सूरह अल-जिन्न سورة الجن
मक्की 28 आयतें
नाम का मतलब
जिन्नात (कुरआन सुनकर ईमान लाने वाले जिन्नों के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-जिन्न में एक जिन्नों के गिरोह का ज़िक्र है जिन्होंने नबी ﷺ की तिलावत सुनी और ईमान ले आए, फिर अपनी कौम को इसकी दावत दी।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह हमें बताती है कि हिदायत का पैगाम सिर्फ इंसानों के लिए नहीं बल्कि जिन्नात के लिए भी है, और कुरआन का असर हर मखलूक पर होता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أُوحِىَ إِلَىَّ أَنَّهُ ٱسْتَمَعَ نَفَرٌۭ مِّنَ ٱلْجِنِّ فَقَالُوٓا۟ إِنَّا سَمِعْنَا قُرْءَانًا عَجَبًۭا
قُلْ
कह दीजिए
أُوحِىَ
वही की गई
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
أَنَّهُ
बेशक वो
ٱسْتَمَعَ
ग़ौर से सुना
نَفَرٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
فَقَالُوٓا۟
तो उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
سَمِعْنَا
सुना हमने
قُرْءَانًا
क़ुरआन
عَجَبًۭا
अजीब
कह दो, "मेरी ओर प्रकाशना की गई है कि जिन्नों के एक गिरोह ने सुना, फिर उन्होंने कहा कि हमने एक मनभाता क़ुरआन सुना,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप अपनी उम्मत से कह दें : अल्लाह ने मेरी तरफ़ यह वह़्य (प्रकाशना) की है कि जिन्नों के एक समूह ने 'नख़ला' नामी स्थान में, मेरे क़ुरआन के पाठ को सुना। उसके बाद जब वे अपनी जाति की ओर लौटकर गए, तो उनसे कहा : निःसंदेह हमने एक सुपाठ्य वाणी सुनी है, जो अपने बयान और वाक्पटुता में बड़ा मनभावन व सराहनीय है।
आयत 2
يَهْدِىٓ إِلَى ٱلرُّشْدِ فَـَٔامَنَّا بِهِۦ ۖ وَلَن نُّشْرِكَ بِرَبِّنَآ أَحَدًۭا
يَهْدِىٓ
वो रहनुमाई करता है
إِلَى
to
ٱلرُّشْدِ
तरफ़ भलाई के
فَـَٔامَنَّا
पस ईमान लाए हम
بِهِۦ ۖ
उस पर
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
نُّشْرِكَ
हम शरीक करेंगे
بِرَبِّنَآ
साथ अपने रब के
أَحَدًۭا
किसी एक को
"जो भलाई और सूझ-बूझ का मार्ग दिखाता है, अतः हम उसपर ईमान ले आए, और अब हम कदापि किसी को अपने रब का साझी नहीं ठहराएँगे
तफ़्सीर:
यह वाणी जो हमने सुनी है, आस्था (अक़ीदा), कथन और कर्म में शुद्धता (सत्य) को दिखाती है। अतः हम उसपर ईमान ले आए। तथा हम अपने उस पालनहार के साथ, जिसने यह वाणी उतारी है, कदापि किसी को साझा नहीं करेंगे।
आयत 3
وَأَنَّهُۥ تَعَـٰلَىٰ جَدُّ رَبِّنَا مَا ٱتَّخَذَ صَـٰحِبَةًۭ وَلَا وَلَدًۭا
وَأَنَّهُۥ
और ये कि
تَعَـٰلَىٰ
बहुत बुलन्द है
جَدُّ
शान
رَبِّنَا
हमारे रब की
مَا
नहीं
ٱتَّخَذَ
बनाई उसने
صَـٰحِبَةًۭ
कोई बीवी
وَلَا
और ना
وَلَدًۭا
कोई औलाद
"और यह कि हमारे रब का गौरब अत्यन्त उच्च है। उसने अपने लिए न तो कोई पत्नी बनाई और न सन्तान
तफ़्सीर:
और हम इस बात पर भी ईमान लाए हैं कि हमारे पालनहार ने (उसकी महिमा एवं प्रताप बहुत उच्च है) न कोई पत्नी बनाई है और न कोई संतान, जैसा कि बहुदेववादियों का कहना है।
आयत 4
وَأَنَّهُۥ كَانَ يَقُولُ سَفِيهُنَا عَلَى ٱللَّهِ شَطَطًۭا
وَأَنَّهُۥ
और ये कि
كَانَ
थे
يَقُولُ
कहा करते
سَفِيهُنَا
बेवक़ूफ़ हमारे
