नाम का मतलब
कयामत (कयामत के दिन की कसम और उसके मंज़र के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-क़ियामा में कयामत के दिन के यकीन, इंसान की तख्लीक की मिसाल और कुरआन याद करने के आदाब का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इसमें नबी ﷺ को वही याद करने में जल्दबाज़ी न करने की हिदायत है, यह हमें सब्र और इत्मीनान से सीखने की तालीम देता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ لَآ أُقْسِمُ بِيَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ
لَآ
Nay
أُقْسِمُ
नहीं मैं क़सम खाता हूँ
بِيَوْمِ
दिन की
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
नहीं, मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने क़ियामत के दिन की क़सम खाई है, जिस दिन लोग सर्व संसार के पालनहार के सामने खड़े होंगे।
आयत 2
وَلَآ أُقْسِمُ بِٱلنَّفْسِ ٱللَّوَّامَةِ
وَلَآ
और नहीं
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
بِٱلنَّفْسِ
नफ़्स की
ٱللَّوَّامَةِ
मलामत करने वाले
और नहीं! मैं कसम खाता हूँ मलामत करनेवाली आत्मा की
तफ़्सीर:
तथा अल्लाह ने अच्छी आत्मा की क़सम खाई है, जो इनसान को अच्छे काम में कोताही करने पर और बुरे कामों के करने पर मलामत (निंदा) करती है। अल्लाह ने इन दोनों चीज़ों की क़सम खाकर कहा है कि वह लोगों को हिसाब और बदले के लिए ज़रूर पुनर्जीवित करेगा।
आयत 3
أَيَحْسَبُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَلَّن نَّجْمَعَ عِظَامَهُۥ
أَيَحْسَبُ
क्या समझता है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
أَلَّن
कि हरगिज़ नहीं
نَّجْمَعَ
हम जमा करेंगे
عِظَامَهُۥ
उसकी हड्डियाँ
क्या मनुष्य यह समझता है कि हम कदापि उसकी हड्डियों को एकत्र न करेंगे?
तफ़्सीर:
क्या इनसान यह सोचता है कि पुनर्जीवित करने के लिए उसकी मृत्यु के बाद हम उसकी हड्डियों को इकट्ठा नहीं करेंगे?!
आयत 4
بَلَىٰ قَـٰدِرِينَ عَلَىٰٓ أَن نُّسَوِّىَ بَنَانَهُۥ
بَلَىٰ
क्यों नहीं
قَـٰدِرِينَ
क़ादिर हैं
عَلَىٰٓ
उस पर
أَن
कि
نُّسَوِّىَ
हम दुरुस्त कर दें
بَنَانَهُۥ
उसके पोर-पोर को
क्यों नहीं, हम उसकी पोरों को ठीक-ठाक करने की सामर्थ्य रखते है
तफ़्सीर:
क्यों नहीं? हम उनको एकत्र करने के साथ-साथ, उसकी उँगलियों की पोरों को पहले की तरह बिलकुल ठीक करने की भी शक्ति रखते हैं।
आयत 5
بَلْ يُرِيدُ ٱلْإِنسَـٰنُ لِيَفْجُرَ أَمَامَهُۥ
بَلْ
बल्कि
يُرِيدُ
चाहता है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
لِيَفْجُرَ
कि वो गुनाह करता रहे
أَمَامَهُۥ
अपने आगे भी
बल्कि मनुष्य चाहता है कि अपने आगे ढिठाई करता रहे
तफ़्सीर:
बल्कि इनसान मरणोपरांत दोबारा उठाए जाने का इनकार करके यह चाहता है कि वह आगे भी किसी रोक-टोक के बिना कुकर्म करता चला जाए।
आयत 6
يَسْـَٔلُ أَيَّانَ يَوْمُ ٱلْقِيَـٰمَةِ
يَسْـَٔلُ
वो पूछता है
أَيَّانَ
कब है
يَوْمُ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत का
पूछता है, "आख़िर क़ियामत का दिन कब आएगा?"
