नाम का मतलब
चादर ओढ़ने वाले (नबी ﷺ को इबादत के लिए चादर से उठने की पुकार)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुज़्ज़म्मिल में नबी ﷺ को रात की नमाज़ (तहज्जुद) और कुरआन ठहर-ठहरकर पढ़ने की ताकीद की गई है, ताकि आने वाली भारी ज़िम्मेदारी के लिए तैयारी हो।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह रात की इबादत को रूहानी तैयारी का सबसे बड़ा ज़रिया बताती है, जो हर मुश्किल काम से पहले की तैयारी के लिए एक अहम सबक है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمُزَّمِّلُ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلْمُزَّمِّلُ
कपड़े में लिपटने वाले
ऐ कपड़े में लिपटनेवाले!
तफ़्सीर:
ऐ कपड़े में लिपटने वाले! (अर्थात् नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
आयत 2
قُمِ ٱلَّيْلَ إِلَّا قَلِيلًۭا
قُمِ
क़याम कीजिए
ٱلَّيْلَ
रात को
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
कम
रात को उठकर (नमाज़ में) खड़े रहा करो - सिवाय थोड़ा हिस्सा -
तफ़्सीर:
रात में नमाज़ पढ़ा करें, सिवाय उसके थोड़े भाग के।
आयत 3
نِّصْفَهُۥٓ أَوِ ٱنقُصْ مِنْهُ قَلِيلًا
نِّصْفَهُۥٓ
आधा उसका
أَوِ
या
ٱنقُصْ
कम कर लीजिए
مِنْهُ
उससे
قَلِيلًا
थोड़ा सा
आधी रात
तफ़्सीर:
अगर चाहें तो आधी रात नमाज़ पढ़ें, या आधी रात से थोड़ा-सा कम पढ़ें यहाँ तक कि एक तिहाई तक पहुँच जाएँ।
आयत 4
أَوْ زِدْ عَلَيْهِ وَرَتِّلِ ٱلْقُرْءَانَ تَرْتِيلًا
أَوْ
या
زِدْ
ज़्यादा बढ़ा दीजिए
عَلَيْهِ
उस पर
وَرَتِّلِ
और ठहर-ठहर कर पढ़िए
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
تَرْتِيلًا
ठहर-ठहर कर पढ़ना
या उससे कुछ थोड़ा कम कर लो या उससे कुछ अधिक बढ़ा लो और क़ुरआन को भली-भाँति ठहर-ठहरकर पढ़ो। -
तफ़्सीर:
या उससे कुछ ज़्यादा पढ़ें, यहाँ तक कि दो-तिहाई तक पहुँच जाएँ। और जब क़ुरआन पढ़ें तो उसे साफ़-साफ़ और ठहर-ठहर कर पढ़ें।
आयत 5
إِنَّا سَنُلْقِى عَلَيْكَ قَوْلًۭا ثَقِيلًا
إِنَّا
बेशक हम
سَنُلْقِى
अनक़रीब हम डाल देंगे
عَلَيْكَ
आप पर
قَوْلًۭا
एक बात /क़ौल
ثَقِيلًا
बहुत भारी
निश्चय ही हम तुमपर एक भारी बात डालनेवाले है
तफ़्सीर:
हम आपपर (ऐ रसूल!) क़ुरआन उतारेंगे, जो एक भारी वाणी है, क्योंकि उसमें कर्तव्यों, हदों (शरई दण्डों), प्रावधानों (नियमों) और शिष्टाचार आदि का उल्लेख है।
आयत 6
إِنَّ نَاشِئَةَ ٱلَّيْلِ هِىَ أَشَدُّ وَطْـًۭٔا وَأَقْوَمُ قِيلًا
إِنَّ
बेशक
نَاشِئَةَ
उठना
ٱلَّيْلِ
रात का
هِىَ
वो
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त है
وَطْـًۭٔا
रौंदने में (नफ़्स को)
وَأَقْوَمُ
और ज़्यादा दुरुस्त है
قِيلًا
बात करने में
निस्संदेह रात का उठना अत्यन्त अनुकूलता रखता है और बात भी उसमें अत्यन्त सधी हुई होती है
तफ़्सीर:
निश्चय रात की घड़ियाँ, तिलावत के साथ दिल के अधिक अनुकूल होती हैं और बात करने में अधिक उपयुक्त होती हैं।
आयत 7
إِنَّ لَكَ فِى ٱلنَّهَارِ سَبْحًۭا طَوِيلًۭا
إِنَّ
बेशक
لَكَ
आप के लिए
فِى
in
ٱلنَّهَارِ
दिन में
سَبْحًۭا
मसरूफ़ियत है
طَوِيلًۭا
तवील
