नाम का मतलब
बड़ी खबर (कयामत की खबर, जिस पर लोग शक करते थे)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नबा में कयामत की बड़ी खबर, कायनात की तख्लीक की निशानियां और जन्नत-दोज़ख़ के अंजाम का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह उन सूरतों में से है जिनकी शुरुआत में मुशरिकों के आपसी सवाल का ज़िक्र है कि वह किस चीज़ के बारे में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं — यानी कयामत की बड़ी खबर के बारे में।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ عَمَّ يَتَسَآءَلُونَ
عَمَّ
किस चीज़ के बारे में
يَتَسَآءَلُونَ
वो आपस में सवाल कर रहे हैं
किस चीज़ के विषय में वे आपस में पूछ-गच्छ कर रहे है?
तफ़्सीर:
ये मुश्रिक लोग, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उनकी ओर भेजे जाने के बाद, किस चीज़ के बारे में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं?!
आयत 2
عَنِ ٱلنَّبَإِ ٱلْعَظِيمِ
عَنِ
About
ٱلنَّبَإِ
उस ख़बर के बारे में
ٱلْعَظِيمِ
जो बहुत बड़ी है
उस बड़ी ख़बर के सम्बन्ध में,
तफ़्सीर:
वे एक-दूसरे से बहुत बड़ी ख़बर के विषय में पूछ रहे हैं। और वह उनके रसूल पर अवतरित यह क़ुरआन है, जिसमें दोबारा उठाए जाने की सूचना है।
आयत 3
ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ
ٱلَّذِى
वो जो
هُمْ
वो
فِيهِ
उसमें
مُخْتَلِفُونَ
इख़्तिलाफ़ करने वाले हैं
जिसमें वे मतभेद रखते है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन है, जिसका वर्णन करने में उनका मतभेद है कि वह जादू है, या कविता, या ज्योतिष या पहले लोगों की कहानियाँ।
आयत 4
كَلَّا سَيَعْلَمُونَ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
سَيَعْلَمُونَ
अनक़रीब वो जान लोंगे
कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा वे समझते हैं। क़ुरआन को झुठलाने वाले ये लोग शीघ्र ही अपने झुठलाने के बुरे परिणाम को जान लेंगे।
आयत 5
ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ
ثُمَّ
फिर
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
سَيَعْلَمُونَ
अनक़रीब वो जान लोंगे
फिर कदापि नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।
तफ़्सीर:
फिर उनके लिए इसकी पुष्टि हो जाएगी।
आयत 6
أَلَمْ نَجْعَلِ ٱلْأَرْضَ مِهَـٰدًۭا
أَلَمْ
क्या नहीं
نَجْعَلِ
हमने बनाया
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
مِهَـٰدًۭا
बिछौना
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को बिछौना बनाया
तफ़्सीर:
क्या हमने धरती को उनके लिए सपाट नहीं बनाया, जो उनके उसपर बसने के लिए उपयुक्त है?!
आयत 7
وَٱلْجِبَالَ أَوْتَادًۭا
وَٱلْجِبَالَ
और पहाड़ों को
أَوْتَادًۭا
मेख़ें
और पहाड़ों को मेख़े?