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
شَطَطًۭا
ज़्यादती की बातें
"और यह कि हममें का मूर्ख व्यक्ति अल्लाह के विषय में सत्य से बिल्कुल हटी हुई बातें कहता रहा है
तफ़्सीर:
और यह कि इबलीस अल्लाह के संबंध में सत्य से हटी हुई बात कहा करता था कि उसकी पत्नी और संतान है।
आयत 5
وَأَنَّا ظَنَنَّآ أَن لَّن تَقُولَ ٱلْإِنسُ وَٱلْجِنُّ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
ظَنَنَّآ
गुमान किया हमने
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
تَقُولَ
कहेंगे
ٱلْإِنسُ
इन्सान
وَٱلْجِنُّ
और जिन्न
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا
कोई झूठ
"और यह कि हमने समझ रखा था कि मनुष्य और जिन्न अल्लाह के विषय में कभी झूठ नहीं बोलते
तफ़्सीर:
और यह कि हम समझते थे कि ये शिर्क करने वाले जिन्न और इनसान झूठ नहीं बोल रहे हैं, जब वे यह दावा कर रहे थे कि अल्लाह की पत्नी और संतान है। इसलिए अनका अनुकरण करते हुए हमने उनकी बात को सत्य मान लिया।
आयत 6
وَأَنَّهُۥ كَانَ رِجَالٌۭ مِّنَ ٱلْإِنسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍۢ مِّنَ ٱلْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًۭا
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
كَانَ
थे
رِجَالٌۭ
कुछ लोग
مِّنَ
among
ٱلْإِنسِ
इन्सानों में से
يَعُوذُونَ
जो पनाह लेते थे
بِرِجَالٍۢ
कुछ लोगों की
مِّنَ
from
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
فَزَادُوهُمْ
तो उन्होंने ज़्यादा कर दिया उन्हें
رَهَقًۭا
सरकशी में
"और यह कि मनुष्यों में से कितने ही पुरुष ऐसे थे, जो जिन्नों में से कितने ही पुरूषों की शरण माँगा करते थे। इसप्रकार उन्होंने उन्हें (जिन्नों को) और चढ़ा दिया
तफ़्सीर:
जाहिलीयत के ज़माने में इनसानों में से कुछ लोग, जब किसी भयानक स्थान पर उतरते, तो जिन्नों में से कुछ लोगों की शरण लिया करते थे, चुनाँचे उनमें से एक कहता था : मैं इस वादी के प्रमुख जिन्न की शरण में आता हूँ, उसकी जाति के नासमझ जिन्नों की बुराई से।इस तरह इनसानों का जिन्नों से भय और डर बढ़ा गया।
आयत 7
وَأَنَّهُمْ ظَنُّوا۟ كَمَا ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَبْعَثَ ٱللَّهُ أَحَدًۭا
وَأَنَّهُمْ
और ये कि वो
ظَنُّوا۟
वो समझते थे
كَمَا
जैसा कि
ظَنَنتُمْ
समझा हमने
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
يَبْعَثَ
भेजेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَحَدًۭا
किसी एक को
"और यह कि उन्होंने गुमान किया जैसे कि तुमने गुमान किया कि अल्लाह किसी (नबी) को कदापि न उठाएगा
तफ़्सीर:
और यह कि इनसानों ने भी तुम्हारी तरह यही सोचा था कि अल्लाह किसी को उसकी मृत्यु के बाद हिसाब और प्रतिफल के लिए कभी पुनर्जीवित नहीं करेगा।
आयत 8
وَأَنَّا لَمَسْنَا ٱلسَّمَآءَ فَوَجَدْنَـٰهَا مُلِئَتْ حَرَسًۭا شَدِيدًۭا وَشُهُبًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
لَمَسْنَا
छुआ हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
فَوَجَدْنَـٰهَا
तो पाया हमने उसे
مُلِئَتْ
भरा हुआ है
حَرَسًۭا
