नाम का मतलब
ऊंचाई की सीढ़ियां (अल्लाह के आसमानों की तरफ चढ़ने की सीढ़ियों के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मआरिज में कयामत के दिन के अज़ाब और इंसान की बेसब्री की फितरत का ज़िक्र है, साथ ही कामयाब नमाज़ियों की सिफात भी बयान हुई हैं।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में नमाज़ी की कामयाब सिफात का तफ्सीली ज़िक्र है, जो एक अच्छे मुसलमान के किरदार की बेहतरीन मिसाल है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍۢ وَاقِعٍۢ
سَأَلَ
सवाल किया
سَآئِلٌۢ
सवाल करने वाले ने
بِعَذَابٍۢ
उस अज़ाब का
وَاقِعٍۢ
जो वाक़ेअ होने वाला है
एक माँगनेवाले ने घटित होनेवाली यातना माँगी,
तफ़्सीर:
मुश्रिकों में से एक व्यक्ति ने खुद पर और अपनी जाति के लोगों पर यातना का आह्वान किया, यदि वह यातना आने वाली है। यह उसने उपहास के तौर पर किया, हालाँकि वह क़ियामत के दिन घटित होने वाली है।
आयत 2
لِّلْكَـٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌۭ
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
لَيْسَ
नहीं है
لَهُۥ
उसे
دَافِعٌۭ
कोई दफ़ा करने वाला
जो इनकार करनेवालो के लिए होगी, उसे कोई टालनेवाला नहीं,
तफ़्सीर:
(वह यातना) अल्लाह का इनकार करने वालों पर आने वाली है। इस यातना को कोई टाल नहीं सकता।
आयत 3
مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ
مِّنَ
From
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
ذِى
Owner
ٱلْمَعَارِجِ
जो उरूज वाला है
वह अल्लाह की ओर से होगी, जो चढ़ाव के सोपानों का स्वामी है
तफ़्सीर:
अल्लाह की ओर से, जो ऊँचाइयों वाला, दर्जों वाला, अनुग्रहों और नेमतों वाला है।
आयत 4
تَعْرُجُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍۢ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍۢ
تَعْرُجُ
चढ़ते हैं
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
وَٱلرُّوحُ
और रूह
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
فِى
in
يَوْمٍۢ
एक दिन में
كَانَ
है
مِقْدَارُهُۥ
मिक़दार जिसकी
خَمْسِينَ
पचास
أَلْفَ
हज़ार
سَنَةٍۢ
साल
फ़रिश्ते और रूह (जिबरील) उसकी ओर चढ़ते है, उस दिन में जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष है
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते और जिबरील (अलैहिस्सलाम) क़ियामत के दिन उन सीढ़ियों के माध्यम से उसकी ओर चढ़ेंगे, और यह एक लंबा दिन है जिसकी मात्रा पचास हज़ार साल है।
आयत 5
فَٱصْبِرْ صَبْرًۭا جَمِيلًا
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
صَبْرًۭا
सब्र
جَمِيلًا
जमील/ ख़ूबसूरत
अतः धैर्य से काम लो, उत्तम धैर्य
तफ़्सीर:
अतः (ऐ नबी) आप ऐसा धैर्य रखें, जिसमें न बेचैनी (घबराहट) हो और न शिकायत के शब्द मुँह से निकालें।
आयत 6
إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًۭا
إِنَّهُمْ
बेशक वो
يَرَوْنَهُۥ
वो देखते हैं उसे
بَعِيدًۭا
बहुत दूर
वे उसे बहुत दूर देख रहे है,
तफ़्सीर:
वे लोग इस यातना को दूर तथा असंभव समझ रहे हैं।
आयत 7
وَنَرَىٰهُ قَرِيبًۭا
وَنَرَىٰهُ
और हम देखते हैं उसे
قَرِيبًۭا
बहुत क़रीब
किन्तु हम उसे निकट देख रहे है
तफ़्सीर:
और हम उसे निश्चित रूप से निकट ही घटित होने वाली समझते हैं।
आयत 8
يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ
يَوْمَ
जिस दिन
تَكُونُ
होगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
كَٱلْمُهْلِ
तेल की तलछट की तरह
