सूरह سورة النازعات
मक्की 46 आयतें
नाम का मतलब
सख्ती से खींचने वाले (जान कब्ज़ करने वाले फरिश्तों के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नाज़िआत में मौत के फरिश्तों की कसम, कयामत के दिन का मंज़र और मूसा अलैहिस्सलाम-फिरऔन के वाकिये का मुख्तसर ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में दुनिया को आखिरत पर तरजीह देने वालों के अंजाम और आखिरत को तरजीह देने वालों के इनाम का साफ फर्क बताया गया है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلنَّـٰزِعَـٰتِ غَرْقًۭا
وَٱلنَّـٰزِعَـٰتِ
क़सम है (उन फ़रिश्तों की ) जो खींचने वाले हैं
غَرْقًۭا
डूब कर
गवाह है वे (हवाएँ) जो ज़ोर से उखाड़ फैंके,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन फ़रिश्तों की क़सम खाई है, जो बड़ी सख़्ती और अति क्रूरता से काफ़िरों की जान खींचकर निकालते हैं।
आयत 2
وَٱلنَّـٰشِطَـٰتِ نَشْطًۭا
وَٱلنَّـٰشِطَـٰتِ
और जो आसानी से निकालने वाले हैं
نَشْطًۭا
आसानी से निकालना
और गवाह है वे (हवाएँ) जो नर्मी के साथ चलें,
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने उन फ़रिश्तों की क़सम खाई है, जो मोमिनों के प्राण बड़ी आसानी और सरलता से निकालते हैं।
आयत 3
وَٱلسَّـٰبِحَـٰتِ سَبْحًۭا
وَٱلسَّـٰبِحَـٰتِ
और जो तैरने वाले हैं
سَبْحًۭا
तेज़ी से तैरना
और गवाह है वे जो वायुमंडल में तैरें,
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने उन फ़रिश्तों की क़सम खाई है, जो अल्लाह के आदेश से आकाश से धरती की ओर तेज़ी से तैरते हुए आते हैं।
आयत 4
فَٱلسَّـٰبِقَـٰتِ سَبْقًۭا
فَٱلسَّـٰبِقَـٰتِ
फिर जो सबक़त करने वाले हैं
سَبْقًۭا
सबक़त करना
फिर एक-दूसरे से अग्रसर हों,
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने उन फ़रिश्तों की क़सम खाई है, जो उसके आदेश के पालन में एक-दूसरे से आगे बढ़ जाते हैं।
आयत 5
فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًۭا
فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ
फिर जो तदबीर करने वाले हैं
أَمْرًۭا
किसी काम की
और मामले की तदबीर करें
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन फ़रिश्तों की क़सम खाई है, जो अल्लाह के उस फ़ैसले को क्रियान्वित करते हैं, जिसका उसने उन्हें आदेश दिया है, जैसे वे फ़रिश्ते जो बंदों के कार्यों को लिखने पर नियुक्त हैं। अल्लाह ने इन सब की क़सम खाई है कि वह निश्चय लोगों को हिसाब और बदले के लिए ज़रूर पुनर्जीवित करके उठाएगा।
आयत 6
يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلرَّاجِفَةُ
يَوْمَ
जिस दिन
تَرْجُفُ
काँपेगी
ٱلرَّاجِفَةُ
काँपने वाली
जिस दिन हिला डालेगी हिला डालनेवाले घटना,
तफ़्सीर:
जिस दिन सूर में पहली फूँक के समय धरती हिलने लगेगी।
आयत 7
تَتْبَعُهَا ٱلرَّادِفَةُ
تَتْبَعُهَا
पीछे आएगी उसके
ٱلرَّادِفَةُ
पीछे आने वाली
उसके पीछ घटित होगी दूसरी (घटना)
तफ़्सीर:
इस फूँक के बाद एक और फूँक मारी जाएगी।
आयत 8
قُلُوبٌۭ يَوْمَئِذٍۢ وَاجِفَةٌ
قُلُوبٌۭ
कुछ दिल
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
وَاجِفَةٌ
धड़कने वाले होंगे
कितने ही दिल उस दिन काँप रहे होंगे,
तफ़्सीर:
उस दिन काफ़िरों और पापियों के दिल डरे हुए होंगे।
आयत 9
أَبْصَـٰرُهَا خَـٰشِعَةٌۭ
أَبْصَـٰرُهَا
निगाहें उनकी
خَـٰشِعَةٌۭ
झुकी होंगी
उनकी निगाहें झुकी होंगी
तफ़्सीर:
उनकी आँखों में अपमान का प्रभाव दिखाई देगा।
आयत 10
يَقُولُونَ أَءِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِى ٱلْحَافِرَةِ
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَمَرْدُودُونَ
अलबत्ता फेरे जाने वाले हैं
فِى
to
ٱلْحَافِرَةِ
पहली हालत में
वे कहते है, "क्या वास्तव में हम पहली हालत में फिर लौटाए जाएँगे?
