सूरह अल-मुद्दस्सिर سورة المدثر
मक्की 56 आयतें
नाम का मतलब
कपड़ा ओढ़ने वाले (नबी ﷺ को दावत के काम के लिए उठने की पुकार)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुद्दस्सिर कुरआन की शुरुआती नाज़िल होने वाली सूरतों में से है, जिसमें नबी ﷺ को खुलेआम दावत का काम शुरू करने का हुक्म दिया गया।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह इस्लामी दावत की बाकायदा शुरुआत की निशानदेही करती है, जब नबी ﷺ को अल्लाह की तरफ से खुलेआम पैगाम पहुंचाने का हुक्म मिला।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمُدَّثِّرُ
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلْمُدَّثِّرُ
कपड़ा लपेटने वाले
ऐ ओढ़ने लपेटनेवाले!
तफ़्सीर:
ऐ कपड़े में लिपटने वाले! (अर्थात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
आयत 2
قُمْ فَأَنذِرْ
قُمْ
खड़े हो जाइए
فَأَنذِرْ
फिर डराइए
उठो, और सावधान करने में लग जाओ
तफ़्सीर:
उठ खड़े हो और अल्लाह की यातना से डराओ।
आयत 3
وَرَبَّكَ فَكَبِّرْ
وَرَبَّكَ
और अपने रब की
فَكَبِّرْ
पस बड़ाई बयान कीजिए
और अपने रब की बड़ाई ही करो
तफ़्सीर:
और केवल अपने रब की बड़ाई बयान करो।
आयत 4
وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْ
وَثِيَابَكَ
और अपने कपड़े
فَطَهِّرْ
पस पाक रखिए
अपने दामन को पाक रखो
तफ़्सीर:
और अपने आपको गुनाहों से तथा अपने कपड़े को गंदगियों से पवित्र रखो।
आयत 5
وَٱلرُّجْزَ فَٱهْجُرْ
وَٱلرُّجْزَ
और गंदगी को
فَٱهْجُرْ
पस छोड़ दीजिए
और गन्दगी से दूर ही रहो
तफ़्सीर:
और मूर्तियों की पूजा से दूर रहो।
आयत 6
وَلَا تَمْنُن تَسْتَكْثِرُ
وَلَا
और ना
تَمْنُن
आप एहसान कीजिए
تَسْتَكْثِرُ
कि आप ज़्यादा हासिल कर सकें
अपनी कोशिशों को अधिक समझकर उसके क्रम को भंग न करो
तफ़्सीर:
और अपने अच्छे कार्यों को अधिक समझकर अपने रब पर उपकार न जताओ।
आयत 7
وَلِرَبِّكَ فَٱصْبِرْ
وَلِرَبِّكَ
और अपने रब के लिए
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
और अपने रब के लिए धैर्य ही से काम लो
तफ़्सीर:
तथा अपको जिन तकलीफ़ों का सामना होता है, उनपर अल्लाह ही के लिए धैर्य रखो।
आयत 8
فَإِذَا نُقِرَ فِى ٱلنَّاقُورِ
فَإِذَا
फिर जब
نُقِرَ
फूँका जाएगा
فِى
in
ٱلنَّاقُورِ
सूर में
जब सूर में फूँक मारी जाएगी
तफ़्सीर:
फिर जब सूर में दूसरी बार फूँक मारी जाएगी।
आयत 9
فَذَٰلِكَ يَوْمَئِذٍۢ يَوْمٌ عَسِيرٌ
فَذَٰلِكَ
तो वो
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يَوْمٌ
दिन होगा
عَسِيرٌ
सख़्त दुशवार
तो जिस दिन ऐसा होगा, वह दिन बड़ा ही कठोर होगा,
तफ़्सीर:
तो वह दिन बड़ा कठिन दिन होगा।
आयत 10
عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ غَيْرُ يَسِيرٍۢ
عَلَى
For
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
غَيْرُ
ना होगा
يَسِيرٍۢ
आसान
इनकार करनेवालो पर आसान न होगा
तफ़्सीर:
अल्लाह का और उसके रसूलों का इनकार करने वालों पर आसान न होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को दावत का काम शुरू करने के हुक्म का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक की दावत का काम शुरू करने में देर नहीं करनी चाहिए, फौरन तैयार हो जाना चाहिए।
