ
मुन्कर/बुराई से
وَيُحِلُّ
और वो हलाल करता है
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلطَّيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ें
وَيُحَرِّمُ
और वो हराम करता है
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْخَبَـٰٓئِثَ
नापाक चीज़ें
وَيَضَعُ
और वो उतारता है
عَنْهُمْ
उनसे
إِصْرَهُمْ
बोझ उनके
وَٱلْأَغْلَـٰلَ
और वो तौक़
ٱلَّتِى
वो जो
كَانَتْ
थे वो
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
فَٱلَّذِينَ
पस वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِهِۦ
उस पर
وَعَزَّرُوهُ
और उन्होंने क़ुव्वत दी उसे
وَنَصَرُوهُ
और उन्होंने मदद की उसकी
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
ٱلنُّورَ
उस नूर की
ٱلَّذِىٓ
वो जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
مَعَهُۥٓ ۙ
साथ उसके
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
"(तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग है) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते है, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पाते है। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों का हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों का हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले है।"
तफ़्सीर:
जो लोग मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हैं, जो कि उम्मी नबी हैं, पढ़ना एवं लिखना नही जानते, बल्कि उनपर उनके पालनहार की ओर से वह़्य की जाती है, और वह वही हैं जिनके नाम, विवरण और नुबुव्वत का उल्लेख वे मूसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली तौरात तथा ईसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली इंजील में पाते हैं; जो उन्हें उन बातों का आदेश देते हैं जिनका अच्छा और भला होना सर्वज्ञात है, और उन्हें उन बातों से रोकते हैं, जिनके बुरे होने की पुष्टि शुद्ध बुद्धि और सही प्रकृति भी करती है, और उनके लिए खाने-पीने और औरतों से संबंधित उन आनंददायक चीजों को वैध ठहराते हैं, जिनमें कोई नुक़सान नहीं है और उनपर उनमें से उन चीज़ों को निषिद्ध ठहराते हैं, जो गंदी और अपवित्र हैं, और उनसे उन कष्टदायक आदेशों का बोझ हटाते हैं, जो उनपर डाले जाते थे, जैसे हत्यारे की हत्या कर देना, हत्या चाहे जान-बूझकर हो या ग़लती से। अतः जो बनी इसराईल तथा अन्य लोग उनपर ईमान लाए, उनका आदर एवं सम्मान किया, और उनसे दुश्मनी रखने वाले काफ़िरों के विरुद्ध उनकी मदद की, और उस क़ुरआन का अनुसरण किया, जो उनपर मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में उतारा गया है; तो वही लोग सफल होने वाले हैं, जो अपनी अपेक्षित चीज़ों को प्राप्त करेंगे और अपने भय की चीज़ों से मुक्ति पाएँगे।
आयत 158
قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّى رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ فَـَٔامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِىِّ ٱلْأُمِّىِّ ٱلَّذِى يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَـٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
إِنِّى
बेशक मैं
رَسُولُ
रसूल हूँ
ٱللَّهِ
अल्लाह का
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
جَمِيعًا
सब के
ٱلَّذِى
वो ही है
لَهُۥ
जिसके लिए
مُلْكُ
बादशाहत है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों की
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन की
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
يُحْىِۦ
वो ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ ۖ
और वो मौत देता है
فَـَٔامِنُوا۟
पस ईमान लाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِ
और उसके रसूल पर
ٱلنَّبِىِّ
जो नबी
ٱلْأُمِّىِّ
उम्मी है
ٱلَّذِى
वो जो
يُؤْمِنُ
ईमान रखता है
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَكَلِمَـٰتِهِۦ
और उसके कलिमात पर
وَٱتَّبِعُوهُ
और इत्तिबा करो उसका
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम हिदायत पा जाओ
कहो, "ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मी नबी, पर ईमान लाओ जो स्वयं अल्लाह पर और उसके शब्दों (वाणी) पर ईमान रखता है और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : ऐ लोगो! मैं तुम सभी की ओर, अरब हों या ग़ैर-अरब, उस अल्लाह का रसूल बनकर आया हूँ, जिसके ही हाथ में आकाशों का राज्य है और उसी के लिए धरती का राज्य है, उस पवित्र अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह मरे हुए लोगों को जीवित करता है, और जीवित लोगों को मौत देता है। इसलिए (ऐ लोगो!) अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाओ, जो ऐसे नबी हैं कि न पढ़ सकते हैं न लिख सकते हैं, बल्कि वह एक वह़्य के साथ आए हैं, जिसे उनका पालनहार उनकी ओर उतारता है, जो अल्लाह पर ईमान रखते हैं, तथा अपने ऊपर उतरने वाली पुस्तक पर ईमान रखते हैं और अपने पहले नबियों पर उतरने वाली पुस्तकों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान रखते हैं, तथा जो कुछ वह अपने पालनहार की ओर से लाए हैं उसमें उनका अनुसरण करो, ताकि तुम वह रास्ता पा सको, जिसमें दुनिया एवं आख़िरत में तुम्हारा हित निहित है।
आयत 159
وَمِن قَوْمِ مُوسَىٰٓ أُمَّةٌۭ يَهْدُونَ بِٱلْحَقِّ وَبِهِۦ يَعْدِلُونَ
وَمِن
And among
قَوْمِ
(the) people
مُوسَىٰٓ
और मूसा की क़ौम में से
أُمَّةٌۭ
एक गिरोह था
يَهْدُونَ
वो रहनुमाई करते
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَبِهِۦ
और साथ उसी के
يَعْدِلُونَ
वो अदल करते
मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते
तफ़्सीर:
और मूसा की जाति बनी इसराईल में कुछ लोग ऐसे हैं, जो सही धर्म पर क़ायम हैं, लोगों को उसी का मार्गदर्शन करते और न्याय के साथ निर्णय करते हैं। अतः वे अन्याय नहीं करते हैं।
आयत 160
وَقَطَّعْنَـٰهُمُ ٱثْنَتَىْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًۭا ۚ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ إِذِ ٱسْتَسْقَىٰهُ قَوْمُهُۥٓ أَنِ ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْحَجَرَ ۖ فَٱنۢبَجَسَتْ مِنْهُ ٱثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًۭا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍۢ مَّشْرَبَهُمْ ۚ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلْغَمَـٰمَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ ۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
وَقَطَّعْنَـٰهُمُ
और अलग-अलग कर दिया हमने उन्हें
ٱثْنَتَىْ
(into) two
عَشْرَةَ
बारह
أَسْبَاطًا
क़बीलों में
أُمَمًۭا ۚ
जमाअतें बनाकर
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰٓ
तरफ़ मूसा के
إِذِ
जब
ٱسْتَسْقَىٰهُ
पानी माँगा उससे
قَوْمُهُۥٓ
उसकी क़ौम ने
أَنِ
कि
ٱضْرِب
मार
بِّعَصَاكَ
असा अपना
ٱلْحَجَرَ ۖ
पत्थर पर
فَٱنۢبَجَسَتْ
पस फूट निकले
مِنْهُ
उससे
ٱثْنَتَا
two
عَشْرَةَ
बारह
عَيْنًۭا ۖ
चश्मे
قَدْ
तहक़ीक़
عَلِمَ
जान लिया
كُلُّ
हर
أُنَاسٍۢ
गिरोह ने
مَّشْرَبَهُمْ ۚ
घाट अपना
وَظَلَّلْنَا
और साया किया हमने
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْغَمَـٰمَ
बादलों का
وَأَنزَلْنَا
और नाज़िल किया हमने
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْمَنَّ
मन्न
وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ
और सलवा
كُلُوا۟
खाओ
مِن
from
طَيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों में से
مَا
जो
رَزَقْنَـٰكُمْ ۚ
अता कीं हमने तुम्हें
وَمَا
और नहीं
ظَلَمُونَا
उन्होंने ज़ुल्म किया हम पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी ही जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
और हमने उन्हें बारह ख़ानदानों में विभक्त करके अलग-अलग समुदाय बना दिया। जब उसकी क़ौम के लोगों ने पानी माँगा तो हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "अपनी लाठी अमुक चट्टान पर मारो।" अतएव उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट मालूम कर लिया। और हमने उनपर बादल की छाया की और उन पर 'मन्न' और 'सलवा' उतारा, "हमनें तुम्हें जो अच्छी-स्वच्छ चीज़े प्रदान की है, उन्हें खाओ।" उन्होंने हम पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वास्तव में वे स्वयं अपने ऊपर ही ज़ुल्म करते रहे
तफ़्सीर:
और हमने बनी इसराईल को बारह गोत्रों में बाँट दिया, और हमने मूसा की ओर वह़्य भेजी, जब उनकी जाति ने उनसे अल्लाह से यह दुआ करने के लिए कहा कि वह उन्हें पानी पिलाए : (ऐ मूसा!) अपनी लाठी को इस पत्थर पर मारो। चुनाँचे मूसा ने उसपर लाठी मारी, तो उसमें से उनके बारह क़बीलों की संख्या के अनुसार बारह स्रोत फूट निकले। उनमें से प्रत्येक क़बीले ने अपने पानी पीने का विशेष स्थान जान लिया। इसलिए कोई भी अन्य क़बीला उसके साथ उसमें साझी नहीं होता था। और हमने उनपर बादलों की छाया कर दी, जो उनके चलने के साथ चलते थे और उनके रुकने से रुक जाते थे। और उनपर शहद की तरह एक मीठा पेय तथा बटेर के समान स्वादिष्ट माँस वाला एक छोटा पक्षी उतारा। और हमने उनसे कहा : इन पवित्र चीज़ों में से, जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं, खाओ। और उन्होंने अत्याचार और नेमतों की नाशुक्री करके और यथोचित उनका आदर न करके हमारा कुछ भी घाटा नहीं किया। परंतु वे स्वयं अपने हितों का घाटा करके अपने आप ही पर अत्याचार करते थे, जब उन्होंने अल्लाह के आदेश का उल्लंघन करके और उसकी नेमतों की अवमानना करके अपने आपको विनाश के घाट लगा दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम के गुस्से और तौरात की तख्तियों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गुस्से में भी इंसाफ और हक बात का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।
