सूरह नूह سورة نوح
मक्की 28 आयतें
नाम का मतलब
नूह अलैहिस्सलाम (उनकी पूरी दावत का किस्सा इस सूरह में है)
पृष्ठभूमि
सूरह नूह में नूह अलैहिस्सलाम की साढ़े नौ सौ साल की लंबी दावत और उनकी कौम के इनकार का तफ्सीली ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह सब्र और मुसलसल दावत की सबसे बड़ी मिसाल पेश करती है, क्योंकि नूह अलैहिस्सलाम ने बरसों तक हिम्मत नहीं हारी।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِنَّآ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦٓ أَنْ أَنذِرْ قَوْمَكَ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
نُوحًا
नूह को
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦٓ
तरफ़ उसकी क़ौम के
أَنْ
कि
أَنذِرْ
डराओ
قَوْمَكَ
अपनी क़ौम को
مِن
from
قَبْلِ
इससे क़ब्ल
أَن
कि
يَأْتِيَهُمْ
आए उनके पास
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
हमने नूह को उसकी कौ़म की ओर भेजा कि "अपनी क़ौम के लोगों को सावधान कर दो, इससे पहले कि उनपर कोई दुखद यातना आ जाए।"
तफ़्सीर:
हमने नूह (अलैहिस्सलाम) को उनकी जाति के पास लोगों को अल्लाह की ओर आमंत्रित करने के लिए भेजा, ताकि वह अपने समुदाय के लोगों को डराएँ, इससे पहले कि उनके अल्लाह के साथ शिर्क करने के कारण, उनपर दर्दनाक यातना आ जाए।
आयत 2
قَالَ يَـٰقَوْمِ إِنِّى لَكُمْ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेतकर्ता हूँ
तफ़्सीर:
नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी जाति के लोगों से कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से उस यातना से डराने वाला हूँ, जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है यदि तुमने अल्लाह से तौबा न की।
आयत 3
أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱتَّقُوهُ وَأَطِيعُونِ
أَنِ
ये कि
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱتَّقُوهُ
और डरो उससे
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
कि अल्लाह की बन्दगी करो और उसका डर रखो और मेरी आज्ञा मानो।-
तफ़्सीर:
और मेरे तुम्हें डराने की अपेक्षा यह है कि मैं तुमसे कहता हूँ : तुम केवल अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ, तथा उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो और मैं तुम्हें जो कुछ आदेश देता हूँ, उसमें मेरा आज्ञापालन करो।
आयत 4
يَغْفِرْ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرْكُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّى ۚ إِنَّ أَجَلَ ٱللَّهِ إِذَا جَآءَ لَا يُؤَخَّرُ ۖ لَوْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
يَغْفِرْ
वो बख़्श देगा
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
[of]
ذُنُوبِكُمْ
तुम्हारे गुनाहों को
وَيُؤَخِّرْكُمْ
और वो मोहलत देगा तुम्हें
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
एक वक़्त तक
مُّسَمًّى ۚ
जो मुक़र्रर है
إِنَّ
बेशक
أَجَلَ
मुक़र्रर करदा वक़्त
ٱللَّهِ
अल्लाह का
إِذَا
जब
جَآءَ
वो आ जाता है
لَا
not
يُؤَخَّرُ ۖ
तो नहीं मुअख़्ख़र किया जाता
لَوْ
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
"वह तुम्हें क्षमा करके तुम्हारे गुनाहों से तुम्हें पाक कर देगा और एक निश्चित समय तक तुम्हे मुहल्लत देगा। निश्चय ही जब अल्लाह का निश्चित समय आ जाता है तो वह टलता नहीं, काश कि तुम जानते!"