निश्चय ही तुम्हार लिए दिन में भी (तसबीह की) बड़ी गुंजाइश है। -
तफ़्सीर:
निश्चय आपको दिन के दौरान बहुत-से कार्य करने होते हैं, जिनमें व्यस्त होकर आप क़ुरआन नहीं पढ़ पाते। अतः रात में नमाज़ पढ़ा करें।
आयत 8
وَٱذْكُرِ ٱسْمَ رَبِّكَ وَتَبَتَّلْ إِلَيْهِ تَبْتِيلًۭا
وَٱذْكُرِ
और ज़िक्र कीजिए
ٱسْمَ
नाम
رَبِّكَ
अपने रब का
وَتَبَتَّلْ
और सबसे अलग हो कर मुतावज्जा हो जाइए
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
تَبْتِيلًۭا
मुतावज्जा होना
और अपने रब के नाम का ज़िक्र किया करो और सबसे कटकर उसी के हो रहो।
तफ़्सीर:
और अल्लाह को अनेक प्रकार के ज़िक्र के साथ याद करें और उसके लिए इबादत को ख़ालिस करके हर चीज़ से कटकर केवल अल्लाह ही के हो जाएँ।
आयत 9
رَّبُّ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ فَٱتَّخِذْهُ وَكِيلًۭا
رَّبُّ
रब
ٱلْمَشْرِقِ
मशरिक़ का
وَٱلْمَغْرِبِ
और रब मग़रिब का
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
فَٱتَّخِذْهُ
पस बना लीजिए उसे
وَكِيلًۭا
कारसाज़
वह पूर्व और पश्चिम का रब है, उसके सिवा कोई इष्ट-पूज्य नहीं, अतः तुम उसी को अपना कार्यसाधक बना लो
तफ़्सीर:
वह सूर्योदय के स्थान का रब और सूर्यास्त के स्थान का रब है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अतः तुम उसी को अपना कार्यसाधक बनाकर अपने सभी कामों में उसी पर भरोसा करो।
आयत 10
وَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَٱهْجُرْهُمْ هَجْرًۭا جَمِيلًۭا
وَٱصْبِرْ
और सब्र कीजिए
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
وَٱهْجُرْهُمْ
और छोड़ दीजिए उन्हें
هَجْرًۭا
छोड़ना
جَمِيلًۭا
ख़ूबसूरत(अंदाज़ में)
और जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और भली रीति से उनसे अलग हो जाओ
तफ़्सीर:
और ये झुठलाने वाले जो उपहास और अपशब्द कहते हैं, उनपर सब्र करें और बिना किसी नुक़सान के उन्हें छोड़ दें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रात की नमाज़ (तहज्जुद) की ताकीद और कुरआन ठहर-ठहरकर पढ़ने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि रात की इबादत दिल को मज़बूती देती है, और कुरआन को जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि ठहर-ठहरकर, तवज्जो से पढ़ना चाहिए।
आयत 11
وَذَرْنِى وَٱلْمُكَذِّبِينَ أُو۟لِى ٱلنَّعْمَةِ وَمَهِّلْهُمْ قَلِيلًا
وَذَرْنِى
और छोड़ दीजिए मुझे
وَٱلْمُكَذِّبِينَ
और झुठलाने वालों को
أُو۟لِى
possessors
ٱلنَّعْمَةِ
जो नेअमतों वाले हैं
وَمَهِّلْهُمْ
और ढील दीजिए उन्हें
قَلِيلًا
थोड़ी सी
और तुम मुझे और झूठलानेवाले सुख-सम्पन्न लोगों को छोड़ दो और उन्हें थोड़ी मुहलत दो
तफ़्सीर:
इन झुठलाने वालों की परवाह न करें, जो दुनिया के सुख का आनंद लेने वाले हैं और मुझे तथा उन्हें छोड़ दें, और उनके बारे में थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, यहाँ तक कि उनका निर्धारित समय आ जाए।
आयत 12
إِنَّ لَدَيْنَآ أَنكَالًۭا وَجَحِيمًۭا
إِنَّ
बेशक
لَدَيْنَآ
हमारे पास
أَنكَالًۭا
बेड़ियाँ हैं
وَجَحِيمًۭا
और भड़कती आग