आयत 161
وَإِذْ قِيلَ لَهُمُ ٱسْكُنُوا۟ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةَ وَكُلُوا۟ مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ وَقُولُوا۟ حِطَّةٌۭ وَٱدْخُلُوا۟ ٱلْبَابَ سُجَّدًۭا نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطِيٓـَٔـٰتِكُمْ ۚ سَنَزِيدُ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَإِذْ
और जब
قِيلَ
कहा गया
لَهُمُ
उनसे
ٱسْكُنُوا۟
तुम ठहरो/रहो
هَـٰذِهِ
इस
ٱلْقَرْيَةَ
बस्ती में
وَكُلُوا۟
और खाओ
مِنْهَا
उसमें से
حَيْثُ
जहाँ से
شِئْتُمْ
चाहो तुम
وَقُولُوا۟
और कहो
حِطَّةٌۭ
हित्तातुन/बख़्श दे
وَٱدْخُلُوا۟
और दाख़िल हो जाओ
ٱلْبَابَ
दरवाज़े से
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
نَّغْفِرْ
हम बख़्श देंगे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
خَطِيٓـَٔـٰتِكُمْ ۚ
ख़ताऐं तुम्हारी
سَنَزِيدُ
अनक़रीब हम ज़्यादा देंगे
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
याद करो जब उनसे कहा गया, "इस बस्ती में रहो-बसो और इसमें जहाँ से चाहो खाओ और कहो - हित्ततुन। और द्वार में सजदा करते हुए प्रवेश करो। हम तुम्हारी ख़ताओं को क्षमा कर देंगे और हम सुकर्मी लोगों को अधिक भी देंगे।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब अल्लाह ने बनी इसराईल से कहा कि बैतुल मक़्दिस में प्रवेश कर जाओ, और उसकी बस्ती के फलों को किसी भी स्थान से और जिस समय भी तुम चाहो, खाओ और कहो कि : ऐ हमारे पालनहार! हमारे पाप क्षमा कर दे। तथा द्वार में झुकते हुए, अपने पालनहार के लिए विनम्रता अपनाते हुए प्रवेश करो। यदि तुमने ऐसा किया, (तो) हम तुम्हारे गुनाह क्षमा कर देंगे और सत्कर्म करने वालों को दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ और अधिक प्रदान करेंगे।
आयत 162
فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ ٱلَّذِى قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَظْلِمُونَ
فَبَدَّلَ
पस बदल दिया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مِنْهُمْ
उन में से
قَوْلًا
बात को
غَيْرَ
सिवाय
ٱلَّذِى
उसके जो
قِيلَ
कही गई थी
لَهُمْ
उन्हें
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजा हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
رِجْزًۭا
अज़ाब
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
किन्तु उनमें से जो अत्याचारी थे उन्होंने, जो कुछ उनसे कहा गया था, उसको उससे भिन्न बात से बदल दिया। अतः जो अत्याचार वे कर रहे थे, उसके कारण हमने आकाश से उनपर यातना भेजी
तफ़्सीर:
उनमें से अत्याचारियों ने, उस बात को बदल दिया जिसका उन्हें आदेश दिया गया था। चुनाँचे उन्होंने क्षमा का अनुरोध करने के बजाय "दाना बाली में" कहा। तथा उन्होंने उस कार्य को को भी बदल दिया जिसका उन्हें आदेश दिया गया था। चुनाँचे वे अल्लाह के लिए विनम्रता अपनाते हुए, अपने सिर को झुकाए हुए प्रवेश करने के बजाय अपनी पीठ के बल घिसटते हुए दाखिल हुए। अतः हमने उनके अत्याचार के कारण, उनपर आकाश से एक यातना भेज दी।
आयत 163
وَسْـَٔلْهُمْ عَنِ ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِى كَانَتْ حَاضِرَةَ ٱلْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِى ٱلسَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًۭا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ ۙ لَا تَأْتِيهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ
وَسْـَٔلْهُمْ
और पूछिए उन से
عَنِ
about
ٱلْقَرْيَةِ
उस बस्ती के बारे में
ٱلَّتِى
वो जो
كَانَتْ
थी वो
حَاضِرَةَ
किनारे पर
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर के
إِذْ
जब
يَعْدُونَ
वो ज़्यादती करते थे
فِى
in
ٱلسَّبْتِ
सब्त/हफ़्ते के दिन में
إِذْ
जब
تَأْتِيهِمْ
आती थीं उनके पास
حِيتَانُهُمْ
मछलियाँ उनकी
يَوْمَ
(on the) day
سَبْتِهِمْ
दिन उनके हफ़्ते के
شُرَّعًۭا
ज़ाहिर होकर
وَيَوْمَ
और जिस दिन
لَا
not
يَسْبِتُونَ ۙ
वो सब्त/हफ़्ते का दिन ना मनाते
لَا
(they did) not
تَأْتِيهِمْ ۚ
नहीं वो आती थीं उनके पास
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَبْلُوهُم
हम आज़माते थे उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْسُقُونَ
वो नाफ़रमानी करते
उनसे उस बस्ती के विषय में पूछो जो सागर-तट पर थी। जब वे सब्त के मामले में सीमा का उल्लंघन करते थे, जब उनके सब्त के दिन उनकी मछलियाँ खुले तौर पर पानी के ऊपर आ जाती थी और जो दिन उनके सब्त का न होता तो वे उनके पास न आती थी। इस प्रकार उनके अवज्ञाकारी होने के कारण हम उनको परीक्षा में डाल रहे थे
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) इन यहूदियों को वह सज़ा याद दिलाने के लिए, जिसके साथ अल्लाह ने उनके पूर्वजों को दंडित किया था, उनसे उस बस्ती की कहानी पूछिए, जो समुद्र के निकट थी, जब उसके निवासी मनाही के बावजूद शनिवार के दिन शिकार करके अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन कर रहे थे। जब अल्लाह ने उनका इस तरह परीक्षण किया कि शनिवार के दिन मछलियाँ समुद्र की सतह पर प्रत्यक्ष होकर उनके पास आने लगीं, जबकि अन्य दिनों में वे उनके पास नहीं आती थीं। अल्लाह ने उन्हें इस प्रकार की परीक्षा में इसलिए डाला कि वे अल्लाह के आज्ञापालन के दायरे से निकल गए थे और गुनाह करने लगे थे। चुनाँचे उन्होंने मछलियों का शिकार करने के लिए यह चाल चली कि उन्होंने जाल लगा दिए और गड्ढे खोद लिए। इस तरह शनिवार के दिन मछलियाँ उन जालों फँस जाती थीं और गड्ढों में गिर जाती थीं। फिर वे रविवार के दिन उन्हें पकड़कर खा जाते थे।
आयत 164
وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌۭ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ ٱللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًۭا شَدِيدًۭا ۖ قَالُوا۟ مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
وَإِذْ
और जब
قَالَتْ
कहा
أُمَّةٌۭ
एक जमाअत ने
مِّنْهُمْ
उनमें से
لِمَ
क्यों
تَعِظُونَ
तुम नसीहत करते हो
قَوْمًا ۙ
ऐसी क़ौम को
ٱللَّهُ
अल्लाह
مُهْلِكُهُمْ
हलाक करने वाला है जिन्हें
أَوْ
या
مُعَذِّبُهُمْ
अज़ाब देने वाला है जिन्हें
عَذَابًۭا
अज़ाब
شَدِيدًۭا ۖ
शदीद
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَعْذِرَةً
माज़रत (करने के लिए)
إِلَىٰ
before
رَبِّكُمْ
तरफ़ तुम्हारे रब के
وَلَعَلَّهُمْ
और शायद कि वो
يَتَّقُونَ
वो डर जाऐं
और जब उनके एक गिरोह ने कहा, "तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत किए जा रहे हो, जिन्हें अल्लाह विनष्ट करनेवाला है या जिन्हें वह कठोर यातना देनेवाला है?" उन्होंने कहा, "तुम्हारे रब के समक्ष अपने को निरपराध सिद्ध करने के लिए, और कदाचित वे (अवज्ञा से) बचें।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब उनका एक समूह उन्हें इस बुराई से रोक रहा था और उन्हें इससे सावधान कर रहा था, तो एक अन्य समूह ने उससे कहा : तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत करते हो, जिन्हें अल्लाह उनके गुनाहों के कारण इस दुनिया में नष्ट करने वाला है, या क़ियामत के दिन उन्हें कठोर यातना देने वाला है? इसपर नसीहत करने वालों ने कहा : हम उन्हें नसीहत, अल्लाह के समक्ष उज़्र करने के लिए कर रहे हैं, हम भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, जिसका अल्लाह ने हमें आदेश दिया है। ताकि उसे त्याग करने पर वह हमारी पकड़ न करे, और इसलिए कि शायद वे नसीहत से लाभान्वित हों और जिस पाप में लिप्त हैं, उसे छोड़ दें।
आयत 165
فَلَمَّا نَسُوا۟ مَا ذُكِّرُوا۟ بِهِۦٓ أَنجَيْنَا ٱلَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ ٱلسُّوٓءِ وَأَخَذْنَا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ بِعَذَابٍۭ بَـِٔيسٍۭ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
نَسُوا۟
वो भूल गए
مَا
जो
ذُكِّرُوا۟
वो नसीहत किए गए थे
بِهِۦٓ
जिसकी
أَنجَيْنَا
निजात दी हमने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
يَنْهَوْنَ
वो रोकते थे
عَنِ
[from]
ٱلسُّوٓءِ
बुराई से
وَأَخَذْنَا
और पकड़ लिया हमने
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
بِعَذَابٍۭ
साथ अज़ाब
بَـِٔيسٍۭ
सख़्त के
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْسُقُونَ
वो नाफ़रमानी करते
फिर जब वे उसे भूल गए जो नसीहत उन्हें दी गई थी तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जो बुराई से रोकते थे और अत्याचारियों को उनकी अवज्ञा के कारण कठोर यातना में पकड़ लिया
तफ़्सीर:
फिर जब अवज्ञाकारियों ने नसीहत करने वालों की नसीहत से मुँह फेर लिया और अपनी हरकत से बाज़ नहीं आए, तो हमने बुराई से रोकने वालों को यातना से बचा लिया और शनिवार के दिन शिकार करके अत्याचार करने वालों को, उनके अल्लाह की अवज्ञा करने और गुनाह पर अड़े रहने के कारण, गंभीर यातना में पकड़ लिया।
आयत 166
فَلَمَّا عَتَوْا۟ عَن مَّا نُهُوا۟ عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا۟ قِرَدَةً خَـٰسِـِٔينَ
فَلَمَّا
फिर जब
عَتَوْا۟
उन्होंने सरकशी की
عَن
उससे
مَّا
जो
نُهُوا۟
वो रोके गए थे
عَنْهُ
जिससे
قُلْنَا
कहा हमने
لَهُمْ
उन्हें
كُونُوا۟
हो जाओ
قِرَدَةً
बन्दर
خَـٰسِـِٔينَ
ज़लील
फिर जब वे सरकशी के साथ वही कुछ करते रहे, जिससे उन्हें रोका गया था तो हमने उनसे कहा, "बन्दर हो जाओ, अपमानित और तिरस्कृत!"