तफ़्सीर:
अगर तुम ऐसा करोगे, तो अल्लाह तुम्हारे उन गुनाहों को क्षमा कर देगा, जो बंदों के अधिकारों से संबंधित नहीं हैं। और तुम्हारे समुदाय की जीवन-अवधि एक निर्धारित समय तक बढ़ा देगा, जो अल्लाह के ज्ञान में है। जब तक तुम इसपर क़ायम रहोगे, धरती को आबाद रखोगे। निश्चय जब मौत आ जाती है, तो टाली नहीं जाती। अगर तुम इस तथ्य को जानते होते, तो अल्लाह पर ईमान लाने और अपने शिर्क और गुमराही से तौबा करने में अवश्य जल्दी करते।
आयत 5
قَالَ رَبِّ إِنِّى دَعَوْتُ قَوْمِى لَيْلًۭا وَنَهَارًۭا
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
دَعَوْتُ
पुकारा मैं ने
قَوْمِى
अपनी क़ौम को
لَيْلًۭا
रात
وَنَهَارًۭا
और दिन
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने अपनी क़ौम के लोगों को रात और दिन बुलाया
तफ़्सीर:
नूह (अलैहिस्सलाम) ने कहा : ऐ मेरे रब! मैं अपनी जाति के लोगों को तेरी इबादत और एकेश्वरवाद की ओर रात और दिन लगातार बुलाता रहा।
आयत 6
فَلَمْ يَزِدْهُمْ دُعَآءِىٓ إِلَّا فِرَارًۭا
فَلَمْ
तो ना
يَزِدْهُمْ
ज़्यादा किया उन्हें
دُعَآءِىٓ
मेरी पुकार ने
إِلَّا
मगर
فِرَارًۭا
फ़रार में
"किन्तु मेरी पुकार ने उनके पलायन को ही बढ़ाया
तफ़्सीर:
परंतु मेरे बुलाने से उनके उस चीज़ से भागने और दूर होने ही में वृद्धि हुई, जिसकी ओर मैं उन्हें बुलाता हूँ।।
आयत 7
وَإِنِّى كُلَّمَا دَعَوْتُهُمْ لِتَغْفِرَ لَهُمْ جَعَلُوٓا۟ أَصَـٰبِعَهُمْ فِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَٱسْتَغْشَوْا۟ ثِيَابَهُمْ وَأَصَرُّوا۟ وَٱسْتَكْبَرُوا۟ ٱسْتِكْبَارًۭا
وَإِنِّى
और बेशक मैं
كُلَّمَا
जब कभी
دَعَوْتُهُمْ
पुकारा मैं ने उन्हें
لِتَغْفِرَ
ताकि तू बख़्श दे
لَهُمْ
उन्हें
جَعَلُوٓا۟
उन्होंने डाल लीं
أَصَـٰبِعَهُمْ
ऊँगलियाँ अपनी
فِىٓ
in
ءَاذَانِهِمْ
अपने कानों में
وَٱسْتَغْشَوْا۟
और उन्होंने ढाँप लिए
ثِيَابَهُمْ
कपड़े अपने
وَأَصَرُّوا۟
और उन्होंने इसरार किया
وَٱسْتَكْبَرُوا۟
और उन्होंने तकब्बुर किया
ٱسْتِكْبَارًۭا
तकब्बुर करना
"और जब भी मैंने उन्हें बुलाया, ताकि तू उन्हें क्षमा कर दे, तो उन्होंने अपने कानों में अपनी उँगलियाँ दे लीं और अपने कपड़ो से स्वयं को ढाँक लिया और अपनी हठ पर अड़ गए और बड़ा ही घमंड किया
तफ़्सीर:
और जब भी मैंने उन्हें उस चीज़ की ओर आमंत्रित किया, जिसमें उनके पापों की क्षमा का कारण है; जैसे कि केवल तेरी इबादत करना तथा तेरा आज्ञापालन और तेरे रसूल का आज्ञापालन करना - तो उन्होंने अपनी उँगलियों से अपने कान बंद कर लिए; ताकि उन्हें मेरी बात सुनने से रोक दें, और अपने चेहरे को अपने कपड़ों से ढँक लिए, ताकि वे मुझे न देखें, तथा अपने शिर्क पर जमे रहे, और जिसकी ओर मैं उन्हें आमंत्रित करता हूँ, उसे स्वीकार करने और उसका पालन करने से अभिमान दिखाया।
आयत 8
ثُمَّ إِنِّى دَعَوْتُهُمْ جِهَارًۭا
ثُمَّ
फिर
إِنِّى
बेशक मैं
دَعَوْتُهُمْ
पुकारा मैं ने उन्हें
جِهَارًۭا
बाआवाज़ बुलन्द
"फिर मैंने उन्हें खुल्लमखुल्ला बुलाया,
तफ़्सीर:
फिर मैंने (ऐ मेरे रब) उन्हें खुले तौर पर आमंत्रित किया।
आयत 9
ثُمَّ إِنِّىٓ أَعْلَنتُ لَهُمْ وَأَسْرَرْتُ لَهُمْ إِسْرَارًۭا
ثُمَّ
फिर
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعْلَنتُ
ऐलानिया कहा मैं ने
لَهُمْ
उन्हें
وَأَسْرَرْتُ
और राज़दाराना बात की मैं ने
لَهُمْ
उन्हें
إِسْرَارًۭا
और राज़दारना तौर पर
"फिर मैंने उनसे खुले तौर पर भी बातें की और उनसे चुपके-चुपके भी बातें की
तफ़्सीर:
फिर मैंने उन्हें ऊँची आवाज़ में बुलाया, और गुप्त रूप से भी समझाया तथा उन्हें धीमे स्वर में भी आमंत्रित किया; मैंने उन्हें बुलाने की विविध शैली अपनाई।
आयत 10