आयत 11
ذَرْنِى وَمَنْ خَلَقْتُ وَحِيدًۭا
ذَرْنِى
छोड़ दो मुझे
وَمَنْ
और जिसे
خَلَقْتُ
पैदा किया मैं ने
وَحِيدًۭا
अकेले
छोड़ दो मुझे और उसको जिसे मैंने अकेला पैदा किया,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) मुझे और उस व्यक्ति को छोड़ दें, जिसे मैंने, बिना धन या संतान के, उसकी माँ के गर्भ में अकेला पैदा किया। (वह वलीद बिन मुग़ीरा है।)
आयत 12
وَجَعَلْتُ لَهُۥ مَالًۭا مَّمْدُودًۭا
وَجَعَلْتُ
और बनाया मैं ने
لَهُۥ
उसके लिए
مَالًۭا
माल
مَّمْدُودًۭا
लम्बा चौड़ा
और उसे माल दिया दूर तक फैला हुआ,
तफ़्सीर:
और मैंने उसे बहुत सारा धन दिया।
आयत 13
وَبَنِينَ شُهُودًۭا
وَبَنِينَ
और बेटे
شُهُودًۭا
हाज़िर रहने वाले
और उसके पास उपस्थित रहनेवाले बेटे दिए,
तफ़्सीर:
और उसे ऐसे पुत्र दिए, जो उसके पास मौजूद रहने वाले हैं और उसके साथ सभाओं में उपस्थित होते हैं। उसे किसी यात्रा के लिए अकेला नहीं छोड़ते; क्योंकि उसके पास धन की कोई कमी नहीं है।
आयत 14
وَمَهَّدتُّ لَهُۥ تَمْهِيدًۭا
وَمَهَّدتُّ
और फैलाया मैं ने
لَهُۥ
उसके लिए
تَمْهِيدًۭا
फैलाना
और मैंने उसके लिए अच्छी तरह जीवन-मार्ग समतल किया
तफ़्सीर:
और हमने उसे जीवन, आजीविका और संतान में ख़ूब विस्तार प्रदान किया।
आयत 15
ثُمَّ يَطْمَعُ أَنْ أَزِيدَ
ثُمَّ
फिर
يَطْمَعُ
वो तमाअ रखता है
أَنْ
कि
أَزِيدَ
मैं ज़्यादा दूँ
फिर वह लोभ रखता है कि मैं उसके लिए और अधिक दूँगा
तफ़्सीर:
फिर वह, मेरे साथ कुफ़्र करने के बावजूद, इस बात की लालसा रखता है कि यह सब कुछ देने के बाद, मैं उसे और अधिक प्रदान करूँ।
आयत 16
كَلَّآ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ لِـَٔايَـٰتِنَا عَنِيدًۭا
كَلَّآ ۖ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
لِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात से
عَنِيدًۭا
सख़्त इनाद रखने वाला
कदापि नहीं, वह हमारी आयतों का दुश्मन है,
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा उसने समझ लिया है। वह हमारे रसूल पर उतरने वाली हमारी आयतों का विरोधी और उन्हें झुठलाने वाला है।
आयत 17
سَأُرْهِقُهُۥ صَعُودًا
سَأُرْهِقُهُۥ
अनक़रीब मैं चढ़ाऊँगा उसे
صَعُودًا
कठिन चढ़ाई
शीघ्र ही मैं उसे घेरकर कठिन चढ़ाई चढ़वाऊँगा
तफ़्सीर:
शीघ्र ही मैं उसे यातना की ऐसी वेदना में डालूँगा, जिसे वह सहन न कर सकेगा।
आयत 18
إِنَّهُۥ فَكَّرَ وَقَدَّرَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
فَكَّرَ
उसने सोचा
وَقَدَّرَ
और उसने अंदाज़ा किया
उसने सोचा और अटकल से एक बात बनाई
तफ़्सीर:
इस काफ़िर ने, जिसे हमने ये सारी नेमतें प्रदान कीं, सोच-विचार किया कि इस क़ुरआन के बारे में उसे ग़लत साबित करने के लिए क्या कहे, और अपने दिल में उसका अनुमान लगाया।
आयत 19
فَقُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَ
فَقُتِلَ
पस वो मारा जाए
كَيْفَ
कैसा
قَدَّرَ
उसने अंदाज़ा किया
तो विनष्ट हो, कैसी बात बनाई!