तफ़्सीर:
फिर जब वे अभिमान एवं हठ के कारण अल्लाह की अवज्ञा करने में सीमा पार कर गए और नसीहत हासिल नहीं की, तो हमने उनसे कहा : ऐ अवज्ञाकारियो! तुम अपमानित बंदर हो जाओ। चुनाँचे वे हमारी मंशा के अनुसार बंदर हो गए। क्योंकि हमारा मामला यह है कि हम जब कसी चीज़ का इरादा करते हैं, तो उससे कहते हैं कि "हो जा" तो वह हो जाती है।
आयत 167
وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ مَن يَسُومُهُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ ۗ إِنَّ رَبَّكَ لَسَرِيعُ ٱلْعِقَابِ ۖ وَإِنَّهُۥ لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَإِذْ
और जब
تَأَذَّنَ
ख़बर दी
رَبُّكَ
आपके रब ने
لَيَبْعَثَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर भेजेगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के दिन तक
مَن
उसे जो
يَسُومُهُمْ
चखाएगा उन्हें
سُوٓءَ
बुरा
ٱلْعَذَابِ ۗ
अज़ाब
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَسَرِيعُ
अलबत्ता जल्द देने वाला है
ٱلْعِقَابِ ۖ
सज़ा
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो है
لَغَفُورٌۭ
अल्बत्ता बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला
और याद करो जब तुम्हारे रब ने ख़बर कर दी थी कि वह क़ियामत के दिन तक उनके विरुद्ध ऐसे लोगों को उठाता रहेगा, जो उन्हें बुरी यातना देंगे। निश्चय ही तुम्हारा रब जल्द सज़ा देता है और वह बड़ा क्षमाशील, दावान भी है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब अल्लाह ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि वह क़ियामत के दिन तक यहूदियों पर ऐसे व्यक्ति को अवश्य प्रभुत्व प्रदान करता रहेगा, जो उन्हें उनके सांसारिक जीवन में अपमानित और तिरस्कृत करता रहे। निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार अवज्ञाकारियों को शीघ्र दंड देने वाला है। यहाँ तक कि कभी-कभी वह उन्हें इसी दुनिया में दंड दे देता है। और वह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 168
وَقَطَّعْنَـٰهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ أُمَمًۭا ۖ مِّنْهُمُ ٱلصَّـٰلِحُونَ وَمِنْهُمْ دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَبَلَوْنَـٰهُم بِٱلْحَسَنَـٰتِ وَٱلسَّيِّـَٔاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَقَطَّعْنَـٰهُمْ
और टुकड़े-टुकड़े कर दिया हमने उन्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أُمَمًۭا ۖ
गिरोह-गिरोह (बनाकर)
مِّنْهُمُ
उनमें से कुछ
ٱلصَّـٰلِحُونَ
नेक हैं
وَمِنْهُمْ
और उनमें से
دُونَ
(are) other than
ذَٰلِكَ ۖ
इसके अलावा हैं
وَبَلَوْنَـٰهُم
और आज़माया हमने उन्हें
بِٱلْحَسَنَـٰتِ
साथ अच्छाइयों के
وَٱلسَّيِّـَٔاتِ
और बुराइयों के
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَرْجِعُونَ
वो रुजूअ करें
और हमने उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके धरती में अनेक गिरोहों में बिखेर दिया। कुछ उनमें से नेक है और कुछ उनमें इससे भिन्न हैं, और हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनकी परीक्षा ली, कदाचित वे पलट आएँ
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें धरती में बिखेर दिया और उन्हें उसमें कई संप्रदायों में विभाजित कर दिया, जबकि वे पहले एक साथ (इकट्ठा) थे। उनमें से कुछ लोग सदाचारी थे, जो अल्लाह के हक़ और उसके बंदों के हक़ अदा करने वाले थे। तथा उनमें से कुछ लोग बीच की राह चलने वाले थे, जबकि उनमें से कुछ लोग पापों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वाले थे। और हमने उन्हें खुशहाली और तंगी के ज़रिए आज़माया, इस आशा में कि वे अपने रवैये से बाज़ आ जाएँ।
आयत 169
فَخَلَفَ مِنۢ بَعْدِهِمْ خَلْفٌۭ وَرِثُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ يَأْخُذُونَ عَرَضَ هَـٰذَا ٱلْأَدْنَىٰ وَيَقُولُونَ سَيُغْفَرُ لَنَا وَإِن يَأْتِهِمْ عَرَضٌۭ مِّثْلُهُۥ يَأْخُذُوهُ ۚ أَلَمْ يُؤْخَذْ عَلَيْهِم مِّيثَـٰقُ ٱلْكِتَـٰبِ أَن لَّا يَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْحَقَّ وَدَرَسُوا۟ مَا فِيهِ ۗ وَٱلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
فَخَلَفَ
तो पीछे आए
مِنۢ
from
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
خَلْفٌۭ
नाख़ल्फ़
وَرِثُوا۟
जो वारिस हुए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब के
يَأْخُذُونَ
वो ले लेते हैं
عَرَضَ
मालो मता
هَـٰذَا
इस
ٱلْأَدْنَىٰ
हक़ीर दुनिया का
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
سَيُغْفَرُ
ज़रूर बख़्श दिया जाएगा
لَنَا
हमें
وَإِن
और अगर
يَأْتِهِمْ
आता है उनके पास
عَرَضٌۭ
मालो मता
مِّثْلُهُۥ
मानिन्द उसी के
يَأْخُذُوهُ ۚ
वो ले लेते हैं उसे
أَلَمْ
क्या नहीं
يُؤْخَذْ
लिया गया
عَلَيْهِم
उनसे
مِّيثَـٰقُ
पुख़्ता अहद
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
أَن
कि
لَّا
not
يَقُولُوا۟
ना वो कहें
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
إِلَّا
सिवाय
ٱلْحَقَّ
हक़ के
وَدَرَسُوا۟
और उन्होंने पढ़ लिया था
مَا
जो
فِيهِ ۗ
उसमें है
وَٱلدَّارُ
और घर
ٱلْـَٔاخِرَةُ
आख़िरत का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَتَّقُونَ ۗ
डरते हैं
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
फिर उनके पीछ ऐसे अयोग्य लोगों ने उनकी जगह ली, जो किताब के उत्ताराधिकारी होकर इसी तुच्छ संसार का सामान समेटते है और कहते है, "हमें अवश्य क्षमा कर दिया जाएगा।" और यदि इस जैसा और सामान भी उनके पास आ जाए तो वे उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे किताब का यह वचन नहीं लिया गया था कि वे अल्लाह पर थोपकर हक़ के सिवा कोई और बात न कहें। और जो उसमें है उसे वे स्वयं पढ़ भी चुके है। और आख़िरत का घर तो उन लोगों के लिए उत्तम है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
फिर इन लोगों के बाद, दुष्ट लोग आए जो इनके उत्तराधिकारी बने। उन्होंने तौरात को अपने पूर्वजों से लिया। वे उसे पढ़ते हैं, लेकिन उसमें जो कुछ है, उसपर अमल नहीं करते हैं। वे अल्लाह की पुस्तक को विकृत करने और जो कुछ उसमें उतारा गया है उसके अलावा के साथ फैसला करने के लिए इस दुनिया के तुच्छ सामान को रिश्वत के रूप में लेते हैं। इसके बावजूद, वे यह आशा रखते हैं कि अल्लाह उनके पापों को क्षमा कर देगा। और यदि उनके पास दुनिया का तुच्छ सामान दोबारा आ जाए, तो वे इसे फिर से ले लेंगे। क्या अल्लाह ने इन लोगों से दृढ़ वचन नहीं लिया था कि वे अल्लाह पर बिना किसी विरूपण या परिवर्तन के, सत्य के अलावा कुछ नहीं कहेंगे?! उनका पुस्तक पर अमल न करना अज्ञानता के कारण नहीं था, बल्कि ज्ञान के बावजूद था। चुनाँचे उन्होंने पुस्तक में जो कुछ था, उसे पढ़ा था और उसकी उन्हें जानकारी थी। इसलिए उनका पाप अधिक गंभीर है। तथा आख़िरत का घर और आख़िरत के घर में जो स्थायी नेमतें हैं, उन लोगों के लिए क्षणभंगुर संपत्ति से बेहतर हैं, जो अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरते हैं। क्या ये लोग जो इस तुच्छ सामान को लेते हैं, इस बात को नहीं समझते कि अल्लाह ने डरने वालों के लिए आख़िरत में जो कुछ तैयार कर रखा है, वह सबसे बेहतर और अधिक स्थायी है।
आयत 170
وَٱلَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِٱلْكِتَـٰبِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُصْلِحِينَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُمَسِّكُونَ
मज़बूती से पकड़ते हैं
بِٱلْكِتَـٰبِ
किताब को
وَأَقَامُوا۟
और वो क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़ को
إِنَّا
बेशक हम
لَا
(will) not
نُضِيعُ
नहीं हम ज़ाया करते
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُصْلِحِينَ
इस्लाह करने वालों का
और जो लोग किताब को मज़बूती से थामते है और जिन्होंने नमाज़ क़ायम कर रखी है, तो काम को ठीक रखनेवालों के प्रतिदान को हम कभी अकारथ नहीं करते
तफ़्सीर:
और जो लोग पुस्तक को दृढ़ता से पकड़ते हैं और उसमें जो कुछ है उसपर अमल करते हैं, तथा नमाज़ को उसके समय, उसकी शर्तों, उसकी वाजिबात (अनिवार्य कार्यों) और उसकी सुन्नतों की पाबंदी करते हुए अदा करते हैं, अल्लाह क़रीब ही उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा। क्योंकि अल्लाह उस व्यक्ति का प्रतिफल बर्बाद नहीं करता, जिसका कार्य अच्छा हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बनी इस्राईल की बार-बार की नाफरमानियों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि लगातार नाफरमानी करते रहना किसी भी कौम को ज़वाल (पतन) की तरफ ले जाता है।
आयत 171
۞ وَإِذْ نَتَقْنَا ٱلْجَبَلَ فَوْقَهُمْ كَأَنَّهُۥ ظُلَّةٌۭ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُۥ وَاقِعٌۢ بِهِمْ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍۢ وَٱذْكُرُوا۟ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
۞ وَإِذْ
और जब
نَتَقْنَا
उठाया हमने
ٱلْجَبَلَ
पहाड़ को
فَوْقَهُمْ
ऊपर उनके
كَأَنَّهُۥ
गोया कि वो
ظُلَّةٌۭ
एक सायबान था
وَظَنُّوٓا۟
और उन्होंने समझ लिया
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
وَاقِعٌۢ
गिरने वाला है
بِهِمْ
उन पर
خُذُوا۟
पकड़ो
مَآ
जो
ءَاتَيْنَـٰكُم
दिया हमने तुम्हें
بِقُوَّةٍۢ
साथ क़ुव्वत के
وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
مَا
जो
فِيهِ
इसमें है
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
तुम मुत्तक़ी बन जाओ
और याद करो जब हमने पर्वत को हिलाया, जो उनके ऊपर था। मानो वह कोई छत्र हो और वे समझे कि बस वह उनपर गिरा ही चाहता है, "थामो मज़बूती से, जो कुछ हमने दिया है। और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो, ताकि तुम बच सको।"
तफ़्सीर:
और (ऐ मुहम्मद!) उस समय को याद करें, जब हमने पर्वत को उखाड़कर बनी इसराईल के ऊपर उठा लिया, जब उन्होंने तौरात की शिक्षाओं को ग्रहण करने से उपेक्षा की। चुनाँचे पहाड़ एक बादल की तरह हो गया, जो उनके सिर पर छाया कर रहा हो। तथा उन्हें यक़ीन हो गया कि वह उनपर गिरने ही वाला है, और उनसे कहा गया : हमने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसे पूरी मज़बूती और दृढ़ संकल्प के साथ थाम लो और उसमें मौजूद नियमों को, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए निर्धारित किए हैं, ठीक से याद रखो और उन्हें भूलो नहीं; इस आशा में कि ऐसा करने के बाद तुम अल्लाह से डरने लगो।
आयत 172
وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنۢ بَنِىٓ ءَادَمَ مِن ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ ۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ ۛ شَهِدْنَآ ۛ أَن تَقُولُوا۟ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَـٰذَا غَـٰفِلِينَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذَ
लिया
رَبُّكَ
आपके रब ने
مِنۢ
from
بَنِىٓ
(the) Children
ءَادَمَ
बनी आदम से
مِن
from
ظُهُورِهِمْ
उनकी पुश्तों से
ذُرِّيَّتَهُمْ
उनकी औलाद को
وَأَشْهَدَهُمْ
और गवाह बनाया उनको
عَلَىٰٓ
over
أَنفُسِهِمْ
उनके नफ़्सों पर
أَلَسْتُ
क्या नहीं हूँ मैं (फ़रमाया)
بِرَبِّكُمْ ۖ
रब तुम्हारा
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
بَلَىٰ ۛ
क्यों नहीं
شَهِدْنَآ ۛ
गवाही दी हमने
أَن
ताकि (ना)
تَقُولُوا۟
तुम कहो
يَوْمَ
(on the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के दिन
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
عَنْ
about
هَـٰذَا
उससे
غَـٰفِلِينَ
ग़ाफ़िल
और याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान से (अर्थात उनकी पीठों से) उनकी सन्तति निकाली और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" बोले, "क्यों नहीं, हम गवाह है।" ऐसा इसलिए किया कि तुम क़ियामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी।"
तफ़्सीर:
तथा (ऐ मुहम्मद!) वह समय याद करें, जब आपके पालनहार ने आदम के पुत्रों की पीठों से उनकी संतति को निकाला और उनसे अपनी रुबूबीयत को साबित करने का इक़रार लिया, जो दरअसल उसने उनकी प्रकृति में रखी है कि वे उसे अपना सृष्टिकर्ता और पालनहार मानते हैं, यह कहते हुए कि "क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ?" सबने कहा : "क्यों नहीं, तू हमारा पालनहार है।" अल्लाह ने कहा : "हमने तुम्हारा परीक्षण किया और तुमसे वचन लिया, ताकि तुम क़ियामत के दिन अपने विरुद्ध अल्लाह के तर्क का इनकार न कर दो और यह न कह दो कि हमें तो इसकी कोई ख़बर ही नहीं थी।"
आयत 173
أَوْ تَقُولُوٓا۟ إِنَّمَآ أَشْرَكَ ءَابَآؤُنَا مِن قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةًۭ مِّنۢ بَعْدِهِمْ ۖ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ ٱلْمُبْطِلُونَ
أَوْ
या
تَقُولُوٓا۟
तुम कहो
إِنَّمَآ
बेशक
أَشْرَكَ
शिर्क किया था
ءَابَآؤُنَا
हमारे आबा ओ अजदाद ने
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
وَكُنَّا
और थे हम
ذُرِّيَّةًۭ
औलाद
مِّنۢ
from
بَعْدِهِمْ ۖ
उनके बाद वालों की
أَفَتُهْلِكُنَا
क्या पस तू हलाक करता है हमें
بِمَا
बवजह उसके जो
فَعَلَ
किया
ٱلْمُبْطِلُونَ
ग़लतकारों ने
या कहो कि "(अल्लाह के साथ) साझी तो पहले हमारे बाप-दादा ने किया। हम तो उसके पश्चात उनकी सन्तति में हुए है। तो क्या तू हमें उसपर विनष्ट करेगा जो कुछ मिथ्याचारियों ने किया है?"