فَقُلْتُ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ إِنَّهُۥ كَانَ غَفَّارًۭا
فَقُلْتُ
फिर कहा मैं ने
ٱسْتَغْفِرُوا۟
बख़्शिश माँगो
رَبَّكُمْ
अपने रब से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
غَفَّارًۭا
बहुत बख़्शने वाला
"और मैंने कहा, अपने रब से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील है,
तफ़्सीर:
तो मैंने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अपने पालनहार से उसके समक्ष तौबा करके क्षमा माँगो। निश्चय वह अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को बहुत क्षमा करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की दावत की शुरुआत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि औलाद और करीबियों को भी हक की दावत देना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।
आयत 11
يُرْسِلِ ٱلسَّمَآءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًۭا
يُرْسِلِ
वो भेजेगा
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّدْرَارًۭا
ख़ूब बरसने वाला
"वह बादल भेजेगा तुमपर ख़ूब बरसनेवाला,
तफ़्सीर:
अगर तुमने ऐसा किया, तो जब भी तुम्हें आवश्यकता होगी, अल्लाह तुम पर लगातार बारिश बरसाएगा। इसलिए तुम सूखे से पीड़ित नहीं होगे।
आयत 12
وَيُمْدِدْكُم بِأَمْوَٰلٍۢ وَبَنِينَ وَيَجْعَل لَّكُمْ جَنَّـٰتٍۢ وَيَجْعَل لَّكُمْ أَنْهَـٰرًۭا
وَيُمْدِدْكُم
और वो मदद करेगा तुम्हारी
بِأَمْوَٰلٍۢ
साथ मालों
وَبَنِينَ
और बेटों के
وَيَجْعَل
और वो बनाएगा
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात
وَيَجْعَل
और वो बनाएगा
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
أَنْهَـٰرًۭا
नहरें
"और वह माल और बेटों से तुम्हें बढ़ोतरी प्रदान करेगा, और तुम्हारे लिए बाग़ पैदा करेगा और तुम्हारे लिए नहरें प्रवाहित करेगा
तफ़्सीर:
और तुम्हें अधिक संख्या में धन एवं संतान प्रदान करेगा, और फल खाने को बाग़ देगा, और तुम्हारे लिए नहरें बहा देगा, जिनका पानी तुम खुद पियोगे तथा अपने जानवरों और अपने खेतों को सैराब करोगे।
आयत 13
مَّا لَكُمْ لَا تَرْجُونَ لِلَّهِ وَقَارًۭا
مَّا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
لَا
not
تَرْجُونَ
नहीं तुम तवक़्क़ो रखते
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَقَارًۭا
किसी वक़ार /अज़मत की
"तुम्हें क्या हो गया है कि तुम (अपने दिलों में) अल्लाह के लिए किसी गौरव की आशा नहीं रखते?
तफ़्सीर:
(ऐ मेरी जाति के लोगो) तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुम धड़ल्ले से अल्लाह की अवज्ञा करते हो, तो तुम्हें उसकी महानता से डर नहीं लगता?!
आयत 14
وَقَدْ خَلَقَكُمْ أَطْوَارًا
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَلَقَكُمْ
उसने पैदा किया तुम्हें
أَطْوَارًا
मुख़्तलिफ़ मरहलों में
"हालाँकि उसने तुम्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुज़ारते हुए पैदा किया
तफ़्सीर:
जबकि उसन तुम्हें चरण के बाद चरण नुत्फ़ा (वीर्य की बूँद), फिर जमे हुए रक्त, फिर मांस के टुकड़े से पैदा किया है।
आयत 15
أَلَمْ تَرَوْا۟ كَيْفَ خَلَقَ ٱللَّهُ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍۢ طِبَاقًۭا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَوْا۟
तुमने देखा
كَيْفَ
किस तरह
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَبْعَ
सात
سَمَـٰوَٰتٍۢ
आसमानों को
طِبَاقًۭا
ऊपर तले
"क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह ने किस प्रकार ऊपर तले सात आकाश बनाए,
तफ़्सीर:
क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने किस प्रकार ऊपर-तले सात आसमान बनाए?!
