नाम का मतलब
माल-ए-गनीमत (जंग में हासिल माल के बंटवारे का ज़िक्र)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अनफाल ग़ज़वा-ए-बदर के बाद नाज़िल हुई, जो मुसलमानों की पहली बड़ी और फैसलाकुन जंग थी। इसमें जंग के माल की तक़सीम, जंग के आदाब और अल्लाह की मदद पर भरोसे का ज़िक्र है। यह सूरह मुसलमानों को इत्तेहाद, तैयारी और सब्र की तरबियत देती है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह जंग-ए-बदर के फैसलाकुन वाकिये और अल्लाह की खास मदद का ज़िक्र करती है, जो कम वसाइल के बावजूद हक की फतह की मिसाल है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْأَنفَالِ ۖ قُلِ ٱلْأَنفَالُ لِلَّهِ وَٱلرَّسُولِ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَصْلِحُوا۟ ذَاتَ بَيْنِكُمْ ۖ وَأَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करते हैं आप से
عَنِ
about
ٱلْأَنفَالِ ۖ
ग़नीमतों के बारे में
قُلِ
कह दीजिए
ٱلْأَنفَالُ
ग़नीमतें
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَٱلرَّسُولِ ۖ
और रसूल के लिए हैं
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَصْلِحُوا۟
और इस्लाह करो
ذَاتَ
that
بَيْنِكُمْ ۖ
आपस में
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥٓ
और उसके रसूल की
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपके साथी आपसे ग़नीमतों (युद्ध में प्राप्त होने वाले धन) के विषय में पूछते हैं कि उन्हें कैसे विभाजित किया जाएगा? और किन लोगों में वितरण किया जाएगा? (ऐ रसूल!) उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए कह दें : ग़नीमतें (युद्ध में प्राप्त धन) अल्लाह और उसके रसूल के लिए हैं और उन्हें खर्च करने और बाँटने के विषय में निर्णय का अधिकार अल्लाह और उसके रसूल का है। तुम्हारा काम केवल मान लेना और आज्ञापालन करना है। अतः (ऐ मोमिनो!) तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से दूर रहकर, डरो। तथा तुम्हारे बीच जो संबंध-विच्छेद और वियोग है, उसे आपसी प्रेम, परस्पर संपर्क (संयोग), अच्छे शिष्टाचार और क्षमा के द्वारा सुधार लो। और अगर तुम सच में ईमान वाले हो, तो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। क्योंकि ईमान आज्ञापालन करने और गुनाहों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। यह प्रश्न बद्र के युद्ध के बाद किया गया था।
आयत 2
إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ ٱللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَإِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُهُۥ زَادَتْهُمْ إِيمَـٰنًۭا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन तो
ٱلَّذِينَ
वो हैं
إِذَا
जब
ذُكِرَ
ज़िक्र किया जाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह का
وَجِلَتْ
डर जाते हैं
قُلُوبُهُمْ
दिल उनके
وَإِذَا
और जब
تُلِيَتْ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُهُۥ
आयात उसकी
زَادَتْهُمْ
वो ज़्यादा कर देती है उन्हें
إِيمَـٰنًۭا
ईमान में
وَعَلَىٰ
and upon
رَبِّهِمْ
और अपने रब पर ही
يَتَوَكَّلُونَ
वो तवक्कल करते हैं
ईमानवाले तो वही लोग है जिनके दिल उस समय काँप उठे जबकि अल्लाह को याद किया जाए। और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ तो वे उनके ईमान को और अधिक बढ़ा दें और वे अपने रब पर भरोसा रखते हों
तफ़्सीर:
वास्तव में, ईमान वाले वही लोग हैं कि जब अल्लाह का वर्णन किया जाए, तो उनके दिल काँप उठते हैं, और उनके दिल और शरीर आज्ञापालन की ओर आकर्षित हो जाते हैं, और जब उनके सामने अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं, तो उनपर चिंतन करते हैं, जिसके फलस्वरूप उनका ईमान बढ़ जाता है, तथा वे अपने हितों को प्राप्त करने और अपनी बुराइयों को दूर करने में केवल अपने पालनहार ही पर भरोसा करते हैं।
आयत 3
ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُقِيمُونَ
क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَمِمَّا
और उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
ये वे लोग हैं जो नमाज़ क़ायम करते है और जो कुछ हमने दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
तफ़्सीर:
जो लोग समय पर पूर्ण रूप से नमाज़ अदा करते हैं और हमारे दिए हुए धन से उन जगहों में खर्च करते हैं, जहाँ खर्च करना वाजिब या मुस्तहब है।
आयत 4
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُؤْمِنُونَ حَقًّۭا ۚ لَّهُمْ دَرَجَـٰتٌ عِندَ رَبِّهِمْ وَمَغْفِرَةٌۭ وَرِزْقٌۭ كَرِيمٌۭ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُؤْمِنُونَ
जो मोमिन हैं
حَقًّۭا ۚ
सच्चे
لَّهُمْ
उनके लिए
دَرَجَـٰتٌ
दर्जे हैं
عِندَ
with
رَبِّهِمْ
उनके रब के पास
وَمَغْفِرَةٌۭ
और बख़्शिश
وَرِزْقٌۭ
और रिज़्क़ है
كَرِيمٌۭ
इज़्ज़त वाला
वही लोग वास्तव में ईमानवाले है। उनके लिेए रब के पास बड़े दर्जे है और क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका भी
तफ़्सीर:
इन्हीं विशेषताओं के मालिक लोग सच्चे ईमान वाले हैं; क्योंकि उनके अंदर ईमान और इस्लाम की ज़ाहिरी विशेषताएँ मौजूद हैं। और उनका बदला उनके पालनहार के पास ऊँचे-ऊँचे घर, उनके गुनाहों की क्षमा और सम्मानित (उत्तम) जीविका है। ये वही नेमतें हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी हैं।
आयत 5
كَمَآ أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنۢ بَيْتِكَ بِٱلْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًۭا مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ لَكَـٰرِهُونَ
كَمَآ
जैसा कि
أَخْرَجَكَ
निकाला आपको
رَبُّكَ
आपके रब ने
مِنۢ
from
بَيْتِكَ
आपके घर से
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَإِنَّ
और बेशक
فَرِيقًۭا
गिरोह
مِّنَ
among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
لَكَـٰرِهُونَ
अलबत्ता नापसंद करने वाला था
(यह बिल्कुल वैसी ही परिस्थित है) जैसे तुम्हारे ने तुम्हें तुम्हारे घर से एक उद्देश्य के साथ निकाला, किन्तु ईमानवालों में से एक गिरोह को यह अप्रिय लगा था
तफ़्सीर:
जिस प्रकार अल्लाह पाक ने, युद्ध में प्राप्त धन को विभाजित करने का मामला, उसके विभाजन के बारे में तुम्हारी असहमति और विवाद के बाद, तुम्हारे हाथ से ले लिया और उसे अल्लाह एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अधिकार में दे दिया, उसी तरह आपके पालनहार ने (ऐ रसूल!) आपपर वह़्य उतारकर, बहुदेववादियों से युद्ध करने के लिए आपको मदीना से निकलने का आदेश दिया है, हालाँकि मोमिनों के एक गिरोह को यह पसंद नहीं था।
आयत 6
يُجَـٰدِلُونَكَ فِى ٱلْحَقِّ بَعْدَ مَا تَبَيَّنَ كَأَنَّمَا يُسَاقُونَ إِلَى ٱلْمَوْتِ وَهُمْ يَنظُرُونَ
يُجَـٰدِلُونَكَ
वो झगड़ते थे आप से
فِى
concerning
ٱلْحَقِّ
हक़ में
بَعْدَ مَا
बाद उसके जो
تَبَيَّنَ
वो वाज़ेह हो गया था
كَأَنَّمَا
गोया कि
يُسَاقُونَ
वो हाँके जा रहे थे
إِلَى
to
ٱلْمَوْتِ
तरफ़ मौत के
وَهُمْ
और वो
يَنظُرُونَ
वो देख रहे थे
वे सत्य के विषय में उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात तुमसे झगड़ रहे थे। मानो वे आँखों देखी मृत्यु की ओर हाँके जा रहे हों
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) मोमिनों का यह समूह बहुदेववादियों से युद्ध करने के बारे में आपके साथ बहस कर रहा था, जबकि उनके लिए यह स्पष्ट हो चुका था कि युद्ध होनी ही है। ऐसा मालूम हो रहा था कि वे मौत की ओर हाँके जा रहे हैं और वे उसे अपनी आँखों से देख रहे हैं। ऐसा इसलिए था कि उन्हें युद्ध के लिए निकलना सख़्त नापसंद था; क्योंकि उन्होंने उसके लिए कोई तैयारी नहीं की थी।
आयत 7
وَإِذْ يَعِدُكُمُ ٱللَّهُ إِحْدَى ٱلطَّآئِفَتَيْنِ أَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ أَنَّ غَيْرَ ذَاتِ ٱلشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ وَيُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُحِقَّ ٱلْحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦ وَيَقْطَعَ دَابِرَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَإِذْ
और जब
يَعِدُكُمُ
वादा कर रहा था तुमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِحْدَى
एक का
ٱلطَّآئِفَتَيْنِ
दो गिरोहों में से
أَنَّهَا
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारे लिए है
وَتَوَدُّونَ
और तुम चाहते थे
أَنَّ
बेशक
غَيْرَ
बग़ैर
ذَاتِ
that
ٱلشَّوْكَةِ
हथियार वाला
تَكُونُ
हो जाए
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَيُرِيدُ
और चाहता था
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يُحِقَّ
वो साबित कर दे
ٱلْحَقَّ
हक़ को
بِكَلِمَـٰتِهِۦ
अपने कलिमात से
وَيَقْطَعَ
और वो काट डाले
دَابِرَ
जड़
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
और याद करो जब अल्लाह तुमसे वादा कर रहा था कि दो गिरोहों में से एक तुम्हारे हाथ आएगा और तुम चाहते थे कि तुम्हें वह हाथ आए, जो निःशस्त्र था, हालाँकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करनेवालों की जड़ काट दे
तफ़्सीर:
और ऐ (झगड़ने वाले मोमिनो!) उस समय को याद करो, जब अल्लाह तुम्हें वचन दे रहा था कि तुम्हें बहुदेववादियों के दो गिरोहों में से एक पर विजय ज़रूर प्राप्त होगी। यह गिरोह या तो काफ़िला की शक्ल में होगा, जिसपर क़ब्ज़ा करके तुम उसके साथ मौजूद धन को ग़नीमत के धन के तौर पर प्राप्त कर लोगे, या मक्का से आए हुए जत्थे की शक्ल में होगा, जिससे लड़ाई करके उसपर विजय प्राप्त करोगे। और तुम चाहते थे कि तुम्हारा सामना क़ाफ़िले ही से हो, क्योंकि उसे बिना किसी लड़ाई के अपने नियंत्रण में करना आसान था। और अल्लाह चाहता था कि तुम्हें लड़ने का आदेश देकर सत्य को सत्य कर दिखाए; ताकि तुम बहुदेववादियों के सरदारों को क़त्ल करो, और उनमें से बहुतों को बंदी बना लो, और इस तरह इस्लाम की शक्ति का प्रदर्शन हो।
आयत 8
لِيُحِقَّ ٱلْحَقَّ وَيُبْطِلَ ٱلْبَـٰطِلَ وَلَوْ كَرِهَ ٱلْمُجْرِمُونَ
لِيُحِقَّ
ताकि वो साबित कर दे
ٱلْحَقَّ
हक़ को
وَيُبْطِلَ
और वो बातिल कर दे
ٱلْبَـٰطِلَ
बातिल को
وَلَوْ
और अगरचे
كَرِهَ
नापसंद करें
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम लोग
ताकि सत्य को सत्य कर दिखाए और असत्य को असत्य, चाहे अपराधियों को कितना ही अप्रिय लगे
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह इस्लाम और मुसलमानों को विजय प्रदान करके सत्य को सत्य कर दिखाए, इस प्रकार कि उसकी सत्यता के सबूत प्रदर्शित कर दे। तथा असत्य के असत्य होने के प्रमाण सामने लाकर उसकी असत्यता को साबित कर दे। यद्यपि काफ़िरों को यह बुरा लगे, लेकिन अल्लाह इसे प्रकट ही करने वाला था।
आयत 9
إِذْ تَسْتَغِيثُونَ رَبَّكُمْ فَٱسْتَجَابَ لَكُمْ أَنِّى مُمِدُّكُم بِأَلْفٍۢ مِّنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ مُرْدِفِينَ
إِذْ
जब
تَسْتَغِيثُونَ
तुम फ़रियाद कर रहे थे
رَبَّكُمْ
अपने रब से
فَٱسْتَجَابَ
तो उसने (दुआ) क़ुबूल कर ली
لَكُمْ
तुम्हारी
أَنِّى
कि बेशक मैं
مُمِدُّكُم
मदद देने वाला हूँ तुम्हें
بِأَلْفٍۢ
साथ एक हज़ार
مِّنَ
of
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों के
مُرْدِفِينَ
एक दूसरे के पीछे आने वाले
याद करो जब तुम अपने रब से फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी पुकार सुन ली। (उसने कहा,) "मैं एक हजार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा जो तुम्हारे साथी होंगे।"
तफ़्सीर:
बद्र के दिन को याद करो, जब तुमने अल्लाह से अपने दुश्मन के विरुद्ध सहायता माँगी, तो अल्लाह ने तुम्हारी दुआ क़बूल कर ली कि वह एक हज़ार फ़रिश्तों के द्वारा (ऐ मोमिनो!) तुम्हारी मदद करने वाला है, जो एक-दूसरे के पीछे आएँगे।
आयत 10
وَمَا جَعَلَهُ ٱللَّهُ إِلَّا بُشْرَىٰ وَلِتَطْمَئِنَّ بِهِۦ قُلُوبُكُمْ ۚ وَمَا ٱلنَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
وَمَا
और नहीं
جَعَلَهُ
बनाया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَّا
मगर
بُشْرَىٰ
ख़ुशख़बरी
وَلِتَطْمَئِنَّ
और ताकि मुत्मईन हो जाऐं
بِهِۦ
साथ उसके
قُلُوبُكُمْ ۚ
दिल तुम्हारे
وَمَا
और नहीं
ٱلنَّصْرُ
मदद
إِلَّا
मगर
مِنْ
from
عِندِ
[of]
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के पास से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌ
ख़ूब हिकमत वाला है
अल्लाह ने यह केवल इसलिए किया कि यह एक शुभ-सूचना हो और ताकि इससे तुम्हारे हृदय संतुष्ट हो जाएँ। सहायता अल्लाह ही के यहाँ से होती है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने फ़रिश्तों के द्वारा सहायता को तुम्हारे लिए (ऐ मोमिनो!) केवल इस बात की शुभ सूचना बनाया है कि वह तुम्हारे दुश्मनों के विरुद्ध तुम्हारी मदद करने वाला है, और ताकि मदद के यक़ीन के साथ तुम्हारे दिलों को संतोष प्राप्त हो जाए। और (दरअसल) विजय संख्याओं की अधिकता और उपकरणों की प्रचुरता के आधार पर प्राप्त नहीं होती, बल्कि विजय अल्लाह की ओर से मिलती है। निःसंदेह अल्लाह अपने राज्य में प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। अपने विधान और निर्णय (नियति) में हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