तफ़्सीर:
अथवा तुम यह तर्क प्रस्तुत करो कि दरअसल तुम्हारे बाप-दादा ही ने वचन तोड़ा और अल्लाह के साथ शिर्क किया था। और तुम उनकी देखा-देखी शिर्क की राह पर चल पड़े थे। इसलिए तुम यह कहो : तो क्या (ऐ हमारे पालनहार!) तू हमारी पकड़ उसके कारण करके हमें यातना देगा, जो हमारे उन पूर्वजों ने किया था जिन्होंने अल्लाह के साथ शिर्क करके अपने अच्छे कर्मों को नष्ट कर लिया था? अतः हम दोषी नहीं हैं, क्योंकि हमें कुछ पता नहीं था और हमने केवल अपने बाप-दादा की देखा-देखी ऐसा किया था।
आयत 174
وَكَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَلَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُفَصِّلُ
हम खोल कर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
وَلَعَلَّهُمْ
और ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो रुजूअ कर लें
इस प्रकार स्थिति के अनुकूल आयतें प्रस्तुत करते है। और शायद कि वे पलट आएँ
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने झुठलाने वाली जातियों के परिणाम के बारे में आयतें खोल-खोल कर बयान की हैं, उसी तरह हम इन लोगों के लिए भी आयतें खोल-खोल कर बयान करते हें, इस आशा में कि वे अपने शिर्क से अल्लाह की तौह़ीद (एकेश्वरवाद) और अकेले उसी की इबादत करने की ओर पलट आएँ, जैसा कि उस वचन में आया है, जो उन्होंने अपने बारे में अल्लाह को दिया था।
आयत 175
وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ ٱلَّذِىٓ ءَاتَيْنَـٰهُ ءَايَـٰتِنَا فَٱنسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ فَكَانَ مِنَ ٱلْغَاوِينَ
وَٱتْلُ
और पढ़िए
عَلَيْهِمْ
उन पर
نَبَأَ
ख़बर
ٱلَّذِىٓ
उस शख़्स की
ءَاتَيْنَـٰهُ
दीं हमने उसको
ءَايَـٰتِنَا
आयात अपनी
فَٱنسَلَخَ
पस वो निकल गया
مِنْهَا
उनसे
فَأَتْبَعَهُ
फिर पीछे लग गया उसके
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
فَكَانَ
तो वो हो गया
مِنَ
of
ٱلْغَاوِينَ
गुमराहों में से
और उन्हें उस व्यक्ति का हाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें प्रदान की किन्तु वह उनसे निकल भागा। फिर शैतान ने उसे अपने पीछे लगा लिया। अन्ततः वह पथभ्रष्ट और विनष्ट होकर रहा
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) बनी इसराईल को, उन्हीं के समुदाय के उस व्यक्ति की खबर पढ़कर सुनाएँ, जिसे हमने अपनी आयतें दी थीं, जिन्हें उसने सीखा और उनसे प्रकट होने वाले सत्य को समझा, लेकिन उसने उन पर अमल नहीं किया, बल्कि उन्हें छोड़ दिया और उनसे किनारा कर लिया। अतः शैतान ने उसका पीछा किया और उसका साथी बन गया। अंततः वह पथभ्रष्टों और विनष्ट होने वालों में से हो गया, जबकि पहले मार्गदर्शित और मुक्ति पाने वालों में से था।
आयत 176
وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَـٰهُ بِهَا وَلَـٰكِنَّهُۥٓ أَخْلَدَ إِلَى ٱلْأَرْضِ وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ ۚ فَمَثَلُهُۥ كَمَثَلِ ٱلْكَلْبِ إِن تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَث ۚ ذَّٰلِكَ مَثَلُ ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا ۚ فَٱقْصُصِ ٱلْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
وَلَوْ
और अगर
شِئْنَا
चाहते हम
لَرَفَعْنَـٰهُ
अलबत्ता बुलन्द करते हम उसे
بِهَا
साथ उनके
وَلَـٰكِنَّهُۥٓ
और लेकिन वो
أَخْلَدَ
वो झुक गया
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ
तरफ़ ज़मीन के
وَٱتَّبَعَ
और उसने पैरवी की
هَوَىٰهُ ۚ
अपनी ख़्वाहिशात की
فَمَثَلُهُۥ
तो मिसाल उसकी
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
ٱلْكَلْبِ
कुत्ते की है
إِن
अगर
تَحْمِلْ
तू हमला करे
عَلَيْهِ
उस पर
يَلْهَثْ
वो ज़बान लटकाता है
أَوْ
या
تَتْرُكْهُ
तू छोड़ दे उसे
يَلْهَث ۚ
वो ज़बान लटकाता है
ذَّٰلِكَ
ये
مَثَلُ
मिसाल है
ٱلْقَوْمِ
उस क़ौम की
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا ۚ
हमारी आयात को
فَٱقْصُصِ
पस बयान कीजिए
ٱلْقَصَصَ
वाक़िआत
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَفَكَّرُونَ
वो ग़ौरो फ़िक्र करें
यदि हम चाहते तो इन आयतों के द्वारा उसे उच्चता प्रदान करते, किन्तु वह तो धरती के साथ लग गया और अपनी इच्छा के पीछे चला। अतः उसकी मिसाल कुत्ते जैसी है कि यदि तुम उसपर आक्षेप करो तब भी वह ज़बान लटकाए रहे या यदि तुम उसे छोड़ दो तब भी वह ज़बान लटकाए ही रहे। यही मिसाल उन लोगों की है, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, तो तुम वृत्तान्त सुनाते रहो, कदाचित वे सोच-विचार कर सकें
तफ़्सीर:
और यदि हम उसे इन आयतों से लाभ पहुँचाना चाहते, तो इनके द्वारा उसे ऊँचाइयाँ प्रदान करते। वह इस तरह कि उसे इनपर अमल करने की तौफीक़ देते, तो वह दुनिया एवं आख़िरत में ऊँचाइयाँ प्राप्त कर लेता। लेकिन उसने वह रास्ता चुना जो उसकी विफलता की ओर ले जाता है, जब वह अपनी आख़िरत पर अपनी दुनिया को प्राथमिकता देते हुए संसार की इच्छाओं की ओर अग्रसर हो गया और अपने मन की असत्य आकांक्षाओं के पीछे चलने लगा। अतः दुनिया के अत्यधिक मोह के विषय में उसकी मिसाल कुत्ते की तरह है, जो हर हाल में हाँफता रहता है, यदि वह बैठा हुआ है तो भी हाँफता रहता है और अगर धुतकार दिया जाता है तो भी हाँफता रहता है। यह मिसाल उन लोगों की है जो हमारी आयतों को झुठलाने के कारण गुमराह होने वाले हैं।तो (ऐ रसूल!) आप उन्हें कहानियाँ सुनाएँ; इस आशा में कि वे सोच-विचार करें, और परिणाम स्वरूप, वे जिस गुमराही और झुठलाने में लिप्त हैं, उससे बाज़ आ जाएँ।
आयत 177
سَآءَ مَثَلًا ٱلْقَوْمُ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَأَنفُسَهُمْ كَانُوا۟ يَظْلِمُونَ
سَآءَ
कितनी बुरी है
مَثَلًا
मिसाल
ٱلْقَوْمُ
उन लोगों की
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَأَنفُسَهُمْ
और अपने ही नफ़्सों पर
كَانُوا۟
थे वो
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
बुरे है मिसाल की दृष्टि से वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और वे स्वयं अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे
तफ़्सीर:
उन लोगों से अधिक बुरा कोई नहीं है, जिन्होंने हमारे तर्कों और सबूतों को झुठला दिया और उनपर विश्वास नहीं किया। इस प्रकार वे खुद को विनाश के घाट उतार कर अपने ही ऊपर अत्याचार कर रहे थे।
आयत 178
مَن يَهْدِ ٱللَّهُ فَهُوَ ٱلْمُهْتَدِى ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
مَن
जिसे
يَهْدِ
हिदायत बख़्शे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَهُوَ
पस वो ही
ٱلْمُهْتَدِى ۖ
हिदायत पाने वाला है
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلْ
वो भटका दे
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
पस यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए वही सीधा मार्ग पानेवाला है और जिसे वह मार्ग से वंचित रखे, तो ऐसे ही लोग घाटे में पड़नेवाले हैं
तफ़्सीर:
जिसे अल्लाह अपने सीधे मार्ग की ओर हिदायत की तौफ़ीक़ प्रदान कर दे, तो वही सही मायने में हिदायत पाने वाला है; और जिसे वह सीधे मार्ग से दूर कर दे, तो वही लोग हैं जो वास्तव में अपने हितों का नुक़सान करने वाले हैं, जो क़ियामत के दिन अपना और अपने परिवार का घाटा करेंगे। आगाह रहो! यही खुला हुआ घाटा है।
आयत 179
وَلَقَدْ ذَرَأْنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ ۖ لَهُمْ قُلُوبٌۭ لَّا يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌۭ لَّا يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ ءَاذَانٌۭ لَّا يَسْمَعُونَ بِهَآ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ كَٱلْأَنْعَـٰمِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْغَـٰفِلُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ذَرَأْنَا
पैदा किए हमने
لِجَهَنَّمَ
जहन्नम के लिए
كَثِيرًۭا
बहुत से
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
وَٱلْإِنسِ ۖ
और इन्सानों में से
لَهُمْ
उनके
قُلُوبٌۭ
दिल हैं
لَّا
(but) not
يَفْقَهُونَ
नहीं वो समझते
بِهَا
साथ उनके
وَلَهُمْ
और उनकी
أَعْيُنٌۭ
आँखें हैं
لَّا
(but) not
يُبْصِرُونَ
नहीं वो देखते
بِهَا
साथ उनके