आयत 16
وَجَعَلَ ٱلْقَمَرَ فِيهِنَّ نُورًۭا وَجَعَلَ ٱلشَّمْسَ سِرَاجًۭا
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
ٱلْقَمَرَ
चाँद को
فِيهِنَّ
उनमें
نُورًۭا
नूर
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
ٱلشَّمْسَ
सूरज को
سِرَاجًۭا
चिराग़
"और उनमें चन्द्रमा को प्रकाश और सूर्य का प्रदीप बनाया?
तफ़्सीर:
और उसने चाँद को उनमें से निचले आकाश में धरती वालों के लिए प्रकाश और सूरज को प्रकाश करने वाला बनाया।
आयत 17
وَٱللَّهُ أَنۢبَتَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ نَبَاتًۭا
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَنۢبَتَكُم
उसने उगाया तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
نَبَاتًۭا
उगाना
"और अल्लाह ने तुम्हें धरती से विशिष्ट प्रकार से विकसित किया,
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुम्हें धरती से पैदा किया, क्योंकि तुम्हारे पिता आदम (अलैहिस्सलाम) को मिट्टी से बनाया। फिर वह (धरती) तुम्हारे लिए जो कुछ उगाती है, उससे तुम भोजन प्राप्त करते हो।
आयत 18
ثُمَّ يُعِيدُكُمْ فِيهَا وَيُخْرِجُكُمْ إِخْرَاجًۭا
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُكُمْ
वो एआदा करेगा तुम्हारा
فِيهَا
उसमें
وَيُخْرِجُكُمْ
और वो निकालेगा तुम्हें
إِخْرَاجًۭا
निकालना
"फिर वह तुम्हें उसमें लौटाता है और तुम्हें बाहर निकालेगा भी
तफ़्सीर:
फिर वह तुम्हें तुम्हारी मृत्यु के बाद उसी में वापस ले जाएगा, फिर वह तुम्हें पुनर्जीवित करके उठाने के लिए उससे बाहर निकालेगा।
आयत 19
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ بِسَاطًۭا
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
جَعَلَ
उसने बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بِسَاطًۭا
बिछौना
"और अल्लाह ने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना बनाया,
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुम्हारे लिए धरती को समतल बनाया, जो निवास के लिए तैयार है।
आयत 20
لِّتَسْلُكُوا۟ مِنْهَا سُبُلًۭا فِجَاجًۭا
لِّتَسْلُكُوا۟
ताकि तुम चलो
مِنْهَا
उसके
سُبُلًۭا
रास्तों में
فِجَاجًۭا
जो कुशादा हैं
"ताकि तुम उसके विस्तृत मार्गों पर चलो।"
तफ़्सीर:
इस आशा में कि तुम हलाल कमाई की खोज में उसके विस्तृत रास्तों पर चलो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कौम को अल्लाह की नेमतों की याद दहानी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इस्तिग़फार (माफी मांगना) बारिश और नेमतों के आने का ज़रिया बनता है।
आयत 21
قَالَ نُوحٌۭ رَّبِّ إِنَّهُمْ عَصَوْنِى وَٱتَّبَعُوا۟ مَن لَّمْ يَزِدْهُ مَالُهُۥ وَوَلَدُهُۥٓ إِلَّا خَسَارًۭا
قَالَ
कहा
نُوحٌۭ
नूह ने
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّهُمْ
बेशक वो
عَصَوْنِى
उन्होंने नाफ़रमानी की मेरी
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
مَن
उसकी जो
لَّمْ
नहीं
يَزِدْهُ
ज़्यादा किया जिसने
مَالُهُۥ
उसके माल ने
وَوَلَدُهُۥٓ
और उसकी औलाद ने
إِلَّا
मगर
خَسَارًۭا
ख़सारे में
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! उन्होंने मेरी अवज्ञा की, और उसका अनुसरण किया जिसके धन और जिसकी सन्तान ने उसके घाटे ही मे अभिवृद्धि की
तफ़्सीर:
नूह (अलैहिस्सलाम) ने कहा : ऐ मेरे रब! मेरी जाति के लोगों ने उस चीज़ में मेरी अवज्ञा की, जो मैंने उन्हें तेरे एकेश्वरवाद (तौहीद) और अकेले तेरी इबादत करने का आदेश दिया। और उनमें से निचले स्तर के लोगों ने अपने सरदारों का अनुसरण किया, जिन्हें तू ने धन और संतान की नेमत प्रदान की है। परन्तु तू ने उन्हें जो कुछ प्रदान किया, उसने उन्हें गुमराही के अलावा किसी चीज़ में नहीं बढ़ाया।
आयत 22
وَمَكَرُوا۟ مَكْرًۭا كُبَّارًۭا
وَمَكَرُوا۟
और उन्होंने चाल चली
مَكْرًۭا
एक चाल
كُبَّارًۭا
बहुत बड़ी
"और वे बहुत बड़ी चाल चले,
तफ़्सीर:
और उनके प्रमुख लोगों ने उनके निचले स्तर के लोगों को नूह़ अलैहिस्सलाम के विरुद्ध भड़काकर बहुत बड़ी चाल चली।
आयत 23
وَقَالُوا۟ لَا تَذَرُنَّ ءَالِهَتَكُمْ وَلَا تَذَرُنَّ وَدًّۭا وَلَا سُوَاعًۭا وَلَا يَغُوثَ وَيَعُوقَ وَنَسْرًۭا
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَذَرُنَّ
हरगिज़ ना तुम छोड़ो
ءَالِهَتَكُمْ
अपने इलाहों को
وَلَا
और ना
تَذَرُنَّ
तुम हरगिज़ छोड़ो
وَدًّۭا
वद्द को
وَلَا
और ना
سُوَاعًۭا
सुवाअ को
وَلَا
और ना
يَغُوثَ
यग़ूस
وَيَعُوقَ
और यऊक़
وَنَسْرًۭا
और नसर को
"और उन्होंने कहा, अपने इष्ट-पूज्यों के कदापि न छोड़ो और न वह वद्द को छोड़ो और न सुवा को और न यग़ूस और न यऊक़ और नस्र को
तफ़्सीर:
और उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा : अपने देवताओं की पूजा का त्याग मत करो। तथा अपनी मूर्तियों; वद्द, सुवाअ, यग़ूस, यऊक़ और नस्र की पूजा को मत छोड़ो।
आयत 24
وَقَدْ أَضَلُّوا۟ كَثِيرًۭا ۖ وَلَا تَزِدِ ٱلظَّـٰلِمِينَ إِلَّا ضَلَـٰلًۭا
وَقَدْ
और तहक़ीक़
أَضَلُّوا۟
उन्होंने भटका दिया
كَثِيرًۭا ۖ
कसीर तादाद को
وَلَا
और ना
تَزِدِ
तू ज़्यादा कर
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
إِلَّا
मगर
ضَلَـٰلًۭا
गुमराही में
"और उन्होंने बहुत-से लोगों को पथभ्रष्ट॥ किया है (तो तू उन्हें मार्ग न दिया) अब, तू भी ज़ालिमों की पथभ्रष्टता ही में अभिवृद्धि कर।"
तफ़्सीर:
और उन्होंने अपनी इन मूर्तियों के द्वारा बहुत-से लोगों को गुमराह किया है। तथा (ऐ मेरे रब!) कुफ़्र और पापों पर अटल रहकर अपने ऊपर अत्याचार करने वालों की सत्य से पथभ्रष्टता ही में वृद्धि कर।
आयत 25
مِّمَّا خَطِيٓـَٔـٰتِهِمْ أُغْرِقُوا۟ فَأُدْخِلُوا۟ نَارًۭا فَلَمْ يَجِدُوا۟ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ أَنصَارًۭا
مِّمَّا
बवजह
خَطِيٓـَٔـٰتِهِمْ
अपनी ख़ताओं के
أُغْرِقُوا۟
वो ग़र्क़ किए गए
فَأُدْخِلُوا۟
फिर वो दाख़िल किए गए
نَارًۭا
आग में
فَلَمْ
फिर ना
يَجِدُوا۟
उन्होंने पाया
لَهُم
अपने लिए
مِّن
from
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَنصَارًۭا
कोई मददगार
वे अपनी बड़ी ख़ताओं के कारण पानी में डूबो दिए गए, फिर आग में दाख़िल कर दिए गए, फिर वे अपने और अल्लाह के बीच आड़ बननेवाले सहायक न पा सके
तफ़्सीर:
अपने पापों के कारण जो उन्होंने किए थे, वे इस दुनिया में बाढ़ में डुबो दिए गए और अपनी मृत्यु के तुरंत बाद आग में डाल दिए गए। तो (उस समय) उन्हें डूबने और आग से बचाने के लिए, अल्लाह के सिवा कोई मदद करने वाले नहीं मिले।
आयत 26
وَقَالَ نُوحٌۭ رَّبِّ لَا تَذَرْ عَلَى ٱلْأَرْضِ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ دَيَّارًا
وَقَالَ
और कहा