पहरेदारों से
شَدِيدًۭا
सख़्त
وَشُهُبًۭا
और शोलों से
"और यह कि हमने आकाश को टटोला तो उसे सख़्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया
तफ़्सीर:
और यह कि हमने आकाश की सूचना प्राप्त करने का प्रयास किया, तो पाया कि आकाश में फ़रिश्तों का बड़ा सख़्त पहरा बिठा दिया गया है, जो इस बात की पहरेदारी कर रहे हैं कि कोई चोरी-छिपे कुछ सुन न सके, जो हम किया करते थे। तथा उसे उल्काओं (अंगारों) से भर दिया गया है, जिनसे आकाश के निकट जाने वाले को मार भगाया जाता है।
आयत 9
وَأَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَـٰعِدَ لِلسَّمْعِ ۖ فَمَن يَسْتَمِعِ ٱلْـَٔانَ يَجِدْ لَهُۥ شِهَابًۭا رَّصَدًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
كُنَّا
थे हम
نَقْعُدُ
हम बैठते
مِنْهَا
उसकी
مَقَـٰعِدَ
बैठने की जगहों पर
لِلسَّمْعِ ۖ
सुनने के लिए
فَمَن
तो जो कोई
يَسْتَمِعِ
ग़ौर से सुनता है
ٱلْـَٔانَ
अब
يَجِدْ
वो पाता है
لَهُۥ
अपने लिए
شِهَابًۭا
एक शोला
رَّصَدًۭا
घात में
"और यह कि हम उसमें बैठने के स्थानों में सुनने के लिए बैठा करते थे, किन्तु अब कोई सुनना चाहे तो वह अपने लिए घात में लगा एक उल्का पाएगा
तफ़्सीर:
हम पहले आकाश में कुछ स्थानों पर बैठा करते थे, जहाँ से हम फ़रिश्तों के बीच आदान-प्रदान होने वाली बातों को सुनते थे, फिर उन्हें धरती में मौजूद काहिनों को बता दिया करते थे। लेकिन (अब) मामला बदल गया है। अब, हम में से जो सुनने का प्रयास करता है, वह अपने लिए एक जलती हुई आग को तैयार पाता है। जब वह निकट जाता है, तो वह उसपर छोड़ दी जाती है, जो उसे जला देती है।
आयत 10
وَأَنَّا لَا نَدْرِىٓ أَشَرٌّ أُرِيدَ بِمَن فِى ٱلْأَرْضِ أَمْ أَرَادَ بِهِمْ رَبُّهُمْ رَشَدًۭا
وَأَنَّا
औक बेशक हम
لَا
not
نَدْرِىٓ
नहीं हम जानते
أَشَرٌّ
क्या शर/ बुराई का
أُرِيدَ
इरादा किया गया
بِمَن
साथ उनके जो
فِى
(are) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में हैं
أَمْ
या
أَرَادَ
इरादा किया
بِهِمْ
साथ उनके
رَبُّهُمْ
उनके रब ने
رَشَدًۭا
ख़ैर/भलाई का
"और यह कि हम नहीं जानते कि उन लोगों के साथ जो धरती में है बुराई का इरादा किया गया है या उनके रब ने उनके लिए भलाई और मार्गदर्शन का इरादा किय है
तफ़्सीर:
हम नहीं जानते कि इस सख़्त पहरेदारी का कारण क्या है; क्या धरती के लोगों के लिए बुराई का इरादा किया गया है, या अल्लाह ने उनके लिए किसी भलाई का इरादा किया है।क्योंकि हमें आकाश की सूचना प्राप्त नहीं हो रही है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जिन्नों के कुरआन सुनकर ईमान लाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई सुनकर उसे फौरन कबूल करने और दूसरों तक पहुंचाने का जज़्बा जिन्नों से भी सीखा जा सकता है।
आयत 11
وَأَنَّا مِنَّا ٱلصَّـٰلِحُونَ وَمِنَّا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ كُنَّا طَرَآئِقَ قِدَدًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
مِنَّا
हम में से
ٱلصَّـٰلِحُونَ
नेक हैं
وَمِنَّا
और हम में से
دُونَ
अलावा हैं
ذَٰلِكَ ۖ
उसके
كُنَّا
हैं हम
طَرَآئِقَ
तरीक़ों पर