तफ़्सीर:
उसपर धिक्कार हो और उसका विनाश हो! उसने यह कैसी बात बनाई?
आयत 20
ثُمَّ قُتِلَ كَيْفَ قَدَّرَ
ثُمَّ
फिर
قُتِلَ
वो मारा जाए
كَيْفَ
कैसा
قَدَّرَ
उसने अंदाज़ा किया
फिर विनष्ट हो, कैसी बात बनाई!
तफ़्सीर:
फिर उसपर धिक्कार हो और उसका विनाश हो! उसने कैसी बात बनाई?
आज की ज़िंदगी में सबक़
एक मुनकिर (इनकार करने वाले) की मिसाल का ज़िक्र है जिसने कुरआन को जादू कहा। यह सबक हमें सिखाता है कि हक बात को झूठे इल्ज़ाम देकर टालने की कोशिश आखिरकार बेनकाब हो जाती है।
आयत 21
ثُمَّ نَظَرَ
ثُمَّ
फिर
نَظَرَ
उसने देखा
फिर नज़र दौड़ाई,
तफ़्सीर:
फिर उसने अपनी बात पर पुनर्विचार किया।
आयत 22
ثُمَّ عَبَسَ وَبَسَرَ
ثُمَّ
फिर
عَبَسَ
उसने तेवरी चढ़ाई
وَبَسَرَ
और उसने मुँह बिसूरा
फिर त्योरी चढ़ाई और मुँह बनाया,
तफ़्सीर:
फिर जब उसने कोई ऐसी बात न पाई, जिसे आधार बनाकर क़ुरआन के अंदर दोष निकाले, तो माथे पर बल दिया और मुँह बनाया।
आयत 23
ثُمَّ أَدْبَرَ وَٱسْتَكْبَرَ
ثُمَّ
फिर
أَدْبَرَ
उसने पीठ फेरी
وَٱسْتَكْبَرَ
और उसने तकब्बुर किया
फिर पीठ फेरी और घमंड किया
तफ़्सीर:
फिर उसने ईमान से मुँह फेरा और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करने से अहंकार किया।
आयत 24
فَقَالَ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ يُؤْثَرُ
فَقَالَ
फिर उसने कहा
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
जादू
يُؤْثَرُ
जो नक़्ल किया जाता है
अन्ततः बोला, "यह तो बस एक जादू है, जो पहले से चला आ रहा है
तफ़्सीर:
अंततः बोला : मुहम्मद जो कुछ लेकर आए हैं, वह अल्लाह की वाणी नहीं है, बल्कि वह एक जादू है, जिसे वह किसी और से बयान करते हैं।
आयत 25
إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا قَوْلُ ٱلْبَشَرِ
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
قَوْلُ
बात
ٱلْبَشَرِ
एक इन्सान की
"यह तो मात्र मनुष्य की वाणी है।"
तफ़्सीर:
यह अल्लाह की वाणी नहीं, बल्कि वह इनसान की वाणी है।
आयत 26
سَأُصْلِيهِ سَقَرَ
سَأُصْلِيهِ
अनक़रीब मैं झोंकूँगा उसे
سَقَرَ
दोज़ख़ में
मैं शीघ्र ही उसे 'सक़र' (जहन्नम की आग) में झोंक दूँगा
तफ़्सीर:
मैं इस काफ़िर को जहन्नम की आग के वर्गों में से एक वर्ग में प्रवेश करूँगा, जिसका नाम 'सक़र' है, वह उसकी गर्मी सहन करेगा।
आयत 27
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سَقَرُ
وَمَآ
और क्या चीज़
أَدْرَىٰكَ
बताए आपको
مَا
क्या है
سَقَرُ
दोज़ख़
और तुम्हें क्या पता की सक़र क्या है?
तफ़्सीर:
और (ऐ मुहम्मद) आपको किस चीज़ ने अवगत कराया कि 'सक़र' (जहन्नम) क्या है?!