तफ़्सीर:
वे कहा करते थे : क्या हम मरने के बाद ज़िंदगी में लौटेंगे?
आज की ज़िंदगी में सबक़
मौत के फरिश्तों की कसम और कयामत के यकीन का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मौत का फरिश्ता किसी भी वक्त आ सकता है, इसलिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
आयत 11
أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًۭا نَّخِرَةًۭ
أَءِذَا
क्या जब
كُنَّا
होंगे हम
عِظَـٰمًۭا
हड्डियाँ
نَّخِرَةًۭ
बोसीदा
क्या जब हम खोखली गलित हड्डियाँ हो चुके होंगे?"
तफ़्सीर:
क्या जब हम सड़ी-गली खोखली हड्डियाँ हो जाएँगे, उसके बाद फिर लौटेंगे?!
आयत 12
قَالُوا۟ تِلْكَ إِذًۭا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌۭ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تِلْكَ
ये
إِذًۭا
तब
كَرَّةٌ
वापसी है
خَاسِرَةٌۭ
ख़सारे की
वे कहते है, "तब तो लौटना बड़े ही घाटे का होगा।"
तफ़्सीर:
उन्होंने कहा : यदि हम वापस लौटते हैं, तो वह वापसी बड़े घाटे वाली होगी।
आयत 13
فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ
فَإِنَّمَا
तो बेशक
هِىَ
वो
زَجْرَةٌۭ
डाँट होगी
وَٰحِدَةٌۭ
एक ही
वह तो बस एक ही झिड़की होगी,
तफ़्सीर:
दोबारा जीवित करने का मामला बड़ा आसान है। वह तो केवल सूर फूँकने पर नियुक्त फ़रिश्ते की एक तेज़ आवाज़ होगी।
आयत 14
فَإِذَا هُم بِٱلسَّاهِرَةِ
فَإِذَا
तो अचानक
هُم
वो
بِٱلسَّاهِرَةِ
मैदान में होंगे
फिर क्या देखेंगे कि वे एक समतल मैदान में उपस्थित है
तफ़्सीर:
फिर अचानक सभी लोग धरती के ऊपर जीवित होंगे। जबकि पहले वे धरती के भीतर मृत अवस्था में थे।
आयत 15
هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ
هَلْ
क्या
أَتَىٰكَ
आई है आपके पास
حَدِيثُ
ख़बर
مُوسَىٰٓ
मूसा की
क्या तुम्हें मूसा की ख़बर पहुँची है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) क्या आपके पास मूसा की अपने पालनहार के साथ और अपने दुश्मन फ़िरऔन के साथ की ख़बर पहुँची है?!
आयत 16
إِذْ نَادَىٰهُ رَبُّهُۥ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى
إِذْ
जब
نَادَىٰهُ
पुकारा उसे
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
بِٱلْوَادِ
in the valley
ٱلْمُقَدَّسِ
मुक़द्दस वादी में
طُوًى
तुवा की
जबकि उसके रब ने पवित्र घाटी 'तुवा' में उसे पुकारा था
तफ़्सीर:
जब उनके पालनहार ने उन्हें 'तुवा' की पवित्र घाटी में पुकारा।
आयत 17
ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ
ٱذْهَبْ
जाओ
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
طَغَىٰ
वो सरकश हो गया है
कि "फ़िरऔन के पास जाओ, उसने बहुत सिर उठा रखा है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनसे जो कुछ कहा, उसमें यह भी था : फ़िरऔन के पास जाओ। उसने अत्याचार और अहंकार की हद पार कर दी है।
आयत 18
فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰٓ أَن تَزَكَّىٰ
فَقُلْ
पस कहो
هَل
क्या है
لَّكَ
तुझे(ख़्वाहिश)
إِلَىٰٓ
[to]
أَن
तरफ़ इसके कि
تَزَكَّىٰ
तू पाक हो जाए
"और कहो, क्या तू यह चाहता है कि स्वयं को पाक-साफ़ कर ले,
तफ़्सीर:
फिर उससे कहो : (ऐ फ़िरऔन) क्या तू कुफ़्र और पापों से पवित्र होना चाहता है?