निश्चय ही हमारे पास बेड़ियाँ है और भड़कती हुई आग
तफ़्सीर:
निश्चय हमारे पास आख़िरत में भारी बेड़ियाँ हैं और भड़कती हुई आग है।
आयत 13
وَطَعَامًۭا ذَا غُصَّةٍۢ وَعَذَابًا أَلِيمًۭا
وَطَعَامًۭا
और खाना
ذَا
that
غُصَّةٍۢ
गले में अटकने वाला
وَعَذَابًا
और अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
और गले में अटकनेवाला भोजन है और दुखद यातना,
तफ़्सीर:
उपर्युक्त के अतिरिक्त, गले में अटकने वाला सख़्त कड़वा भोजन और दर्दनाक यातना है।
आयत 14
يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلْأَرْضُ وَٱلْجِبَالُ وَكَانَتِ ٱلْجِبَالُ كَثِيبًۭا مَّهِيلًا
يَوْمَ
जिस दिन
تَرْجُفُ
काँपेगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَٱلْجِبَالُ
और पहाड़
وَكَانَتِ
और होंगे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
كَثِيبًۭا
रेत को टीले
مَّهِيلًا
बिखरे हुए
जिस दिन धरती और पहाड़ काँप उठेंगे, और पहाड़ रेत के ऐसे ढेर होकर रह जाएगे जो बिखरे जा रहे होंगे
तफ़्सीर:
यह यातना काफ़िरों को उस दिन होगी, जिस दिन धरती और पर्वत काँप उठेंगे और पर्वत उसकी भयावहता की गंभीरता से बिखरे हुए तरल रेत हो जाएँगे।
आयत 15
إِنَّآ أَرْسَلْنَآ إِلَيْكُمْ رَسُولًۭا شَـٰهِدًا عَلَيْكُمْ كَمَآ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ رَسُولًۭا
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَيْكُمْ
तरफ़ आपके
رَسُولًۭا
एक रसूल
شَـٰهِدًا
गवाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
كَمَآ
जैसा कि
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन के
رَسُولًۭا
एक रसूल
निश्चय ही हुमने तुम्हारी ओर एक रसूल तुमपर गवाह बनाकर भेजा है, जिस प्रकार हमने फ़़िरऔन की ओर एक रसूल भेजा था
तफ़्सीर:
निश्चय हमने तुम्हारी ओर एक रसूल भेजा है, जो क़ियामत के दिन तुम्हारे कर्मों की गवाही देने वाला है, जैसे हमने फ़िरऔन की ओर एक रसूल अर्थात मूसा अलैहिस्सलाम को भेजा।
आयत 16
فَعَصَىٰ فِرْعَوْنُ ٱلرَّسُولَ فَأَخَذْنَـٰهُ أَخْذًۭا وَبِيلًۭا
فَعَصَىٰ
तो नाफ़रमानी की
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
ٱلرَّسُولَ
उस रसूल की
فَأَخَذْنَـٰهُ
तो पकड़ लिया हमने उसे
أَخْذًۭا
पकड़ना
وَبِيلًۭا
सख़्त
किन्तु फ़िरऔन ने रसूल की अवज्ञा कि, तो हमने उसे पकड़ लिया और यह पकड़ सख़्त वबाल थी
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने अपने पालनहार द्वारा अपनी ओर भेजे गए रसूल की अवज्ञा की। चुनाँचे हमने उसे दुनिया में पानी में डुबोकर, तथा आख़िरत में आग की यातना के साथ कड़ी सज़ा दी। अतः तुम अपने रसूल की अवज्ञा न करो, अन्यथा तुम्हें भी उसी की तरह यातना का सामना करना पड़ेगा।
आयत 17
فَكَيْفَ تَتَّقُونَ إِن كَفَرْتُمْ يَوْمًۭا يَجْعَلُ ٱلْوِلْدَٰنَ شِيبًا
فَكَيْفَ
तो किस तरह
تَتَّقُونَ
तुम बचोगे
إِن
अगर
كَفَرْتُمْ
कुफ़्र किया तुमने
يَوْمًۭا
उस दिन से
يَجْعَلُ
जो कर देगा
ٱلْوِلْدَٰنَ
बच्चों को
شِيبًا
बूढ़ा
यदि तुमने इनकार किया तो उस दिन से कैसे बचोगे जो बच्चों को बूढा कर देगा?