तफ़्सीर:
और हमने पहाड़ों को धरती के ऊपर मेखों की तरह बनाया, जो उसे हिलने-डुलने से रोकते हैं।
आयत 8
وَخَلَقْنَـٰكُمْ أَزْوَٰجًۭا
وَخَلَقْنَـٰكُمْ
और पैदा किया हमने तुम्हें
أَزْوَٰجًۭا
जोड़ा-जोड़ा
और हमने तुम्हें जोड़-जोड़े पैदा किया,
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो) हमने तुम्हें नर और मादा के रूप में पैदा किया।
आयत 9
وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًۭا
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
نَوْمَكُمْ
तुम्हारी नींद को
سُبَاتًۭا
आराम का ज़रिया
और तुम्हारी नींद को थकन दूर करनेवाली बनाया,
तफ़्सीर:
और हमने तुम्हारी नींद को गतिविधि से रुकने का कारण बनाया, ताकि तुम आराम कर सको।
आयत 10
وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
ٱلَّيْلَ
रात को
لِبَاسًۭا
लिबास
रात को आवरण बनाया,
तफ़्सीर:
और हमने रात को अपने अंधेरे के साथ तुम्हारे लिए आवरण बनाया, जैसे तुम कपड़े से अपनी शर्मगाहों को छिपाते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत की बड़ी खबर और कायनात की तख्लीक की निशानियों (पहाड़, नींद, दिन-रात) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कायनात की हर चीज़ (नींद, दिन-रात) एक मकसद से बनाई गई है, इस पर गौर करना चाहिए।
आयत 11
وَجَعَلْنَا ٱلنَّهَارَ مَعَاشًۭا
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
ٱلنَّهَارَ
दिन को
مَعَاشًۭا
मआश का वक़्त
और दिन को जीवन-वृति के लिए बनाया
तफ़्सीर:
और हमने दिन को कमाने और रोज़ी तलाश करने का समय बनाया।
आयत 12
وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًۭا شِدَادًۭا
وَبَنَيْنَا
और बनाए हमने
فَوْقَكُمْ
ऊपर तुम्हारे
سَبْعًۭا
सात
شِدَادًۭا
मज़बूत (आसमान)
और तुम्हारे ऊपर सात सुदृढ़ आकाश निर्मित किए,
तफ़्सीर:
और हमने तुम्हारे ऊपर मज़बूत तथा सुदृढ़ रूप से निर्मित सात आकाश बनाए।
आयत 13
وَجَعَلْنَا سِرَاجًۭا وَهَّاجًۭا
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
سِرَاجًۭا
एक चिराग़
وَهَّاجًۭا
ख़ूब रौशन
और एक तप्त और प्रकाशमान प्रदीप बनाया,
तफ़्सीर:
और हमने सूरज को तेज़ जलने वाला और रौशनी देने वाला दीप बनाया।
आयत 14
وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلْمُعْصِرَٰتِ مَآءًۭ ثَجَّاجًۭا
وَأَنزَلْنَا
और उतारा हमने
مِنَ
from
ٱلْمُعْصِرَٰتِ
बदलियों से
مَآءًۭ
पानी
ثَجَّاجًۭا
ख़ूब बरसने
और बरस पड़नेवाली घटाओं से हमने मूसलाधार पानी उतारा,
तफ़्सीर:
और हमने उन बादलों से, जो बरसने ही वाले थे, बहुत बरसने वाला पानी उतारा।
आयत 15
لِّنُخْرِجَ بِهِۦ حَبًّۭا وَنَبَاتًۭا
لِّنُخْرِجَ
ताकि हम निकालें
بِهِۦ
उससे
حَبًّۭا
ग़ल्ला
وَنَبَاتًۭا
और नबातात
ताकि हम उसके द्वारा अनाज और वनस्पति उत्पादित करें
तफ़्सीर:
ताकि हम उसके द्वारा विभिन्न प्रकार के अन्न और नाना प्रकार की वनस्पतियाँ उगाएँ।
आयत 16
وَجَنَّـٰتٍ أَلْفَافًا
وَجَنَّـٰتٍ
और बाग़ात
أَلْفَافًا
घने
और सघन बांग़ भी।
तफ़्सीर:
और उसके द्वारा ऐसे बाग़ उगाएँ, जो अपने पेड़ों की शाखाओं के आपस में गुथे होने के कारण गुंजान और घने हैं।
आयत 17
إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ كَانَ مِيقَـٰتًۭا
إِنَّ
बेशक
يَوْمَ
दिन
ٱلْفَصْلِ
फ़ैसले का
كَانَ
है
مِيقَـٰتًۭا
एक मुक़र्रर वक़्त
निस्संदेह फ़ैसले का दिन एक नियत समय है,
तफ़्सीर:
निःसंदेह प्राणियों के बीच निर्णय के दिन का एक समय निर्धारित है, जो टल नहीं सकता।
आयत 18
يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
يُنفَخُ
फूँक दिया जाएगा