माल-ए-गनीमत की तक़सीम और बदर में अल्लाह की मदद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मिलकर काम करते वक्त माल या क्रेडिट पर झगड़ने की बजाय इंसाफ से बंटवारा करना चाहिए।
आयत 11
إِذْ يُغَشِّيكُمُ ٱلنُّعَاسَ أَمَنَةًۭ مِّنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ لِّيُطَهِّرَكُم بِهِۦ وَيُذْهِبَ عَنكُمْ رِجْزَ ٱلشَّيْطَـٰنِ وَلِيَرْبِطَ عَلَىٰ قُلُوبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ ٱلْأَقْدَامَ
إِذْ
जब
يُغَشِّيكُمُ
उसने ढांप दी तुम पर
ٱلنُّعَاسَ
ऊँघ
أَمَنَةًۭ
अमन के लिए
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
وَيُنَزِّلُ
और वो उतार रहा था
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
لِّيُطَهِّرَكُم
ताकि वो पाक कर दे तुम्हें
بِهِۦ
साथ उसके
وَيُذْهِبَ
और वो ले जाए
عَنكُمْ
तुमसे
رِجْزَ
नजासत
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की
وَلِيَرْبِطَ
और ताकि वो मज़बूत कर दे
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों को
وَيُثَبِّتَ
और वो जमा दे
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَقْدَامَ
क़दमों को
यह करो जबकि वह अपनी ओर से चैन प्रदान कर तुम्हें ऊँघ से ढँक रहा था और वह आकाश से तुमपर पानी बरसा रहा था, ताकि उसके द्वारा तुम्हें अच्छी तरह पाक करे और शैतान की गन्दगी तुमसे दूर करे और तुम्हारे दिलों को मज़बूत करे और उसके द्वारा तुम्हारे क़दमों को जमा दे
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) उस समय को याद करो, जब अल्लाह तुम्हें अपने दुश्मन से होने वाले भय को दूर करने के लिए तुमपर ऊँघ डाल रहा था, तथा तुमपर आकाश से जल बरसा रहा था; ताकि तुम्हें मलिनता से पवित्र कर दे, और ताकि तुमसे शैतान के बुरे ख़यालों को दूर कर दे, और ताकि उसके द्वारा तुम्हारे दिलों को सुदृढ़ कर दे, ताकि मुठभेड़ के समय तुम्हारे शरीर स्थिर रहें, और ताकि उसकी वजह से रेतीली ज़मीन को ठोस करके तुम्हारे क़दमों को जमा दे ताकि उसमें तुम्हारे पाँव न धँसें।
आयत 12
إِذْ يُوحِى رَبُّكَ إِلَى ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ أَنِّى مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۚ سَأُلْقِى فِى قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلرُّعْبَ فَٱضْرِبُوا۟ فَوْقَ ٱلْأَعْنَاقِ وَٱضْرِبُوا۟ مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍۢ
إِذْ
जब
يُوحِى
वही कर रहा था
رَبُّكَ
रब आपका
إِلَى
to
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
तरफ़ फ़रिश्तों के
أَنِّى
बेशक मैं
مَعَكُمْ
साथ हों तुम्हारे
فَثَبِّتُوا۟
पस साबित रखो
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟ ۚ
ईमान लाए
سَأُلْقِى
अनक़रीब मैं डाल दूँगा
فِى
in
قُلُوبِ
दिलों में
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ٱلرُّعْبَ
रौब को
فَٱضْرِبُوا۟
पस मारो
فَوْقَ
ऊपर
ٱلْأَعْنَاقِ
गर्दनों के
وَٱضْرِبُوا۟
और मारो
مِنْهُمْ
उनके
كُلَّ
हर
بَنَانٍۢ
पोर पर
याद करो जब तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ। अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करनेवालों के दिलों में रोब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ!"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) जब आपका पालनहार उन फ़रिश्तों की ओर वह़्य कर रहा था, जिन्हें बद्र के दिन मोमिनों की सहायता के लिए भेजा था कि (ऐ फ़रिश्तो!) मैं मदद और समर्थन के द्वारा तुम्हारे साथ हूँ। अतः अपने दुश्मनों से लड़ने में मोमिनों के संकल्प को मज़बूत करो। मैं शीघ्र ही काफ़िरों के दिलों में अत्यधिक भय डाल दूँगा। इसलिए तुम (ऐ मोमिनो!) काफ़िरों की गरदनें उड़ाते जाओ, ताकि उनका काम तमाम हो जाए, और उनके जोड़ों और शरीर के अंगों पर वार किए जाओ, ताकि तुमसे युद्ध करने से असमर्थ हो जाएँ।
आयत 13
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَآقُّوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ ۚ وَمَن يُشَاقِقِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह इसके कि उन्होंने
شَآقُّوا۟
मुख़ालिफ़त की
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ ۚ
और उसके रसूल की
وَمَن
और जो कोई
يُشَاقِقِ
मुख़ालिफ़त करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे (उसे कठोर यातना मिलकर रहेगी) क्योंकि अल्लाह कड़ी यातना देनेवाला है
तफ़्सीर:
काफ़िरों के क़त्ल किए जाने और उनके अंगों के भंग किए जाने का कारण यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। चुनाँचे उन्हें जो आदेश दिया गया था, उसका उन्होंने पालन नहीं किया, और उन्हें जिस चीज़ से मना किया गया था, उससे नहीं रुके। तथा जो कोई भी अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे, तो अल्लाह उसे दुनिया में क़त्ल और क़ैद, तथा आख़िरत में जहन्नम की आग के द्वारा, कठोर यातना देने वाला है।
आयत 14
ذَٰلِكُمْ فَذُوقُوهُ وَأَنَّ لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابَ ٱلنَّارِ
ذَٰلِكُمْ
ये है ( सज़ा)
فَذُوقُوهُ
पस चख़ो इसे
وَأَنَّ
और बेशक
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَذَابَ
अज़ाब है
ٱلنَّارِ
आग का
यह तो तुम चखो! और यह कि इनकार करनेवालों के लिए आग की यातना है
तफ़्सीर:
(ऐ अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करने वालो!) यह उक्त सज़ा तुम्हारे लिए है। तो इसे दुनिया के जीवन में अग्रिम ही चखो, और आख़िरत में तुम्हारे लिए आग की यातना है, यदि तुम अपने कुफ़्र और हठ की अवस्था में मर गए।
आयत 15
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا لَقِيتُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ زَحْفًۭا فَلَا تُوَلُّوهُمُ ٱلْأَدْبَارَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगों जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
لَقِيتُمُ
मुलाक़ात करो तुम
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
زَحْفًۭا
मैदाने जंग में
فَلَا
पस ना
تُوَلُّوهُمُ
तुम फेरो उनसे
ٱلْأَدْبَارَ
पुश्तों को
ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबला हो तो पीठ न फेरो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब युद्ध के मैदान में मुश्रिकों से आमने-सामना हो जाओ, तो उनसे हार न मानो और उनसे पीठ फेरकर न भागो, बल्कि उनके सामने डट जाओ और धैर्य के साथ उनका मुक़ाबला करो। क्योंकि अल्लाह अपनी मदद और समर्थन के द्वारा तुम्हारे साथ है।
आयत 16
وَمَن يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍۢ دُبُرَهُۥٓ إِلَّا مُتَحَرِّفًۭا لِّقِتَالٍ أَوْ مُتَحَيِّزًا إِلَىٰ فِئَةٍۢ فَقَدْ بَآءَ بِغَضَبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَمَأْوَىٰهُ جَهَنَّمُ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
وَمَن
और जो कोई
يُوَلِّهِمْ
फेरेगा उनसे
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
دُبُرَهُۥٓ
पुश्त अपनी
إِلَّا
सिवाय
مُتَحَرِّفًۭا
पैंतरा बदलने वाले के
لِّقِتَالٍ
जंग के लिए
أَوْ
या
مُتَحَيِّزًا
पनाह लेने वाले के
إِلَىٰ
to
فِئَةٍۢ
तरफ़ एक गिरोह के
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
بَآءَ
वो पलटा
بِغَضَبٍۢ
साथ ग़ज़ब के
مِّنَ
of
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَمَأْوَىٰهُ
और ठिकाना उसका
جَهَنَّمُ ۖ
जहन्नम है
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
ٱلْمَصِيرُ
ठिकाना
जिस किसी ने भी उस दिन उनसे अपनी पीठ फेरी - यह और बात है कि युद्ध-चाल के रूप में या दूसरी टुकड़ी से मिलने के लिए ऐसा करे - तो वह अल्लाह के प्रकोप का भागी हुआ और उसका ठिकाना जहन्नम है, और क्या ही बुरा जगह है वह पहुँचने की!
तफ़्सीर:
और जो व्यक्ति उनसे भागते हुए अपनी पीठ फेरे, जबकि वह उनसे लड़ाई के लिए मुड़ने वाला नहीं है कि वह चाल के तौर पर उनसे भागने का दिखावा करे, जबकि वह पलटकर उनपर हमला करना चाहता हो, या वह मदद लेने के लिए मुसलमानों के किसी उपस्थित समूह में शामिल होने वाला नहीं है, तो निश्चय वह अल्लाह के प्रकोप के साथ लौटा और उसका हक़दार हो गया, और आख़िरत में उसका ठिकाना जहन्नम है और उसका वह ठिकाना बहुत बुरा है और उसके पलटने की वह जगह बहुत बुरी है।
आयत 17
فَلَمْ تَقْتُلُوهُمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ قَتَلَهُمْ ۚ وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ رَمَىٰ ۚ وَلِيُبْلِىَ ٱلْمُؤْمِنِينَ مِنْهُ بَلَآءً حَسَنًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
فَلَمْ
तो नहीं
تَقْتُلُوهُمْ
तुम ने क़त्ल किया उन्हें
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
قَتَلَهُمْ ۚ
क़त्ल किया उन्हें
وَمَا
और नहीं
رَمَيْتَ
फेंका आपने
إِذْ
जब
رَمَيْتَ
फेंका था आपने
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
رَمَىٰ ۚ
फेंका था
وَلِيُبْلِىَ
और ताकि वो आज़माए
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
مِنْهُ
अपनी तरफ़ से
بَلَآءً
आज़माइश
حَسَنًا ۚ
अच्छी से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
तुमने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंक, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका (कि अल्लाह अपनी गुण-गरिमा दिखाए) और ताकि अपनी ओर से ईमानवालों के गुण प्रकट करे। निस्संदेह अल्लाह सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) तुमने बद्र के दिन मुश्रिकों को अपनी ताक़त और शक्ति से नहीं मारा, बल्कि अल्लाह ने इसमें तुम्हारी मदद की। और (ऐ नबी!) जब आपने मुश्रिकों की ओर मिट्टी फेंकी, तो आपने मिट्टी नहीं फेंकी, बल्कि अल्लाह ही ने फेंकी, जब आपकी फेंकी हुई मिट्टी को उनके पास पहुँचा दिया। और ताकि वह मोमिनों को अपने इस उपकार के साथ आज़माए कि उसने उन्हें संख्याबल और उपकरणों की कमी के बावजूद उनके दुश्मन पर विजय प्रदान किया ताकि वे उसका शुक्रिया अदा करें। निश्चय अल्लाह तुम्हारी दुआओं और बातों को सुनने वाला, तथा तुम्हारे कर्मों और हितों को जानने वाला है।
आयत 18
ذَٰلِكُمْ وَأَنَّ ٱللَّهَ مُوهِنُ كَيْدِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
ذَٰلِكُمْ
ये है
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مُوهِنُ
कमज़ोर करने वाला है
كَيْدِ
चाल को
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
यह तो हुआ, और यह (जान लो) कि अल्लाह इनकार करनेवालों की चाल को कमज़ोर कर देनेवाला है
तफ़्सीर:
यह उल्लिखित बातें, जैसे मुश्रिकों को क़त्ल करना, उनकी ओर मिट्टी फेंकना यहाँ तक कि वे पराजित हो गए और पीठ फेरकर भाग गए, तथा मुसलमानों को उनके दुश्मन पर विजय प्रदान करना; यह सब अल्लाह की ओर से है। और अल्लाह काफ़िरों की उस चाल को कमज़ोर कर देने वाला है, जो वे इस्लाम के खिलाफ़ चल रहे हैं।
आयत 19
إِن تَسْتَفْتِحُوا۟ فَقَدْ جَآءَكُمُ ٱلْفَتْحُ ۖ وَإِن تَنتَهُوا۟ فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ وَإِن تَعُودُوا۟ نَعُدْ وَلَن تُغْنِىَ عَنكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْـًۭٔا وَلَوْ كَثُرَتْ وَأَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِن
अगर
تَسْتَفْتِحُوا۟
तुम फ़ैसला चाहते हो
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
جَآءَكُمُ
आ गया तुम्हारे पास
ٱلْفَتْحُ ۖ
फ़ैसला
وَإِن
और अगर
تَنتَهُوا۟
तुम बाज़ आ जाओ
فَهُوَ
तो वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
وَإِن
और अगर
تَعُودُوا۟
तुम लौटोगे
نَعُدْ
हम भी लौटेंगे
وَلَن
और हरगिज़ ना
تُغْنِىَ
काम आएगा
عَنكُمْ
तुम्हें
فِئَتُكُمْ
गिरोह तुम्हारा
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَوْ
और अगरचे
كَثُرَتْ
वो बकसरत हों
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के
यदि तुम फ़ैसला चाहते हो तो फ़ैसला तुम्हारे सामने आ चुका और यदि बाज़ आ जाओ तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है। लेकिन यदि तुमने पलटकर फिर वही हरकत की तो हम भी पलटेंगे और तुम्हारा जत्था, चाहे वह कितना ही अधिक हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। और यह कि अल्लाह मोमिनों के साथ होता है
तफ़्सीर:
(ऐ बहुदेववादियो!) अगर तुम यह चाहते हो कि अल्लाह अपराधियों व अत्याचारियों पर अपनी यातना उतार दे, तो अल्लाह ने तुमपर वह यातना उतार दी है, जो तुमने माँगी थी। क्योंकि वह तुम्हें ऐसी सज़ा दे चुका है, जो तुम्हारे लिए शिक्षाप्रद और अल्लाह का भय रखने वालों के लिए नसीहत (इबरत) का कारण है। और यदि तुम इसकी माँग से बाज़ आ जाओ, तो यह तुम्हारे लिए उत्तम है। क्योंकि हो सकता है कि अल्लाह तुम्हें मोहलत दे दे और तुमसे बदला लेने में जल्दी न करे। और अगर तुम दोबारा उसकी माँग करने और मुसलमानों से युद्ध करने की ओर लौट आए, तो हम फिर से तुम्हें यातना में डालेंगे और मोमिनों को विजय प्रदान करेंगे। और तुम्हारा जत्था और तुम्हारे सहायक, चाहे वे बहुत अधिक संख्या एवं उपकरण वाले हों और ईमान वालों की संख्या कम हो, तुम्हारे कुछ काम न आएँगे। और इसलिए कि निश्चय अल्लाह की सहायता और समर्थन मोमिनों के साथ है। और जिसके साथ अल्लाह हो, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।