तफ़्सीर:
वह असंभव समझते हुए क़ियामत के दिन के बारे में पूछता है : वह कब होगा?
आयत 7
فَإِذَا بَرِقَ ٱلْبَصَرُ
فَإِذَا
फिर जब
بَرِقَ
चौंधिया जाऐंगी
ٱلْبَصَرُ
आँखें
तो जब निगाह चौंधिया जाएगी,
तफ़्सीर:
जब आँख उस चीज़ को देखकर चौंधिया जाएगी और चकित रह जाएगी, जिसे वह दुनिया में झुठलाया करता था।
आयत 8
وَخَسَفَ ٱلْقَمَرُ
وَخَسَفَ
और बेनूर हो जाएगा
ٱلْقَمَرُ
चाँद
और चन्द्रमा को ग्रहण लग जाएगा,
तफ़्सीर:
और चाँद की रोशनी चली जाएगी।
आयत 9
وَجُمِعَ ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ
وَجُمِعَ
और जमा कर दिए जाऐंगे
ٱلشَّمْسُ
सूरज
وَٱلْقَمَرُ
और चाँद
और सूर्य और चन्द्रमा इकट्ठे कर दिए जाएँगे,
तफ़्सीर:
और सूरज एवं चाँद इकट्ठे कर दिए जाएँगे।
आयत 10
يَقُولُ ٱلْإِنسَـٰنُ يَوْمَئِذٍ أَيْنَ ٱلْمَفَرُّ
يَقُولُ
कहेगा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
أَيْنَ
कहाँ है
ٱلْمَفَرُّ
फ़रार की जगह
उस दिन मनुष्य कहेगा, "कहाँ जाऊँ भागकर?"
तफ़्सीर:
उस दिन कुकर्मी इनसान कहेगा कि भागने का स्थान कहाँ है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन की कसम और इंसान की हड्डियां जोड़ने की कुदरत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जो अल्लाह इंसान की उंगलियों के निशान तक दोबारा बना सकता है, वह कयामत में इंसान को दोबारा ज़िंदा कर सकता है।
आयत 11
كَلَّا لَا وَزَرَ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
لَا
(There is) no
وَزَرَ
नहीं कोई जाएपनाह
कुछ नहीं, कोई शरण-स्थल नहीं!
तफ़्सीर:
उस दिन भागने का कोई अवसर न होगा और न ही कोई शरण स्थल होगा, जहाँ कुकर्मी शरण ले सके और न कोई बचने का स्थान होगा, जहाँ पहुँचकर बच सके।
आयत 12
إِلَىٰ رَبِّكَ يَوْمَئِذٍ ٱلْمُسْتَقَرُّ
إِلَىٰ
To
رَبِّكَ
तरफ़ आपके रब के
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
ٱلْمُسْتَقَرُّ
ठिकाना है
उस दिन तुम्हारे रब ही ओर जाकर ठहरना है
तफ़्सीर:
उस दिन (ऐ रसूल) तेरे पालनहार ही की ओर हिसाब और प्रतिफल के लिए लौटकर जाना होगा।
आयत 13
يُنَبَّؤُا۟ ٱلْإِنسَـٰنُ يَوْمَئِذٍۭ بِمَا قَدَّمَ وَأَخَّرَ
يُنَبَّؤُا۟
ख़बर दिया जाएगा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
يَوْمَئِذٍۭ
उस दिन
بِمَا
उसकी जो
قَدَّمَ
उसने आगे भेजा
وَأَخَّرَ
और उसने पीछे छोड़ा
उस दिन मनुष्य को बता दिया जाएगा जो कुछ उसने आगे बढाया और पीछे टाला
तफ़्सीर:
उस दिन इनसान को उसके कर्मों के बारे में सूचित किया जाएगा कि क्या उसने आगे भेजा और क्या उसने पीछे छोड़ा।
आयत 14
بَلِ ٱلْإِنسَـٰنُ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ بَصِيرَةٌۭ
بَلِ
बल्कि