जिस दिन आकाश तेल की तलछट जैसा काला हो जाएगा,
तफ़्सीर:
जिस दिन आकाश पिघले हुए तांबे और सोने आदि के जैसा हो जाएगा।
आयत 9
وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ
وَتَكُونُ
और होंगे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
كَٱلْعِهْنِ
धुनकी हुई रूई की तरह
और पर्वत रंग-बिरंगे ऊन के सदृश हो जाएँगे
तफ़्सीर:
और पहाड़ ऊन की तरह हल्के हो जाएँगे।
आयत 10
وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًۭا
وَلَا
और ना
يَسْـَٔلُ
पूछेगा
حَمِيمٌ
कोई गहरा दोस्त
حَمِيمًۭا
किसी गहरे दोस्त को
कोई मित्र किसी मित्र को न पूछेगा,
तफ़्सीर:
और कोई निकट संबंधी अपने निकट संबंधी का हाल नहीं पूछेगा, क्योंकि हर कोई अपने आप में व्यस्त होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अज़ाब की जल्दी मांगने वालों को जवाब और कयामत के दिन की लंबाई का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह से अज़ाब जल्दी मांगने की बजाय सब्र और तौबा का रास्ता अपनाना चाहिए।
आयत 11
يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ
يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ
वो दिखाए जाऐंगे उन्हें
يَوَدُّ
चाहेगा
ٱلْمُجْرِمُ
मुजरिम
لَوْ
काश
يَفْتَدِى
वो फ़िदये में दे दे
مِنْ
from
عَذَابِ
अज़ाब से (बचने के लिए)
يَوْمِئِذٍۭ
उस दिन के
بِبَنِيهِ
अपने बेटों को
हालाँकि वे एक-दूसरे को दिखाए जाएँगे। अपराधी चाहेगा कि किसी प्रकार वह उस दिन की यातना से छूटने के लिए अपने बेटों,
तफ़्सीर:
प्रत्येक व्यक्ति अपने निकट के संबंधी को देख रहा होगा, वह उससे छिपा नहीं होगा। फिर भी, उस स्थिति की भयावहता के कारण, कोई किसी को नहीं पूछेगा। तथा वह व्यक्ति जो जहन्नम का हक़दार बन गया होगा, यह चाहेगा कि अपने बजाय अपने बच्चों को यातना के लिए पेश कर दे।
आयत 12
وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ
وَصَـٰحِبَتِهِۦ
और अपनी बीवी को
وَأَخِيهِ
और अपने भाई को
अपनी पत्नी , अपने भाई
तफ़्सीर:
और वह अपनी पत्नी तथा अपने भाई को छुड़ौती के रूप में प्रस्तुत कर दे।
आयत 13
وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ
وَفَصِيلَتِهِ
और अपने कुनबे को
ٱلَّتِى
वो जो
تُـْٔوِيهِ
वो पनाह देता था उसे
और अपने उस परिवार को जो उसको आश्रय देता है,
तफ़्सीर:
और अपने सबसे क़रीबी परिवार वालों को छुड़ौती के रूप में प्रस्तुत कर दे, जो कठिन परिस्थितियों में उसके साथ खड़े होते थे।
आयत 14
وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا ثُمَّ يُنجِيهِ
وَمَن
और जो
فِى
(is) on
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
جَمِيعًۭا
सब के सब को
ثُمَّ
फिर
يُنجِيهِ
वो निजात दिला दे उसे
और उन सभी लोगों को जो धरती में रहते है, फ़िदया (मुक्ति-प्रतिदान) के रूप में दे डाले फिर वह उसको छुटकारा दिला दे
तफ़्सीर:
और धरती पर मौजूद मनुष्य, जिन्न और अन्य सहित सभी को छुड़ौती के रूप में दे दे। फिर यह फ़िदया देना उसे जहन्नम की यातना से बचा ले।
आयत 15
كَلَّآ ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ
كَلَّآ ۖ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهَا
बेशक वो
لَظَىٰ
शोले वाली आग है
कदापि नहीं! वह लपट मारती हुई आग है,
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा कि इस अपराधी ने कामना की है। निश्चय वह आख़िरत की आग है, जो भड़क रही है और लपट मार रही है।
आयत 16
نَزَّاعَةًۭ لِّلشَّوَىٰ
نَزَّاعَةًۭ
खींचने वाली है
لِّلشَّوَىٰ