आयत 20
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَا تَوَلَّوْا۟ عَنْهُ وَأَنتُمْ تَسْمَعُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
أَطِيعُوا۟
इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
وَلَا
और ना
تَوَلَّوْا۟
तुम मुँह फेरो
عَنْهُ
उससे
وَأَنتُمْ
जब कि तुम
تَسْمَعُونَ
तुम सुन रहे हो
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो और उससे मुँह न फेरो जबकि तुम सुन रहे हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अल्लाह की आज्ञा का पालन और उसके रसूल की आज्ञा का पालन, उसके आदेशों पर अमल करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहकर, करो। तथा उसके आदेश की अवहेलना करके और उसके मना किए हुए कार्य को करके, उससे मुँह न फेरो, जबकि तुम अल्लाह की आयतों को सुनते हो, जो तुम्हारे सामने पढ़ी जाती हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बदर की जंग में फरिश्तों की मदद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कम वसाइल के बावजूद अल्लाह पर भरोसा और सही तैयारी कामयाबी दिला सकती है।
आयत 21
وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
كَٱلَّذِينَ
उनकी तरह जिन्होंने
قَالُوا۟
कहा
سَمِعْنَا
सुना हमने
وَهُمْ
हालाँकि वो
لَا
(do) not
يَسْمَعُونَ
नहीं वो सुनते
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने कहा था, "हमने सुना" हालाँकि वे सुनते नहीं
तफ़्सीर:
और (ऐ मोमिनो!) तुम उन मुनाफ़िक़ों और मुश्रिकों की तरह न हो जाओ, जिनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो वे कहते हैं : हमने अपने कानों से वह क़ुरआन सुना, जो हमारे सामने पढ़ा जाता है, हालाँकि वे चिंतन करने और उपदेश ग्रहण करने के उद्देश्य से नहीं सुनते, कि जो कुछ उन्होंने सुना है उससे लाभ उठाएँ।
आयत 22
۞ إِنَّ شَرَّ ٱلدَّوَآبِّ عِندَ ٱللَّهِ ٱلصُّمُّ ٱلْبُكْمُ ٱلَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ
۞ إِنَّ
बेशक
شَرَّ
बदतरीन
ٱلدَّوَآبِّ
जानदार
عِندَ
near
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
ٱلصُّمُّ
वो बहरे
ٱلْبُكْمُ
गूँगे हैं
ٱلَّذِينَ
जो
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल से काम लेते
अल्लाह की स्पष्ट में तो निकृष्ट पशु वे बहरे-गूँगे लोग है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
तफ़्सीर:
अल्लाह के निकट धरती पर चलने वाली सारी मख़लूक़ में सबसे बुरे वे बहरे हैं, जो सत्य को स्वीकार करने के लिए नहीं सुनते, वे गूँगे हैं, जो बोल नहीं पाते। क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो अल्लाह के आदेशों और निषेधों को नहीं समझते।
आयत 23
وَلَوْ عَلِمَ ٱللَّهُ فِيهِمْ خَيْرًۭا لَّأَسْمَعَهُمْ ۖ وَلَوْ أَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوا۟ وَّهُم مُّعْرِضُونَ
وَلَوْ
और अगर
عَلِمَ
जान लेता
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِيهِمْ
उनमें
خَيْرًۭا
कोई भलाई
لَّأَسْمَعَهُمْ ۖ
अलबत्ता वो सुनवा देता उन्हें
وَلَوْ
और अगर
أَسْمَعَهُمْ
वो सुनवा देता उन्हें
لَتَوَلَّوا۟
यक़ीनन वो मुँह फेर जाते
وَّهُم
और वो हैं ही
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले
यदि अल्लाह जानता कि उनमें कुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते
तफ़्सीर:
और अगर अल्लाह जानता कि इन झुठलाने वाले बहुदेववादियों के अंदर कोई भलाई है, तो उन्हें अवश्य इस तरह सुना देता कि वे उससे लाभ उठाते और उसके तर्कों और प्रमाणों को समझते, लेकिन उसे पता है कि उनके अंदर कोई भलाई नहीं है। और अगर (मान लिया जाए कि) अल्लाह उन्हें सुना देता, तो भी वे हठ के कारण ईमान से फिर जाते, इस हाल में कि वे मुँह फेरने वाले होते।
आयत 24
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱسْتَجِيبُوا۟ لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ ۖ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَحُولُ بَيْنَ ٱلْمَرْءِ وَقَلْبِهِۦ وَأَنَّهُۥٓ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱسْتَجِيبُوا۟
क़ुबूल कर लो (हुक्म)
لِلَّهِ
अल्लाह का
وَلِلرَّسُولِ
और रसूल का
إِذَا
जब
دَعَاكُمْ
वो पुकारे तुम्हें
لِمَا
उसके लिए जो
يُحْيِيكُمْ ۖ
ज़िन्दगी बख़्शता है तुम्हें
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَحُولُ
वो हाइल होता है
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْمَرْءِ
आदमी
وَقَلْبِهِۦ
और उसके दिल के
وَأَنَّهُۥٓ
और बेशक वो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
ऐ ईमान लानेवाले! अल्लाह और रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें जीवन प्रदान करनेवाली है, और जान रखो कि अल्लाह आदमी और उसके दिल के बीच आड़े आ जाता है और यह कि वही है जिसकी ओर (पलटकर) तुम एकत्र होगे
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो ! अल्लाह और उसके रसूल की पुकार का, उनके आदेशों का पालन करके और उनके निषेधों से बचकर जवाब दो, जब रसूल तुम्हें उस सत्य के लिए बुलाएँ, जिसमें तुम्हारा जीवन है। और इस बात से सुनिश्चित हो जाओ कि अल्लाह हर चीज़ की शक्ति रखता है। चुनाँचे वह इस बात की शक्ति रखता है कि यदि तुम सत्य को अस्वीकार करने के बाद उसे मानना चाहो तो वह तुम्हारे और सत्य को मानने के बीच रुकावट बन जाए। इसलिए सत्य को स्वीकार करने में जल्दी करो। और इस बात का यक़ीन रखो कि तुम क़ियामत के दिन अकेले अल्लाह ही के पास एकत्र किए जाओगे। फिर वह तुम्हें तुम्हारे दुनिया में किए हुए कर्मों का बदला देगा।
आयत 25
وَٱتَّقُوا۟ فِتْنَةًۭ لَّا تُصِيبَنَّ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنكُمْ خَآصَّةًۭ ۖ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
فِتْنَةًۭ
फ़ितने से (उस)
لَّا
not
تُصِيبَنَّ
जो हरगिज़ ना पहुँचेगा
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مِنكُمْ
तुम में से
خَآصَّةًۭ ۖ
ख़ासकर
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल अत्याचारियों को ही नहीं लेगा, जान लो अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है
तफ़्सीर:
और (ऐ ईमान वालो!) उस यातना से बचो, जो तुममें से केवल उसी पर नहीं आएगी, जो पापी है, बल्कि उसके साथ-साथ दूसरे लोग भी उसकी चपेट में आएँगे। यह उस समय होगा, जब अत्याचार प्रकट होगा और उसे दूर नहीं किया जाएगा। और यक़ीन मानो कि अल्लाह अपनी अवज्ञा करने वाले को सख़्त सज़ा देने वाला है। अतः उसकी अवज्ञा से बचो।
आयत 26
وَٱذْكُرُوٓا۟ إِذْ أَنتُمْ قَلِيلٌۭ مُّسْتَضْعَفُونَ فِى ٱلْأَرْضِ تَخَافُونَ أَن يَتَخَطَّفَكُمُ ٱلنَّاسُ فَـَٔاوَىٰكُمْ وَأَيَّدَكُم بِنَصْرِهِۦ وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَٱذْكُرُوٓا۟
और याद करो
إِذْ
जब
أَنتُمْ
तुम
قَلِيلٌۭ
थोड़े थे
مُّسْتَضْعَفُونَ
कमज़ोर समझे जाते थे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
تَخَافُونَ
तुम डरते थे
أَن
कि
يَتَخَطَّفَكُمُ
उचक लेंगे तुम्हें
ٱلنَّاسُ
लोग
فَـَٔاوَىٰكُمْ
फिर उसने ठिकाना दिया तुम्हें
وَأَيَّدَكُم
और उसने ताईद की तुम्हारी
بِنَصْرِهِۦ
अपनी मदद से
وَرَزَقَكُم
और उसने रिज़्क़ दिया तुम्हें
مِّنَ
of
ٱلطَّيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोजी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
तफ़्सीर:
तथा (ऐ ईमान वालो!) उस समय को याद करो, जब तुम मक्का में बहुत कम संख्या में थे, मक्का वाले तुम्हें कमज़ोर समझे हुए थे और तुम्हें दबाए हुए थे। तुम्हें डर था कि तुम्हारे दुश्मन तुम्हें उचक ले जाएँगे। तो अल्लाह ने तुम्हें मदीना के रूप में एक शरण स्थल दिया और युद्ध के स्थानों में तुम्हारे दुश्मनों पर तुम्हें विजय प्रदान करके तुम्हें शक्ति प्रदान की, जैसे कि बद्र के दिन हुआ, और तुम्हें पवित्र चीज़ों से जीविका प्रदान की, जिनमें युद्ध के मैदान में तुम्हारे शत्रुओं से प्राप्त किया हुआ ग़नीमत का धन भी शामिल है, ताकि तुम अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करो, जिसके कारण वह तुम्हें और नेमतें प्रदान करेगा, तथा उनकी नाशुक्री न करो कि अल्लाह तुमसे वे नेमतें छीन ले और तुम्हें यातना से ग्रस्त कर दे।
आयत 27
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَخُونُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ وَتَخُونُوٓا۟ أَمَـٰنَـٰتِكُمْ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَخُونُوا۟
ना तुम ख़यानत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह
وَٱلرَّسُولَ
और रसूल की
وَتَخُونُوٓا۟
और (ना) तुम ख़यानत करो
أَمَـٰنَـٰتِكُمْ
अपनी अमानतों में
وَأَنتُمْ
जबकि तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अल्लाह और उसके रसूल के साथ, उनके आदेशों का पालन न करके और उनके निषेधों से न बचकर, विश्वासघात न करो, तथा तुम्हारे पास जो अमानत रखी जाए उसमें ख़यानत न करो, जबकि तुम जान रहे हो कि तुम्हारा यह काम ख़यानत है, अन्यथा तुम ख़यानत करने वालों में से हो जाओगे।
आयत 28
وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَآ أَمْوَٰلُكُمْ وَأَوْلَـٰدُكُمْ فِتْنَةٌۭ وَأَنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥٓ أَجْرٌ عَظِيمٌۭ
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّمَآ
बेशक
أَمْوَٰلُكُمْ
माल तुम्हारे
وَأَوْلَـٰدُكُمْ
और औलाद तुम्हारी
فِتْنَةٌۭ
आज़माइश हैं
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عِندَهُۥٓ
उसके पास
أَجْرٌ
अजर है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह कि अल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है
तफ़्सीर:
और (ऐ ईमान वालो!) जान लो कि तुम्हारे धन और तुम्हारी संतान तुम्हारे लिए अल्लाह की ओर से आज़माइश और परीक्षण हैं। क्योंकि ये चीज़ें तुम्हें आख़िरत के लिए कार्य करने से रोक सकती हैं और तुम्हें ख़यानत पर आमादा कर सकती हैं। तथा जान लो कि अल्लाह के पास बहुत बड़ा सवाब है। अतः अपने धन और अपने बच्चों को ध्यान में रखकर और उनकी खातिर ख़यानत करके, यह सवाब अपने हाथ से न जाने दो।
आयत 29
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن تَتَّقُوا۟ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّكُمْ فُرْقَانًۭا وَيُكَفِّرْ عَنكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلَّذِينَ
लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِن
अगर
تَتَّقُوا۟
तुम डरोगे
ٱللَّهَ
अल्लाह से
يَجْعَل
वो बना देगा
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
فُرْقَانًۭا
फ़ुरक़ान
وَيُكَفِّرْ
और वो दूर कर देगा
عَنكُمْ
तुम से
سَيِّـَٔاتِكُمْ
बुराइयाँ तुम्हारी
وَيَغْفِرْ
और वो बख़्श देगा
لَكُمْ ۗ
तुम्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ذُو
(is) the Possessor
ٱلْفَضْلِ
फ़ज़ल वाला है
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़े
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदान करेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हे क्षमा करेगा। अल्लाह बड़ा अनुग्राहक है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जान लो कि अगर तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरोगे, तो वह तुम्हें सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की शक्ति प्रदान करेगा, जिससे तुम्हारे लिए दोनों गड्ड-मड्ड नहीं होंगे। तथा जो कुछ तुमने बुरे कार्य किए होंगे, वह उन्हें तुमसे मिटा देगा और तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा। और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है। और उसका एक बड़ा अनुग्रह उसकी जन्नत है, जिसे उसने अपने डरने वाले बंदों के लिए तैयार की है।
आयत 30
وَإِذْ يَمْكُرُ بِكَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِيُثْبِتُوكَ أَوْ يَقْتُلُوكَ أَوْ يُخْرِجُوكَ ۚ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ ٱللَّهُ ۖ وَٱللَّهُ خَيْرُ ٱلْمَـٰكِرِينَ
وَإِذْ
और जब
يَمْكُرُ
चालें चल रहे थे
بِكَ
साथ आपके
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِيُثْبِتُوكَ
ताकि वो क़ैद कर लें आपको
أَوْ
या
يَقْتُلُوكَ
वो क़त्ल कर दें आपको
أَوْ
या
يُخْرِجُوكَ ۚ
वो निकाल दें आपको
وَيَمْكُرُونَ
और वो चालें चल रहे थे
وَيَمْكُرُ
और तदबीर कर रहा था
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْمَـٰكِرِينَ
सब तदबीर करने वालों से