وَلَهُمْ
और उनके
ءَاذَانٌۭ
कान हैं
لَّا
(but) not
يَسْمَعُونَ
नहीं वो सुनते
بِهَآ ۚ
साथ उनके
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग
كَٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशियों की तरह हैं
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
أَضَلُّ ۚ
ज़्यादा गुमराह हैं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْغَـٰفِلُونَ
जो ग़ाफ़िल हैं
निश्चय ही हमने बहुत-से जिन्नों और मनुष्यों को जहन्नम ही के लिए फैला रखा है। उनके पास दिल है जिनसे वे समझते नहीं, उनके पास आँखें है जिनसे वे देखते नहीं; उनके पास कान है जिनसे वे सुनते नहीं। वे पशुओं की तरह है, बल्कि वे उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट है। वही लोग है जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
और हमने बहुत-से जिन्नों और इनसानों को जहन्नम के लिए पैदा किए हैं; क्योंकि हम जानते हैं कि वे जहन्नम वालों का काम करेंगे। उनके पास दिल हैं जिनके साथ वे अपने लाभ एवं नुक़सान को नहीं समझते, उनकी आँखें हैं जिनके साथ वे आत्माओं और क्षितिज में अल्लाह की निशानियाँ नहीं देखते कि उनसे शिक्षा ग्रहण करते, और उनके पास कान हैं, जिनसे वे अल्लाह की आयतों को नहीं सुनते कि वे उसमें जो कुछ है उसपर चिंतन करते। जो लोग इन गुणों से विशेषित हैं, वे बुद्धिहीन होने में जानवरों की तरह हैं, बल्कि वे जानवरों की तुलना में अधिक गुमराह हैं। यही लोग हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लाने से ग़फ़लत में पड़े हुए हैं।
आयत 180
وَلِلَّهِ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ فَٱدْعُوهُ بِهَا ۖ وَذَرُوا۟ ٱلَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِىٓ أَسْمَـٰٓئِهِۦ ۚ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
ٱلْأَسْمَآءُ
नाम
ٱلْحُسْنَىٰ
अच्छे-अच्छे
فَٱدْعُوهُ
पस पुकारो उसे
بِهَا ۖ
साथ उनके
وَذَرُوا۟
और छोड़ दो
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
يُلْحِدُونَ
कज रवी करते हैं
فِىٓ
concerning
أَسْمَـٰٓئِهِۦ ۚ
उसके नामों में
سَيُجْزَوْنَ
अनक़रीब वो बदला दिए जाऐंगे
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
अच्छे नाम अल्लाह ही के है। तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते है। जो कुछ वे करते है, उसका बदला वे पाकर रहेंगे
तफ़्सीर:
सबसे अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं, जो उसकी महिमा और पूर्णता को इंगित करते हैं। अतः अल्लाह से कुछ माँगते समय उनको वसीला बनाओ और उनके ज़रिए अल्लाह की प्रशंसा करो, और उन लोगों को छोड़ दो, जो इन नामों के मामले में सही रास्ते से हट जाते हैं, इस प्रकार कि उन्हें अल्लाह के अलावा के लिए ठहरा देते हैं, या अल्लाह से उनको अलग कर देते हैं, या उनके अर्थ को विकृत करते हैं, या अल्लाह के अलावा को उनके समान (सदृश्य) ठहराते हैं। हम इन नामों के विषय में सही रास्ते से हटने वालों को जल्द ही उनके कर्मों के कारण दर्दनाक यातना देंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मीसाक (अहद) और इल्म रखते हुए गुमराह हो जाने वाले शख्स की मिसाल का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इल्म रखते हुए भी उस पर अमल न करना इंसान को भटकाए रखता है।
आयत 181
وَمِمَّنْ خَلَقْنَآ أُمَّةٌۭ يَهْدُونَ بِٱلْحَقِّ وَبِهِۦ يَعْدِلُونَ
وَمِمَّنْ
और उनमें से जिन्हें
خَلَقْنَآ
पैदा किए हमने
أُمَّةٌۭ
एक गिरोह है
يَهْدُونَ
वो रहनुमाई करते हैं
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَبِهِۦ
और साथ उसी के
يَعْدِلُونَ
वो अदल करते हैं
हमारे पैदा किए प्राणियों में कुछ लोग ऐसे भी है जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों को हमने पैदा किया, उनके अंदर कुछ लोग ऐसे हैं, जो खुद सत्य पर क़ायम रहते हैं और दूसरों को उसकी ओर आमंत्रित करते हैं, चुनाँचे वे भी सही रास्ते पर आ जाते हैं, और वे उसी के अनुसार न्याय के साथ निर्णय करते हैं। अतः वे अन्याय नहीं करते हैं।
आयत 182
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
سَنَسْتَدْرِجُهُم
ज़रूर हम आहिस्ता-आहिस्ता पकड़ेंगे उन्हें
مِّنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَا
not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, हम उन्हें क्रमशः तबाही की ओर ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से जिसे वे जानते नहीं
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया और उनपर ईमान नहीं लाए, बल्कि उनका इनकार कर दिया, हम उनके लिए आजीविका के दरवाज़े खोल देंगे। लेकिन यह उनके सम्मान के तौर पर नहीं होगा, बल्कि उन्हें ढील देने के लिए होगा; ताकि वे जिस गुमराही में लिप्त हैं उसी में पड़े रहें। फिर हामरी यातना अचानक उन्हें अपनी पकड़ में ले ले।
आयत 183
وَأُمْلِى لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِى مَتِينٌ
وَأُمْلِى
और मैं मोहलत दे रहा हूँ
لَهُمْ ۚ
उन्हें
إِنَّ
बेशक
كَيْدِى
तदबीर मेरी
مَتِينٌ
बहुत मज़बूत है
मैं तो उन्हें ढील दिए जा रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल अत्यन्त सुदृढ़ है
तफ़्सीर:
और मैं उनकी सज़ा को टालता रहूँगा, यहाँ तक कि वे समझने लगेंगे कि उनपर यातना नहीं आने वाली। परिणामस्वरूप वे अपने कुफ़्र और झुठलाने का क्रम जारी रखेंगे, यहाँ तक कि उनपर यातना कई गुना कर दी जाएगी। निश्चय मेरा उपाय बड़ा मज़बूत है। चुनाँचे मैं उनके लिए उपकार ज़ाहिर करता हूँ, लेकिन मैं उनकी विफलता चाहता हूँ।
आयत 184
أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا۟ ۗ مَا بِصَاحِبِهِم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَتَفَكَّرُوا۟ ۗ
उन्होंने ग़ौरो फ़िक्र किया
مَا
नहीं है
بِصَاحِبِهِم
उनके साथी को
مِّن
[of]
جِنَّةٍ ۚ
कोई जुनून
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
क्या उन लोगों ने विचार नहीं किया? उनके साथी को कोई उन्माद नहीं। वह तो बस एक साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला है
तफ़्सीर:
और क्या अल्लाह की आयतों और उसके रसूल को झुठलाने वाले इन लोगों ने अपनी बुद्धि को काम में लाते हुए ग़ौर नहीं किया कि उनके लिए यह स्पष्ट हो जाता कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पागल नहीं हैं। वह तो केवल अल्लाह के रसूल हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपनी यातना से खुले रूप से सावधान करने के लिए भेजा है।
आयत 185
أَوَلَمْ يَنظُرُوا۟ فِى مَلَكُوتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا خَلَقَ ٱللَّهُ مِن شَىْءٍۢ وَأَنْ عَسَىٰٓ أَن يَكُونَ قَدِ ٱقْتَرَبَ أَجَلُهُمْ ۖ فَبِأَىِّ حَدِيثٍۭ بَعْدَهُۥ يُؤْمِنُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَنظُرُوا۟
उन्होंने देखा
فِى
in
مَلَكُوتِ
बादशाहत में
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَمَا
और जो भी
خَلَقَ
पैदा की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
of
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
وَأَنْ
और ये कि
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَكُونَ
हो
قَدِ
तहक़ीक़
ٱقْتَرَبَ
क़रीब आ चुकी
أَجَلُهُمْ ۖ
मुद्दत उनकी
فَبِأَىِّ
तो साथ किस
حَدِيثٍۭ
बात के
بَعْدَهُۥ
बाद उसके
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाऐंगे
या क्या उन्होंने आकाशों और धरती के राज्य पर और जो चीज़ भी अल्लाह ने पैदा की है उसपर दृष्टि नहीं डाली, और इस बात पर कि कदाचित उनकी अवधि निकट आ लगी हो? फिर आख़िर इसके बाद अब कौन-सी बात हो सकती है, जिसपर वे ईमान लाएँगे?
तफ़्सीर:
क्या इन लोगों ने आकाशों तथा धरती में अल्लाह के राज्य को शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से नहीं देखा? और उन दोनों के अंदर अल्लाह ने जो जीव और निर्जीव चीज़ें पैदा की हैं, उनपर निगाह नहीं डाली? और अपने निर्धारित समय (आयु) पर ग़ौर नहीं किया, जिसका अंत हो सकता है बहुत निकट हो, इसलिए समय निकलने से पहले तौबा कर लेते? जब वे क़ुरआन और उसके वादों और धमकियों पर ईमान नहीं लाए, तो उसके अलावा किस किताब पर ईमान लाएँगे?