قِدَدًۭا
मुख़्तलिफ़
"और यह कि हममें से कुछ लोग अच्छे है और कुछ लोग उससे निम्नतर है, हम विभिन्न मार्गों पर है
तफ़्सीर:
हम जिन्नों के बीच कुछ लोग अल्लाह से डरने वाले, सदाचारी हैं, तथा हमारे बीच कुछ लोग ऐसे हैं, जो काफ़िर और अवज्ञाकारी हैं। हम अलग-अलग वर्गों और विभिन्न विचारों वाले हैं।
आयत 12
وَأَنَّا ظَنَنَّآ أَن لَّن نُّعْجِزَ ٱللَّهَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَن نُّعْجِزَهُۥ هَرَبًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
ظَنَنَّآ
यक़ीन रखते हैं हम
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
نُّعْجِزَ
हम आजिज़ कर सकते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
نُّعْجِزَهُۥ
हम आजिज़ कर सकते उसे
هَرَبًۭا
भाग कर
"और यह कि हमने समझ लिया कि हम न धरती में कही जाकर अल्लाह के क़ाबू से निकल सकते है, और न आकाश में कहीं भागकर उसके क़ाबू से निकल सकते है
तफ़्सीर:
हमें विश्वास हो गया है कि अगर अल्लाह हमसे कुछ चाहता है, तो हम उसके क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और न ही हम उससे भागकर निकल सकते हैं, क्योंकि उसने हमें घेर रखा है।
आयत 13
وَأَنَّا لَمَّا سَمِعْنَا ٱلْهُدَىٰٓ ءَامَنَّا بِهِۦ ۖ فَمَن يُؤْمِنۢ بِرَبِّهِۦ فَلَا يَخَافُ بَخْسًۭا وَلَا رَهَقًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हमने
لَمَّا
जब
سَمِعْنَا
सुना हमने
ٱلْهُدَىٰٓ
हिदायत को
ءَامَنَّا
ईमान ले आए हम
بِهِۦ ۖ
उस पर
فَمَن
पस जो कोई
يُؤْمِنۢ
ईमान लाएगा
بِرَبِّهِۦ
अपने रब पर
فَلَا
तो ना
يَخَافُ
वो डरेगा
بَخْسًۭا
किसी कमी से
وَلَا
और ना
رَهَقًۭا
किसी ज़्यादती से
"और यह कि जब हमने मार्गदर्शन की बात सुनी तो उसपर ईमान ले आए। अब तो कोई अपने रब पर ईमान लाएगा, उसे न तो किसी हक़ के मारे जाने का भय होगा और न किसी ज़ुल्म-ज़्यादती का
तफ़्सीर:
जब हमने वह क़ुरआन सुना, जो सबसे सही रास्ते का मार्गदर्शन करता है, तो हम उसपर ईमान ले आए। अतः जो कोई अपने पालनहार पर ईमान लाएगा, उसे न अपनी नेकियों में कमी किए जाने का भय होगा और न उसके पिछले पापों में वृद्धि का।
आयत 14
وَأَنَّا مِنَّا ٱلْمُسْلِمُونَ وَمِنَّا ٱلْقَـٰسِطُونَ ۖ فَمَنْ أَسْلَمَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ تَحَرَّوْا۟ رَشَدًۭا
وَأَنَّا
और बेशक हम
مِنَّا
हम में से कुछ
ٱلْمُسْلِمُونَ
मुसलमान हैं
وَمِنَّا
और हम में से कुछ
ٱلْقَـٰسِطُونَ ۖ
ज़ालिम हैं
فَمَنْ
तो जो कोई
أَسْلَمَ
फ़रमाबरदार हो गया
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
تَحَرَّوْا۟
जिन्होंने इरादा किया
رَشَدًۭا
भलाई का
"और यह कि हममें से कुछ मुस्लिम (आज्ञाकारी) है और हममें से कुछ हक़ से हटे हुए है। तो जिन्होंने आज्ञापालन का मार्ग ग्रहण कर लिया उन्होंने भलाई और सूझ-बूझ की राह ढूँढ़ ली
तफ़्सीर:
और यह कि हममें से कुछ लोग अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाले मुसलमान हैं, तथा हममें से कुछ लोग सत्य और धार्मिकता के मार्ग से हटे हुए हैं। अतः जो आज्ञापालन और अच्छे कार्य के साथ अल्लाह का आज्ञाकारी हो गया, तो वही लोग हैं, जिन्होंने हिदायत और सत्य का मार्ग अपनाया।