आयत 28
لَا تُبْقِى وَلَا تَذَرُ
لَا
Not
تُبْقِى
ना वो बाक़ी रखे
وَلَا
और ना
تَذَرُ
वो छोड़ेगी
वह न तरस खाएगी और न छोड़ेगी,
तफ़्सीर:
उसमें डाली जाने वाली किसी चीज़ को वह शेष नहीं रखेगी, बल्कि उसका काम तमाम कर देगी और उसे छोड़े गी नहीं। फिर वह अपनी पहली स्थिति में लौट आएगी, तो वह फिर उसका काम तमाम कर देगी। इसी तरह यह सिलसिला चलता रहेगा।
आयत 29
لَوَّاحَةٌۭ لِّلْبَشَرِ
لَوَّاحَةٌۭ
झुलसा देने वाली है
لِّلْبَشَرِ
चमड़े को
खाल को झुलसा देनेवाली है,
तफ़्सीर:
वह खाल को बुरी तरह जला देने वाली और उसकी हालत बदल देने वाली है।
आयत 30
عَلَيْهَا تِسْعَةَ عَشَرَ
عَلَيْهَا
उस पर हैं
تِسْعَةَ
(are) nine
عَشَرَ
उन्नीस (फ़रिश्ते)
उसपर उन्नीस (कार्यकर्ता) नियुक्त है
तफ़्सीर:
उसपर उन्नीस फ़रिश्ते नियुक्त हैं, जो उसके रक्षक हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़ख़ की सख्ती (उन्नीस फरिश्तों) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुनाहों की सज़ा को मामूली समझने की बजाय इससे डरना चाहिए।
आयत 31
وَمَا جَعَلْنَآ أَصْحَـٰبَ ٱلنَّارِ إِلَّا مَلَـٰٓئِكَةًۭ ۙ وَمَا جَعَلْنَا عِدَّتَهُمْ إِلَّا فِتْنَةًۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِيَسْتَيْقِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ وَيَزْدَادَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِيمَـٰنًۭا ۙ وَلَا يَرْتَابَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۙ وَلِيَقُولَ ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ وَٱلْكَـٰفِرُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا مَثَلًۭا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ ٱللَّهُ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَمَا يَعْلَمُ جُنُودَ رَبِّكَ إِلَّا هُوَ ۚ وَمَا هِىَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْبَشَرِ
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَآ
बनाया हमने
أَصْحَـٰبَ
निगरान
ٱلنَّارِ
आग के
إِلَّا
मगर
مَلَـٰٓئِكَةًۭ ۙ
फ़रिश्ते
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَا
बनाया हमने
عِدَّتَهُمْ
उनकी तादाद को
إِلَّا
मगर
فِتْنَةًۭ
एक फ़ितना
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِيَسْتَيْقِنَ
ताकि यक़ीन कर लें
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَيَزْدَادَ
और ज़्यादा हो जाऐं
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
إِيمَـٰنًۭا ۙ
ईमान में
وَلَا
और ना
يَرْتَابَ
शक करें
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۙ
और मोमिन
وَلِيَقُولَ
और ताकि कहें
ٱلَّذِينَ
वो लोग
فِى
in
قُلُوبِهِم
जिनके दिलों में
مَّرَضٌۭ
बीमारी है
وَٱلْكَـٰفِرُونَ
और काफ़िर
مَاذَآ
क्या कुछ
أَرَادَ
इरादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَـٰذَا
साथ इस
مَثَلًۭا ۚ