आयत 186
مَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَلَا هَادِىَ لَهُۥ ۚ وَيَذَرُهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
مَن
जिसे
يُضْلِلِ
भटका देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَلَا
पस नहीं
هَادِىَ
कोई हिदायत देने वाला
لَهُۥ ۚ
उसे
وَيَذَرُهُمْ
और वो छोड़ देता है उन्हें
فِى
in
طُغْيَـٰنِهِمْ
उनकी सरकशी में
يَعْمَهُونَ
वो सरगरदाँ फिरते हैं
जिसे अल्लाह मार्ग से वंचित रखे उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं। वह तो तो उन्हें उनकी सरकशी ही में भटकता हुआ छोड़ रहा है
तफ़्सीर:
जिसे अल्लाह सत्य की ओर हिदायत से विफल कर दे और उसे सीधे रास्ते से भटका दे, तो उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं है, जो उसकी ओर उसका मार्गदर्शन कर सके।और अल्लाह उन्हें उनकी गुमराही और कुफ़्र में छोड़ देता है कि वे भटकते फिरते हैं, उन्हें कोई रास्ता सुझाई नहीं देता।
आयत 187
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ رَبِّى ۖ لَا يُجَلِّيهَا لِوَقْتِهَآ إِلَّا هُوَ ۚ ثَقُلَتْ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ لَا تَأْتِيكُمْ إِلَّا بَغْتَةًۭ ۗ يَسْـَٔلُونَكَ كَأَنَّكَ حَفِىٌّ عَنْهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ ٱللَّهِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
يَسْـَٔلُونَكَ
वो पूछते हैं आप से
عَنِ
about
ٱلسَّاعَةِ
उस घड़ी (क़यामत) के बारे में
أَيَّانَ
कब है
مُرْسَىٰهَا ۖ
ठहराना उसका
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
عِلْمُهَا
इल्म उसका
عِندَ
पास है
رَبِّى ۖ
मेरे रब के
لَا
no (one)
يُجَلِّيهَا
नहीं ज़ाहिर करेगा उसे
لِوَقْتِهَآ
उसके वक़्त पर
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
ثَقُلَتْ
भारी होगी
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में
لَا
Not
تَأْتِيكُمْ
नहीं वो आएगी तुम्हारे पास
إِلَّا
मगर
بَغْتَةًۭ ۗ
अचानक
يَسْـَٔلُونَكَ
वो पूछते हैं आपसे
كَأَنَّكَ
गोया कि आप
حَفِىٌّ
पूरे बाख़बर हैं
عَنْهَا ۖ
उससे
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
عِلْمُهَا
इल्म उसका
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
तुमसे उस घड़ी (क़ियामत) के विषय में पूछते है कि वह कब आएगी? कह दो, "उसका ज्ञान मेरे रब ही के पास है। अतः वही उसे उसके समय पर प्रकट करेगा। वह आकाशों और धरती में बोझिल हो गई है - बस अचानक ही वह तुमपर आ जाएगी।" वे तुमसे पूछते है मानो तुम उसके विषय में भली-भाँति जानते हो। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है - किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) ये हठी झुठलाने वाले आपसे क़ियामत के बारे में पूछते हैं कि वह किस समय घटित होगी और उसका सटीक ज्ञान कब होगा? आप कह दें कि उसका ज्ञान न तो मेरे पास है और न मेरे अलावा किसी और के पास है। उसकी जानकारी केवल अल्लाह के पास है। उसे उसके निर्धारित समय पर केवल अल्लाह ही प्रकट करेगा। उसके प्रकट होने का मामला आकाश वालों तथा धरती वालों से छिपा है। वह तुम्हारे पास अचानक ही आएगी। वे आपसे क़ियामत के बारे में ऐसे पूछ रहे हैं, जैसे कि आप उसके बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं। हालाँकि उन्हें यह पता ही नहीं कि आप अपने रब से पूरी तरह अवगत होने के कारण उससे क़ियामत के बारे में नहीं पूछते हैं। (ऐ मुहम्मद!) उनसे कह दें कि क़ियामत की जानकारी केवल अल्लाह ही के पास है, लेकिन अधिकतर लोग इस बात से अवगत नहीं हैं।
आयत 188
قُل لَّآ أَمْلِكُ لِنَفْسِى نَفْعًۭا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۚ وَلَوْ كُنتُ أَعْلَمُ ٱلْغَيْبَ لَٱسْتَكْثَرْتُ مِنَ ٱلْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِىَ ٱلسُّوٓءُ ۚ إِنْ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ وَبَشِيرٌۭ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَمْلِكُ
नहीं हूँ मैं मालिक
لِنَفْسِى
अपने नफ़्स के लिए
نَفْعًۭا
किसी नफ़ा का
وَلَا
और ना
ضَرًّا
किसी नुक़सान का
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
وَلَوْ
और अगर
كُنتُ
होता मैं
أَعْلَمُ
मैं जानता
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब को
لَٱسْتَكْثَرْتُ
अलबत्ता कसरत से ले लेता मैं
مِنَ
of
ٱلْخَيْرِ
भलाई में से
وَمَا
और ना
مَسَّنِىَ
पहुँचती मुझे
ٱلسُّوٓءُ ۚ
कोई तकलीफ़
إِنْ
नहीं हूँ
أَنَا۠
मैं
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
وَبَشِيرٌۭ
और ख़ुशख़बरी देने वाला
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
कहो, "मैं अपने लिए न तो लाभ का अधिकार रखता हूँ और न हानि का,बल्कि अल्लाह ही की इच्छा क्रियान्वित है। यदि मुझे परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान होता तो बहुत-सी भलाई समेट लेता और मुझे कभी कोई हानि न पहुँचती। मैं तो बस सचेत करनेवाला हूँ, उन लोगों के लिए जो ईमान लाएँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) आप कह दें : मैं न अपने लिए कोई भलाई प्राप्त कर सकता हूँ और न अपने आपसे कोई बुराई दूर कर सकता हूँ, सिवाय इसके कि अल्लाह चाहे। यह काम केवल अल्लाह का है। मैं केवल वही जानता हूँ, जो अल्लाह ने मुझे सिखाया है। चुनाँचे मैं ग़ैब की बात नहीं जानता। अगर मैं ग़ैब की बात जानता होता, तो चीज़ों को उनके होने से पहले जानने और उनके परिणाम से अवगत होने की वजह से अवश्य उन कारणों को अपनाया होता, जिन्हें मैं जानता हूँ कि वे मेरे हितों की पूर्ति करते और मुझसे बुराइयों को दूर करते हैं। मैं तो केवल अल्लाह की ओर से भेजा हुआ एक रसूल हूँ। उसकी दुखदायी यातना से डराता हूँ और उन लोगों को उसके उदार प्रतिफल की शुभ सूचना देता हूँ, जो इस बात पर विश्वास रखते हैं कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ और मैं जो कुछ लेकर आया हूँ, उसे सच्चा मानते हैं।
आयत 189
۞ هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍۢ وَٰحِدَةٍۢ وَجَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا لِيَسْكُنَ إِلَيْهَا ۖ فَلَمَّا تَغَشَّىٰهَا حَمَلَتْ حَمْلًا خَفِيفًۭا فَمَرَّتْ بِهِۦ ۖ فَلَمَّآ أَثْقَلَت دَّعَوَا ٱللَّهَ رَبَّهُمَا لَئِنْ ءَاتَيْتَنَا صَـٰلِحًۭا لَّنَكُونَنَّ مِنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ
۞ هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
نَّفْسٍۢ
जान से
وَٰحِدَةٍۢ
एक ही
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
مِنْهَا
उससे
زَوْجَهَا
जोड़ा उसका
لِيَسْكُنَ
ताकि वो सुकून हासिल करें
إِلَيْهَا ۖ
तरफ़ उसके
فَلَمَّا
फिर जब
تَغَشَّىٰهَا
उसने ढाँप लिया उसे
حَمَلَتْ
उसने उठाया
حَمْلًا
बोझ
خَفِيفًۭا
हल्का
فَمَرَّتْ
पस वो चलती रही
بِهِۦ ۖ
साथ उसके
فَلَمَّآ
फिर जब
أَثْقَلَت
वो बोझल हो गई
دَّعَوَا
दोंनो ने दुआ की
ٱللَّهَ
अल्लाह से
رَبَّهُمَا
जो रब है उन दोनों का
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
ءَاتَيْتَنَا
दे दिया तूने हमें
صَـٰلِحًۭا
सही सलामत (बच्चा)
لَّنَكُونَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों में से
वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे। फिर जब उसने उसको ढाँक लिया तो उसने एक हल्का-सा बोझ उठा लिया; फिर वह उसे लिए हुए चलती-फिरती रही, फिर जब वह बोझिल हो गई तो दोनों ने अल्लाह - अपने रब को पुकारा, "यदि तूने हमें भला-चंगा बच्चा दिया, तो निश्चय ही हम तेरे कृतज्ञ होंगे।"
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है, जिसने तुम्हें (ऐ पुरुषो और महिलाओ!) एक ही जान अर्थात् आदम अलैहिस्सलाम से पैदा किया और आदम अलैहिस्सलाम से उनकी पत्नी ह़व्वा को पैदा किया। ह़व्वा को आदम अलैहिस्सलाम की पसली से पैदा किया, ताकि आदम अलैहिस्सलाम उनसे सुकून हासिल करें और संतुष्ट रहें। फिर जब एक पति ने अपनी पत्नी के साथ संभोग किया, तो उसे हल्का सा गर्भ ठहर गया, जिसे वह महसूस नहीं करती थी। क्योंकि वह अपनी शुरुआत में था। वह अपनी इस गर्भावस्था पर रहते हुए अपनी ज़रूरत के काम-काज करती रही, उसे कोई बोझ महसूस नहीं होता था। फिर उसके पेट में गर्भ के बड़ा होने पर, उसे भारीपन महसूस हुआ, तो पति-पत्नी ने मिलकर अल्लाह से दुआ करते हुए कहा : (ऐ हमारे पालनहार!) अगर तूने हमें एक स्वस्थ बच्चा प्रदान किया, तो हम तेरी नेमतों का शुक्रिया अदा करने वालों में से होंगे।
आयत 190
فَلَمَّآ ءَاتَىٰهُمَا صَـٰلِحًۭا جَعَلَا لَهُۥ شُرَكَآءَ فِيمَآ ءَاتَىٰهُمَا ۚ فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
فَلَمَّآ
तो जब
ءَاتَىٰهُمَا
उसने दिया उन दोनों को
صَـٰلِحًۭا
सही सलामत
جَعَلَا
उन दोनों ने बना लिया
لَهُۥ
उसके लिए
شُرَكَآءَ
शरीक
فِيمَآ
उसमें जो
ءَاتَىٰهُمَا ۚ
उसने दिया उन्हें
فَتَعَـٰلَى
पस बुलन्दतर है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
किन्तु उसने जब उन्हें भला-चंगा (बच्चा) प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे, जो साझी वे ठहराते है
तफ़्सीर:
जब अल्लाह ने उन दोनों की प्रार्थना स्वीकार करके उन्हें एक स्वस्थ बच्चा प्रदान कर दिया, तो उन्होंने अल्लाह की दी हुई संतान में उसके साझीदार बना लिए। चुनाँचे उन्होंने अपने बेटे को अल्लाह के अलावा अन्य का बंदा बना दिया और उसका नाम अब्दुल ह़ारिस (हारिस का बंदा) रख दिया। तो अल्लाह हर साझी व शरीक से बहुत ऊँचा है। क्योंकि वह पालनहार और पूज्य होने में अकेला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह के अच्छे नामों से दुआ मांगने की ताकीद है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह से उसके खूबसूरत नामों के वसीले से दुआ मांगना उसकी बड़ी नेमत है।
आयत 191
أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْـًۭٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
أَيُشْرِكُونَ
क्या वो शरीक ठहराते हैं
مَا
उनको जो
لَا
(can) not
يَخْلُقُ
नहीं वो पैदा कर सकते
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَهُمْ
और वो
يُخْلَقُونَ
वो पैदा किए जाते हैं
क्या वे उसको साझी ठहराते है जो कोई चीज़ भी पैदा नहीं करता, बल्कि ऐसे उनके ठहराए हुए साझीदार तो स्वयं पैदा किए जाते हैं
तफ़्सीर:
क्या वे इन मूर्तियों और इनके सिवा अन्य चीज़ों को इबादत में अल्लाह का साझी बनाते हैं, जबकि वे जानते हैं कि ये मूर्तियाँ कुछ पैदा नहीं करतीं, कि पूजा की हक़दार हों। बल्कि, वे स्वयं पैदा की गई हैं। तो फिर वे इन्हें कैसे अल्लाह का साझी ठहराते हैं?