मुँह की खाल को
जो मांस और त्वचा को चाट जाएगी,
तफ़्सीर:
जो अपनी गर्मी और प्रज्वलन की तीव्रता से गंभीर रूप से सिर की खाल उधेड़ देगी।
आयत 17
تَدْعُوا۟ مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ
تَدْعُوا۟
वो पुकारेगी
مَنْ
उसे जिसने
أَدْبَرَ
पीठ फेरी
وَتَوَلَّىٰ
और उसने मुँह मोड़ा
उस व्यक्ति को बुलाती है जिसने पीठ फेरी और मुँह मोड़ा,
तफ़्सीर:
वह उस व्यक्ति को पुकारेगी, जिसने सत्य से मुँह मोड़ा और उससे दूर भागा, न उसपर ईमान लाया और न उसपर अमल किया।
आयत 18
وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ
وَجَمَعَ
और उसने जमा किया
فَأَوْعَىٰٓ
फिर उसने समेट कर रखा
और (धन) एकत्र किया और सैंत कर रखा
तफ़्सीर:
और उसने धन जमा किया और उसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करने में कंजूसी की।
आयत 19
۞ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا
۞ إِنَّ
बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
خُلِقَ
वो पैदा किया गया
هَلُوعًا
थुड़दिला
निस्संदेह मनुष्य अधीर पैदा हुआ है
तफ़्सीर:
निश्चय इनसान सख़्त लालची पैदा किया गया है।
आयत 20
إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًۭا
إِذَا
जब
مَسَّهُ
पहुँचती है उसे
ٱلشَّرُّ
तक्लीफ़
جَزُوعًۭا
बहुत जज़ा-फ़ज़ा करने वाला है
जि उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो घबरा उठता है,
तफ़्सीर:
जब वह बीमारी या गरीबी जैसी किसी तकलीफ से पीड़ित होता है, तो अधीर हो जाता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की बेसब्री और कंजूसी की फितरत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इंसान फितरी तौर पर बेसब्र और कंजूस है, इस कमज़ोरी पर काबू पाने के लिए मेहनत करनी चाहिए।
आयत 21
وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا
وَإِذَا
और जब
مَسَّهُ
पहुँचती है उसे
ٱلْخَيْرُ
भलाई
مَنُوعًا
बहुत रोकने वाला है
किन्तु जब उसे सम्पन्नता प्राप्त होती ही तो वह कृपणता दिखाता है
तफ़्सीर:
और जब उसे उर्वरता और मालदारी जैसी कोई खुशी देने वाली चीज़ मिलती है, तो वह उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च करने से बहुत ज़्यादा रोकने वाला होता है।
आयत 22
إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ
إِلَّا
सिवाए
ٱلْمُصَلِّينَ
नमाज़ियों के
किन्तु नमाज़ अदा करनेवालों की बात और है,
तफ़्सीर:
सिवाय उन बंदों के जो नमाज़ अदा करने वाले हैं। चुनाँचे वे इन निंदनीय विशेषताओं से सुरक्षित हैं।
आयत 23
ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
هُمْ
वो
عَلَىٰ
at
صَلَاتِهِمْ
अपनी नमाज़ों पर
دَآئِمُونَ
दवाम /हमेशगी इख़्तियार करने वाले हैं
जो अपनी नमाज़ पर सदैव जमें रहते है,
तफ़्सीर:
जो हमेशा अपनी नमाज़ की पाबंदी करते हैं। वे कभी उससे ग़ाफ़िल नहीं होते तथा सदा उसे उसके निर्दिष्ट समय पर अदा करते हैं।
आयत 24
وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّۭ مَّعْلُومٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
فِىٓ
in
أَمْوَٰلِهِمْ
मालों में उनके
حَقٌّۭ
हक़ है
مَّعْلُومٌۭ
मालूम/ मुक़र्रर
और जिनके मालों में
तफ़्सीर:
और जिन लोगों के धनों में एक अनिवार्य निर्धारित हिस्सा है।
आयत 25
لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
لِّلسَّآئِلِ
वास्ते सवाली
وَٱلْمَحْرُومِ
और महरूम के
माँगनेवालों और वंचित का एक ज्ञात और निश्चित हक़ होता है,
तफ़्सीर:
वे उसे उस व्यक्ति को देते हैं, जो उनसे माँगता है तथा उस व्यक्ति को देते हैं, जो उनसे नहीं माँगता है, जो किसी कारण से अपनी आजीविका से वंचित है।
आयत 26
وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُصَدِّقُونَ
तस्दीक़ करते हैं
بِيَوْمِ
दिन की
ٱلدِّينِ
बदले के
जो बदले के दिन को सत्य मानते है,
तफ़्सीर:
और जो क़ियामत के दिन को सत्य मानते हैं, जिस दिन अल्लाह हर एक को वह बदला देगा, जिसका वह हक़दार है।
आयत 27
وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُم
वो
مِّنْ
of
عَذَابِ
अज़ाब से
رَبِّهِم
अपने रब के
مُّشْفِقُونَ
डरने वाले हैं
जो अपने रब की यातना से डरते है -
तफ़्सीर:
और जो अपने पालनहार की यातना से डरने वाले हैं, जबकि वे नेकी के काम किए हुए होते हैं।
आयत 28
إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍۢ
إِنَّ
बेशक
عَذَابَ
अज़ाब
رَبِّهِمْ
उनके रब का
غَيْرُ
नहीं है
مَأْمُونٍۢ
बेख़ौफ़ होने की चीज़
उनके रब की यातना है ही ऐसी जिससे निश्चिन्त न रहा जाए -
तफ़्सीर:
निश्चय उनके पालनहार की यातना डरने की चीज़ है, जिससे कोई समझदार व्यक्ति निश्चिंत नहीं हो सकता।
आयत 29
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
لِفُرُوجِهِمْ
अपनी शर्मगाहों की
حَـٰفِظُونَ
हिफ़ाज़त करने वाले हैं
जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है।
तफ़्सीर:
और जो अपने गुप्तांगों की, उन्हें ढंक कर और उन्हें अनैतिक आचरण से दूर रखकर, रक्षा करते हैं।
आयत 30
إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
إِلَّا
सिवाए
عَلَىٰٓ
from
أَزْوَٰجِهِمْ
अपनी बीवियों के
أَوْ
या
مَا
जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُهُمْ
दाऐं हाथ उनके
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
غَيْرُ
नहीं
مَلُومِينَ
मलामत किए जाने वाले
अपनी पत्नि यों या जो उनकी मिल्क में हो उनके अतिरिक्त दूसरों से तो इस बात पर उनकी कोई भर्त्सना नही। -
तफ़्सीर:
सिवाय अपनी पत्नियों और अपने स्वामित्व में आई हुई दासियों के। क्योंकि उनसे संभोग आदि से लाभ उठाने में उनपर कोई दोष नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कामयाब नमाज़ियों की सिफात (मांगने वाले और महरूम का हक अदा करना, आखिरत का डर) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अपने माल में गरीबों और सवाल करने वालों का हक निकालना कामयाब मोमिन की निशानी है।
आयत 31
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
فَمَنِ
फिर जो कोई
ٱبْتَغَىٰ
तलाश करे
وَرَآءَ
अलावा
ذَٰلِكَ
उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْعَادُونَ
जो हद से बढ़ने वाले हैं
किन्तु जिस किसी ने इसके अतिरिक्त कुछ और चाहा तो ऐसे ही लोग सीमा का उल्लंघन करनेवाले है।-
तफ़्सीर:
फिर जो उपर्युक्त पत्नियों और दासियों के अलावा से आनंद तलाश करे, तो वही लोग अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं।
आयत 32
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ
अपनी अमानतों की
وَعَهْدِهِمْ
और अपने वादों की
رَٰعُونَ
निगरानी करने वाले हैं
जो अपने पास रखी गई अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करते है,
तफ़्सीर:
और जो लोग अपने पास अमानत रखे हुए धनों और भेदों आदि की तथा लोगों से की हुई अपनी प्रतिज्ञाओं की रक्षा करने वाले हैं। न तो उनकी अमानतों में ख़यानत करते हैं और न उनकी प्रतिज्ञाओं को तोड़ते हैं।
आयत 33
وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَـٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُم
वो
بِشَهَـٰدَٰتِهِمْ
अपनी गवाहियों पर
قَآئِمُونَ
क़ायम रहने वाले हैं
जो अपनी गवाहियों पर क़़ायम रहते है,
तफ़्सीर:
और जो लोग अपेक्षित तरीक़े से अपनी गवाही देते हैं। न तो रिश्तेदारी और न ही दुश्मनी उनकी गवाही को प्रभावित करती है।
आयत 34
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
عَلَىٰ
on
صَلَاتِهِمْ
अपनी नमाज़ों की
يُحَافِظُونَ
वो हिफ़ाज़त करते हैं
और जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते है
तफ़्सीर:
और जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते हैं; पवित्रता और हृदय शांति के साथ तथा उसके समय पर उसकी अदायगी करके। कोई चीज़ उन्हें नमाज़ से ग़ाफ़िल नहीं होने देती।
आयत 35
أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى جَنَّـٰتٍۢ مُّكْرَمُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
فِى
(will be) in
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ों में
مُّكْرَمُونَ
इज़्ज़त दिए जाने वाले
वही लोग जन्नतों में सम्मानपूर्वक रहेंगे
तफ़्सीर:
जो लोग इन गुणों से विशिष्ट हैं, वे जन्नतों में सम्मानित हों। क्योंकि उन्हें स्थायी नेमतों का आनंद और अल्लाह के चेहरे के दीदार का सौभाग्य प्राप्त होगा।
आयत 36
فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ
فَمَالِ
तो क्या है
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
قِبَلَكَ
आपकी तरफ़
مُهْطِعِينَ
दौड़ते चले आने वाले हैं
फिर उन इनकार करनेवालो को क्या हुआ है कि वे तुम्हारी ओर दौड़े चले आ रहे है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपकी जाति के इन मुश्रिकों को किस चीज़ ने आकर्षित किया कि वे आपके चारों ओर आपको झुठलाने के लिए दौड़े चले आ रहे हैं?!
आयत 37
عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ
عَنِ
On
ٱلْيَمِينِ
दाऐं तरफ़ से
وَعَنِ
and on
ٱلشِّمَالِ
और बाऐं तरफ़ से
عِزِينَ
गिरोह दर गिरोह
दाएँ और बाएँ से गिरोह के गिरोह
तफ़्सीर:
वे आपको समूहों में आपके दाहिने और बाएँ तरफ से घेरे हुए हैं।
आयत 38
أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍۢ
أَيَطْمَعُ
क्या तमाअ रखता है
كُلُّ
हर
ٱمْرِئٍۢ
शख़्स
مِّنْهُمْ
उन में से
أَن
कि
يُدْخَلَ
वो दाख़िल किया जाएगा
جَنَّةَ
जन्नत में
نَعِيمٍۢ
नेअमतों वाली
क्या उनमें से प्रत्येक व्यक्ति इसकी लालसा रखता है कि वह अनुकम्पा से परिपूर्ण जन्नत में प्रविष्ट हो?
तफ़्सीर:
क्या उनमें से हर आदमी यह आशा रखता है कि अल्लाह उसे नेमतों वाली जन्नत में दाख़िल करेगा, जिसमें वह उसकी सदाबहार नेमतों का आनंद लेगा, जबकि वह अपने कुफ़्र पर क़ायम है?!
आयत 39
كَلَّآ ۖ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ
كَلَّآ ۖ
हरगिज़ नहीं
إِنَّا
बेशक हम
خَلَقْنَـٰهُم
पैदा किया हमने उन्हें
مِّمَّا
उससे जिसे
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
कदापि नहीं, हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया है, जिसे वे भली-भाँति जानते है
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा कि उन्होंने कल्पना की है। निश्चय हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया है, जिसे वे जानते हैं। हमने उन्हें एक तुच्छ पानी से पैदा किया है। अतः वे कमज़ोर हैं, अपने लिए लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं। फिर उन्हें अभिमान कैसे शोभा देता है?!