आयत 15
وَأَمَّا ٱلْقَـٰسِطُونَ فَكَانُوا۟ لِجَهَنَّمَ حَطَبًۭا
وَأَمَّا
और रहे
ٱلْقَـٰسِطُونَ
ज़ालिम लोग
فَكَانُوا۟
तो हैं वो
لِجَهَنَّمَ
जहन्नम का
حَطَبًۭا
ईंधन
"रहे वे लोग जो हक़ से हटे हुए है, तो वे जहन्नम का ईधन होकर रहे।"
तफ़्सीर:
और जहाँ तक उन लोगों की बात है, जो सत्य और धार्मिकता के मार्ग से हटे हुए हैं, तो वे लोग जहन्नम का ईंधन होंगे, जिसके द्वारा उनके जैसे इनसानों के साथ जहन्नम को भड़काया जाएगा।
आयत 16
وَأَلَّوِ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ عَلَى ٱلطَّرِيقَةِ لَأَسْقَيْنَـٰهُم مَّآءً غَدَقًۭا
وَأَلَّوِ
और ये कि अगर
ٱسْتَقَـٰمُوا۟
वो क़ायम हो जाते
عَلَى
on
ٱلطَّرِيقَةِ
रास्ते पर
لَأَسْقَيْنَـٰهُم
अलबत्ता पिलाते हम उन्हें
مَّآءً
पानी
غَدَقًۭا
वाफ़र
और वह प्रकाशना की गई है कि यदि वे सीधे मार्ग पर धैर्यपूर्वक चलते तो हम उन्हें पर्याप्त जल से अभिषिक्त करते,
तफ़्सीर:
जिस तरह उनकी ओर यह वह़्य की गई है कि जिन्नों के एक गिरोह ने क़ुरआन सुना, उसी तरह यह भी वह़्य की गई है कि अगर जिन्न एवं इनसान इस्लाम के रास्ते पर क़ायम रहते और उसके अनुसार कार्य करते, तो अल्लाह उन्हें भरपूर जल से सैराब करता और उन्हें विभिन्न नेमतें प्रदान करता।
आयत 17
لِّنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَمَن يُعْرِضْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِۦ يَسْلُكْهُ عَذَابًۭا صَعَدًۭا
لِّنَفْتِنَهُمْ
ताकि हम आज़माऐं उन्हें
فِيهِ ۚ
उसमें
وَمَن
और जो कोई
يُعْرِضْ
ऐराज़ करेगा
عَن
from
ذِكْرِ
ज़िक्र से
رَبِّهِۦ
अपने रब के
يَسْلُكْهُ
वो दाख़िल करेगा उसे
عَذَابًۭا
अज़ाब में
صَعَدًۭا
सख़्त
ताकि हम उसमें उनकी परीक्षा करें। और जो कोई अपने रब की याद से कतराएगा, तो वह उसे कठोर यातना में डाल देगा
तफ़्सीर:
ताकि हम उसमें उनका परीक्षण करें कि वे अल्लाह की नेमत का शुक्रिया अदा करते हैं या उसकी नाशुक्री करते हैं? और जो क़ुरआन से तथा उसमें मौजूद उपदेशों से मुँह फेरेगा, उसका पालनहार उसे बड़ी कठोर यातना में दाख़िल करेगा, जिसे वह सहन नहीं कर सकेगा।
आयत 18
وَأَنَّ ٱلْمَسَـٰجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا۟ مَعَ ٱللَّهِ أَحَدًۭا
وَأَنَّ
और बेशक
ٱلْمَسَـٰجِدَ
मस्जिदें
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए हैं
فَلَا
पस ना
تَدْعُوا۟
तुम पुकारो
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَحَدًۭا
किसी एक को
और यह कि मस्जिदें अल्लाह के लिए है। अतः अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो
तफ़्सीर:
और यह कि मस्जिदें केवल पवित्र अल्लाह के लिए हैं, किसी और की नहीं। अतः उनके अंदर अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो। अन्यथा तुम यहूदियों और ईसाइयों के समान हो जाओगे उनके चर्चों और मंदिरों में।
आयत 19
وَأَنَّهُۥ لَمَّا قَامَ عَبْدُ ٱللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا۟ يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًۭا
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
لَمَّا
जब
قَامَ
खड़ा हुआ
عَبْدُ
बन्दा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
يَدْعُوهُ
कि वो पुकारे उसे
كَادُوا۟
क़रीब थे वो
يَكُونُونَ
कि वो हो जाऐं
عَلَيْهِ
उस पर
لِبَدًۭا
गिरोह दर गिरोह(हमला आवर)
और यह कि "जब अल्लाह का बन्दा उसे पुकारता हुआ खड़ा हुआ तो वे ऐसे लगते है कि उसपर जत्थे बनकर टूट पड़ेगे।"
तफ़्सीर:
जब अल्लाह के बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम 'नख़ला' नामी स्थान में अपने पालनहार की इबादत करने के लिए खड़े हुए, तो जिन्न आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन के पाठ को सुनने के लिए इस तरह भीड़ लगाए हुए थे, जैसे एक-दूसरे पर चढ़े जा रहे हैं।
आयत 20
قُلْ إِنَّمَآ أَدْعُوا۟ رَبِّى وَلَآ أُشْرِكُ بِهِۦٓ أَحَدًۭا
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَدْعُوا۟
मैं पुकारता हूँ
رَبِّى
अपने रब को
وَلَآ
और नहीं
أُشْرِكُ
मैं शरीक ठहराता
بِهِۦٓ
साथ उसके
أَحَدًۭا
किसी एक को
कह दो, "मैं तो बस अपने रब ही को पुकारता हूँ, और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराता।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दें : मैं केवल अपने पालनहार ही को पुकारता हूँ और इबादत में उसके साथ उसके अलावा किसी को साझी नहीं बनाता, चाहे जो भी हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जिन्नों में भी नेक-बद के फर्क और मस्जिदें अल्लाह के लिए होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मस्जिदें सिर्फ अल्लाह की इबादत के लिए हैं, वहां किसी और का नाम शामिल नहीं करना चाहिए।
आयत 21
قُلْ إِنِّى لَآ أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّۭا وَلَا رَشَدًۭا
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّى
बेशक मैं
لَآ
(do) not
أَمْلِكُ
नहीं मैं मालिक हो सकता
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ضَرًّۭا
किसी नुक़्सान का
وَلَا
और ना
رَشَدًۭا
किसी भलाई का
कह दो, "मैं तो तुम्हारे लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न किसी भलाई का।"
तफ़्सीर:
आप उनसे कह दें : मैं तुम्हारे लिए किसी ऐसे नुक़सान को टालने का अधिकार नहीं रखता, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए नियत कर दिया हो, और न ही मैं तुम्हें कोई ऐसा लाभ पहुँचा सकता, जिसे अल्लाह ने तुमसे रोक दिया हो।
आयत 22
قُلْ إِنِّى لَن يُجِيرَنِى مِنَ ٱللَّهِ أَحَدٌۭ وَلَنْ أَجِدَ مِن دُونِهِۦ مُلْتَحَدًا
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّى
बेशक
لَن
हरगिज़ ना
يُجِيرَنِى
पनाह देगा मुझे
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
أَحَدٌۭ
कोई एक
وَلَنْ
और हरगिज़ ना
أَجِدَ
मैं पाऊँगा
مِن
from
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مُلْتَحَدًا
कोई जाएपनाह
कहो, "अल्लाह के मुक़ाबले में मुझे कोई पनाह नहीं दे सकता और न मैं उससे बचकर कतराने की कोई जगह पा सकता हूँ। -
तफ़्सीर:
आप उनसे कह दें : अगर मैं अल्लाह की अवज्ञा करूँ, तो उसकी पकड़ से मुझे कोई नहीं बचा सकेगा और न मुझे उसके अलावा कोई शरण लेने का स्थान मिल सकेगा।