तफ़्सीर:
फिर (यदि तुमने अल्लाह का इनकार किया और उसके रसूल को झुठलाया) तो तुम अपने आपको उस लंबे कठोर दिन से कैसे बचाओगे और सुरक्षित रखोगे, जिसकी भयावहता की गंभीरता और लंबाई के कारण छोटे बच्चों के बाल सफ़ेद हो जाएँगे।
आयत 18
ٱلسَّمَآءُ مُنفَطِرٌۢ بِهِۦ ۚ كَانَ وَعْدُهُۥ مَفْعُولًا
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
مُنفَطِرٌۢ
फट जाने वाला होगा
بِهِۦ ۚ
उसमें
كَانَ
है
وَعْدُهُۥ
वादा उसका
مَفْعُولًا
हो कर रहने वाला
आकाश उसके कारण फटा पड़ रहा है, उसका वादा तो पूरा ही होना है
तफ़्सीर:
उस दिन की भयावहता से आकाश फट जाएगा। अल्लाह का वादा अनिवार्य रूप से पूरा होकर रहेगा।
आयत 19
إِنَّ هَـٰذِهِۦ تَذْكِرَةٌۭ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًا
إِنَّ
बेशक
هَـٰذِهِۦ
ये
تَذْكِرَةٌۭ ۖ
एक नसीहत है
فَمَن
पस जो कोई
شَآءَ
चाहे
ٱتَّخَذَ
बना ले
إِلَىٰ
to
رَبِّهِۦ
तरफ़ अपने रब के
سَبِيلًا
रास्ता
निश्चय ही यह एक अनुस्मृति है। अब जो चाहे अपने रब की ओर मार्ग ग्रहण कर ले
तफ़्सीर:
निश्चय यह उपदेश (जिसमें क़ियामत के दिन की भयावहता और भीषणता का उल्लेख है) एक याददेहानी है, जिससे ईमान वाले लाभ उठाते हैं। अतः जो अपने रब की ओर ले जाने वाला मार्ग पकड़ना चाहे, पकड़ ले।
आयत 20
۞ إِنَّ رَبَّكَ يَعْلَمُ أَنَّكَ تَقُومُ أَدْنَىٰ مِن ثُلُثَىِ ٱلَّيْلِ وَنِصْفَهُۥ وَثُلُثَهُۥ وَطَآئِفَةٌۭ مِّنَ ٱلَّذِينَ مَعَكَ ۚ وَٱللَّهُ يُقَدِّرُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ ۚ عَلِمَ أَن لَّن تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۖ فَٱقْرَءُوا۟ مَا تَيَسَّرَ مِنَ ٱلْقُرْءَانِ ۚ عَلِمَ أَن سَيَكُونُ مِنكُم مَّرْضَىٰ ۙ وَءَاخَرُونَ يَضْرِبُونَ فِى ٱلْأَرْضِ يَبْتَغُونَ مِن فَضْلِ ٱللَّهِ ۙ وَءَاخَرُونَ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ فَٱقْرَءُوا۟ مَا تَيَسَّرَ مِنْهُ ۚ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَقْرِضُوا۟ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًۭا ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍۢ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِ هُوَ خَيْرًۭا وَأَعْظَمَ أَجْرًۭا ۚ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۢ
۞ إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
يَعْلَمُ
वो जानता है
أَنَّكَ
बेशक आप
تَقُومُ
आप क़याम करते हैं
أَدْنَىٰ
क़रीब
مِن
than
ثُلُثَىِ
दो तिहाई
ٱلَّيْلِ
रात का
وَنِصْفَهُۥ
और (कभी)निस्फ़ उसका
وَثُلُثَهُۥ
और एक तिहाई उसका
وَطَآئِفَةٌۭ
और एक गिरोह
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में से जो
مَعَكَ ۚ
आपके साथ हैं
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُقَدِّرُ
वो अंदाज़ा रखता है
ٱلَّيْلَ
रात का
وَٱلنَّهَارَ ۚ
और दिन का
عَلِمَ
वो जानता है
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ ना
تُحْصُوهُ
तुम शुमार कर सकोगे उसे
فَتَابَ
तो वो मेहरबान हुआ
عَلَيْكُمْ ۖ
तुम पर
فَٱقْرَءُوا۟
पस पढ़ो
مَا
जो
تَيَسَّرَ
मयस्सर आए
مِنَ
of
ٱلْقُرْءَانِ ۚ
क़ुरआन में से
عَلِمَ
वो जानता है
أَن
कि
سَيَكُونُ
अनक़रीब होंगे
مِنكُم
तुम में
مَّرْضَىٰ ۙ
बीमार
وَءَاخَرُونَ
और कुछ दूसरे
يَضْرِبُونَ
जो सफ़र करते होंगे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
يَبْتَغُونَ
वो तलाश करते होंगे
مِن
of
فَضْلِ
फ़ज़ल में से
ٱللَّهِ ۙ
अल्लाह के
وَءَاخَرُونَ
और कुछ दूसरे
يُقَـٰتِلُونَ