आयत 19
وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ
وَأَهْدِيَكَ
और मैं रहनुमाई करूँ तेरी
إِلَىٰ
to
رَبِّكَ
तरफ़ तेरे रब के
فَتَخْشَىٰ
फिर तू डरे
"और मैं तेरे रब की ओर तेरा मार्गदर्शन करूँ कि तु (उससे) डरे?"
तफ़्सीर:
और मैं तेरे उस पालनहार की ओर तेरा मार्गदर्शन करूँ, जिसने तुझे पैदा किया और तेरी देखभाल की, तो तू उससे डरने लगे। चुनाँचे तू ऐसे कार्य करने लगे, जो उसे प्रसन्न करते हैं और ऐसे कार्यों से बचे, जो उसे क्रोधित करते हैं?
आयत 20
فَأَرَىٰهُ ٱلْـَٔايَةَ ٱلْكُبْرَىٰ
فَأَرَىٰهُ
पस उसने दिखाई उसे
ٱلْـَٔايَةَ
निशानी
ٱلْكُبْرَىٰ
बहुत बड़ी
फिर उसने (मूसा ने) उसको बड़ी निशानी दिखाई,
तफ़्सीर:
फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे इस बात की बड़ी निशानी दिखाई कि वे अपने पालनहार के रसूल हैं। इस निशानी से अभिप्राय हाथ और छड़ी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम-फिरऔन के वाकिये का मुख्तसर ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि फिरऔन जैसे बड़े ताकतवर की सरकशी भी आखिरकार तबाह हुई, ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए।
आयत 21
فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ
فَكَذَّبَ
तो उसने झुठलाया
وَعَصَىٰ
और उसने नाफ़रमानी की
किन्तु उसने झुठला दिया और कहा न माना,
तफ़्सीर:
तो फ़िरऔन ने इस निशानी को झुठला दिया और मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे जो आदेश दिया था, उसकी अवहेलना की।
आयत 22
ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ
ثُمَّ
फिर
أَدْبَرَ
वो पलटा
يَسْعَىٰ
कोशिश करते हुए
फिर सक्रियता दिखाते हुए पलटा,
तफ़्सीर:
फिर वह मूसा अलैहिस्सलाम के लाए हुए धर्म पर ईमान लाने से मुँह फेर लिया अल्लाह की अवज्ञा करने और सत्य का विरोध करने में परिश्रम करते हुए।
आयत 23
فَحَشَرَ فَنَادَىٰ
فَحَشَرَ
फिर उसने इकट्ठा किया
فَنَادَىٰ
फिर उसने पुकारा
फिर (लोगों को) एकत्र किया और पुकारकर कहा,
तफ़्सीर:
फिर वह मूसा अलैहिस्सलाम को पराजित करने के लिए अपनी जाति के लोगों और अपने अनुयायियों को इकट्ठा किया, चुनाँचे उसने पुकार कर कहा :
आयत 24
فَقَالَ أَنَا۠ رَبُّكُمُ ٱلْأَعْلَىٰ
فَقَالَ
फिर उसने कहा
أَنَا۠
मैं
رَبُّكُمُ
रब हूँ तुम्हारा
ٱلْأَعْلَىٰ
सब से बुलन्द
"मैं तुम्हारा उच्चकोटि का स्वामी हूँ!"