और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालें चल रहे थे कि तम्हें क़ैद रखें या तुम्हे क़त्ल कर दें या तुम्हे निकाल बाहर करे। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) उस समय को याद करें, जब सब मुश्रिकों ने मिलकर आपको क़ैद करने, मार डालने या अपने नगर से किसी और नगर की ओर निकाल देने का षड्यंत्र किया। वे आपके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे थे और अल्लाह उनके षड्यंत्र को उन्हीं पर लौटा रहा था तथा उससे आपोक बचाने का उपाय कर रहा था और अल्लाह ही सबसे अत्तम उपाय करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुनने और मानने के फर्क, अमानतदारी की ताकीद है। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ सुनना काफी नहीं, हक बात पर अमल करना असली सुनना है।
आयत 31
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُنَا قَالُوا۟ قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَآءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هَـٰذَآ ۙ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَإِذَا
और जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
قَالُوا۟
वो कहते हैं
قَدْ
तहक़ीक़
سَمِعْنَا
सुन लिया हमने
لَوْ
अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
لَقُلْنَا
अलबत्ता कह लें हम
مِثْلَ
मानिन्द
هَـٰذَآ ۙ
इसी के
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते है, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।"
तफ़्सीर:
और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे सत्य से वैर और अहंकार के कारण कहते हैं : हमने पहले भी ऐसा कुछ सुना है। अगर हम इस क़ुरआन जैसा कहना चाहें, तो निश्चय हम कह सकते हैं। यह क़ुरआन जो हमने सुना है, पहले लोगों की झूठी कहानियों के सिवा कुछ नहीं है। इसलिए हम इसपर हरगिज़ विश्वास नहीं करेंगे।
आयत 32
وَإِذْ قَالُوا۟ ٱللَّهُمَّ إِن كَانَ هَـٰذَا هُوَ ٱلْحَقَّ مِنْ عِندِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةًۭ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ أَوِ ٱئْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍۢ
وَإِذْ
और जब
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱللَّهُمَّ
ऐ अल्लाह
إِن
अगर
كَانَ
है
هَـٰذَا
ये
هُوَ
वो ही
ٱلْحَقَّ
जो हक़ है
مِنْ
[of]
عِندِكَ
तेरे पास से
فَأَمْطِرْ
तो बरसा
عَلَيْنَا
हम पर
حِجَارَةًۭ
पत्थर
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
أَوِ
या
ٱئْتِنَا
ले आ हम पर
بِعَذَابٍ
अज़ाब
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक
और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब बहुदेववादियों ने कहा : ऐ अल्लाह! यदि मुहम्मद का लाया हुआ धर्म सत्य है, तो हमपर आकाश से पत्थर गिरा दे जो हमें नष्ट कर दे, अथवा हमपर कोई गंभीर यातना ले आ। उन्होंने यह बात इनकार में अतिशयोक्ति के तौर पर कही थी।
आयत 33
وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُعَذِّبَهُمْ
कि वो अज़ाब दे उन्हें
وَأَنتَ
जबकि आप
فِيهِمْ ۚ
उनमें (मौजूद हों)
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مُعَذِّبَهُمْ
अज़ाब देने वाला है उन्हें
وَهُمْ
जबकि वो
يَسْتَغْفِرُونَ
वो इस्तग़फ़ार कर रहे हों
और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हो और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे
तफ़्सीर:
और अल्लाह आपकी उम्मत को (चाहे वह उन लोगों में से हो जिन्होंने आपके निमंत्रण को स्वीकार किया या उन लोगों में से हो जो आपके निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं), ऐसी यातना से ग्रस्त नहीं करेगा, जो उन्हें जड़ से मिटा दे, जबकि (ऐ मुहम्मद!) आप उनके बीच जीवित मौजूद हैं। क्योंकि उनके बीच आपकी उपस्थिति उनके लिए यातना से सुरक्षा है। तथा अल्लाह उन्हें यातना से ग्रस्त करने वाला नहीं है, जबकि वे अपने पापों के लिए अल्लाह से क्षमा मांगते हों।
आयत 34
وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ ٱللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ وَمَا كَانُوٓا۟ أَوْلِيَآءَهُۥٓ ۚ إِنْ أَوْلِيَآؤُهُۥٓ إِلَّا ٱلْمُتَّقُونَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَمَا
और क्या है
لَهُمْ
उन्हें
أَلَّا
कि ना
يُعَذِّبَهُمُ
अज़ाब देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَهُمْ
हालाँकि वो
يَصُدُّونَ
वो रोकते हैं
عَنِ
from
ٱلْمَسْجِدِ
Al-Masjid
ٱلْحَرَامِ
मस्जिदे हराम से
وَمَا
हालाँकि नहीं
كَانُوٓا۟
हैं वो
أَوْلِيَآءَهُۥٓ ۚ
मुतवल्ली उसके
إِنْ
नहीं
أَوْلِيَآؤُهُۥٓ
मुतवल्ली उसके
إِلَّا
मगर
ٱلْمُتَّقُونَ
मुत्तक़ी लोग
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
किन्तु अब क्या है उनके पास कि अल्लाह उन्हें यातना न दे, जबकि वे 'मस्जिदे हराम' (काबा) से रोकते है, हालाँकि वे उसके कोई व्यवस्थापक नहीं? उसके व्यवस्थापक तो केवल डर रखनेवाले ही है, परन्तु उनके अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
भला उनको यातना क्यों न दी जाए, जबकि उन्होंने लोगों को 'मस्जिदे ह़राम' (काबा) का तवाफ़ करने या उसमें नमाज़ अदा करने से रोककर ऐसा कार्य किया है जो उन्हें यातना का पात्र बनाता है? तथा ये मुश्रिक अल्लाह के दोस्त नहीं हैं, अल्लाह के दोस्त तो केवल उसके डरने वाले बंदे हैं, जो उसकी आज्ञाओं का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरते हैं। परंतु अधिकतर मुश्रिक इस बात को नहीं जानते, यही कारण है कि वे कहते हैं कि वे अल्लाह के दोस्त हैं, जबकि वे अल्लाह के दोस्त नहीं हैं।
आयत 35
وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِندَ ٱلْبَيْتِ إِلَّا مُكَآءًۭ وَتَصْدِيَةًۭ ۚ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
وَمَا
और ना
كَانَ
थी
صَلَاتُهُمْ
नमाज़ उनकी
عِندَ
पास
ٱلْبَيْتِ
बैतुल्लाह के
إِلَّا
मगर
مُكَآءًۭ
सीटियाँ बजाना
وَتَصْدِيَةًۭ ۚ
और तालियाँ बजाना
فَذُوقُوا۟
पस चख़ो
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते
उनकी नमाज़़ इस घर (काबा) के पास सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होती। तो अब यातना का मज़ा चखो, उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो
तफ़्सीर:
मस्जिदे ह़राम के पास मुश्रिकों की नमाज़ सीटी बजाने और ताली बजाने के अलावा और कुछ नहीं थी। अतः (ऐ मुश्रिको!) अल्लाह का इनकार करने और उसके रसूल को झुठलाने के कारण बद्र के दिन क़त्ल और क़ैद की यातना चखो।
आयत 36
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ لِيَصُدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ فَسَيُنفِقُونَهَا ثُمَّ تَكُونُ عَلَيْهِمْ حَسْرَةًۭ ثُمَّ يُغْلَبُونَ ۗ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِلَىٰ جَهَنَّمَ يُحْشَرُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
أَمْوَٰلَهُمْ
अपने मालों को
لِيَصُدُّوا۟
ताकि वो रोकें
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते से
فَسَيُنفِقُونَهَا
पस अनक़रीब वो ख़र्च करेंगे उसे
ثُمَّ
फिर
تَكُونُ
वो हो जाएगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَسْرَةًۭ
हसरत (का सबब )
ثُمَّ
फिर
يُغْلَبُونَ ۗ
वो मग़लूब किए जाऐंगे
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِلَىٰ
तरफ़
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
يُحْشَرُونَ
वो इकट्ठे किए जाऐंगे
निश्चय ही इनकार करनेवाले अपने माल अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च करते रहेंगे, फिर यही उनके लिए पश्चाताप बनेगा। फिर वे पराभूत होंगे और इनकार करनेवाले जहन्नम की ओर समेट लाए जाएँगे
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, वे अपना धन लोगों को अल्लाह के धर्म से रोकने के लिए ख़र्च करते हैं। चुनाँचे वे इसी तरह खर्च करते रहेंगे और उनकी मनोकामना कभी पूरी नहीं होगी। फिर उनके धन खर्च करने का परिणाम पछतावा होगा; क्योंकि धन भी चला गया और उसके खर्च करने का उद्देश्य भी प्राप्त नहीं हुआ। फिर वे ईमान वालों के उनपर विजय से पराजित हो जाएँगे। और जिन लोगों ने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, वे क़ियामत के दिन जहन्नम की ओर हाँककर ले जाए जाएँगे। फिर वे उसमें प्रवेश करेंगे और हमेशा के लिए उसी में रहेंगे।
आयत 37
لِيَمِيزَ ٱللَّهُ ٱلْخَبِيثَ مِنَ ٱلطَّيِّبِ وَيَجْعَلَ ٱلْخَبِيثَ بَعْضَهُۥ عَلَىٰ بَعْضٍۢ فَيَرْكُمَهُۥ جَمِيعًۭا فَيَجْعَلَهُۥ فِى جَهَنَّمَ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
لِيَمِيزَ
ताकि जुदा कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْخَبِيثَ
नापाक को
مِنَ
from
ٱلطَّيِّبِ
पाक से
وَيَجْعَلَ
और वो कर दे
ٱلْخَبِيثَ
नापाक को
بَعْضَهُۥ
उसके बाज़ को
عَلَىٰ
on
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
فَيَرْكُمَهُۥ
फिर वो ढेर लगा दे उसका
جَمِيعًۭا
सबका
فَيَجْعَلَهُۥ
फिर वो डाल दे उसे
فِى
in
جَهَنَّمَ ۚ
जहन्नम में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छाँटकर अलग करे और नापाकों को आपस में एक-दूसरे पर रखकर ढेर बनाए, फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटे में पड़नेवाले है
तफ़्सीर:
इन काफ़िरों को, जो अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए अपना धन खर्च करते हैं, जहन्नम की आग की ओर ले जाया जाएगा, ताकि अल्लाह काफ़िरों के अपवित्र (दुष्ट) समूह को मोमिनों के पवित्र (अच्छे) समूह से अलग कर दे, तथा अपवित्र व्यक्तियों, कार्यों और धनों को एक-दूसरे पर रखकर ढेर बना दे। फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटा उठाने वाले हैं; क्योंकि उन्होंने क़ियामत के दिन अपना और अपने घर वालों का नुक़सान किया।
आयत 38
قُل لِّلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِن يَنتَهُوا۟ يُغْفَرْ لَهُم مَّا قَدْ سَلَفَ وَإِن يَعُودُوا۟ فَقَدْ مَضَتْ سُنَّتُ ٱلْأَوَّلِينَ
قُل
कह दीजिए
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِن
अगर
يَنتَهُوا۟
वो बाज़ आ जाऐं
يُغْفَرْ
बख़्श दिया जाएगा
لَهُم
उनके लिए
مَّا
जो
قَدْ
तहक़ीक़
سَلَفَ
पहले हो गया
وَإِن
और अगर
يَعُودُوا۟
वो पलटेंगे
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
مَضَتْ
गुज़र चुकी
سُنَّتُ
सुन्नत
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की (तरीक़ा)
उन इनकार करनेवालो से कह दो कि वे यदि बाज़ आ जाएँ तो जो कुछ हो चुका, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, किन्तु यदि वे फिर भी वहीं करेंगे तो पूर्ववर्ती लोगों के सिलसिले में जो रीति अपनाई गई वह सामने से गुज़र चुकी है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अपनी जाति के उन लोगों से कह दें, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया : यदि वे अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र करने से, तथा ईमान लाने वालों को अल्लाह के मार्ग से रोकने से बाज़ आ जाएँ; तो अल्लाह उनके पिछले गुनाहों को माफ़ कर देगा। क्योंकि इस्लाम अपने से पहले जो कुछ हुआ, उसे मिटा देता है। और अगर वे अपने कुफ़्र की ओर लौट गए, तो पहले लोगों के बारे में अल्लाह की रीति गुज़र चुकी है। वह यह है कि जब उन्होंने झुठलाया और अपने कुफ़्र पर अड़े रहे, तो अल्लाह ने उन्हें अविलंब सज़ा दे दी।
आयत 39
وَقَـٰتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌۭ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ كُلُّهُۥ لِلَّهِ ۚ فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
وَقَـٰتِلُوهُمْ
और जंग करो उनसे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
لَا
not
تَكُونَ
ना रहे
فِتْنَةٌۭ
कोई फ़ितना
وَيَكُونَ
और हो जाए
ٱلدِّينُ
दीन
كُلُّهُۥ
सारे का सारा
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह के लिए
فَإِنِ
फिर अगर
ٱنتَهَوْا۟
वो बाज़ आ जाऐं
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِمَا
उसे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाक़ी न रहे और दीन (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके कर्म को देख रहा है
तफ़्सीर:
और (ऐ मोमिनो!) अपने काफिर दुश्मनों से युद्ध करो, यहाँ तक कि न शिर्क रहे और न ही मुसलमानों को अल्लाह के धर्म से रोकना, तथा धर्म और आज्ञाकारिता एकमात्र अल्लाह के लिए रह जाए, जिसमें उसका कोई साझी न हो। फिर यदि काफ़िर अपने शिर्क और अल्लाह के मार्ग से रोकने से बाज़ आ जाएँ, तो उन्हें छोड़ दो। क्योंकि अल्लाह उनके कर्मों को जानता है, उससे कोई बात छिपी नहीं है।
आयत 40
وَإِن تَوَلَّوْا۟ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَوْلَىٰكُمْ ۚ نِعْمَ ٱلْمَوْلَىٰ وَنِعْمَ ٱلنَّصِيرُ
وَإِن
और अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ जाऐं
فَٱعْلَمُوٓا۟
तो जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَوْلَىٰكُمْ ۚ
मौला है तुम्हारा
نِعْمَ
कितना अच्छा है
ٱلْمَوْلَىٰ
मौला
وَنِعْمَ
और कितना अच्छा है
ٱلنَّصِيرُ
मददगार
किन्तु यदि वे मुँह मोड़े तो जान रखो कि अल्लाह संरक्षक है। क्या ही अच्छा संरक्षक है वह, और क्या ही अच्छा सहायक!