فِى
in
ٱلصُّورِ
सूर में
فَتَأْتُونَ
तो तुम आओगे
أَفْوَاجًۭا
फ़ौज दर फ़ौज
जिस दिन नरसिंघा में फूँक मारी जाएगी, तो तुम गिरोह को गिरोह चले आओगे।
तफ़्सीर:
जिस दिन फ़रिश्ता सूर में दूसरी बार फूँक मारेगा, तो (ऐ लोगो) तुम गिरोह के गिरोह चले आओगे।
आयत 19
وَفُتِحَتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ أَبْوَٰبًۭا
وَفُتِحَتِ
और खोल दिया जाएगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
فَكَانَتْ
तो वो हो जाएगा
أَبْوَٰبًۭا
दरवाज़े-दरवाज़े
और आकाश खोल दिया जाएगा तो द्वार ही द्वार हो जाएँगे;
तफ़्सीर:
और आकाश को खोल दिया जाएगा, तो उसमें खुले दरवाज़ों की तरह छेद और दरारें हो जाएँगी।
आयत 20
وَسُيِّرَتِ ٱلْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا
وَسُيِّرَتِ
और चला दिए जाऐंगे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
فَكَانَتْ
तो वो हो जाऐंगे
سَرَابًا
सराब
और पहाड़ चलाए जाएँगे, तो वे बिल्कुल मरीचिका होकर रह जाएँगे
तफ़्सीर:
और पहाड़ों को चलाया जाएगा, यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल में बदल जाएँगे और मरीचिका की तरह हो जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन सूर फूंकने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कयामत का दिन एक फैसले का दिन होगा, जिसकी तैयारी अभी से करनी चाहिए।
आयत 21
إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًۭا
إِنَّ
बेशक
جَهَنَّمَ
जहन्नम
كَانَتْ
है
مِرْصَادًۭا
एक घात
वास्तव में जहन्नम एक घात-स्थल है;
तफ़्सीर:
निश्चय जहन्नम घात लगाकर प्रतीक्षा में है।
आयत 22
لِّلطَّـٰغِينَ مَـَٔابًۭا
لِّلطَّـٰغِينَ
सरकशों के लिए
مَـَٔابًۭا
ठिकाना
सरकशों का ठिकाना है
तफ़्सीर:
ज़ालिमों के लिए लौटने की जगह है, जहाँ वे लौटकर जाएँगे।
आयत 23
لَّـٰبِثِينَ فِيهَآ أَحْقَابًۭا
لَّـٰبِثِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उसमें
أَحْقَابًۭا
मुद्दतों
वस्तुस्थिति यह है कि वे उसमें मुद्दत पर मुद्दत बिताते रहेंगे
तफ़्सीर:
जिसमें वे अंतहीन युगों और कालों तक रहेंगे।
आयत 24
لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًۭا وَلَا شَرَابًا
لَّا
Not
يَذُوقُونَ
ना वो चखेंगे
فِيهَا
उसमें
بَرْدًۭا
कोई ठंडक
وَلَا
और ना
شَرَابًا
कोई पीने की चीज़
वे उसमे न किसी शीतलता का मज़ा चखेगे और न किसी पेय का,
तफ़्सीर:
वे उसमें न ठंडी हवा का स्वाद ले सकेंगे, जो उनसे दोज़ख़ की गर्मी को शांत कर सके, और न ही वे उसमें कोई आनंददायक पेय चखेंगे।
आयत 25
إِلَّا حَمِيمًۭا وَغَسَّاقًۭا
إِلَّا
मगर
حَمِيمًۭا
खौलता पानी
وَغَسَّاقًۭا
और बहती पीप
सिवाय खौलते पानी और बहती पीप-रक्त के
तफ़्सीर:
वे अत्यंत गर्म पानी और जहन्नम के लोगों से बहने वाले मवाद के अलावा कुछ भी नहीं चखेंगे।
आयत 26
جَزَآءًۭ وِفَاقًا
جَزَآءًۭ
बदला है
وِفَاقًا
पूरा-पूरा
यह बदले के रूप में उनके कर्मों के ठीक अनुकूल होगा
तफ़्सीर:
यह उनके कुफ़्र एवं गुमराही के अनुरूप बदला है।
आयत 27
إِنَّهُمْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ حِسَابًۭا
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
لَا
not
يَرْجُونَ
ना वो उम्मीद रखते
حِسَابًۭا
हिसाब की
वास्तव में किसी हिसाब की आशा न रखते थे,
तफ़्सीर:
निश्चय वे दुनिया में इस बात से नहीं डरते थे कि अल्लाह आख़िरत में उनका हिसाब लेगा। क्योंकि वे मरणोपरांत दोबारा जीवित होने में विश्वास नहीं करते थे। अगर वे दोबारा ज़िंदा होने का भय रखते, तो अल्लाह पर अवश्य ईमान लाते और अच्छे कार्य करते।
आयत 28
وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا كِذَّابًۭا
وَكَذَّبُوا۟
और उन्होंने झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
كِذَّابًۭا
बहुत झुठलाना
और उन्होंने हमारी आयतों को ख़ूब झुठलाया,
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने हमारे रसूल पर उतरने वाली हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया।
आयत 29
وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَـٰهُ كِتَـٰبًۭا
وَكُلَّ
और हर
شَىْءٍ
चीज़ को
أَحْصَيْنَـٰهُ
शुमार कर रखा है हमने उसे
كِتَـٰبًۭا
एक किताब मे
और हमने हर चीज़ लिखकर गिन रखी है
तफ़्सीर:
और हमने उनके हर कार्य को संरक्षित कर लिया है और उसे गिन रखा है। और वह उनके कर्मपत्रों में लिखा हुआ है।
आयत 30
فَذُوقُوا۟ فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا
فَذُوقُوا۟
पस चखो
فَلَن
पस हरगिज़ ना
نَّزِيدَكُمْ
हम ज़्यादा देंगे तुम्हें
إِلَّا
मगर
عَذَابًا
अज़ाब
"अब चखो मज़ा कि यातना के अतिरिक्त हम तुम्हारे लिए किसी और चीज़ में बढ़ोत्तरी नहीं करेंगे। "
तफ़्सीर:
अब (ऐ सरकशो) तुम इस स्थायी यातना का मज़ा चखो। हम तुम्हारे लिए यातना पर यातना ही बढ़ाते रहेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़ख़ के अज़ाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सरकशी और झूठ बोलने वालों के लिए संगीन अंजाम रखा गया है, इससे बचना चाहिए।
आयत 31
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا
إِنَّ
बेशक
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
مَفَازًا
कामयाबी है
निस्सदेह डर रखनेवालों के लिए एक बड़ी सफलता है,
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरते हैं, उनके लिए कामयाबी का एक स्थान है, जिसमें वे अपनी मुराद प्राप्त कर लेंगे और वह जन्नत है।
आयत 32
حَدَآئِقَ وَأَعْنَـٰبًۭا
حَدَآئِقَ
बाग़ात
وَأَعْنَـٰبًۭا
और अंगूर हैं
बाग़ है और अंगूर,
तफ़्सीर:
बाग़ और अंगूर हैं।
आयत 33
وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًۭا
وَكَوَاعِبَ
और उभरी छातियों वालियाँ
أَتْرَابًۭا
हम उमर
और नवयौवना समान उम्रवाली,
तफ़्सीर:
और समान आयु वाली नवयुवतियाँ हैं।
आयत 34
وَكَأْسًۭا دِهَاقًۭا
وَكَأْسًۭا
और जाम
دِهَاقًۭا
छलकते हुए
और छलक़ता जाम
तफ़्सीर:
और शराब से भरे हुए जाम हैं।
आयत 35
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا كِذَّٰبًۭا
لَّا
Not
يَسْمَعُونَ
ना वो सुनेंगे
فِيهَا
उसमें
لَغْوًۭا
कोई लग़्व
وَلَا
और ना
كِذَّٰبًۭا
कोई झूठ
वे उसमें न तो कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न कोई झुठलाने की बात
तफ़्सीर:
वे जन्नत में कोई निरर्थक बात नहीं सुनेंगे और न कोई झूठ सुनेंगे और न वे एक-दूसरे को झुठलाएँगे।
आयत 36
جَزَآءًۭ مِّن رَّبِّكَ عَطَآءً حِسَابًۭا
جَزَآءًۭ
बदला है
مِّن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
عَطَآءً
अतिया
حِسَابًۭا
किफ़ायत करने वाला / काफ़ी
यह तुम्हारे रब की ओर से बदला होगा, हिसाब के अनुसार प्रदत्त
तफ़्सीर:
यह सब अल्लाह ने उन्हें अपने उपकार एवं एहसान स्वरूप ऐसा प्रदान दिया है जो व्याप्त एवं पर्याप्त है।
आयत 37
رَّبِّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلرَّحْمَـٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًۭا
رَّبِّ
जो रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है उन दोनों के
ٱلرَّحْمَـٰنِ ۖ
जो रहमान है
لَا
not
يَمْلِكُونَ
ना वो मालिक होंगे
مِنْهُ
उससे
خِطَابًۭا
बात करने के