मिसाल के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُضِلُّ
भटका देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَمَا
और नहीं
يَعْلَمُ
जानता
جُنُودَ
लश्करों को
رَبِّكَ
आपके रब के
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
وَمَا
और नहीं
هِىَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرَىٰ
नसीहत
لِلْبَشَرِ
इन्सान के लिए
और हमने उस आग पर नियुक्त रहनेवालों को फ़रिश्ते ही बनाया है, और हमने उनकी संख्या को इनकार करनेवालों के लिए मुसीबत और आज़माइश ही बनाकर रखा है। ताकि वे लोग जिन्हें किताब प्रदान की गई थी पूर्ण विश्वास प्राप्त करें, और वे लोग जो ईमान ले आए वे ईमान में और आगे बढ़ जाएँ। और जिन लोगों को किताब प्रदान की गई वे और ईमानवाले किसी संशय मे न पड़े, और ताकि जिनके दिलों मे रोग है वे और इनकार करनेवाले कहें, "इस वर्णन से अल्लाह का क्या अभिप्राय है?" इस प्रकार अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता हैं संमार्ग प्रदान करता है। और तुम्हारे रब की सेनाओं को स्वयं उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह तो मनुष्य के लिए मात्र एक शिक्षा-सामग्री है
तफ़्सीर:
हमने जहन्नम के रक्षक के तौर पर केवल फ़रिश्तों को नियुक्त किया है, जिनसे मुक़ाबला करने की शक्ति इनसान के पास नहीं है। तथा हमने उनकी यह संख्या केवल अल्लाह का इनकार करने वालों के परीक्षण के तौर पर रखी है, ताकि वे इस तरह की बातें कहें, फिर उनकी यातना में वृद्धि कर दी जाए। और ताकि यहूदियों को, जिन्हें तौरात दी गई है, और ईसाइयों को, जिन्हें इंजील दी गई है, क़ुरआन द्वारा उनकी किताबों की बातों की पुष्टि करने के कारण विश्वास हो जाए। तथा ईमान वालों के ईमान में वृद्धि हो जाए जब पुस्तक के लोग (यहूदी एवं ईसाई) उनके साथ सहमत हों। और यहूदी, ईसाई और ईमान वाले किसी संदेह में न पड़ें। और ताकि ईमान में संकोच करने वाले और काफ़िर लोग कहें : इस विचित्र संख्या से अल्लाह का क्या उद्देश्य है?! जिस तरह इस संख्या का इनकार करने वाले को गुमराह किया गया है और उसकी पुष्टि करने वाले को हिदायत दी गई है, उसी तरह अल्लाह जिसे गुमराह करना चाहे, उसे गुमराह करता है और जिसे हिदायत देना चाहे, उसे हिदायत देता है। और तेरे रब की सेनाओं को उनकी बहुतायत के कारण, उस महिमावान् के सिवा कोई नहीं जानता। और जहन्नम तो मनुष्यों को मात्र याद दिलाने के लिए है, जिससे वे सर्वशक्तिमान अल्लाह की महानता को जानते हैं।
आयत 32
كَلَّا وَٱلْقَمَرِ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
وَٱلْقَمَرِ
क़सम है चाँद की
कुछ नहीं, साक्षी है चाँद
तफ़्सीर:
बात वैसी नहीं है, जैसा कि कुछ मुश्रिकों ने दावा किया है कि उसके साथी जहन्नम की रक्षा पर नियुक्त फ़रिश्तों का काम तमाम करने के पर्याप्त हैं। अल्लाह ने चाँद की क़सम खाई है।
आयत 33
وَٱلَّيْلِ إِذْ أَدْبَرَ
وَٱلَّيْلِ
और रात की
إِذْ
जब
أَدْبَرَ
वो पलट जाए
और साक्षी है रात जबकि वह पीठ फेर चुकी,
तफ़्सीर:
और रात की क़सम खाई है, जब वह जाने लगे।
आयत 34
وَٱلصُّبْحِ إِذَآ أَسْفَرَ
وَٱلصُّبْحِ
और सुबह की
إِذَآ
जब
أَسْفَرَ
वो रौशन हो जाए
और प्रातःकाल जबकि वह पूर्णरूपेण प्रकाशित हो जाए।
तफ़्सीर:
और सुबह की क़सम खाई है, जब वह अच्छी तरह प्रकाशित हो जाए।
आयत 35
إِنَّهَا لَإِحْدَى ٱلْكُبَرِ
إِنَّهَا
बिलाशुबा वो (जहन्नम)
لَإِحْدَى
अलबत्ता एक है
ٱلْكُبَرِ
बहुत बड़ी चीज़ों में से
निश्चय ही वह भारी (भयंकर) चीज़ों में से एक है,
तफ़्सीर:
निःसंदेह जहन्नम की आग निश्चय महान आपदाओं में से एक है।
आयत 36
نَذِيرًۭا لِّلْبَشَرِ
نَذِيرًۭا
डराने वाली है
لِّلْبَشَرِ
इन्सान को
मनुष्यों के लिए सावधानकर्ता के रूप में,
तफ़्सीर:
लोगों को डराने और भय दिखाने के लिए है।
आयत 37
لِمَن شَآءَ مِنكُمْ أَن يَتَقَدَّمَ أَوْ يَتَأَخَّرَ
لِمَن
उसके लिए जो
شَآءَ
चाहे
مِنكُمْ
तुम में से
أَن
कि
يَتَقَدَّمَ
वो आगे बढ़े
أَوْ
या
يَتَأَخَّرَ
वो पीछे रहे
तुममें से उस व्यक्ति के लिए जो आगे बढ़ना या पीछे हटना चाहे
तफ़्सीर:
तुममें से (ऐ लोगो) उस व्यक्ति के लिए, जो ईमान और सत्कर्म के साथ आगे बढ़ना चाहे या कुफ़्र एवं गुनाह के साथ पीछे हटना चाहे।
आयत 38
كُلُّ نَفْسٍۭ بِمَا كَسَبَتْ رَهِينَةٌ
كُلُّ
हर
نَفْسٍۭ
नफ़्स
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبَتْ
उसने कमाई की
رَهِينَةٌ
रहन है
प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ उसने कमाया उसके बदले रेहन (गिरवी) है,
तफ़्सीर:
हर प्राणी की उसके किए हुए कर्मों पर पकड़ होगी। चुनाँचे या तो उसके कर्म उसका विनाश कर देंगे, और या तो उसे विनाश से बचा लेंगे।
आयत 39
إِلَّآ أَصْحَـٰبَ ٱلْيَمِينِ
إِلَّآ
सिवाय
أَصْحَـٰبَ
(the) companions
ٱلْيَمِينِ
दाऐं हाथ वालों के
सिवाय दाएँवालों के
तफ़्सीर:
सिवाय मोमिनों के। क्योंकि उनके गुनाहों के कारण उनकी पकड़ नहीं होगी। बल्कि उनके अच्छे कामों के कारण उनके पापों को क्षमा कर दिया जाएगा।
आयत 40
فِى جَنَّـٰتٍۢ يَتَسَآءَلُونَ
فِى
In
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
يَتَسَآءَلُونَ
सवाल कर रहे होंगे
वे बाग़ों में होंगे, पूछ-ताछ कर रहे होंगे
तफ़्सीर:
वे क़ियामत के दिन जन्नतों में एक-दूसरे से पूछेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन आमाल के गिरवी होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर इंसान अपने अमल का ज़िम्मेदार है, सिवाय उनके जो नेक अमल करते हैं।
आयत 41
عَنِ ٱلْمُجْرِمِينَ
عَنِ
About
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों से
अपराधियों के विषय में
तफ़्सीर:
उन काफ़िरों के बारे में, जिन्होंने पाप करके स्वयं को नष्ट कर दिया।
आयत 42
مَا سَلَكَكُمْ فِى سَقَرَ
مَا
किस चीज़ ने
سَلَكَكُمْ
दाख़िल किया तुम्हें
فِى
into
سَقَرَ
दोज़ख़ में
"तुम्हे क्या चीज़ सकंर (जहन्नम) में ले आई?"
तफ़्सीर:
वे उनसे कहेंगे : तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम में ले आई?