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
عَلَىٰ
against
نَفْسِهِۦ
अपने नफ़्स पर
بَصِيرَةٌۭ
ख़ूब नज़र रखने वाला है
नहीं, बल्कि मनुष्य स्वयं अपने हाल पर निगाह रखता है,
तफ़्सीर:
बल्कि मनुष्य खुद के खिलाफ़ एक गवाह है, क्योंकि उसके शरीर के अंग उसके खिलाफ़ गवाही देंगे कि उसने क्या पाप किए हैं।
आयत 15
وَلَوْ أَلْقَىٰ مَعَاذِيرَهُۥ
وَلَوْ
और अगरचे
أَلْقَىٰ
वो डाले
مَعَاذِيرَهُۥ
मआज़रतें अपनी
यद्यपि उसने अपने कितने ही बहाने पेश किए हो
तफ़्सीर:
यद्यपि वह तरह-तरह के बहाने पेश करके अपने बारे में यह तर्क दे कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है, लेकिन इसका उसे कुछ लाभ नहीं होगा।
आयत 16
لَا تُحَرِّكْ بِهِۦ لِسَانَكَ لِتَعْجَلَ بِهِۦٓ
لَا
Not
تُحَرِّكْ
ना आप हरकत दीजिए
بِهِۦ
साथ उसके
لِسَانَكَ
अपनी ज़बान को
لِتَعْجَلَ
ताकि आप जल्दी (याद) करें
بِهِۦٓ
उसको
तू उसे शीघ्र पाने के लिए उसके प्रति अपनी ज़बान को न चला
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) क़ुरआन के साथ अपनी ज़ुबान को न हिलाएँ इस बात के लिए जल्दी करते हुए कि कहीं वह आपकी याददाश्त से निकल न जाए।
आयत 17
إِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهُۥ وَقُرْءَانَهُۥ
إِنَّ
बेशक
عَلَيْنَا
हम पर ही है
جَمْعَهُۥ
जमा करना उसका
وَقُرْءَانَهُۥ
और पढ़ना उसका
हमारे ज़िम्मे है उसे एकत्र करना और उसका पढ़ना,
तफ़्सीर:
निश्चय यह काम हमारे ही ज़िम्मे है कि हम उसे आपके सीने में एकत्र कर दें और उसके पठन को आपकी ज़ुबान पर साबित कर दें।
आयत 18
فَإِذَا قَرَأْنَـٰهُ فَٱتَّبِعْ قُرْءَانَهُۥ
فَإِذَا
फिर जब
قَرَأْنَـٰهُ
पढ़ें हम उसे
فَٱتَّبِعْ
तो पैरवी कीजिए आप
قُرْءَانَهُۥ
उसके पढ़ने की
अतः जब हम उसे पढ़े तो उसके पठन का अनुसरण कर,
तफ़्सीर:
अतः जब हमारे संदेष्टा जिबरील उसे आपके सामने पढ़ें, तो आप उसके पठन को कान लगाकर सुनें और ख़ामोश रहें।
आयत 19
ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا بَيَانَهُۥ
ثُمَّ
फिर
إِنَّ
बेशक
عَلَيْنَا
हमारे ही ज़िम्मे है
بَيَانَهُۥ
उसे बयान करना
फिर हमारे ज़िम्मे है उसका स्पष्टीकरण करना
तफ़्सीर:
फिर उसकी व्याख्या करना और आपको उसका अर्थ बताना भी हमारी ज़िम्मेदारी है।
आयत 20
كَلَّا بَلْ تُحِبُّونَ ٱلْعَاجِلَةَ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
بَلْ
बल्कि
تُحِبُّونَ
तुम पसंद करते हो
ٱلْعَاجِلَةَ
जल्द मिलने वाली (दुनिया) को
कुछ नहीं, बल्कि तुम लोग शीघ्र मिलनेवाली चीज़ (दुनिया) से प्रेम रखते हो,
तफ़्सीर:
हरगिज़ नहीं, मामला वैसा नहीं है, जैसा तुमने मरणोपरांत पुनर्जीवित होने की असंभवता का दावा किया है। क्योंकि तुम खुद जानते हो कि जो तुम्हें शुरुआत में पैदा करने में सक्षम है, वह तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हें पुनर्जीवित करने में असमर्थ नहीं होगा। लेकिन तुम्हारे मरणोपरांत पुनर्जीवित होकर उठने के इनकार का कारण इस नश्वर दुनिया से तुम्हारा प्यार है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वही याद करने में जल्दबाज़ी न करने की हिदायत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कोई भी नई चीज़ सीखते वक्त जल्दबाज़ी की बजाय सब्र और तवज्जो से सीखना बेहतर नतीजे देता है।
आयत 21
وَتَذَرُونَ ٱلْـَٔاخِرَةَ
وَتَذَرُونَ
और तुम छोड़ देते हो
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत को
और आख़िरत को छोड़ रहे हो
तफ़्सीर:
तथा तुम्हारा आख़िरत के जीवन को छोड़ देना है, जिसका रास्ता अल्लाह के आदेशों का पालन करना और उसकी हराम की हुई चीज़ों से बचना है।
आयत 22
وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ نَّاضِرَةٌ
وُجُوهٌۭ
कुछ चेहरे
يَوْمَئِذٍۢ
उस रोज़
نَّاضِرَةٌ
तरो ताज़ा होंगे
किनते ही चहरे उस दिन तरो ताज़ा और प्रफुल्लित होंगे,
तफ़्सीर:
उस दिन ईमान और सौभाग्य वालों के चेहरे सुंदर और प्रकाशमान् होंगे।
आयत 23
إِلَىٰ رَبِّهَا نَاظِرَةٌۭ
إِلَىٰ
Towards
رَبِّهَا
अपने रब की तरफ़
نَاظِرَةٌۭ
देखने वाले
अपने रब की ओर देख रहे होंगे।
तफ़्सीर:
वे अपने रब की ओर देख रहे होंगे और उससे आनंदित हो रहे होंगे।
आयत 24
وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۭ بَاسِرَةٌۭ
وَوُجُوهٌۭ
और कुछ चेहरे
يَوْمَئِذٍۭ
उस रोज़
بَاسِرَةٌۭ
बेरौनक़ होंगे
और कितने ही चेहरे उस दिन उदास और बिगड़े हुए होंगे,
तफ़्सीर:
और काफ़िरों तथा दुर्भाग्यशाली लोगों के चेहरे उस दिन बिगड़े हुए होंगे।
आयत 25
تَظُنُّ أَن يُفْعَلَ بِهَا فَاقِرَةٌۭ
تَظُنُّ
वो समझ रहे होंगे
أَن
कि
يُفْعَلَ
किया जाएगा
بِهَا
साथ उनके
فَاقِرَةٌۭ
कमर तोड़ देने वाला
समझ रहे होंगे कि उनके साथ कमर तोड़ देनेवाला मामला किया जाएगा
तफ़्सीर:
उन्हें विश्वास होगा कि उनपर बड़ी सज़ा और दर्दनाक यातना उतरने वाली है।
आयत 26
كَلَّآ إِذَا بَلَغَتِ ٱلتَّرَاقِىَ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِذَا
जब
بَلَغَتِ
पहुँच जाएगी
ٱلتَّرَاقِىَ
(जान) हलक़ को
कुछ नहीं, जब प्राण कंठ को आ लगेंगे,
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा मुश्रिकों ने समझ लिया है कि जब वे मर जाएँगे तो उन्हें यातना का सामना नहीं होगा। जब तुममें से किसी का प्राण उसके सीने के ऊपरी भाग (हँसली) तक पहुँच जाएगा।
आयत 27
وَقِيلَ مَنْ ۜ رَاقٍۢ
وَقِيلَ
और कह दिया जाएगा
مَنْ ۜ
कौन है
رَاقٍۢ
झाड़ फ़ूँक करने वाला
और कहा जाएगा, "कौन है झाड़-फूँक करनेवाला?"