आयत 192
وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًۭا وَلَآ أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
وَلَا
और नहीं
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते
لَهُمْ
उनके लिए
نَصْرًۭا
किसी मदद की
وَلَآ
और ना
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों की
يَنصُرُونَ
वो मदद कर सकते हैं
और वे न तो उनकी सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है?
तफ़्सीर:
ये पूज्य न अपने पूजकों की सहायता कर सकते हैं और न खुद अपनी सहायता कर सकते हैं, तो फिर वे इनकी इबादत कैसे करते हैं?!
आयत 193
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى ٱلْهُدَىٰ لَا يَتَّبِعُوكُمْ ۚ سَوَآءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنتُمْ صَـٰمِتُونَ
وَإِن
और अगर
تَدْعُوهُمْ
तुम बुलाओ उन्हें
إِلَى
to
ٱلْهُدَىٰ
तरफ़ हिदायत के
لَا
not
يَتَّبِعُوكُمْ ۚ
नहीं वो पैरवी करेंगे तुम्हारी
سَوَآءٌ
यकसाँ है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أَدَعَوْتُمُوهُمْ
ख़्वाह बुलाओ तुम उन्हें
أَمْ
या
أَنتُمْ
तुम
صَـٰمِتُونَ
ख़ामोश रहो
यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे तुम्हारे पीछे न आएँगे। तुम्हारे लिए बराबर है - उन्हें पुकारो या तुम चुप रहो
तफ़्सीर:
और अगर तुम (ऐ मुश्रिको!) इन मूर्तियों को, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूज्य बनाते हो, हिदायत की ओर बुलाओ, तो वे तुम्हें उसका जवाब नहीं देंगी जिनकी ओर तुमने उन्हें बुलाया है और न ही वे तुम्हारा अनुसरण करेंगी। अतः उनके निकट तुम्हारा उन्हें पुकारना या तुम्हारा चुप रहना दोनों बराबर है। क्योंकि वे मात्र निर्जीव वस्तुएं हैं; जो न समझती हैं, न सुनती हैं और न बोलती हैं।
आयत 194
إِنَّ ٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ ۖ فَٱدْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا۟ لَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
عِبَادٌ
बन्दे हैं
أَمْثَالُكُمْ ۖ
तुम्हारी तरह के
فَٱدْعُوهُمْ
पस पुकारो उन्हें
فَلْيَسْتَجِيبُوا۟
तो चाहिए कि वो जवाब दें
لَكُمْ
तुम्हें
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
तुम अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वे तो तुम्हारे ही जैसे बन्दे है, अतः पुकार लो उनको, यदि तुम सच्चे हो, तो उन्हें चाहिए कि वे तुम्हें उत्तर दे!
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों की तुम (ऐ मुश्रिको!) अल्लाह के सिवा इबादत करते हो, वे अल्लाह ही के पैदा किए हुए हैं और उनका मालिक भी वही है। इस तरह वे इस बारे में तुम्हारे ही जैसे हैं। बल्कि तुम उनसे उत्तम स्थिति में हो। क्योंकि तुम ज़िंदा हो, बोलते हो, चलते-फिरते हो, सुनते हो और देखते हो। जबकि तुम्हारी मूर्तियों के पास ये शक्तियाँ नहीं हैं। अतः तुम उनको पुकारो और वे तुम्हारी पुकार का जवाब दें, यदि तुम उनके बारे में अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 195
أَلَهُمْ أَرْجُلٌۭ يَمْشُونَ بِهَآ ۖ أَمْ لَهُمْ أَيْدٍۢ يَبْطِشُونَ بِهَآ ۖ أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌۭ يُبْصِرُونَ بِهَآ ۖ أَمْ لَهُمْ ءَاذَانٌۭ يَسْمَعُونَ بِهَا ۗ قُلِ ٱدْعُوا۟ شُرَكَآءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنظِرُونِ
أَلَهُمْ
क्या उनके
أَرْجُلٌۭ
पाँव हैं
يَمْشُونَ
कि वो चलते हों
بِهَآ ۖ
साथ उनके
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके
أَيْدٍۢ
हाथ हैं
يَبْطِشُونَ
कि वो पकड़ते हों
بِهَآ ۖ
साथ उनके
أَمْ
या
لَهُمْ
उनकी
أَعْيُنٌۭ
आँखें हैं
يُبْصِرُونَ
कि वो देखते हों
بِهَآ ۖ
साथ उनके
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके
ءَاذَانٌۭ
कान हैं
يَسْمَعُونَ
कि वो सुनते हों
بِهَا ۗ
साथ उनके
قُلِ
कह दीजिए
ٱدْعُوا۟
पुकारो
شُرَكَآءَكُمْ
अपने शरीकों को
ثُمَّ
फिर
كِيدُونِ
चाल चलो मेरे ख़िलाफ़
فَلَا
फिर ना
تُنظِرُونِ
तुम मोहलत दो मुझे
क्या उनके पाँव हैं जिनसे वे चलते हों या उनके हाथ हैं जिनसे वे पकड़ते हों या उनके पास आँखें हीं जिनसे वे देखते हों या उनके कान हैं जिनसे वे सुनते हों? कहों, "तुम अपने ठहराए हु सहभागियों को बुला लो, फिर मेरे विरुद्ध चालें न चलो, इस प्रकार कि मुझे मुहलत न दो
तफ़्सीर:
क्या इन मूर्तियों के, जिन्हें तुमने पूज्य बना रखा है, पाँव हैं, जिनसे वे चलती हैं, कि तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करें? या उनके हाथ हैं, जिनसे वे तुम्हारा पूरी शक्ति से बचाव करें? या उनकी आँखें हैं, जिनसे वे उन चीज़ों को देखती हैं, जिन्हें तुम नहीं देख सकते कि तुम्हें उनसे अवगत करा सकें? या उनके कान हैं, जिनसे वे उन बातों को सुन लेती हैं, जिन्हें तुम नहीं सुन सकते, तो वे तुम्हें उनसे सूचित कर देती हैं? अगर वे इन सारी चीज़ों से खाली हैं, तो फिर तुम उन्हें लाभ प्राप्त करने या हानि से बचने की आशा में कैसे पूजते हो?! (ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : उन लोगों को पुकारो, जिन्हें तुमने अल्लाह के बराबर बना रखा है, फिर तुम मुझे नुक़सान पहुँचाने का उपाय करो और मुझे कोई मोहलत न दो।
आयत 196
إِنَّ وَلِـِّۧىَ ٱللَّهُ ٱلَّذِى نَزَّلَ ٱلْكِتَـٰبَ ۖ وَهُوَ يَتَوَلَّى ٱلصَّـٰلِحِينَ
إِنَّ
बेशक
وَلِـِّۧىَ
मेरा दोस्त
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ٱلَّذِى
जिसने
نَزَّلَ
नाज़िल की है
ٱلْكِتَـٰبَ ۖ
किताब
وَهُوَ
और वो ही
يَتَوَلَّى
दोस्त रखता है
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेहीन को
निश्चय ही मेरा संरक्षक मित्र अल्लाह है, जिसने यह किताब उतारी और वह अच्छे लोगों का संरक्षण करता है
तफ़्सीर:
वास्तव में, मेरा मददगार और सहायक अल्लाह है, जो मेरा संरक्षण करता है। अतः मैं उसके अलावा किसी और से आशा नहीं रखता, और मुझे तुम्हारी मूर्तियों से कुछ भी डर नहीं है। क्योंकि वही (अल्लाह) है जिसने मुझपर क़ुरआन को लोगों के मार्गदर्शन के लिए उतारा है और वही अपने सत्कर्मी बंदों के सारे काम संभालता है। चुनाँचे उनका संरक्षण करता और उनकी सहायता करता है।
आयत 197
وَٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَآ أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
from
دُونِهِۦ
उसके सिवा
لَا
not
يَسْتَطِيعُونَ
नहीं वो इस्तिताअत रखते
نَصْرَكُمْ
तुम्हारी मदद की
وَلَآ
और ना
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों की
يَنصُرُونَ
वो मदद कर सकते हैं
रहे वे जिन्हें तुम उसको छोड़कर पुकारते हो, वे तो तुम्हारी, सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है
तफ़्सीर:
और इन मूर्तियों में से जिन्हें (ऐ मुश्रिको!) तुम पुकारते हो, वे न तुम्हारी सहायता करने में सक्षम हैं, और न ही वे स्वयं का समर्थन करने में सक्षम हैं। क्योंकि वे असहाय हैं। तो फिर तुम अल्लाह को छोड़कर उन्हें कैसे पुकारते हो?!