तफ़्सीर:
मैं तुम्हारा सबसे ऊँचा पालनहार हूँ। इसलिए तुम पर मेरे अलावा किसी दूसरे की आज्ञाकारिता नहीं है।
आयत 25
فَأَخَذَهُ ٱللَّهُ نَكَالَ ٱلْـَٔاخِرَةِ وَٱلْأُولَىٰٓ
فَأَخَذَهُ
तो पकड़ लिया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
نَكَالَ
अज़ाब में
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत
وَٱلْأُولَىٰٓ
और दुनिया के
अन्ततः अल्लाह ने उसे आख़िरत और दुनिया की शिक्षाप्रद यातना में पकड़ लिया
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने उसे पकड़ लिया, चुनाँचे उसे इस दुनिया में समुद्र में डूबने के सज़ा दी और आख़िरत में उसे सबसे गंभीर यातना में डालकर दंडित करेगा।
आयत 26
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّمَن يَخْشَىٰٓ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَعِبْرَةًۭ
यक़ीनन इब्रत है
لِّمَن
उसके लिए जो
يَخْشَىٰٓ
डरता हो
निस्संदेह इसमें उस व्यक्ति के लिए बड़ी शिक्षा है जो डरे!
तफ़्सीर:
हमने फ़िरऔन को दुनिया और आख़िरत में जिस रूप में दंडित किया, उसमें अल्लाह से डरने वाले के लिए एक उपदेश है; क्योंकि वही उपदेशों से लाभान्वित होता है।
आयत 27
ءَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ ٱلسَّمَآءُ ۚ بَنَىٰهَا
ءَأَنتُمْ
क्या तुम
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त हो
خَلْقًا
तख़लीक़ में
أَمِ
या
ٱلسَّمَآءُ ۚ
आसमान
بَنَىٰهَا
उसने बनाया उसे
क्या तुम्हें पैदा करना अधिक कठिन कार्य है या आकाश को? अल्लाह ने उसे बनाया,
तफ़्सीर:
(ऐ मरणोपरांत पुनर्जीवन का इनकार करने वालो) क्या अल्लाह के लिए तुम्हें पैदा करना अधिक कठिन है या आकाश को पैदा करना, जिसे उसने बनाया है?!
आयत 28
رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّىٰهَا
رَفَعَ
उसने बुलन्द किया
سَمْكَهَا
इसकी छत को
فَسَوَّىٰهَا
फिर उसने दुरुस्त कर दिया उसे
उसकी ऊँचाई को ख़ूब ऊँचा करके उसे ठीक-ठाक किया;
तफ़्सीर:
उसने उसके रूप को ऊपर की ओर ऊँचा बनाया और उसे सपाट बना दिया, जिसमें कोई छेद, या दरार, या दोष नहीं है।
आयत 29
وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَىٰهَا
وَأَغْطَشَ
और उसने तारीक किया
لَيْلَهَا
उसकी रात के
وَأَخْرَجَ
और उसने निकाला
ضُحَىٰهَا
उसकी धूप को
और उसकी रात को अन्धकारमय बनाया और उसका दिवस-प्रकाश प्रकट किया
तफ़्सीर:
और उसकी रात को सूरज के डूबने पर अंधकारमय कर दिया और सूरज के निकलने पर उसकी रोशनी को प्रकट कर दिया।
आयत 30
وَٱلْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَىٰهَآ
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
ذَٰلِكَ
उसके
دَحَىٰهَآ
उसने फैला दिया उसे
और धरती को देखो! इसके पश्चात उसे फैलाया;
तफ़्सीर:
और आकाश को पैदा करने के बाद धरती को बिछा दिया और उसमें उसके फ़ायदे की चीज़ें रख दीं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के दावा-ए-खुदाई और ज़मीन की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि खुद को बहुत बड़ा समझने वाला इंसान आखिरकार अल्लाह के सामने बेबस है।
आयत 31
أَخْرَجَ مِنْهَا مَآءَهَا وَمَرْعَىٰهَا
أَخْرَجَ
उसने निकाला
مِنْهَا
उससे
مَآءَهَا
पानी उसका
وَمَرْعَىٰهَا
और चारा उसक
उसमें से उसका पानी और उसका चारा निकाला
तफ़्सीर:
उससे बहते (जल) स्रोतों के रूप में उसका पानी निकाला और उसमें ऐसे पौधे उगाए, जो जानवर चरते हैं।
आयत 32
وَٱلْجِبَالَ أَرْسَىٰهَا
وَٱلْجِبَالَ
और पहाड़ों को
أَرْسَىٰهَا
उसने गाड़ दिया उन्हें
और पहाड़ो को देखो! उन्हें उस (धरती) में जमा दिया,
तफ़्सीर:
और पर्वतों को धरती पर मज़बूती से स्थिर कर दिया।
आयत 33
مَتَـٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ
مَتَـٰعًۭا
फ़ायदे का सामान है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ
और तुम्हारे मवेशियों के लिए
तुम्हारे लिए और तुम्हारे मवेशियों के लिए जीवन-सामग्री के रूप में
तफ़्सीर:
यह सब (ऐ लोगो) तुम्हारे लिए और तुम्हारे मवेशियों के लिए लाभदायक चीज़ें हैं। अतः जिसने यह सब पैदा किया, वह उन्हें नए सिरे से पैदा करने में अक्षम नहीं है।
आयत 34
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلطَّآمَّةُ ٱلْكُبْرَىٰ
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَتِ
आ जाएगी
ٱلطَّآمَّةُ
आफ़त
ٱلْكُبْرَىٰ
बहुत बड़ी
फिर जब वह महाविपदा आएगी,
तफ़्सीर:
फिर जब सूर में दूसरी बार फूँक मारी जाएगी, जिसकी भयावहता हर चीज़ को घेर लेगी और क़ियामत शुरू हो जाएगी।
आयत 35
يَوْمَ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ مَا سَعَىٰ
يَوْمَ
उस दिन
يَتَذَكَّرُ
याद करेगा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
مَا
जो
سَعَىٰ
उसने कोशिश की
उस दिन मनुष्य जो कुछ भी उसने प्रयास किया होगा उसे याद करेगा
तफ़्सीर:
जिस दिन क़ियामत आ जाएगी, इनसान अपने किए हुए काम को याद करेगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा।
आयत 36
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ
وَبُرِّزَتِ
और ज़ाहिर कर दी जाएगी
ٱلْجَحِيمُ
जहन्नम
لِمَن
उसके लिए जो
يَرَىٰ
देखता है
और भड़कती आग (जहन्नम) देखने वालों के लिए खोल दी जाएगी
तफ़्सीर:
और जहन्नम को लाया जाएगा और उसे देखने वालों के लिए आँखों के सामने प्रकट कर दिया जाएगा।
आयत 37
فَأَمَّا مَن طَغَىٰ
فَأَمَّا
तो रहा वो
مَن
जिसने
طَغَىٰ
सरकशी की
तो जिस किसी ने सरकशी की
तफ़्सीर:
तो जो व्यक्ति गुमराही में हद को पार कर गया।
आयत 38
وَءَاثَرَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا
وَءَاثَرَ
और उसने तरजीह दी
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
और सांसारिक जीवन को प्राथमिकता दो होगी,
तफ़्सीर:
तथा उसने दुनिया के नश्वर जीवन को आख़िरत के बाकी रहने वाले जीवन पर प्राथमिकता दी।
आयत 39
فَإِنَّ ٱلْجَحِيمَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱلْجَحِيمَ
जहन्नम
هِىَ
वो ही
ٱلْمَأْوَىٰ
ठिकाना है (उसका)
तो निस्संदेह भड़कती आग ही उसका ठिकाना है
तफ़्सीर:
तो जहन्नम ही उसका ठिकाना है, जहाँ वह शरण लेगा।
आयत 40
وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ وَنَهَى ٱلنَّفْسَ عَنِ ٱلْهَوَىٰ
وَأَمَّا
और रहा
مَنْ
वो जो
خَافَ
डरा
مَقَامَ
खड़े होने से
رَبِّهِۦ
अपने रब के (सामने)
وَنَهَى
और उसने रोक लिया
ٱلنَّفْسَ
नफ़्स को
عَنِ
from
ٱلْهَوَىٰ
ख़्वाहिशात से
और रहा वह व्यक्ति जिसने अपने रब के सामने खड़े होने का भय रखा और अपने जी को बुरी इच्छा से रोका,
तफ़्सीर:
परंतु जो व्यक्ति अपने पालनहार के सामने खड़ा होने से डर गया और अपने नफ़्स को अल्लाह की हराम की हुई चीज़ का पालन करने से रोक लिया, जिसकी उसका नफ़्स इच्छा करता है, तो जन्नत ही उसका ठिकाना है, जहाँ वह निवास ग्रहण करेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के मंज़र और दुनिया को तरजीह देने वालों के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया की चंद दिनों की ज़िंदगी को आखिरत पर तरजीह देना बड़ा नुकसान है।
आयत 41
فَإِنَّ ٱلْجَنَّةَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ
فَإِنَّ
तो यक़ीनन
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत
هِىَ
वो ही
ٱلْمَأْوَىٰ
ठिकाना है (उसका)
तो जन्नत ही उसका ठिकाना है
तफ़्सीर:
परंतु जो व्यक्ति अपने पालनहार के सामने खड़ा होने से डर गया और अपने नफ़्स को अल्लाह की हराम की हुई चीज़ का पालन करने से रोक लिया, जिसकी उसका नफ़्स इच्छा करता है, तो जन्नत ही उसका ठिकाना है, जहाँ वह निवास ग्रहण करेगा।
आयत 42
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا
يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करता हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلسَّاعَةِ
क़यामत के बारे में
أَيَّانَ
कब है
مُرْسَىٰهَا
ठहरना उसका
वे तुमसे उस घड़ी के विषय में पूछते है कि वह कब आकर ठहरेगी?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) ये मरणोपरांत पुनः जीवित होने को झुठलाने वाले लोग आपसे पूछते हैं कि क़ियामत कब आएगी?
आयत 43
فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَىٰهَآ
فِيمَ
किस (फ़िक्र) में हैं
أَنتَ
आप
مِن
[of]
ذِكْرَىٰهَآ
उसके ज़िक्र से
उसके बयान करने से तुम्हारा क्या सम्बन्ध?
तफ़्सीर:
आपको इसकी जानकारी नहीं है कि उन्हें बता सकें, और यह आपका काम नहीं है। आपका काम तो उसके लिए तैयारी करना है।
आयत 44
إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَىٰهَآ
إِلَىٰ
To
رَبِّكَ
तरफ़ आपके रब के
مُنتَهَىٰهَآ
इन्तिहा है उसकी
उसकी अन्तिम पहुँच तो तेरे से ही सम्बन्ध रखती है
तफ़्सीर:
क़ियामत के ज्ञान की अंतिमता केवल तुम्हारे पालनहार की ओर है।
आयत 45
إِنَّمَآ أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَىٰهَا
إِنَّمَآ
बेशक
أَنتَ
आप तो
مُنذِرُ
डराने वाले हैं
مَن
उसे जो
يَخْشَىٰهَا
डरता हो उससे
तुम तो बस उस व्यक्ति को सावधान करनेवाले हो जो उससे डरे
तफ़्सीर:
आप तो केवल उस व्यक्ति को डराने वाले हैं, जो क़ियामत से डरता है; क्योंकि वही है जो आपके डराने से लाभान्वित होता है।
आयत 46
كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَىٰهَا
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
يَوْمَ
जिस दिन
يَرَوْنَهَا
वो देखेंगे उसे (तो कहेंगे)
لَمْ
नहीं
يَلْبَثُوٓا۟
वो ठहरे
إِلَّا
मगर
عَشِيَّةً
पिछला पहर
أَوْ
या
ضُحَىٰهَا
पहला पहर उसका
जिस दिन वे उसे देखेंगे तो (ऐसा लगेगा) मानो वे (दुनिया में) बस एक शाम या उसकी सुबह ही ठहरे है
तफ़्सीर:
जिस दिन वे क़ियामत को अपनी आँखों से देखेंगे, तो (ऐसा समझेंगे) मानो वे अपने सांसारिक जीवन में केवल एक दिन की संध्या या उसकी सुबह ही ठहरे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आखिरत को तरजीह देने वालों के इनाम के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि अपने नफ्स को गलत ख्वाहिशों से रोकने वाला इंसान जन्नत का हकदार बनता है।
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