वह आकाशों और धरती का और जो कुछ उनके बीच है सबका रब है, अत्यन्त कृपाशील है, उसके सामने बात करना उनके बस में नहीं होगा
तफ़्सीर:
जो आकाशों और धरती का पालनहार तथा उन दोनों के बीच की समस्त चीज़ों का पालनहार है, जो दुनिया तथा आख़िरत में अत्यंत दयावान् है। धरती या आकाश में मोजूद लोगों में से किसी को भी उससे पूछने का अधिकार नहीं होगा, सिवाय इसके कि वह उन्हें अनुमति प्रदान कर दे।
आयत 38
يَوْمَ يَقُومُ ٱلرُّوحُ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ صَفًّۭا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَقَالَ صَوَابًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
يَقُومُ
खड़े होंगे
ٱلرُّوحُ
रूहुल अमीन
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्ते
صَفًّۭا ۖ
सफ़ दर सफ़
لَّا
not
يَتَكَلَّمُونَ
ना वो कलाम कर सकेंगे
إِلَّا
मगर
مَنْ
वो जो
أَذِنَ
इजाज़त दे
لَهُ
उसको
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
وَقَالَ
और वो कहे
صَوَابًۭا
बात दुरुस्त
जिस दिन रूह और फ़रिश्ते पक्तिबद्ध खड़े होंगे, वे बोलेंगे नहीं, सिवाय उस व्यक्ति के जिसे रहमान अनुमति दे और जो ठीक बात कहे
तफ़्सीर:
जिस दिन जिबरील और फ़रिश्ते पंक्तिबद्ध खड़े होंगे, वे किसी की सिफ़ारिश के लिए ज़बान नहीं खोलेंगे, सिवाय उसके जिसके लिए अत्यंत दयावान् (अल्लाह) सिफ़ारिश करने की अनुमति प्रदान कर देगा, और वह ठीक बात कहेगा, जैसे तौह़ीद (एकेश्वरवाद) का कलिमा।
आयत 39
ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ مَـَٔابًا
ذَٰلِكَ
ये है
ٱلْيَوْمُ
दिन
ٱلْحَقُّ ۖ
बरहक़
فَمَن
पस जो कोई
شَآءَ
चाहे
ٱتَّخَذَ
बना ले
إِلَىٰ
towards
رَبِّهِۦ
तरफ़ अपने रब के
مَـَٔابًا
ठिकाना
वह दिन सत्य है। अब जो कोई चाहे अपने रब की ओर रुज करे
तफ़्सीर:
यह (दिन) जिसका तुम्हारे सामने वर्णन हुआ, वह दिन है जिसके आने में कोई संदेह नहीं है। अतः जो उस दिन अल्लाह की यातना से बचना चाहता है, वह अपने पालनहार को प्रसन्न करने वाले कार्य करके उसके लिए रास्ता बना ले।
आयत 40
إِنَّآ أَنذَرْنَـٰكُمْ عَذَابًۭا قَرِيبًۭا يَوْمَ يَنظُرُ ٱلْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ ٱلْكَافِرُ يَـٰلَيْتَنِى كُنتُ تُرَٰبًۢا
إِنَّآ
बेशक हम
أَنذَرْنَـٰكُمْ
डरा दिया हमने तुम्हें
عَذَابًۭا
अज़ाब से
قَرِيبًۭا
क़रीब के
يَوْمَ
जिस दिन
يَنظُرُ
देखेगा
ٱلْمَرْءُ
इन्सान
مَا
जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
يَدَاهُ
उसके दोनों हाथों ने
وَيَقُولُ
और कहेगा
ٱلْكَافِرُ
काफ़िर
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
كُنتُ
होता मैं
تُرَٰبًۢا
मिट्टी
हमने तुम्हें निकट आ लगी यातना से सावधान कर दिया है। जिस दिन मनुष्य देख लेगा जो कुछ उसके हाथों ने आगे भेजा, और इनकार करनेवाला कहेगा, "ऐ काश! कि मैं मिट्टी होता!"
तफ़्सीर:
हमने (ऐ लोगो) तुम्हें एक ऐसी यातना से सावधान कर दिया है, जो निकट ही घटित होने वाली है। जिस दिन मनुष्य इस दुनिया में अपने किए हुए काम को देख लेगा, और काफ़िर व्यक्ति यातना से मुक्ति की कामना करते हुए कहेगा : ऐ काश कि मैं जानवरों की तरह मिट्टी हो जाता! यह उस समय कहेगा, जब क़ियामत के दिन जानवरों से कहा जाएगा : तुम मिट्टी हो जाओ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुत्तकीन की जन्नत की नेमतों और कयामत के दिन की हकीकत के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि उस दिन काफिर तमन्ना करेगा कि काश वह मिट्टी हो जाता, इसलिए आज ही सही रास्ता चुन लेना बेहतर है।
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