आयत 43
قَالُوا۟ لَمْ نَكُ مِنَ ٱلْمُصَلِّينَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
لَمْ
ना
نَكُ
थे हम
مِنَ
of
ٱلْمُصَلِّينَ
नमाज़ पढ़ने वालों में से
वे कहेंगे, "हम नमाज़ अदा करनेवालों में से न थे।
तफ़्सीर:
तो काफ़िर लोग उन्हें जवाब देते हुए कहेंगे : हम उन लोगों में से नहीं थे, जो दुनिया के जीवन में फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ा करते थे।
आयत 44
وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ ٱلْمِسْكِينَ
وَلَمْ
और ना
نَكُ
थे हम
نُطْعِمُ
हम खाना खिलाते
ٱلْمِسْكِينَ
मिसकीन को
और न हम मुहताज को खाना खिलाते थे
तफ़्सीर:
और हम निर्धन को अल्लाह के दिए हुए धन से भोजन नहीं कराते थे।
आयत 45
وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ ٱلْخَآئِضِينَ
وَكُنَّا
और थे हम
نَخُوضُ
हम बहस करते
مَعَ
साथ
ٱلْخَآئِضِينَ
बहस करने वालों के
"और व्यर्थ बात और कठ-हुज्जती में पड़े रहनेवालों के साथ हम भी उसी में लगे रहते थे।
तफ़्सीर:
हम झूठे लोगों के साथ थे, वे जहाँ भी गए हम उनके साथ घूमते थे और गुमराह तथा भटके हुए लोगों के साथ बातों में लगे रहते थे।
आयत 46
وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
وَكُنَّا
और थे हम
نُكَذِّبُ
हम झुठलाते
بِيَوْمِ
दिन को
ٱلدِّينِ
बदले के
और हम बदला दिए जाने के दिन को झुठलाते थे,
तफ़्सीर:
और हम बदले के दिन को झुठलाया करते थे।
आयत 47
حَتَّىٰٓ أَتَىٰنَا ٱلْيَقِينُ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
أَتَىٰنَا
आ गई हमारे पास
ٱلْيَقِينُ
यक़ीनी चीज़ (मौत)
"यहाँ तक कि विश्वसनीय चीज़ (प्रलय-दिवस) में हमें आ लिया।"
तफ़्सीर:
हम इसे नकारते रहे यहाँ तक कि मौत हमारे पास आ गई और उसने हमें तौबा करने से रोक दिया।
आयत 48
فَمَا تَنفَعُهُمْ شَفَـٰعَةُ ٱلشَّـٰفِعِينَ
فَمَا
तो ना
تَنفَعُهُمْ
काम आएगी उन्हें
شَفَـٰعَةُ
सिफ़ारिश
ٱلشَّـٰفِعِينَ
सिफ़ारिशियों की
अतः सिफ़ारिश करनेवालों को कोई सिफ़ारिश उनको कुछ लाभ न पहुँचा सकेगी
तफ़्सीर:
चुनाँचे सिफ़ारिश करने वाले फ़रिश्तों, नबियों और सदाचारियों की मध्यस्थता (सिफ़ारिश) क़ियामत के दिन उन्हें कुछ लाभ न देगी। क्योंकि अल्लाह के यहाँ सिफ़ारिश क़बूल होने की शर्तों में से एक अल्लाह का उस बंदे से राज़ी होना है, जिसके लिए सिफ़ारिश की जा रही है।
आयत 49
فَمَا لَهُمْ عَنِ ٱلتَّذْكِرَةِ مُعْرِضِينَ
فَمَا
तो क्या है
لَهُمْ
उन्हें
عَنِ
(that) from
ٱلتَّذْكِرَةِ
नसीहत से
مُعْرِضِينَ
ऐराज़ करने वाले हैं
आख़िर उन्हें क्या हुआ है कि वे नसीहत से कतराते है,
तफ़्सीर:
किस चीज़ ने इन काफ़िरों को क़ुरआन से मुँह मोड़ने वाला बना दिया है?!
आयत 50
كَأَنَّهُمْ حُمُرٌۭ مُّسْتَنفِرَةٌۭ
كَأَنَّهُمْ
गोया की वो
حُمُرٌۭ
गधे हैं
مُّسْتَنفِرَةٌۭ
सख़्त बिदकने वाले
मानो वे बिदके हुए जंगली गधे है
तफ़्सीर:
वे क़ुरआन से मुँह मोड़ने और उससे भागने में सख़्त बिदकने वाले जंगली गधों जैसे मालूम होते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गुनाहगारों से सवाल (नमाज़ न पढ़ना, गरीब को न खिलाना) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नमाज़ की पाबंदी और गरीबों की मदद दोनों जन्नत की तरफ ले जाने वाले अमल हैं।
आयत 51
فَرَّتْ مِن قَسْوَرَةٍۭ
فَرَّتْ
जो भागे हों
مِن
from
قَسْوَرَةٍۭ
शेर से
जो शेर से (डरकर) भागे है?