जो जंग करते होंगे
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के रास्ते में
فَٱقْرَءُوا۟
पस पढ़ो
مَا
जो
تَيَسَّرَ
मयस्सर आए
مِنْهُ ۚ
उसमें से
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَأَقْرِضُوا۟
और क़र्ज़ दो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
قَرْضًا
क़र्ज़
حَسَنًۭا ۚ
अच्छा
وَمَا
और जो
تُقَدِّمُوا۟
तुम आगे भेजोगे
لِأَنفُسِكُم
अपने नफ़्सों के लिए
مِّنْ
of
خَيْرٍۢ
कोई भलाई
تَجِدُوهُ
तुम पा लोगे उसे
عِندَ
पास
ٱللَّهِ
अल्लाह के
هُوَ
वो
خَيْرًۭا
बेहतर है
وَأَعْظَمَ
और ज़्यादा बड़ा है
أَجْرًۭا ۚ
अजर में
وَٱسْتَغْفِرُوا۟
और बख़्शिश माँगो
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۢ
निहायत रहम करने वाला है
निस्संदेह तुम्हारा रब जानता है कि तुम लगभग दो तिहाई रात, आधी रात और एक तिहाई रात तक (नमाज़ में) खड़े रहते हो, और एक गिरोंह उन लोगों में से भी जो तुम्हारे साथ है, खड़ा होता है। और अल्लाह रात और दिन की घट-बढ़ नियत करता है। उसे मालूम है कि तुम सब उसका निर्वाह न कर सकोगे, अतः उसने तुमपर दया-दृष्टि की। अब जितना क़ुरआन आसानी से हो सके पढ़ लिया करो। उसे मालूम है कि तुममे से कुछ बीमार भी होंगे, और कुछ दूसरे लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह (रोज़ी) को ढूँढ़ते हुए धरती में यात्रा करेंगे, कुछ दूसरे लोग अल्लाह के मार्ग में युद्ध करेंगे। अतः उसमें से जितना आसानी से हो सके पढ़ लिया करो, और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात देते रहो, और अल्लाह को ऋण दो, अच्छा ऋण। तुम जो भलाई भी अपने लिए (आगे) भेजोगे उसे अल्लाह के यहाँ अत्युत्तम और प्रतिदान की दृष्टि से बहुत बढ़कर पाओगे। और अल्लाह से माफ़ी माँगते रहो। बेशक अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
निश्चय आपका रब (ऐ रसूल) जानता है कि आप कभी दो-तिहाई रात से कुछ कम नमाज़ पढ़ते हैं, और कभी आधी रात, तो कभी एक तिहाई रात क़ियाम करते हैं। ईमान वालों का एक समूह भी आपके साथ नमाज़ में खड़ा होता है। तथा अल्लाह ही रात और दिन का निर्धारण करता है और उनकी घड़ियों को गिनता है। उसे पता है कि तुम रात के समय का बिलकुल ठीक-ठीक हिसाब नहीं रख सकते। इसलिए तुम्हारे लिए अपेक्षित की खोज में, रात के अधिकतर भाग को नमाज़ में गुज़ारना कठिन है। इसलिए, उसने तुम पर दया की। अतः रात में से जितना आसान हो, नमाज़ पढ़ो। अल्लाह जानता है कि तुममें से (ऐ मोमिनो) कुछ लोग बीमार होंगे, जिन्हें बीमारी ने थका दिया होगा, तथा कुछ अन्य लोग अल्लाह की रोज़ी की तलाश में यात्रा कर रहे होंगे, तथा कुछ दूसरे लोग अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए और उसकी बात को ऊँचा करने के लिए, काफ़िरों से युद्ध कर रहे होंगे। तो इन लोगें के लिए रात में नमाज़ के लिए खड़े होना बहुत मुश्किल है। अतः रात में उतनी नमाज़ पढ़ो, जितनी तुम्हारे लिए आसान हो। तथा फ़र्ज़ नमाज़ को संपूर्ण तरीक़े से अदा करो, और अपने धन की ज़कात दो, तथा अपने धन का कुछ भाग अल्लाह के मार्ग में खर्च करो। और तुम अपने लिए जो भी भलाई आगे भेजोगे, उसे सबसे बेहतर और बड़े प्रतिफल वाला पाओगे। और अल्लाह से क्षमा माँगते रहो। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया की मोहलत और सब्र की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह ने रात की नमाज़ में आसानी भी रखी है, जितना हो सके पढ़ना चाहिए, बोझ नहीं समझना चाहिए।
मेरा एक्शन प्लान
अपना एक्शन प्लान लिखने और सेव करने के लिए लॉगिन करें।