आयत 23
إِلَّا بَلَـٰغًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِسَـٰلَـٰتِهِۦ ۚ وَمَن يَعْصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَإِنَّ لَهُۥ نَارَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًا
إِلَّا
मगर
بَلَـٰغًۭا
पहुँचा देना है
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से (हुक्म)
وَرِسَـٰلَـٰتِهِۦ ۚ
और उसके पैग़ामात
وَمَن
और जो कोई
يَعْصِ
नाफ़रमानी करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
فَإِنَّ
तो बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
نَارَ
आग है
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उसमें
أَبَدًا
हमेशा-हमेशा
"सिवाय अल्लाह की ओर से पहुँचने और उसके संदेश देने के। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा तो उसके लिए जहन्नम की आग है, जिसमें ऐसे लोग सदैव रहेंगे।"
तफ़्सीर:
लेकिन जो कुछ मेरे अधिकार में है, वह यह है कि अल्लाह ने मुझे जो कुछ तुम्हें पहुँचाने का आदेश दिया है, वह तुम्हें पहुँचा दूँ, और उसका संदेश जिसके साथ उसने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। और जो अल्लाह तथा उसके रसूल की अवज्ञा करेगा, उसका अंजाम जहन्नम में प्रवेश है, जहाँ वह हमेशा रहेगा, उससे वह कभी भी नहीं निकलेगा।
आयत 24
حَتَّىٰٓ إِذَا رَأَوْا۟ مَا يُوعَدُونَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ أَضْعَفُ نَاصِرًۭا وَأَقَلُّ عَدَدًۭا
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
رَأَوْا۟
वो देखेंगे
مَا
उसे जो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
فَسَيَعْلَمُونَ
तो अनक़रीब वो जान लेंगे
مَنْ
कौन
أَضْعَفُ
ज़्यादा कमज़ोर है
نَاصِرًۭا
मददगार के ऐतबार से
وَأَقَلُّ
और कौन ज़्यादा कम है
عَدَدًۭا
तादाद के ऐतबार से
यहाँ तक कि जब वे उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है तो वे जान लेंगे कि कौन अपने सहायक की दृष्टि से कमज़ोर और संख्या में न्यूतर है
तफ़्सीर:
काफ़िर लोग अपने कुफ़्र के मार्ग ही पर चलते रहेंगे, यहाँ तक कि जब क़ियामत के दिन अपनी आँखों से उस यातना को देख लेंगे, जिसका उनसे दुनिया में वादा किया जाता था, तो उस समय वे जान लेंगे कि सबसे कमज़ोर समर्थक वाला कौन है, और उन्हें पता चल जाएगा कि सबसे कम सहायक वाला कौन है।
आयत 25
قُلْ إِنْ أَدْرِىٓ أَقَرِيبٌۭ مَّا تُوعَدُونَ أَمْ يَجْعَلُ لَهُۥ رَبِّىٓ أَمَدًا
قُلْ
कह दीजिए
إِنْ
नहीं
أَدْرِىٓ
मैं जानता
أَقَرِيبٌۭ
क्या क़रीब है
مَّا
वो जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते हो
أَمْ
या
يَجْعَلُ
मुक़र्रर कर देगा
لَهُۥ
उसके लिए
رَبِّىٓ
मेरा रब
أَمَدًا
कोई मुद्दत
कह दो, "मैं नहीं जानता कि जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जाता है वह निकट है या मेरा रब उसके लिए लम्बी अवधि ठहराता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) इन दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करने वाले मुश्रिकों से कह दें : मैं नहीं जानता कि वह यातना जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है, निकट है या उसकी कोई अवधि निर्धारित है, जिसे अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता।