तफ़्सीर:
और कुछ लोग एक-दूसरे से कहेंगे : कौन इसकी झाड़-फूँक करेगा, शायद वह ठीक हो जाए!?
आयत 28
وَظَنَّ أَنَّهُ ٱلْفِرَاقُ
وَظَنَّ
और वो समझ लेगा
أَنَّهُ
कि बेशक वो
ٱلْفِرَاقُ
जुदाई का वक़्त है
और वह समझ लेगा कि वह जुदाई (का समय) है
तफ़्सीर:
और जो उस समय मरणासन्न दशा में होगा, उसे विश्वास हो जाएगा कि यह मौत के द्वारा दुनिया से जुदाई की घड़ी है।
आयत 29
وَٱلْتَفَّتِ ٱلسَّاقُ بِٱلسَّاقِ
وَٱلْتَفَّتِ
और लिपट जाएगी
ٱلسَّاقُ
पिंडली
بِٱلسَّاقِ
साथ पिंडली के
और पिंडली से पिंडली लिपट जाएगी,
तफ़्सीर:
इस दुनिया के अंत और इसके बाद की दुनिया (आख़रित) की शुरुआत में कठिनाइयाँ एकत्र हो जाएँगी।
आयत 30
إِلَىٰ رَبِّكَ يَوْمَئِذٍ ٱلْمَسَاقُ
إِلَىٰ
To
رَبِّكَ
आपके रब ही की तरफ़
يَوْمَئِذٍ
उस रोज़
ٱلْمَسَاقُ
रवानगी है
तुम्हारे रब की ओर उस दिन प्रस्थान होगा
तफ़्सीर:
ऐसा घटित होने पर मृतक को उसके पालनहार के पास ले जाया जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया-आखिरत की चाहत के फर्क और मौत के वक्त के मंज़र का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मौत के वक्त इंसान को अपनी हकीकत का एहसास होता है, इसलिए ज़िंदगी में ही तैयारी कर लेनी चाहिए।
आयत 31
فَلَا صَدَّقَ وَلَا صَلَّىٰ
فَلَا
पस ना
صَدَّقَ
उसने तस्दीक़ की
وَلَا
और ना
صَلَّىٰ
उसने नमाज़ पढ़ी
किन्तु उसने न तो सत्य माना और न नमाज़ अदा की,
तफ़्सीर:
काफ़िर ने न तो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए संदेश को सत्य माना, और न सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ी।
आयत 32
وَلَـٰكِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَذَّبَ
उसने झुठलाया
وَتَوَلَّىٰ
और उसने मुँह मोड़ लिया
लेकिन झुठलाया और मुँह मोड़ा,
तफ़्सीर:
लेकिन उसने रसूल के लाए हुए संदेश को झुठलाया और उससे दूर हो गया।
आयत 33
ثُمَّ ذَهَبَ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ يَتَمَطَّىٰٓ
ثُمَّ
फिर
ذَهَبَ
वो चला गया
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِهِۦ
तरफ़ अपने घर वालों के
يَتَمَطَّىٰٓ
अकड़ता हुआ
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की ओर चल दिया
तफ़्सीर:
फिर यह काफ़िर अहंकार से अकड़ता हुआ अपने परिवार के पास गया।
आयत 34
أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰ
أَوْلَىٰ
अफ़सोस
لَكَ
तुझ पर
فَأَوْلَىٰ
फिर अफ़सोस
अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
तफ़्सीर:
इसलिए अल्लाह ने काफ़िर को धमकी दी कि अल्लाह की यातना उसके निकट आ चुकी है।
आयत 35
ثُمَّ أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰٓ
ثُمَّ
फिर
أَوْلَىٰ
अफ़सोस
لَكَ
तुझ पर
فَأَوْلَىٰٓ
फिर अफ़सोस
फिर अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
तफ़्सीर:
फिर अल्लाह ने बल देने के लिए इस वाक्य को दोहराया। चुनाँचे फरमाया : ''फि तेरे लिए विनाश है, फिर तेरे लिए बर्बादी है।''
आयत 36
أَيَحْسَبُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَن يُتْرَكَ سُدًى
أَيَحْسَبُ
क्या समझता है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
أَن
कि
يُتْرَكَ
वो छोड़ दिया जाएगा
سُدًى
बेकार
क्या मनुष्य समझता है कि वह यूँ ही स्वतंत्र छोड़ दिया जाएगा?