आयत 198
وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى ٱلْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا۟ ۖ وَتَرَىٰهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
وَإِن
और अगर
تَدْعُوهُمْ
तुम पुकारो उन्हें
إِلَى
to
ٱلْهُدَىٰ
तरफ़ हिदायत के
لَا
not
يَسْمَعُوا۟ ۖ
नहीं वो सुनेंगे
وَتَرَىٰهُمْ
और आप देखेंगे उन्हें
يَنظُرُونَ
कि वो देख रहे हैं
إِلَيْكَ
तरफ़ आप के
وَهُمْ
हालाँकि वो
لَا
not
يُبْصِرُونَ
नहीं वो देख रहे
और यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे न सुनेंगे। वे तुम्हें ऐसे दीख पड़ते हैं जैसे वे तुम्हारी ओर ताक रहे हैं, हालाँकि वे कुछ भी नहीं देखते
तफ़्सीर:
और (ऐ मुश्रिको!) यदि तुम अपनी मूर्तियों को, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो, सीधी राह की ओर बुलाओ, तो वे तुम्हारे बुलावे को नहीं सुनेंगी। और तुम उन्हें देखोगे कि वे तुम्हारी ओर तुम्हारी ही बनाई हुई आँखों से देख रही हैं, हालाँकि वे निर्जीव चीज़ें हैं, जो नहीं देखती हैं। दरअसल मुश्रिक लोग मनुष्यों या जानवरों के रूप में मूर्तियाँ बनाते थे, जिनके हाथ, पैर और आँखें होती थीं। लेकिन वे बेजान होती थीं, न उनके अंदर जीवन होता था न हरकत।
आयत 199
خُذِ ٱلْعَفْوَ وَأْمُرْ بِٱلْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ ٱلْجَـٰهِلِينَ
خُذِ
इख़्तियार कीजिए
ٱلْعَفْوَ
दरगुज़र को
وَأْمُرْ
और हुक्म दीजिए
بِٱلْعُرْفِ
नेकी का
وَأَعْرِضْ
और ऐराज़ कीजिए
عَنِ
from
ٱلْجَـٰهِلِينَ
जाहिलों से
क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप लोगों के उन कार्यों और व्यवहारों को स्वीकार करें, जो वे खुशी मन से करें और जो उनके लिए आसान हों। उनपर ऐसे कार्य और व्यवहार का बोझ न डालें जिनकी उनके स्वभाव अनुमति नहीं देते हैं। क्योंकि यह उन्हें आपसे दूर करने का कारण बनेगा। और आप हर सुंदर बात तथा अच्छे कार्य का आदेश दें और अज्ञानी लोगों से उपेक्षा करें। इसलिए उनकी अज्ञानता का जवाब अज्ञानता से न दें। चुनाँचे जो आपको कष्ट दे, आप उसे कष्ट न दें और जो आपको वंचित करे, आप उसे वंचित न करें।
आयत 200
وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ نَزْغٌۭ فَٱسْتَعِذْ بِٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
وَإِمَّا
और अगर
يَنزَغَنَّكَ
वसवसा आए आपको
مِنَ
from
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की तरफ़ से
نَزْغٌۭ
कोई वसवसा
فَٱسْتَعِذْ
पस पनाह तलब कीजिए
بِٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आप महसूस करें कि शैतान आपके दिल में कोई ग़लत ख़याल डाल रहा है या आपको सत्कर्म से रोकने का प्रयास करता है, तो अल्लाह का शरण लें और उसे मज़बूती से पकड़ लें। क्योंकि वह आपकी बात को सुनने वाला और आपके शरण लेने को जानने वाला है। अतः वह शैतान से आपकी रक्षा करेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शिर्क की बेबुनियादी और माफी-दरगुज़र की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गुस्से और तकरार की बजाय दरगुज़र और माफी का रवैया रिश्तों को बेहतर बनाता है।
आयत 201
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ إِذَا مَسَّهُمْ طَـٰٓئِفٌۭ مِّنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ تَذَكَّرُوا۟ فَإِذَا هُم مُّبْصِرُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱتَّقَوْا۟
तक़वा किया
إِذَا
जब
مَسَّهُمْ
छू जाता है उन्हें
طَـٰٓئِفٌۭ
कोई ख़्याल
مِّنَ
from
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की तरफ़ से
تَذَكَّرُوا۟
तो वो चौंक पड़ते हैं
فَإِذَا
फिर यकायक
هُم
वो
مُّبْصِرُونَ
देखने लगते हैं
जो डर रखते हैं, उन्हें जब शैतान की ओर से कोई ख़याल छू जाता है, तो वे चौंक उठते हैं। फिर वे साफ़ देखने लगते हैं
तफ़्सीर:
वास्तव में, जो लोग अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से दूर रहकर, डरते हैं, जब वे शैतान की ओर से किसी बुरे ख़याल से पीड़ित होकर गुनाह कर बैठते हैं; तो वे अल्लाह की महानता, अवज्ञाकारियों के लिए उसकी सज़ा और आज्ञाकारियों के लिए उसके प्रतिफल को याद करते हैं। इसलिए वे अपने गुनाहों से तौबा करके अपने पालनहार की ओर लौट जाते हैं। फिर क्या देखते हैं कि वे सत्य मार्ग पर जम गए, ग़फ़लत से जाग गए और गुनाह से बाज़ आ गए।
आयत 202
وَإِخْوَٰنُهُمْ يَمُدُّونَهُمْ فِى ٱلْغَىِّ ثُمَّ لَا يُقْصِرُونَ
وَإِخْوَٰنُهُمْ
और भाई उन (शैतानों) के
يَمُدُّونَهُمْ
वो खींचते हैं उन्हें
فِى
in
ٱلْغَىِّ
गुमराही में
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُقْصِرُونَ
नहीं वो कमी करते
और उन (शैतानों) के भाई उन्हें गुमराही में खींचे लिए जाते हैं, फिर वे कोई कमी नहीं करते
तफ़्सीर:
दुराचारियों और काफ़िरों जैसे शैतान के भाइयों को, शैतान एक के बाद एक पाप में लिप्त करके उन्हें गुमराही में बढ़ाते जाते हैं। वे रुकने का नाम ही नहीं लेते, न शैतान बहकाने और गुमराह करने से और न ही दुराचारी लोग उनकी बात मानने और बुराई करने से।
आयत 203
وَإِذَا لَمْ تَأْتِهِم بِـَٔايَةٍۢ قَالُوا۟ لَوْلَا ٱجْتَبَيْتَهَا ۚ قُلْ إِنَّمَآ أَتَّبِعُ مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ مِن رَّبِّى ۚ هَـٰذَا بَصَآئِرُ مِن رَّبِّكُمْ وَهُدًۭى وَرَحْمَةٌۭ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
وَإِذَا
और जब
لَمْ
नहीं
تَأْتِهِم
आप लाते उनके पास
بِـَٔايَةٍۢ
कोई निशानी
قَالُوا۟
वो कहते हैं
لَوْلَا
क्यों ना
ٱجْتَبَيْتَهَا ۚ
चुन लाया तू उसे
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَتَّبِعُ
मैं पैरवी करता हूँ
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ
तरफ़ मेरे
مِن
from
رَّبِّى ۚ
मेरे रब की तरफ़ से
هَـٰذَا
ये
بَصَآئِرُ
बसीरत की बातें हैं
مِن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
और जब तुम उनके सामने कोई निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं, "तुम स्वयं कोई निशानी क्यों न छाँट लाए?" कह दो, "मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ जो मेरे रब की ओर से प्रकाशना की जाती है। यह तुम्हारे रब की ओर से अन्तर्दृष्टियों का प्रकाश-पुंज है, और ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है।"
तफ़्सीर:
जब (ऐ रसूल!) आप कोई आयत (निशानी) लाएँ, तो वे आपको झुठला देते हैं और उससे मुँह फेर लेते हैं। और अगर आप उनके पास कोई आयत न लाएँ, तो वे कहते हैं : आपने अपनी ओर से कोई आयत क्यों न गढ़ ली? आप (ऐ रसूल!) ऐसे लोगों से कह दें : मुझे यह अधिकार नहीं कि मैं अपनी ओर से कोई आयत ले आऊँ। मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो अल्लाह मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) करता है। यह क़ुरआन जो मैं तुम्हारे सामने पढ़ता हूँ, अल्लाह की ओर से, जो तुम्हारा रचयिता और तुम्हारे सब काम संभालने वाला है, प्रमाण और दलील है, तथा उसके मोमिन बंदों के लिए मार्गदर्शन और दया है। रही बात ग़ैर मोमिनों की, तो वे गुमराह और दुर्भाग्य वाले लोग हैं।
आयत 204
وَإِذَا قُرِئَ ٱلْقُرْءَانُ فَٱسْتَمِعُوا۟ لَهُۥ وَأَنصِتُوا۟ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَإِذَا
और जब
قُرِئَ
पढ़ा जाए
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरआन
فَٱسْتَمِعُوا۟
पस ग़ौर से सुनो
لَهُۥ
उसे
وَأَنصِتُوا۟
और ख़ामोश रहो
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो, ताकि तुमपर दया की जाए
तफ़्सीर:
और जब क़ुरआन पढ़ा जाए, तो उसकी तिलावत को ध्यानपूर्वक सुनो तथा न बात करो और न किसी अन्य काम में व्यस्त हो, उम्मीद है अल्लाह तुमपर दया करे।
आयत 205
وَٱذْكُر رَّبَّكَ فِى نَفْسِكَ تَضَرُّعًۭا وَخِيفَةًۭ وَدُونَ ٱلْجَهْرِ مِنَ ٱلْقَوْلِ بِٱلْغُدُوِّ وَٱلْـَٔاصَالِ وَلَا تَكُن مِّنَ ٱلْغَـٰفِلِينَ
وَٱذْكُر
और ज़िक्र कीजिए
رَّبَّكَ
अपने रब का
فِى
in
نَفْسِكَ
अपने दिल में
تَضَرُّعًۭا
आजिज़ी
وَخِيفَةًۭ
और ख़ौफ़ से
وَدُونَ
और बग़ैर
ٱلْجَهْرِ
बुलन्द
مِنَ
of
ٱلْقَوْلِ
आवाज़ के
بِٱلْغُدُوِّ
सुबह के वक़्त
وَٱلْـَٔاصَالِ
और शाम के वक़्त
وَلَا
और ना
تَكُن
हों आप
مِّنَ
among
ٱلْغَـٰفِلِينَ
ग़ाफ़िलों में से
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
और (ऐ नबी!) अल्लाह को, जो आपका पालनहार है, विनयपूर्वक और डरते हुए याद करें, और दुआ के समय अपनी आवाज़ मध्यम रखें, न बहुत ऊँची, न बहुत नीची, दिन के प्रथम और उसके अंतिम भाग में। क्योंकि इन दोनों समय की बड़ी फ़ज़ीलत है। और आप उन लोगों में से न हों, जो अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल रहते हैं।
आयत 206
إِنَّ ٱلَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَيُسَبِّحُونَهُۥ وَلَهُۥ يَسْجُدُونَ ۩
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो (फ़रिश्ते ) जो
عِندَ
(are) near
رَبِّكَ
आपके रब के पास हैं
لَا
not
يَسْتَكْبِرُونَ
नहीं वो तकब्बुर करते
عَنْ
from
عِبَادَتِهِۦ
उसकी इबादत से
وَيُسَبِّحُونَهُۥ
और वो तस्बीह करते हैं उसकी
وَلَهُۥ
और उसी को
يَسْجُدُونَ ۩
वो सजदा करते हैं
निस्संदेह जो तुम्हारे रब के पास है, वे उसकी बन्दगी के मुक़ाबले में अहंकार की नीति नहीं अपनाते; वे तो उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और उसी को सजदा करते है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो फ़रिश्ते (ऐ रसूल!) आपके पालनहार के पास हैं, वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नहीं करते, बल्कि उसके आज्ञापालन में समर्पित रहते हैं, उससे थकते नहीं हैं। तथा वे दिन-रात अल्लाह को उन बातों से पवित्र ठहराते रहते हैं, जो उसके लायक़ नहीं हैं और केवल उसी के आगे सजदा करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शैतान के वसवसों से बचाव और सजदे की अहमियत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि वसवसा आते ही अल्लाह को याद करना और सजदे में झुकना सुकून का ज़रिया है।
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