तफ़्सीर:
और अगर वे, कुफ़्र और अल्लाह के मार्ग से रोकने से बाज़ आने का जो उन्हें आदेश दिया गया है, उससे मुँह फेरें, तो (ऐ मोमिनो!) निश्चित हो जाओ कि अल्लाह उनके विरुद्ध तुम्हारा मददगार है। वह उसके लिए बहुत अच्छा संरक्षक है, जिसका वह संरक्षक हो, तथा वह उसके लिए बहुत अच्छा सहायक है, जिसका वह सहायक हो। अतः वह जिसका संरक्षक हो गया, वह सफल हुआ और वह जिसका मददगार हो गया, वह विजयी हुआ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार की साज़िशों और अल्लाह की तदबीर का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुश्मन की चालें चाहे कितनी भी मज़बूत लगें, अल्लाह की तदबीर हमेशा बेहतर होती है।
आयत 41
۞ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَا غَنِمْتُم مِّن شَىْءٍۢ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُۥ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ إِن كُنتُمْ ءَامَنتُم بِٱللَّهِ وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا يَوْمَ ٱلْفُرْقَانِ يَوْمَ ٱلْتَقَى ٱلْجَمْعَانِ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
۞ وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّمَا
कि बेशक जो
غَنِمْتُم
ग़नीमत में पाओ तुम
مِّن
of
شَىْءٍۢ
कोई भी चीज़
فَأَنَّ
तो बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
خُمُسَهُۥ
पाँचवां हिस्सा उसका
وَلِلرَّسُولِ
और रसूल के लिए
وَلِذِى
and for the
ٱلْقُرْبَىٰ
और क़राबतदारों के लिए
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिस्कीनों
وَٱبْنِ
and the
ٱلسَّبِيلِ
और मुसाफ़िर के लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
ءَامَنتُم
ईमान लाए तुम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَمَآ
और उस पर जो
أَنزَلْنَا
नाज़िल किया हमने
عَلَىٰ
to
عَبْدِنَا
अपने बन्दे पर
يَوْمَ
(on the) day
ٱلْفُرْقَانِ
फ़ैसले के दिन
يَوْمَ
जिस दिन
ٱلْتَقَى
आमने-सामने हुईं
ٱلْجَمْعَانِ ۗ
दो जमाअतें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाग का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
और (ऐ ईमान वालो!) जान लो कि तुमने अल्लाह के मार्ग में काफ़िरों से जिहाद करते हुए जो ग़नीमत का धन हासिल किया है, उसे पाँच भागों में विभाजित किया जाएगा। उनमें से चार भाग मुजाहिदों में बाँट दिए जाएँगे, जबकि शेष पाँचवें भाग को फिर पाँच हिस्सों में विभाजित किया जाएगा : उसका एक हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का होगा, जिसे मुसलमानों के सार्वजनिक हितों में खर्च किया जाएगा, तथा एक हिस्सा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निकट-संबंधियों अर्थात् बनू हाशिम एवं बनू मुत्तलिब के लिए, एक हिस्सा अनाथों के लिए, एक हिस्सा गरीबों एवं मिसकीनों के लिए, तथा एक हिस्सा ऐसे यात्रियों के लिए है, जो रास्ते में फँसे हुए हों। यदि तुम अल्लाह पर तथा उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर बद्र के दिन उतारी, जिसके द्वारा अल्लाह ने सत्य और झूठ के बीच अंतर कर दिया जब उसने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों पर जीत दिलाई। और अल्लाह, जिसने तुम्हारी मदद की, हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
आयत 42
إِذْ أَنتُم بِٱلْعُدْوَةِ ٱلدُّنْيَا وَهُم بِٱلْعُدْوَةِ ٱلْقُصْوَىٰ وَٱلرَّكْبُ أَسْفَلَ مِنكُمْ ۚ وَلَوْ تَوَاعَدتُّمْ لَٱخْتَلَفْتُمْ فِى ٱلْمِيعَـٰدِ ۙ وَلَـٰكِن لِّيَقْضِىَ ٱللَّهُ أَمْرًۭا كَانَ مَفْعُولًۭا لِّيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنۢ بَيِّنَةٍۢ وَيَحْيَىٰ مَنْ حَىَّ عَنۢ بَيِّنَةٍۢ ۗ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَسَمِيعٌ عَلِيمٌ
إِذْ
जब
أَنتُم
तुम
بِٱلْعُدْوَةِ
किनारे पर थे
ٱلدُّنْيَا
क़रीब के
وَهُم
और वो
بِٱلْعُدْوَةِ
किनारे पर थे
ٱلْقُصْوَىٰ
दूर के
وَٱلرَّكْبُ
और क़ाफ़िला
أَسْفَلَ
नीचे था
مِنكُمْ ۚ
तुमसे
وَلَوْ
और अगर
تَوَاعَدتُّمْ
आपस में वादा करते तुम
لَٱخْتَلَفْتُمْ
अलबत्ता इख़्तिलाफ़ करते तुम
فِى
in
ٱلْمِيعَـٰدِ ۙ
मुक़र्रर वक़्त/जगह के बारे में
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لِّيَقْضِىَ
ताकि पूरा कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَمْرًۭا
एक काम को
كَانَ
जो था
مَفْعُولًۭا
होकर रहने वाला
لِّيَهْلِكَ
ताकि वो हलाक हो
مَنْ
जो
هَلَكَ
हलाक हो
عَنۢ
on
بَيِّنَةٍۢ
साथ वाज़ेह दलील के
وَيَحْيَىٰ
और वो ज़िन्दा रहे
مَنْ
जो
حَىَّ
ज़िन्दा रहे
عَنۢ
on
بَيِّنَةٍۢ ۗ
साथ वाज़ेह दलील के
وَإِنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَسَمِيعٌ
अलबत्ता ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
याद करो जब तुम घाटी के निकटवर्ती छोर पर थे और वे घाटी के दूरस्थ छोर पर थे और क़ाफ़िला तुमसे नीचे की ओर था। यदि तुम परस्पर समय निश्चित किए होते तो अनिवार्यतः तुम निश्चित समय पर न पहुँचते। किन्तु जो कुछ हुआ वह इसलिए कि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे, जिसका पूरा होना निश्चित था, ताकि जिसे विनष्ट होना हो, वह स्पष्ट प्रमाण देखकर ही विनष्ट हो और जिसे जीवित रहना हो वह स्पष्ट़ प्रमाण देखकर जीवित रहे। निस्संदेह अल्लाह भली-भाँति जानता, सुनता है
तफ़्सीर:
तथा उस समय को याद करो, जब तुम घाटी के उस किनारे पर थे जो मदीना से सबसे निकट है, तथा बहुदेववादी उसी घाटी के दूर वाले किनारे पर थे, जो मक्का से करीब है, और क़ाफ़िला तुमसे नीचे क्षेत्र में लाल सागर के तट के निकट था। यदि तुमने और बहुदेववादियों ने बद्र में मिलने का वादा किया होता, तो तुम निर्धारित समय (पर पहुँचने) के बारे में एक-दूसरे से असहमत होते। परंतु अल्लाह ने तुम्हें बिना पूर्वनिर्धारित अवधि के बद्र में एकत्र कर दिया। ताकि अल्लाह वह काम पूरा कर दे, जो किया जाने वाला था, अर्थात् ईमान वालों की जीत और काफ़िरों की विफलता, अपने धर्म (इस्लाम) का सम्मान और बहुदेववाद का अपमान; ताकि उनमें से जो मरे, वह ईमान वालों की संख्याबल और उपकरणों की कमी के बावजूद काफ़िरों पर जीत के द्वारा उसपर तर्क स्थापित होने के बाद मरे, तथा जो जीवित रहे, वह उस सबूत और तर्क को देखकर जीवित रहे, जो अल्लाह ने उसके लिए प्रकट किया है। ताकि किसी के लिए अल्लाह के विरुद्ध कोई तर्क बाक़ी न रहे, जिसे वह प्रस्तुत कर सके। निःसंदेह अल्लाह सभी की बातों को सुनने वाला, उनके कार्यों को जानने वाला है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 43
إِذْ يُرِيكَهُمُ ٱللَّهُ فِى مَنَامِكَ قَلِيلًۭا ۖ وَلَوْ أَرَىٰكَهُمْ كَثِيرًۭا لَّفَشِلْتُمْ وَلَتَنَـٰزَعْتُمْ فِى ٱلْأَمْرِ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ سَلَّمَ ۗ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
إِذْ
जब
يُرِيكَهُمُ
दिखाया आपको उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فِى
in
مَنَامِكَ
आपके ख़्वाब में
قَلِيلًۭا ۖ
थोड़े
وَلَوْ
और अगर
أَرَىٰكَهُمْ
वो दिखाता आपको उन्हें
كَثِيرًۭا
ज़्यादा
لَّفَشِلْتُمْ
अलबत्ता हिम्मत हार जाते तुम
وَلَتَنَـٰزَعْتُمْ
और अलबत्ता बाहम झगड़ने लगते तुम
فِى
in
ٱلْأَمْرِ
मामले में
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
سَلَّمَ ۗ
सलामत रखा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what is in
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले (भेद)
और याद करो जब अल्लाह उनको तुम्हारे स्वप्न में थोड़ा करके तुम्हें दिखा रहा था और यदि वह उन्हें ज़्यादा करके तुम्हें दिखा देता तो अवश्य ही तुम हिम्मत हार बैठते और असल मामले में झगड़ने लग जाते, किन्तु अल्लाह ने इससे बचा लिया। निश्चय ही वह तो जो कुछ दिलों में होता है उसे भी जानता है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप, अपने और मोमिनों के ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करें, जब अल्लाह ने आपको सपने में मुश्रिकों की संख्या कम करके दिखाई, और आपने ईमान वालों को इसके बारे में बताया, तो वे इस शुभ समाचार से आनंदित हुए और अपने दुश्मन से मिलने और उससे लड़ने का उनका संकल्प और भी मज़बूत हो गया। यदि अल्लाह आपको मुश्रिकों की संख्या अधिक दिखाता, तो अवश्य ही आपके साथियों के संकल्प कमज़ोर पड़ जाते और वे लड़ने से भय खाने लगते। परंतु अल्लाह ने इससे सुरक्षित रखा और उन्हें असफलता से बचाया। इसलिए उन्हें अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नज़र में कम कर दिया। निःसंदेह वह सीनों की बातों से भली-भाँति अवगत, तथा दिलों के भेदों को जानने वाला है।
आयत 44
وَإِذْ يُرِيكُمُوهُمْ إِذِ ٱلْتَقَيْتُمْ فِىٓ أَعْيُنِكُمْ قَلِيلًۭا وَيُقَلِّلُكُمْ فِىٓ أَعْيُنِهِمْ لِيَقْضِىَ ٱللَّهُ أَمْرًۭا كَانَ مَفْعُولًۭا ۗ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ
وَإِذْ
और जब
يُرِيكُمُوهُمْ
वो दिखा रहा था तुम्हें उनको
إِذِ
जब
ٱلْتَقَيْتُمْ
आमने-सामने हुए तुम
فِىٓ
in
أَعْيُنِكُمْ
तुम्हारी निगाहों में
قَلِيلًۭا
थोड़े
وَيُقَلِّلُكُمْ
और वो थोड़ा दिखा रहा था तुम्हें
فِىٓ
in
أَعْيُنِهِمْ
उनकी निगाहों में
لِيَقْضِىَ
ताकि वो पूरा कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَمْرًۭا
काम
كَانَ
था जो
مَفْعُولًۭا ۗ
होकर रहने वाला
وَإِلَى
And to
ٱللَّهِ
और तरफ़ अल्लाह ही के
تُرْجَعُ
लौटाए जाते हैं
ٱلْأُمُورُ
सब काम
याद करो जब तुम्हारी परस्पर मुठभेड़ हुई तो वह तुम्हारी निगाहों में उन्हें कम करके और तुम्हें उनकी निगाहों में कम करके दिखा रहा था, ताकि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे जिसका होना निश्चित था। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ ईमान वालो!) उस समय को याद करो, जब अल्लाह बहुदेववादियों को लड़ाई के समय तुम्हारी आँखों में थोड़ा करके दिखा रहा था। इस तरह उसने तुम्हें उनसे लड़ने का साहस दिया। तथा उनकी आँखों में तुम्हें थोड़ा करके दिखा रहा था, इसलिए वे भी तुमसे लड़ाई के लिए आगे बढ़े और वापस जाने के बारे में नहीं सोचा। ताकि अल्लाह उस काम को पूरा कर दे, जो होकर रहना था, यानी बहुदेववादियों से (उन्हें) मारकर और बंदी बनाकर बदला लेना और ईमान वालों को दुश्मनों पर जीत एवं सफलता द्वारा पुरस्कृत करना। तथा सभी मामले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते हैं, फिर वह कुकर्म करने वाले को उसके कुकर्म का, और सुकर्म करने वाले को उसके सुकर्म का बदला देता है।
आयत 45
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا لَقِيتُمْ فِئَةًۭ فَٱثْبُتُوا۟ وَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا لَّعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
لَقِيتُمْ
मुक़ाबला हो तुम्हारा
فِئَةًۭ
किसी गिरोह से
فَٱثْبُتُوا۟
तो साबित क़दम रहो
وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
كَثِيرًۭا
कसरत से
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फ़लाह पाओ
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारा किसी गिरोह से मुक़ाबला हो जाए तो जमे रहो और अल्लाह को ज़्यादा याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो एवं उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम काफ़िरों के किसी समूह का सामना करो, तो उनसे मिलते समय दृढ़ रहो और कायरता न दिखाओ। तथा अल्लाह को बहुत याद करो और उससे प्रार्थना करो। क्योंकि वही तुम्हें उनपर विजय दिलाने में समर्थ है; आशा है कि वह तुम्हें वह चीज़ प्रदान करे जो तुम माँगते हो और तुम्हें उस चीज़ से बचाए, जिसका तुम्हें डर है।
आयत 46
وَأَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَا تَنَـٰزَعُوا۟ فَتَفْشَلُوا۟ وَتَذْهَبَ رِيحُكُمْ ۖ وَٱصْبِرُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
وَلَا
और ना
تَنَـٰزَعُوا۟
तुम बाहम झगड़ो
فَتَفْشَلُوا۟
वरना तुम कम हिम्मत हो जाओगे
وَتَذْهَبَ
और जाती रहेगी
رِيحُكُمْ ۖ
हवा (शान) तुम्हारी
وَٱصْبِرُوٓا۟ ۚ
और सब्र करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों के
और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो और आपस में न झगड़ो, अन्यथा हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। और धैर्य से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह धैर्यवानों के साथ है
तफ़्सीर:
तुम अपने कथनों एवं कार्यों और अपनी सभी स्थितियों में अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और आपस में मतभेद न करो। क्योंकि मतभेद तुम्हारी कमज़ोरी और कायरता, तथा तुम्हारी शक्ति के मिट जाने का कारण है। तथा अपने शत्रु से मुठभेड़ के समय धैर्य रखो। निःसंदेह अल्लाह विजय, समर्थन और सहायता के साथ धैर्य रखने वालों के संग है। और अल्लाह जिसके साथ हो, वही अनिवार्य रूप से विजयी और ग़ालिब रहता है।
आयत 47
وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ خَرَجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِم بَطَرًۭا وَرِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌۭ
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
كَٱلَّذِينَ
मानिन्द उनके जो
خَرَجُوا۟
निकले
مِن
from
دِيَـٰرِهِم
अपने घरों से
بَطَرًۭا
इतराते हुए
وَرِئَآءَ
और दिखावा करते हुए
ٱلنَّاسِ
लोगों को
وَيَصُدُّونَ
और वो रोकते थे
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसको जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
مُحِيطٌۭ
घेरने वाला है
और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है, हालाँकि जो कुछ वे करते है, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है
तफ़्सीर:
और उन मुश्रिकों के समान न हो जाओ, जो मक्का से घमंड करते हुए तथा लोगों को दिखावा करते हुए निकले। तथा वे लोगों को अल्लाह के धर्म (इस्लाम) से दूर करते और उन्हें उसमें प्रवेश करने से रोकते हैं। हालाँकि जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उसे (अपने ज्ञान के) घेरे में लिए हुए है। उनके कामों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 48
وَإِذْ زَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ ٱلْيَوْمَ مِنَ ٱلنَّاسِ وَإِنِّى جَارٌۭ لَّكُمْ ۖ فَلَمَّا تَرَآءَتِ ٱلْفِئَتَانِ نَكَصَ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ وَقَالَ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّنكُمْ إِنِّىٓ أَرَىٰ مَا لَا تَرَوْنَ إِنِّىٓ أَخَافُ ٱللَّهَ ۚ وَٱللَّهُ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
وَإِذْ
और जब
زَيَّنَ
मुज़य्यन कर दिया
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
أَعْمَـٰلَهُمْ
उनके आमाल को
وَقَالَ
और उसने कहा
لَا
नहीं
غَالِبَ
कोई ग़ालिब आने वाला
لَكُمُ
तुम पर
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
مِنَ
from
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
وَإِنِّى
और बेशक मैं
جَارٌۭ
हमसाया/हिमायती हूँ
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारा
فَلَمَّا
तो जब
تَرَآءَتِ
एक-दूसरे को देखा
ٱلْفِئَتَانِ
दोनों जमाअतों ने
نَكَصَ
वो पलट गया
عَلَىٰ
on
عَقِبَيْهِ
अपनी दोनों एड़ियों पर
وَقَالَ
और उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़ ज़िम्मा हूँ
مِّنكُمْ
तुम से
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰ
मैं देख रहा हूँ
مَا
जो
لَا
not
تَرَوْنَ
नहीं तुम देख रहे
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
और याद करो जब शैतान ने उनके कर्म उनके लिए सुन्दर बना दिए और कहा, "आज लोगों में से कोई भी तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" किन्तु जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए तो वह उलटे पाँव फिर गया और कहने लगा, "मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। मैं वह कुछ देख रहा हूँ, जो तुम्हें नहीं दिखाई देता। मैं अल्लाह से डरता हूँ, और अल्लाह कठोर यातना देनेवाला है।"
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो कि शैतान ने बहुदेववादियों के लिए उनके कर्म सुंदर बना दिए। इस तरह उसने उन्हें मुसलमानों का सामना करने और उनसे लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और उनसे कहा : आज तुमपर कोई विजय पाने वाला नहीं, निश्चय मैं तुम्हारी सहायता करूँगा और तुम्हारे शत्रुओं से तुम्हारी रक्षा करूँगा। फिर जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए : एक तरफ़ ईमान वालों का गिरोह, जिनके साथ उनकी मदद के लिए फ़रिश्ते थे, और दूसरी तरफ़ बहुदेववादियों का गिरोह, जिनके साथ शैतान था, जो शीघ्र ही उनका साथ छोड़ने वाला था; ऐसी परिस्थिति में शैतान पीठ फेरकर भाग खड़ा हुआ और बहुदेववादियों से कहा : मैं तुमसे बरी हूँ। मैं उन फ़रिश्तों को देख रहा हूँ, जो मोमिनों की सहायता के लिए आए हैं। मुझे डर है कि कहीं अल्लाह मुझे नष्ट न कर दे, और अल्लाह बहुत कठोर सज़ा देने वाला है। इसलिए कोई भी उसकी सज़ा सहन करने में सक्षम नहीं है।
आयत 49
إِذْ يَقُولُ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌ غَرَّ هَـٰٓؤُلَآءِ دِينُهُمْ ۗ وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
إِذْ
जब
يَقُولُ
कह रह थे
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ
मुनाफ़िक़
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग
فِى
in
قُلُوبِهِم
दिलों में जिनके
مَّرَضٌ
बीमारी थी
غَرَّ
धोखे में डाल दिया है
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन लोगों को
دِينُهُمْ ۗ
उनके दीन ने
وَمَن
और जो कोई
يَتَوَكَّلْ
तवक्कल करेगा
عَلَى
in
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
याद करो जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है, कह रहे थे, "इन लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है।" हालाँकि जो अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तथा (वह समय याद करो) जब मुनाफ़िक़ तथा कमज़ोर ईमान वाले लोग कह रहे थे : इन मुसलमानों को इनके धर्म ने धोखा दिया है, जो इनसे इनकी कम संख्या और कमज़ोर उपकरण के बावजूद, इनसे अधिक संख्या और मज़बूत उपकरण वाले इनके दुश्मनों पर जीत का वादा कर रहा है। लेकिन इन लोगों को इस बात का एहसास नहीं था कि जो व्यक्ति एक अल्लाह पर भरोसा करता और उसके मदद के वादे पर विश्वास रखता है, तो निश्चय अल्लाह उसकी सहायता करने वाला है और वह उसे कभी असहाय नहीं छोड़ेगा, चाहे वह कितना भी कमज़ोर क्यों न हो। अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, कोई भी उसे परास्त नहीं कर सकता, वह अपनी नियति और विधान में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 50
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ يَتَوَفَّى ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۙ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَأَدْبَـٰرَهُمْ وَذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلْحَرِيقِ
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذْ
जब
يَتَوَفَّى
फ़ौत करते हैं
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۙ
कुफ़्र किया
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
يَضْرِبُونَ
वो मारते हैं
وُجُوهَهُمْ
उनके चेहरों पर
وَأَدْبَـٰرَهُمْ
और उनकी पीठों पर
وَذُوقُوا۟
और (वो कहते हैं) चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْحَرِيقِ
आग का
क्या ही अच्छा होता कि तुम देखते जब फ़रिश्ते इनकार करनेवालों के प्राण ग्रस्त करते हैं! वे उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं कि "लो अब जलने की यातना मज़ा चखो।" (तो उनकी दुर्दशा का अन्दाजा कर सकते)
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आप अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार करने वालों को उस समय देखते, जब फ़रिश्ते उनके प्राण निकाल रहे थे; जब वे आगे बढ़ते थे, तो उनके चेहरों पर मारते और जब वे पीठ फेरकर भागते, तो उनकी पीठ पर मारते थे और उनसे कहते थे : (ऐ काफ़िरो!) जलाने वाली यातना का मज़ा चखो। यदि आप इसे देखते, तो आप एक भयानक दृश्य देखते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जंग के आदाब और फरिश्तों की गवाही का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात में सब्र और डटे रहना कामयाबी की शर्त है।
आयत 51
ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّـٰمٍۢ لِّلْعَبِيدِ
ذَٰلِكَ
ये
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيكُمْ
तुम्हारे हाथों ने
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَيْسَ
नहीं है
بِظَلَّـٰمٍۢ
कोई ज़ुल्म करने वाला
لِّلْعَبِيدِ
बन्दों पर
यह तो उसी का बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा और यह कि अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता
तफ़्सीर:
(ऐ काफ़िरो!) तुम्हारे प्राण निकालते समय यह दर्दनाक पीड़ा, तथा तुम्हारी क़ब्रों में और आख़िरत में जलाने वाली यातना, यह (सब) उसके कारण है, जो दुनिया में तुम्हारे हाथों ने कमाया है। इसलिए कि अल्लाह लोगों पर अत्याचार नहीं करता, बल्कि उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला करता है। क्योंकि वह न्याय के साथ निर्णय करने वाला है।
आयत 52
كَدَأْبِ ءَالِ فِرْعَوْنَ ۙ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ قَوِىٌّۭ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
كَدَأْبِ
जैसी हालत थी
ءَالِ
(of) people
فِرْعَوْنَ ۙ
आले फ़िरऔन की
وَٱلَّذِينَ
और उनकी जो
مِن
(were) from
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِ
in (the) Signs
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का
فَأَخَذَهُمُ
फिर पकड़ लिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِذُنُوبِهِمْ ۗ
बवजह उनके गुनाहों के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
قَوِىٌّۭ
बहुत क़ुव्वत वाला है
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
इनके साथ वैसा ही मामला पेश आया जैसा फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों के साथ पेश आया। उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह अल्लाह शक्तिशाली, कठोर यातना देनेवाला है
तफ़्सीर:
इन काफ़िरों पर उतरने वाली यह यातना उन्हीं के लिए विशिष्ट नहीं है, बल्कि यह अल्लाह का नियम है जो वह हर समय और जगह में काफ़िरों पर लागू करता रहा है। चुनाँचे फ़िरऔन के लोग तथा उनसे पहले के समुदाय इससे पीड़ित हो चुके हैं, जब उन्होंने अल्लाह की निशानियों का इनकार किया। इसलिए अल्लाह ने उन्हें, उनके गुनाहों के कारण एक प्रभुत्वशाली और शक्तिमान की तरह पकड़ लिया और उनपर अपना दंड उतार दिया। निःसंदेह अल्लाह बहुत शक्तिशाली, अजेय और अपराजेय है, अपनी अवज्ञा करने वालों को कठोर दंड देने वाला है।
आयत 53
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًۭا نِّعْمَةً أَنْعَمَهَا عَلَىٰ قَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا۟ مَا بِأَنفُسِهِمْ ۙ وَأَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّ
बवजह इसके कि
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَمْ
नहीं
يَكُ
है वो
مُغَيِّرًۭا
तब्दील करने वाला
نِّعْمَةً
किसी नेअमत को
أَنْعَمَهَا
उसने इनाम किया हो जिसे
عَلَىٰ
on
قَوْمٍ
किसी क़ौम पर
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُغَيِّرُوا۟
वो तब्दील कर दें
مَا
उसे जो
بِأَنفُسِهِمْ ۙ
उनके नफ़्सों में है
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं हैं, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
यह दर्दनाक यातना इस कारण है कि अल्लाह जब किसी जाति को कोई अनुग्रह प्रदान करता है, तो उसे उनसे उस समय तक नहीं छीनता, जब तक कि वे ईमान, धार्मिकता और नेमतों के प्रति आभार की अपनी अच्छी स्थिति को बदलकर अल्लाह के इनकार, उसकी अवज्ञा और उसकी नेमतों की नाशुक्री की बुरी स्थिति को न अपना लें। और यह कि अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कार्यों को जानने वाला है। उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है।
आयत 54
كَدَأْبِ ءَالِ فِرْعَوْنَ ۙ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ فَأَهْلَكْنَـٰهُم بِذُنُوبِهِمْ وَأَغْرَقْنَآ ءَالَ فِرْعَوْنَ ۚ وَكُلٌّۭ كَانُوا۟ ظَـٰلِمِينَ
كَدَأْبِ
जैसी हालत थी
ءَالِ
(of) people
فِرْعَوْنَ ۙ
आले फ़िरऔन की
وَٱلَّذِينَ
और उनकी जो
مِن
(were) from
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِ
आयात को
رَبِّهِمْ
अपने रब की
فَأَهْلَكْنَـٰهُم
तो हलाक कर दिया हमने उन्हें
بِذُنُوبِهِمْ
बवजह उनके गुनाहों के
وَأَغْرَقْنَآ
और ग़र्क़ कर दिया हमने
ءَالَ
(the) people
فِرْعَوْنَ ۚ
आले फ़िरऔन को
وَكُلٌّۭ
और सबके सब
كَانُوا۟
थे वो
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों को झुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे
तफ़्सीर:
इन काफ़िरों की स्थिति उन अन्य लोगों की तरह है, जिन्होंने फ़िरऔनियों तथा उनसे पहले के झुठलाने वाले समुदायों की तरह अल्लाह का इनकार किया। उन्होंने अपने रब की निशानियों को झुठलाया, इसलिए अल्लाह ने उनके द्वारा किए गए पापों के कारण उन्हें विनष्ट कर दिया, तथा अल्लाह ने फ़िरऔनियों को समुद्र में डुबोकर विनष्ट किया। दरअसल, फ़िरऔन के लोग और उनसे पहले के झुठलाने वाले सभी समुदाय, अपने कुफ़्र एवं शिर्क के कारण ज़ालिम थे। इसलिए वे अल्लाह की सज़ा के हक़दार बन गए थे, तो अल्लाह ने उनपर सज़ा उतार दी।
आयत 55
إِنَّ شَرَّ ٱلدَّوَآبِّ عِندَ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّ
बेशक
شَرَّ
बदतरीन
ٱلدَّوَآبِّ
जानदारों में
عِندَ
near
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
ٱلَّذِينَ
वो हैं जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَهُمْ
पस वो
لَا
(will) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की स्पष्ट में वे लोग है, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते
तफ़्सीर:
धरती पर चलने वाले सबसे बुरे लोग वे हैं, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार किया। भले ही उनके पास हर तरह की निशानी आ जाए, वे ईमान नहीं लाएँगे; क्योंकि वे कुफ़्र पर अड़े हुए हैं। उनके अंदर मार्गदर्शन के साधन जैसे बुद्धि, कान और आँख निष्कर्म हो चुके हैं।
आयत 56
ٱلَّذِينَ عَـٰهَدتَّ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنقُضُونَ عَهْدَهُمْ فِى كُلِّ مَرَّةٍۢ وَهُمْ لَا يَتَّقُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
عَـٰهَدتَّ
अहद लिया आपने
مِنْهُمْ
उनसे
ثُمَّ
फिर
يَنقُضُونَ
वो तोड़ देते हैं
عَهْدَهُمْ
अपने अहद को
فِى
[in]
كُلِّ
हर
مَرَّةٍۢ
बार
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يَتَّقُونَ
नहीं वो डरते
जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग कर देते है और वे डर नहीं रखते
तफ़्सीर:
जिन लोगों के साथ आपने संधियाँ और समझौते किए हैं (जैसे बनू क़ुरैज़ा), फिर वे हर बार अपना समझौता भंग कर देते हैं और वे अल्लाह से नहीं डरते। इसलिए वे अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी नहीं करते और उनसे ली गई वाचाओं का पालन नहीं करते।
आयत 57
فَإِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِى ٱلْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِم مَّنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
فَإِمَّا
फिर अगर
تَثْقَفَنَّهُمْ
आप पाऐं उन्हें
فِى
in
ٱلْحَرْبِ
जंग में
فَشَرِّدْ
तो मार भगाऐं
بِهِم
उनके ज़रिए
مَّنْ
उन्हें जो
خَلْفَهُمْ
पीछे हैं उनके
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَذَّكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें
तफ़्सीर:
तो यदि कभी (ऐ रसूल!) आप इन वचन तोड़ने वाले लोगों को युद्धभूमि में पा लें, तो उन्हें और अधिक कठोर दंड दें यहाँ तक कि दूसरे लोग भी इसके बारे में सुन लें, ताकि वे इनकी स्थिति से सीख ग्रहण करें। फिर वे आपसे लड़ने और आपके विरुद्ध आपके शत्रुओं की मदद करने से डर महसूस करें।
आयत 58
وَإِمَّا تَخَافَنَّ مِن قَوْمٍ خِيَانَةًۭ فَٱنۢبِذْ إِلَيْهِمْ عَلَىٰ سَوَآءٍ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْخَآئِنِينَ
وَإِمَّا
और अगर
تَخَافَنَّ
आप वाक़ई ख़ौफ़ रखते हैं
مِن
from
قَوْمٍ
किसी क़ौम से
خِيَانَةًۭ
ख़यानत का
فَٱنۢبِذْ
पस फेंक दीजिए (अहद)
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
عَلَىٰ
on
سَوَآءٍ ۚ
बराबरी पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْخَآئِنِينَ
ख़यानत करने वालों को
और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आपको किसी ऐसी जाति की ओर से जिनसे आपने संधि कर रखी है, धोखा देने और वचन तोड़ने का भय हो, जिसके आपको संकेत दिखाई पड़ रहे हों, तो आप उन्हें उनके वचन को तोड़ने के बारे में सूचित कर दें, ताकि वे इसकी जानकारी में आपके बराबर हो जाएँ। उन्हें सूचित करने से पहले उनपर अचानक हमला न करें। क्योंकि सूचना देने से पहले अचानक उनपर हमला करना विश्वासघात है। और अल्लाह विश्वासघात करने वालों से प्रेम नहीं करता, बल्कि उनसे घृणा करता है। इसलिए आप विश्वासघात से सावधान रहें।
आयत 59
وَلَا يَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ سَبَقُوٓا۟ ۚ إِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُونَ
وَلَا
और ना
يَحْسَبَنَّ
हरगिज़ गुमान करें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
سَبَقُوٓا۟ ۚ
कि वो सबक़त ले गए
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَا
(can) not
يُعْجِزُونَ
नहीं वो आजिज़ कर सकते
इनकार करनेवाले यह न समझे कि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
तफ़्सीर:
जो लोग काफ़िर हैं, वे हरगिज़ यह न समझें कि वे अल्लाह के दंड से छूट गए हैं और उससे बच निकले हैं। वे अल्लाह से नहीं छूट सकते और उसके दंड से नहीं बच सकते। बल्कि वह हर हाल में उन्हें पाकर रहेगा।
आयत 60
وَأَعِدُّوا۟ لَهُم مَّا ٱسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍۢ وَمِن رِّبَاطِ ٱلْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِهِۦ عَدُوَّ ٱللَّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَءَاخَرِينَ مِن دُونِهِمْ لَا تَعْلَمُونَهُمُ ٱللَّهُ يَعْلَمُهُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِن شَىْءٍۢ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ
وَأَعِدُّوا۟
और तैयार रखो
لَهُم
उनके लिए
مَّا
जो
ٱسْتَطَعْتُم
इस्तिताअत रखते हो तुम
مِّن
of
قُوَّةٍۢ
क़ुव्वत में से
وَمِن
and of
رِّبَاطِ
tethered
ٱلْخَيْلِ
और बाँधे हुए घोड़ों से
تُرْهِبُونَ
तुम डराओगे
بِهِۦ
साथ उसके
عَدُوَّ
(the) enemy
ٱللَّهِ
अल्लाह के दुश्मनों को
وَعَدُوَّكُمْ
और अपने दुश्मनों को
وَءَاخَرِينَ
और कुछ दूसरों को
مِن
from
دُونِهِمْ
उनके अलावा
لَا
not
تَعْلَمُونَهُمُ
नहीं तुम जानते उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَعْلَمُهُمْ ۚ
वो जानता है उन्हें
وَمَا
और जो
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करोगे
مِن
from
شَىْءٍۢ
कुछ भी
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
يُوَفَّ
वो पूरा-पूरा दिया जाएगा
إِلَيْكُمْ
तुम्हें
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(will) not
تُظْلَمُونَ
ना तुम ज़ुल्म किए जाओगे
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा
तफ़्सीर:
तथा (ऐ ईमान वालो!) तुमसे जितना हो सके संख्याबल और (सैन्य) उपकरण तैयार रखो, और उनके लिए उन घोड़ों को तैयार रखो, जिन्हें अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए पाले हुए हो, जिससे तुम उन काफ़िरों में से अल्लाह के शत्रुओं तथा अपने शत्रुओं को डरा सको, जो हमेशा तुम्हें नुकसान पहुँचाने की फिराक में रहते हैं, तथा जिससे कुछ अन्य लोगों को भी डरा सको, जिन्हें तुम नहीं जानते तथा तुम यह भी नहीं जानते कि उन्होंने अपने दिलों में तुम्हारे खिलाफ कितनी (बड़ी) दुश्मनी छिपा रखी है। बल्कि उन्हें और उनके दिलों में छिपी बातों को केवल अल्लाह ही जानता है। तथा अल्लाह की राह में तुम जो भी खर्च करोगे, कम हो या ज़्यादा, अल्लाह उसका इस दुनिया में तुम्हें बदला देगा और आख़िरत में तुम्हें उसका पूरा-पूरा सवाब देगा। इसलिए अल्लाह की राह में ख़र्च करने में जल्दी करो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अहद तोड़ने वालों से निमटने और तैयारी की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपने दिफा के लिए मुनासिब तैयारी रखना अक्लमंदी है।
आयत 61
۞ وَإِن جَنَحُوا۟ لِلسَّلْمِ فَٱجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
۞ وَإِن
और अगर
جَنَحُوا۟
वो माइल हों
لِلسَّلْمِ
सुलह के लिए
فَٱجْنَحْ
तो आप भी माइल हो जाइए
لَهَا
उसके लिए
وَتَوَكَّلْ
और तवक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
और यदि वे संधि की ओर झुकें और आपसे लड़ाई करना त्याग दें, तो (ऐ रसूल!) आप भी उसकी ओर झुक जाएँ और उनसे समझौता कर लें, तथा अल्लाह पर भरोसा करें और उसपर विश्वास रखें। क्योंकि वह हरगिज़ आपको असहाय नहीं छोड़ेगा। निःसंदेह वह उनकी बातों को सुनने वाला, उनके इरादों और कार्यों को जानने वाला है।
आयत 62
وَإِن يُرِيدُوٓا۟ أَن يَخْدَعُوكَ فَإِنَّ حَسْبَكَ ٱللَّهُ ۚ هُوَ ٱلَّذِىٓ أَيَّدَكَ بِنَصْرِهِۦ وَبِٱلْمُؤْمِنِينَ
وَإِن
और अगर
يُرِيدُوٓا۟
वो चाहें
أَن
कि
يَخْدَعُوكَ
वो धोखा दें आपको
فَإِنَّ
तो बेशक
حَسْبَكَ
काफ़ी है आपको
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَيَّدَكَ
ताईद की आपकी
بِنَصْرِهِۦ
साथ अपनी मदद के
وَبِٱلْمُؤْمِنِينَ
और साथ मोमिनों के
और यदि वे यह चाहें कि तुम्हें धोखा दें तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। वही तो है जिसने तुम्हें अपनी सहायता से और मोमिनों के द्वारा शक्ति प्रदान की
तफ़्सीर:
और यदि संधि करने और युद्ध करना छोड़ने से उनका उद्देश्य (ऐ रसूल!) आपको धोखा देना है, ताकि वे आपसे लड़ने के लिए तैयारी कर सकें, तो अल्लाह उनकी साज़िश और धोखे से आपको बचाने के लिए काफ़ी है। वही है जिसने अपनी सहायता से आपको मज़बूती प्रदान की, तथा ईमान लाने वाले मुहाजिरों और अनसारियों की मदद से आपको सशक्त किया।
आयत 63
وَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ ۚ لَوْ أَنفَقْتَ مَا فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا مَّآ أَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ أَلَّفَ بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
وَأَلَّفَ
और उसने उलफ़त डाल दी
بَيْنَ
दर्मियान
قُلُوبِهِمْ ۚ
उनके दिलों के
لَوْ
अगर
أَنفَقْتَ
ख़र्च करते आप
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
جَمِيعًۭا
सारे का सारा
مَّآ
ना
أَلَّفْتَ
उलफ़त डाल सकते थे आप
بَيْنَ
दर्मियान
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों के
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
أَلَّفَ
उलफ़त डाल दी
بَيْنَهُمْ ۚ
दर्मियान उनके
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
बहुत हिकमत वाला है
और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलों को परस्पर जोड़ न सकते, किन्तु अल्लाह ने उन्हें परस्पर जोड़ दिया। निश्चय ही वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तथा उसने उन ईमान वालों के दिलों को, जिनके द्वारा उसने आपकी मदद की, आपस में जोड़ दिया, जबकि वे बिखरे हुए थे। यदि आप उनके बिखरे हुए दिलों को जोड़ने के लिए, धरती के अंदर जितना धन है, सब खर्च कर देते, तो भी आप उन्हें जोड़ न पाते। लेकिन अकेले अल्लाह ने उन्हें जोड़ दिया। वह अपने राज्य में शक्तिशाली है, उसे कोई परास्त नहीं कर सकता। वह अपनी नियति, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 64
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ حَسْبُكَ ٱللَّهُ وَمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
حَسْبُكَ
काफ़ी है आपको
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَمَنِ
और उसे जो
ٱتَّبَعَكَ
पैरवी करे आपकी
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
ऐ नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमानवाले अनुयायी ही काफ़ी है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! आपको तथा आपके ईमान वाले साथियों को, आपके दुश्मनों की बुराई से बचाने के लिए अल्लाह काफ़ी है। इसलिए अल्लाह पर विश्वास और भरोसा रखें।
आयत 65
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ حَرِّضِ ٱلْمُؤْمِنِينَ عَلَى ٱلْقِتَالِ ۚ إِن يَكُن مِّنكُمْ عِشْرُونَ صَـٰبِرُونَ يَغْلِبُوا۟ مِا۟ئَتَيْنِ ۚ وَإِن يَكُن مِّنكُم مِّا۟ئَةٌۭ يَغْلِبُوٓا۟ أَلْفًۭا مِّنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَفْقَهُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
حَرِّضِ
रग़बत दिलाइए
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
عَلَى
to
ٱلْقِتَالِ ۚ
जंग पर
إِن
अगर
يَكُن
होंगे
مِّنكُمْ
तुम में से
عِشْرُونَ
बीस
صَـٰبِرُونَ
सब्र करने वाले
يَغْلِبُوا۟
वो ग़ालिब आ जाऐंगे
مِا۟ئَتَيْنِ ۚ
दो सौ पर
وَإِن
और अगर
يَكُن
होंगे
مِّنكُم
तुम में से
مِّا۟ئَةٌۭ
एक सौ
يَغْلِبُوٓا۟
वो ग़ालिब आ जाऐंगे
أَلْفًۭا
एक हज़ार पर
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उनमें से जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَوْمٌۭ
ऐसे लोग हैं
لَّا
(who do) not
يَفْقَهُونَ
जो समझ नहीं रखते
ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुमसे से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! ईमान वालों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करें, तथा उन्हें इसके लिए इस तरह से प्रोत्साहन दें कि उनके संकल्प को मज़बूत करें और उनका हौसला बढ़ाएँ। (ऐ ईमान वालो!) अगर तुममें से बीस आदमी काफ़िरों से लड़ने में धैर्य रखने वाले हों, तो दो सौ काफ़िरों पर प्रभावी रहेंगे। और अगर तुममें से एक सौ धैर्य रखने वाले हों, तो एक हज़ार काफ़िरों को हरा देंगे। इसका कारण यह है कि काफ़िर लोग अल्लाह का यह नियम नहीं समझते कि वह अपने दोस्तों को विजय प्रदान करता है और अपने शत्रुओं को परास्त कर देता है। तथा वे नहीं जानते कि लड़ने का क्या उद्देश्य है। यही कारण है कि वे दुनिया में वर्चस्व प्राप्त करने के लिए लड़ते हैं।
आयत 66
ٱلْـَٔـٰنَ خَفَّفَ ٱللَّهُ عَنكُمْ وَعَلِمَ أَنَّ فِيكُمْ ضَعْفًۭا ۚ فَإِن يَكُن مِّنكُم مِّا۟ئَةٌۭ صَابِرَةٌۭ يَغْلِبُوا۟ مِا۟ئَتَيْنِ ۚ وَإِن يَكُن مِّنكُمْ أَلْفٌۭ يَغْلِبُوٓا۟ أَلْفَيْنِ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
ٱلْـَٔـٰنَ
अब
خَفَّفَ
हल्का कर दिया (बोझ)
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَنكُمْ
तुमसे
وَعَلِمَ
और उसने जान लिया
أَنَّ
बेशक
فِيكُمْ
तुम में
ضَعْفًۭا ۚ
कमज़ोरी है
فَإِن
पस अगर
يَكُن
हों
مِّنكُم
तुम में से
مِّا۟ئَةٌۭ
एक सौ
صَابِرَةٌۭ
सब्र करने वाले
يَغْلِبُوا۟
वो ग़ालिब आ जाऐंगे
مِا۟ئَتَيْنِ ۚ
दो सौ पर
وَإِن
और अगर
يَكُن
हों
مِّنكُمْ
तुम में से
أَلْفٌۭ
एक हज़ार
يَغْلِبُوٓا۟
वो ग़ालिब आ जाऐंगे
أَلْفَيْنِ
दो हज़ार पर
بِإِذْنِ
with (the) permission
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के इज़्न से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों के
अब अल्लाह ने तुम्हारे बोझ हल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहनेवाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हजार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे। अल्लाह तो उन्ही लोगों के साथ है जो जमे रहते है
तफ़्सीर:
अब अल्लाह ने (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारी कमज़ोरी को देखते हुए अपनी कृपा से तुम्हारे बोझ को हल्का कर दिया है। अब उसने अनिवार्य किया है कि तुममें से एक व्यक्ति को दस के बजाय दो काफिरों के सामने खड़ा होना है। अतः यदि तुममें से सौ लोग काफ़िरों से लड़ने में धैर्य रखने वाले हों, तो दो सौ पर विजय प्राप्त करेंगे। और अगर तुममें से एक हज़ार धैर्य रखने वाले व्यक्ति हों, तो अल्लाह की अनुमति से दो हज़ार काफ़िरों पर विजयी रहेंगे। तथा अल्लाह समर्थन और विजय के साथ धैर्यवान मोमिनों के संग है।
आयत 67
مَا كَانَ لِنَبِىٍّ أَن يَكُونَ لَهُۥٓ أَسْرَىٰ حَتَّىٰ يُثْخِنَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ تُرِيدُونَ عَرَضَ ٱلدُّنْيَا وَٱللَّهُ يُرِيدُ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
مَا
नहीं
كَانَ
है
لِنَبِىٍّ
किसी नबी के लिए
أَن
कि
يَكُونَ
हों
لَهُۥٓ
उसके लिए
أَسْرَىٰ
क़ैदी
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُثْخِنَ
वो अच्छी तरह ख़ून बहा दे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
تُرِيدُونَ