نُوحٌۭ
नूह ने
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
لَا
(Do) not
تَذَرْ
ना तू छोड़
عَلَى
on
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन पर
مِنَ
any
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों में से
دَيَّارًا
कोई बसने वाला
और नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! धरती पर इनकार करनेवालों में से किसी बसनेवाले को न छोड
तफ़्सीर:
जब अल्लाह ने नूह अलैहिस्सलाम को बताया कि उनकी जाति के जो लोग ईमान ला चुके हैं, उनके सिवा अब कोई ईमान नहीं लाएगा, तो उन्होंने कहा : ऐ मेरे रब! धरती पर काफ़िरों में से किसी चलने-फिरने वाले को न छोड़।
आयत 27
إِنَّكَ إِن تَذَرْهُمْ يُضِلُّوا۟ عِبَادَكَ وَلَا يَلِدُوٓا۟ إِلَّا فَاجِرًۭا كَفَّارًۭا
إِنَّكَ
बेशक तू
إِن
अगर
تَذَرْهُمْ
तू छोड़ देगा उन्हें
يُضِلُّوا۟
वो भटका देंगे
عِبَادَكَ
तेरे बन्दों को
وَلَا
और ना
يَلِدُوٓا۟
वो जन्म देंगे
إِلَّا
मगर
فَاجِرًۭا
फ़ाजिर को
كَفَّارًۭا
सख़्त मुन्कर को
"यदि तू उन्हें छोड़ देगा तो वे तेरे बन्दों को पथभ्रष्ट कर देंगे और वे दुराचारियों और बड़े अधर्मियों को ही जन्म देंगे
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ हमारे पालनहार) अगर तू उन्हें छोड़ देगा और मोहलत देगा, तो वे तेरे मोमिन बंदों को गुमराह करेंगे, और वे केवल ऐसे दुराचारी को जन्म देंगे, जो तेरी बात नहीं मानेगा, और सख़्त काफ़िर को (जन्म देंगे), जो तेरी नेमतों पर तेरा आभारी नहीं होगा।
आयत 28
رَّبِّ ٱغْفِرْ لِى وَلِوَٰلِدَىَّ وَلِمَن دَخَلَ بَيْتِىَ مُؤْمِنًۭا وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ وَلَا تَزِدِ ٱلظَّـٰلِمِينَ إِلَّا تَبَارًۢا
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
ٱغْفِرْ
बख़्श दे
لِى
मुझे
وَلِوَٰلِدَىَّ
और मेरे वालिदैन को
وَلِمَن
और उसे भी जो
دَخَلَ
दाख़िल हो
بَيْتِىَ
मेरे घर में
مُؤْمِنًۭا
ईमान लाकर
وَلِلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिन मर्दों को
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
और मोमिन औरतों को
وَلَا
और ना
تَزِدِ
तू ज़्यादा कर
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
إِلَّا
मगर
تَبَارًۢا
हलाकत में
"ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरे माँ-बाप को भी और हर उस व्यक्ति को भी जो मेरे घर में ईमानवाला बन कर दाख़िल हुआ और (सामान्य) ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को भी (क्षमा कर दे), और ज़ालिमों के विनाश को ही बढ़ा।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पालनहार! मेरे पापों को क्षमा कर दे, और मेरे माता-पिता को क्षमा कर दे, और मेरे घर में मोमिन बन कर दाख़िल होने वाले को क्षमा कर दे, और ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों को भी क्षमा कर दे। तथा कुफ़्र और पापों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को विनाश और हानि ही में बढ़ा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कौम के इनकार और उनकी दुआ के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि बहुत ज़्यादा मुखालिफत के बावजूद अल्लाह से मदद मांगते रहना चाहिए, नाउम्मीद नहीं होना चाहिए।
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