आयत 40
فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَـٰرِقِ وَٱلْمَغَـٰرِبِ إِنَّا لَقَـٰدِرُونَ
فَلَآ
पस नहीं
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
بِرَبِّ
रब की
ٱلْمَشَـٰرِقِ
मशरिक़ों के
وَٱلْمَغَـٰرِبِ
और मग़रिबों के
إِنَّا
बेशक हम
لَقَـٰدِرُونَ
अलबत्ता क़ादिर हैं
अतः कुछ नहीं, मैं क़सम खाता हूँ पूर्वों और पश्चिमों के रब की, हमे इसकी सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
अल्लाह सर्वशक्तिमान ने स्वयं अपनी क़सम खाई है, और वह सूर्य, चंद्रमा और शेष सभी ग्रहों के उदय एवं यास्त के स्थानों का स्वामी है, कि निःसंदेह हम निश्चय सामर्थ्यवान् हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पाकदामनी, अमानतदारी और गवाही की सिफात का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अमानतदारी और सच्ची गवाही देना असली ईमान वालों की पहचान है।
आयत 41
عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًۭا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
عَلَىٰٓ
उस पर
أَن
कि
نُّبَدِّلَ
हम बदल दें
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهُمْ
उनसे
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِمَسْبُوقِينَ
नाकाम होने वाले
कि उनकी उनसे अच्छे ले आएँ और हम पिछड़ जानेवाले नहीं है
तफ़्सीर:
कि उन्हें नष्ट करके उनके बदले में ऐसे लोगों को ले आएँ, जो अल्लाह का आज्ञापालन करने वाले हों। हम ऐसा करने में असमर्थ नहीं हैं, तथा जब भी हम उन्हें नष्ट करना चाहें और उन्हें दूसरों के साथ बदलना चाहें, तो हम ऐसा करने में विवश नहीं हैं।
आयत 42
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
فَذَرْهُمْ
तो छोड़ दीजिए उन्हें
يَخُوضُوا۟
वो बहस मुबाहिसा करें
وَيَلْعَبُوا۟
और वो खेलते रहें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُلَـٰقُوا۟
वो जा मिलें
يَوْمَهُمُ
अपने उस दिन से
ٱلَّذِى
वो जो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
अतः उन्हें छोड़ो कि वे व्यर्थ बातों में पड़े रहें और खेलते रहे, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन से मिलें, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है,
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें छोड़ दें कि वे अपने झूठ और गुमराही में पड़े रहें तथा अपने सांसारिक जीवन में खेलते रहें, यहाँ तक कि वे क़ियामत के दिन से जा मिलें, जिसका उनसे क़ुरआन में वादा किया जाता था।
आयत 43
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًۭا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍۢ يُوفِضُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
يَخْرُجُونَ
वो निकलेंगे
مِنَ
from
ٱلْأَجْدَاثِ
क़ब्रों से
سِرَاعًۭا
दौड़ते हुए
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
إِلَىٰ
to
نُصُبٍۢ
तरफ़ आसतानों के
يُوفِضُونَ
वो दौड़ते हैं
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी के साथ निकलेंगे जैसे किसी निशान की ओर दौड़े जा रहे है,
तफ़्सीर:
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ दौड़ते हुए लिकलेंगे, जैसे वे किसी निशान की ओर दौड़े जा रहे हैं।
आयत 44
خَـٰشِعَةً أَبْصَـٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ
خَـٰشِعَةً
झुकी हुई होंगी
أَبْصَـٰرُهُمْ
निगाहें उनकी
تَرْهَقُهُمْ
छा रही होगी उन पर
ذِلَّةٌۭ ۚ
ज़िल्लत
ذَٰلِكَ
ये है
ٱلْيَوْمُ
दिन
ٱلَّذِى
जिसका
كَانُوا۟
थे वो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते
उनकी निगाहें झुकी होंगी, ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। यह है वह दिन जिससे वह डराए जाते रहे है
तफ़्सीर:
उनकी निगाहें झुकी होंगी, उनपर अपमान छाया होगा। यह वही दिन है, जिसका उनसे दुनिया में वादा किया जाता था और वे उसकी परवाह नहीं करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन की हैरत के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कयामत उस दिन आएगी जब लोग गफलत में डूबे होंगे, इसलिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
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