तफ़्सीर:
क्या इनसान यह समझता है कि अल्लाह उसे शरीयत का बाध्य किए बिना यूँ ही बेकार छोड़ देगा?!
आयत 37
أَلَمْ يَكُ نُطْفَةًۭ مِّن مَّنِىٍّۢ يُمْنَىٰ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَكُ
था वो
نُطْفَةًۭ
एक नुत्फ़ा
مِّن
of
مَّنِىٍّۢ
मनी का
يُمْنَىٰ
जो टपकाया जाता है
क्या वह केवल टपकाए हुए वीर्य की एक बूँद न था?
तफ़्सीर:
क्या यह इनसान किसी दिन गर्भाशय में गिराए जाने वाले वीर्य की एक बूँद नहीं था?!
आयत 38
ثُمَّ كَانَ عَلَقَةًۭ فَخَلَقَ فَسَوَّىٰ
ثُمَّ
फिर
كَانَ
हो गया वो
عَلَقَةًۭ
जमा हुआ ख़ून
فَخَلَقَ
फिर उसने पैदा किया
فَسَوَّىٰ
फिर उसने दुरुस्त कर दिया
फिर वह रक्त की एक फुटकी हुआ, फिर अल्लाह ने उसे रूप दिया और उसके अंग-प्रत्यंग ठीक-ठाक किए
तफ़्सीर:
फिर उसके बाद वह जमे हुए रक्त का टुकड़ा हो गया, फिर अल्लाह ने उसे पैदा किया और उसकी रचना को ठीक-ठाक बनाया।
आयत 39
فَجَعَلَ مِنْهُ ٱلزَّوْجَيْنِ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰٓ
فَجَعَلَ
फिर उसने बनाया
مِنْهُ
उससे
ٱلزَّوْجَيْنِ
जोड़ा
ٱلذَّكَرَ
मर्द
وَٱلْأُنثَىٰٓ
और औरत
और उसकी दो जातियाँ बनाई - पुरुष और स्त्री
तफ़्सीर:
फिर उसने उसकी जाति से दो प्रकार : नर और मादा बनाए।
आयत 40
أَلَيْسَ ذَٰلِكَ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يُحْـِۧىَ ٱلْمَوْتَىٰ
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
ذَٰلِكَ
वो
بِقَـٰدِرٍ
क़ादिर
عَلَىٰٓ
उस पर
أَن
कि
يُحْـِۧىَ
वो ज़िन्दा कर दे
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
क्या उसे वह सामर्थ्य प्राप्त- नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे?
तफ़्सीर:
क्या जिसने मनुष्य को वीर्य फिर जमे हुए रक्त से पैदा किया, वह मरे हुए लोगों को हिसाब और बदले के लिए पुन: जीवित करने में सक्षम नहीं है?! क्यों नहीं, निश्चय वह अवश्य सक्षम है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की तख्लीक की मिसाल के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो अल्लाह इंसान को एक बूंद से बना सकता है, वह उसे दोबारा ज़िंदा करने पर भी कादिर है, इस पर यकीन रखना चाहिए।
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