तफ़्सीर:
जो शेर से डरकर भाग खड़े हुए हैं।
आयत 52
بَلْ يُرِيدُ كُلُّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ أَن يُؤْتَىٰ صُحُفًۭا مُّنَشَّرَةًۭ
بَلْ
बल्कि
يُرِيدُ
चाहता है
كُلُّ
हर
ٱمْرِئٍۢ
आदमी
مِّنْهُمْ
उनमें से
أَن
कि
يُؤْتَىٰ
वो दिया जाए
صُحُفًۭا
सहीफ़े
مُّنَشَّرَةًۭ
खुले हुए
नहीं, बल्कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसे खुली किताबें दी जाएँ
तफ़्सीर:
बल्कि इन मुश्रिकों में से हर व्यक्ति चाहता है कि उसके सिर के पास एक खुली किताब हो, जो उसे बताए कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। और इसका कारण प्रमाणों की कमी या तर्कों का कमज़ोर होना नहीं है, बल्कि इसका कारण हठ और घमंड है।
आयत 53
كَلَّا ۖ بَل لَّا يَخَافُونَ ٱلْـَٔاخِرَةَ
كَلَّا ۖ
हरगिज़ नहीं
بَل
बल्कि
لَّا
not
يَخَافُونَ
नहीं वे ख़ौफ़ रखते
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत का
कदापि नहीं, बल्कि ले आख़िरत से डरते नहीं
तफ़्सीर:
मामला यह नहीं है। बल्कि उनके गुमराही में में बने रहने का कारण यह है कि वे आख़िरत की यातना पर ईमान नहीं रखते हैं। इसलिए वे अपने कुफ़्र पर बने हुए हैं।
आयत 54
كَلَّآ إِنَّهُۥ تَذْكِرَةٌۭ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
تَذْكِرَةٌۭ
एक नसीहत है
कुछ नहीं, वह तो एक अनुस्मति है
तफ़्सीर:
सुन लो, निःसंदेह यह क़ुरआन एक उपदेश और याददेहानी है।
आयत 55
فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ
فَمَن
पस जो कोई
شَآءَ
चाहे
ذَكَرَهُۥ
नसीहत हासिल करे उससे
अब जो कोई चाहे इससे नसीहत हासिल करे,
तफ़्सीर:
अतः जो क़ुरआन पढ़ना और उससे नसीहत हासिल करना चाहे, वह उसे पढ़े और उससे नसीहत हासिल करे।
आयत 56
وَمَا يَذْكُرُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ هُوَ أَهْلُ ٱلتَّقْوَىٰ وَأَهْلُ ٱلْمَغْفِرَةِ
وَمَا
और नहीं
يَذْكُرُونَ
वो नसीहत हासिल करेंगे
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
هُوَ
वो ही
أَهْلُ
लायक़ है
ٱلتَّقْوَىٰ
तक़्वा के
وَأَهْلُ
और लायक़ है
ٱلْمَغْفِرَةِ
बख़्शने के
और वे नसीहत हासिल नहीं करेंगे। यह और बात है कि अल्लाह ही ऐसा चाहे। वही इस योग्य है कि उसका डर रखा जाए और इस योग्य भी कि क्षमा करे
तफ़्सीर:
वे नसीहत हासिल नहीं करेंगे, परंतु यह कि अल्लाह चाहे कि वे नसीहत हासिल करें। वह पवित्र अल्लाह इस योग्य है कि उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरा जाए। तथा वह इस योग्य है कि अपने बंदों के गुनाहों को माफ़ कर दे, यदि वे उसके समक्ष तौबा करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नसीहत से मुंह मोड़ने वालों की मज़म्मत के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि नसीहत को कबूल करना या न करना इंसान की अपनी मर्ज़ी पर है, मगर अंजाम भी अपने अमल के मुताबिक भुगतना होगा।
मेरा एक्शन प्लान

⚠️ कुछ गलत लगा?

अगर आपको इस पेज पर कोई ग़लती (तर्जुमा, तथ्य, या कुछ और) दिखी हो, तो हमें बताएं — हम जांच करके ठीक करेंगे।

0%