आयत 26
عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَىٰ غَيْبِهِۦٓ أَحَدًا
عَـٰلِمُ
जानने वाला है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब का
فَلَا
पस नहीं
يُظْهِرُ
वो ज़ाहिर करता
عَلَىٰ
from
غَيْبِهِۦٓ
अपने ग़ैब पर
أَحَدًا
किसी एक को
"परोक्ष का जाननेवाला वही है और वह अपने परोक्ष को किसी पर प्रकट नहीं करता,
तफ़्सीर:
वही पवित्र अल्लाह ग़ैब (परोक्ष) की सभी बातों को जानने वाला है। उससे ग़ैब की कोई बात छिपा नहीं है। चुनाँचे वह अपनी ग़ैब की बातों से किसी को सूचित नहीं करता। बल्कि वह उसके ज्ञान तक सीमित रहता है।
आयत 27
إِلَّا مَنِ ٱرْتَضَىٰ مِن رَّسُولٍۢ فَإِنَّهُۥ يَسْلُكُ مِنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِۦ رَصَدًۭا
إِلَّا
मगर
مَنِ
जिसे
ٱرْتَضَىٰ
वो पसंद करे
مِن
of
رَّسُولٍۢ
कोई रसूल
فَإِنَّهُۥ
पस बेशक वो
يَسْلُكُ
वो लगा देता है
مِنۢ
from
بَيْنِ
before
يَدَيْهِ
उसके आगे
وَمِنْ
and from
خَلْفِهِۦ
और उसके पीछे
رَصَدًۭا
मुहाफ़िज़
सिवाय उस व्यक्ति के जिसे उसने रसूल की हैसियत से पसन्द कर लिया हो तो उसके आगे से और उसके पीछे से निगरानी की पूर्ण व्यवस्था कर देता है,
तफ़्सीर:
सिवाय उस रसूल के, जिसे अल्लाह सर्वशक्तिमान पसंद कर ले। तो वह उसे जिस चीज़ से चाहता है, सूचित कर देता है, तथा वह उस रसूल के आगे और उसके पीछे फ़रिश्तों का पहरा लगा देता है, जो उसकी रक्षा करते हैं, ताकि उस रसूल के अलावा कोई और उससे अवगत न हो सके।
आयत 28
لِّيَعْلَمَ أَن قَدْ أَبْلَغُوا۟ رِسَـٰلَـٰتِ رَبِّهِمْ وَأَحَاطَ بِمَا لَدَيْهِمْ وَأَحْصَىٰ كُلَّ شَىْءٍ عَدَدًۢا
لِّيَعْلَمَ
ताकि वो जान ले
أَن
कि
قَدْ
तहक़ीक़
أَبْلَغُوا۟
उन्होंने पहुँचा दिए
رِسَـٰلَـٰتِ
पैग़ामात
رَبِّهِمْ
अपने रब के
وَأَحَاطَ
और उसने घेर रखा है
بِمَا
उनको जो
لَدَيْهِمْ
उनके पास है
وَأَحْصَىٰ
और उसने शुमार कर रखा है
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَدَدًۢا
अदद के ऐतबार से
ताकि वह यक़ीनी बना दे कि उन्होंने अपने रब के सन्देश पहुँचा दिए और जो कुछ उनके पास है उसे वह घेरे हुए है और हर चीज़ को उसने गिन रखा है।"
तफ़्सीर:
आशा है कि रसूल जान ले कि उसके पहले के रसूलों ने अपने पालनहार के संदेशों को पहुँचा दिया था, जिनके पहुँचाने का अल्लाह ने उन्हें आदेश दिया था क्योंकि अल्लाह ने उन्हें (भी) अपने देखभाल से घेर रखा था। तथा अल्लाह ने, जो कुछ फ़रिश्तों और रसूलों के पास है, अपने ज्ञान से घेर रखा है। इसलिए उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। और उसने हर चीज़ की संख्या गिन रखी है। अतः उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह को होने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह को है, इसलिए नजूमियों या झूठे दावों पर भरोसा करने से बचना चाहिए।
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