तुम चाहते हो
عَرَضَ
सामान
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُرِيدُ
चाहता है
ٱلْـَٔاخِرَةَ ۗ
आख़िरत
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
किसी नबी के लिए यह उचित नहीं कि उसके पास क़ैदी हो यहाँ तक की वह धरती में रक्तपात करे। तुम लोग संसार की सामग्री चाहते हो, जबकि अल्लाह आख़िरत चाहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
किसी नबी के लिए उचित नहीं है कि उसके पास उन काफ़िरों में से बंदी हों, जो उससे लड़ रहे हैं, यहाँ तक कि उनका अच्छी तरह खून बहा ले; ताकि उनके दिलों में भय दाखिल हो जाए, फिर वे दोबारा युद्ध करने की हिम्मत न करें। (ऐ ईमान वालो!) तुम बद्र में दुश्मनों को बंदी बनाकर फिरौती लेना चाहते हो और अल्लाह आख़िरत चाहता है, जिसे धर्म की जीत और उसके प्रभुत्व से प्राप्त किया जा सकता है। अल्लाह अपने अस्तित्व, अपने गुणों और शक्ति में प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपनी नियति और शरीयत में हिकमत वाला है।
आयत 68
لَّوْلَا كِتَـٰبٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَآ أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
لَّوْلَا
अगर ना होता
كِتَـٰبٌۭ
लिखा हुआ
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
سَبَقَ
जो गुज़र चुका है
لَمَسَّكُمْ
अलबत्ता पहुँचता तुम्हें
فِيمَآ
उसके (बदले) में जो
أَخَذْتُمْ
लिया तुमने
عَذَابٌ
अज़ाब
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
यदि अल्लाह का लिखा पहले से मौजूद न होता, तो जो कुछ नीति तुमने अपनाई है उसपर तुम्हें कोई बड़ी यातना आ लेती
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह की ओर से यह लिखी हुई बात न होती, जिसमें उसने पूर्वनियत और फ़ैसला कर दिया था कि उसने तुम्हारे लिए ग़नीमत का धन हलाल कर दिया तथा बंदियों को फिरौती के बदले छोड़ना अनुमेय कर दिया, तो अल्लाह की ओर से उसकी अनुमति के बारे में वह़्य उतरने से पहले, तुम्हारे ग़नीमत का धन और क़ैदियों से फिरौती लेने के कारण, तुम्हें अल्लाह की ओर से सख़्त यातना पहुँचती।
आयत 69
فَكُلُوا۟ مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَـٰلًۭا طَيِّبًۭا ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
فَكُلُوا۟
पस खाओ
مِمَّا
उसमें से जो
غَنِمْتُمْ
ग़नीमत पाई तुमने
حَلَـٰلًۭا
हलाल
طَيِّبًۭا ۚ
पाक
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ ईमान वालो!) तुमने काफ़िरों से जो ग़नीमत का धन प्राप्त किया है, उसे खाओ। वह तुम्हारे लिए हलाल है। तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहकर, डरो। निःसंदेह अल्लाह अपने ईमान वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दया करने वाला है।
आयत 70
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ قُل لِّمَن فِىٓ أَيْدِيكُم مِّنَ ٱلْأَسْرَىٰٓ إِن يَعْلَمِ ٱللَّهُ فِى قُلُوبِكُمْ خَيْرًۭا يُؤْتِكُمْ خَيْرًۭا مِّمَّآ أُخِذَ مِنكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
قُل
कह दीजिए
لِّمَن
उनसे जो
فِىٓ
(is) in
أَيْدِيكُم
तुम्हारे हाथों में है
مِّنَ
of
ٱلْأَسْرَىٰٓ
क़ैदियों में से
إِن
अगर
يَعْلَمِ
जान लेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِى
in
قُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों में
خَيْرًۭا
कोई भलाई
يُؤْتِكُمْ
वो देगा तुम्हें
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّمَّآ
उससे जो
أُخِذَ
ले लिया गया
مِنكُمْ
तुम से
وَيَغْفِرْ
और वो बख़्श देगा
لَكُمْ ۗ
तुम्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्जें में है, उनसे कह दो, "यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
ऐ नबी! उन लोगों से कहो जो बहुदेववादियों के बंदियों में से तुम्हारे हाथों में आए हैं, जिन्हें तुमने बद्र के दिन क़ैद कर लिया था : अगर अल्लाह तुम्हारे दिलों में नेकी की मंशा और अच्छा इरादा जान लेगा, तो तुम्हें उससे बेहतर देगा जो तुमसे छुड़ौती में लिया गया है। इसलिए जो कुछ तुमसे लिया गया है, उसपर शोक मत करो। तथा वह तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दया करने वाला है। वास्तव में, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चाचा अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके अलावा अन्य मुसलमान होने वालों के संबंध में अल्लाह का यह वादा पूरा हो गया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुलह की पेशकश और कैदियों के मामलों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब दुश्मन सुलह चाहे तो उसे कबूल करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, अमन को तरजीह देनी चाहिए।
आयत 71
وَإِن يُرِيدُوا۟ خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا۟ ٱللَّهَ مِن قَبْلُ فَأَمْكَنَ مِنْهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
وَإِن
और अगर
يُرِيدُوا۟
वो इरादा करेंगे
خِيَانَتَكَ
आपसे ख़यानत का
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
خَانُوا۟
उन्होंने ख़यानत की
ٱللَّهَ
अल्लाह से
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
فَأَمْكَنَ
तो उसने क़ाबू में दे दिया
مِنْهُمْ ۗ
उन्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
बहुत इल्म वाला है
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
किन्तुम यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके है। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और अगर वे (ऐ मुहम्मद!) आपसे जो कुछ कहते हैं, उसके द्वारा आपके साथ विश्वासघात करना चाहें, तो निश्चय वे इससे पहले अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके हैं, और अल्लाह ने उनके विरुद्ध आपकी सहायता की। चुनाँचे उनमें से कुछ लोग मारे गए और कुछ लोग क़ैद हुए। अब अगर वे दोबारा ऐसी हरकत करें, तो उन्हें इसी तरह की सज़ा की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अल्लाह अपनी सृष्टि और उसके हितों से अवगत है, अपने प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 72
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَهَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلَّذِينَ ءَاوَوا۟ وَّنَصَرُوٓا۟ أُو۟لَـٰٓئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَآءُ بَعْضٍۢ ۚ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَمْ يُهَاجِرُوا۟ مَا لَكُم مِّن وَلَـٰيَتِهِم مِّن شَىْءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُوا۟ ۚ وَإِنِ ٱسْتَنصَرُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ فَعَلَيْكُمُ ٱلنَّصْرُ إِلَّا عَلَىٰ قَوْمٍۭ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَـٰقٌۭ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमाम लाए
وَهَاجَرُوا۟
और उन्होंने हिजरत की
وَجَـٰهَدُوا۟
और उन्होंने जिहाद किया
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों
وَأَنفُسِهِمْ
और अपनी जानों के
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ءَاوَوا۟
पनाह दी
وَّنَصَرُوٓا۟
और मदद की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
أَوْلِيَآءُ
दोस्त हैं
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ के
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَلَمْ
और नहीं
يُهَاجِرُوا۟
उन्होंने हिजरत की
مَا
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
(of)
وَلَـٰيَتِهِم
उनकी दोस्ती में से
مِّن
(in)
شَىْءٍ
कोई भी चीज़
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُهَاجِرُوا۟ ۚ
वो हिजरत कर जाऐं
وَإِنِ
और अगर
ٱسْتَنصَرُوكُمْ
वो मदद माँगें तुमसे
فِى
in
ٱلدِّينِ
दीन के मामले में
فَعَلَيْكُمُ
तो तुम पर (लाज़िम) है
ٱلنَّصْرُ
मदद करना
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
against
قَوْمٍۭ
उस क़ौम के ख़िलाफ़
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَهُم
और दर्मियान उनके
مِّيثَـٰقٌۭ ۗ
पुख़्ता मुआहिदा है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र है। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारा संरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगे तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, उसके रसूल की पुष्टि की, उसकी शरीयत पर अमल किया तथा कुफ़्र के देश से इस्लाम के देश की ओर या ऐसी जगह की ओर हिजरत की जहाँ निर्भय होकर अल्लाह की इबादत कर सकें, तथा अल्लाह की बात को सर्वोच्च करने के लिए अपनी जान और माल के साथ जिहाद किया, तथा वे लोग जिन्होंने उनको अपने घरों में ठहराया और उनकी सहायता की - वे मुहाजिर लोग और उनकी मदद करने वाले मदीना के वासी मदद और सहयोग में एक-दूसरे के दोस्त हैं। और जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, परंतु उन्होंने कुफ़्र के देश से इस्लाम के देश की ओर हिजरत नहीं की, तो (ऐ मोमिनो!) तुमपर उनकी मदद करना और उनकी रक्षा करना ज़रूरी नहीं है यहाँ तक कि वे अल्लाह के मार्ग में हिजरत करें। अगर काफ़िर लोग उनपर अत्याचार करें और वे तुमसे मदद की गुहार लगाएँ, तो उनके दुश्मन के विरुद्ध उनकी सहायता करो, सिवाय इसके कि तुम्हारे और उनके दुश्मनों (काफ़िरों) के बीच कोई संधि हो जिसे उन्होंने भंग न किया हो। तथा तुम जो कुछ कर रहे हो, अल्लाह उसे देख रहा है। उससे तुम्हारा कोई कार्य छिपा नहीं है, और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 73
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَآءُ بَعْضٍ ۚ إِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُن فِتْنَةٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ وَفَسَادٌۭ كَبِيرٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
أَوْلِيَآءُ
मददगार हैं
بَعْضٍ ۚ
बाज़ के
إِلَّا
अगर नहीं
تَفْعَلُوهُ
तुम करोगे ऐसा
تَكُن
होगा
فِتْنَةٌۭ
फ़ितना
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَفَسَادٌۭ
और फ़साद
كَبِيرٌۭ
बहुत बड़ा
जो इनकार करनेवाले लोग है, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया, उन्हें यही इनकार एक-दूसरे से जोड़े रखता है। इसलिए वे एक दूसरे की मदद करते हैं। अतः किसी मोमिन को उनसे दोस्ती नहीं रखनी चाहिए। अगर तुम मोमिनों से दोस्ती और काफ़िरों से दुश्मनी नहीं रखोगे, तो ईमान वालों के लिए बड़ा फ़ितना (परीक्षण) होगा। क्योंकि उन्हें उनका कोई इस्लामी भाई मदद करने के लिए नहीं मिलेगा। तथा अल्लाह की राह से रोकने की वजह से धरती पर बहुत बड़ा बिगाड़ पैदा होगा।
आयत 74
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَهَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلَّذِينَ ءَاوَوا۟ وَّنَصَرُوٓا۟ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُؤْمِنُونَ حَقًّۭا ۚ لَّهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَرِزْقٌۭ كَرِيمٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَهَاجَرُوا۟
और उन्होंने हिजरत की
وَجَـٰهَدُوا۟
और उन्होंने जिहाद किया
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ءَاوَوا۟
पनाह दी
وَّنَصَرُوٓا۟
और मदद की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُؤْمِنُونَ
जो मोमिन हैं
حَقًّۭا ۚ
सच्चे
لَّهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश है
وَرِزْقٌۭ
और रिज़्क़
كَرِيمٌۭ
इज़्ज़त वाला
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन हैं। उनके क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है
तफ़्सीर:
तथ जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसके मार्ग में हिजरत की, तथा जिन्होंने अल्लाह के मार्ग में हिजरत करने वालों को शरण दी और उनकी मदद की, वही लोग सच्चे ईमान वाले हैं। अल्लाह की ओर से उनका प्रतिफल उनके पापों की क्षमा, और उसकी ओर से एक उदार जीविका है, और वह जन्नत है।
आयत 75
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنۢ بَعْدُ وَهَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ مَعَكُمْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مِنكُمْ ۚ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَىٰ بِبَعْضٍۢ فِى كِتَـٰبِ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۢ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مِنۢ
from
بَعْدُ
बाज़ उसके
وَهَاجَرُوا۟
और उन्होंने हिजरत की
وَجَـٰهَدُوا۟
और जिहाद किया
مَعَكُمْ
तुम्हारे साथ
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
مِنكُمْ ۚ
तुम में से
وَأُو۟لُوا۟
But those
ٱلْأَرْحَامِ
और रहम/रिश्तों वाले
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
أَوْلَىٰ
ज़्यादा क़रीब हैं
بِبَعْضٍۢ
बाज़ के
فِى
in
كِتَـٰبِ
(the) Book
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की किताब में
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में ही से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है
तफ़्सीर:
जो लोग, सबसे पहले ईमान लाने वाले मुहाजिरों और अनसारियों के बाद ईमान लाए, तथा उन्होंने कुफ़्र के देश से इस्लाम के देश की ओर हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया, ताकि अल्लाह की बात सर्वोच्च हो और काफ़िरों की बात नीची, तो वे लोग (ऐ मोमिनो!) तुम ही में से हैं। उनके लिए वही अधिकार हैं, जो तुम्हारे लिए हैं तथा उनके वही कर्तव्य (और दायित्व) हैं, जो तुम्हारे हैं। तथा अल्लाह के निर्णय में रिश्तेदारी के लोग, आपस में एक-दूसरे के वारिस होने के, पहले से मौजूद ईमान और हिजरत के आधार पर वारिस होने से अधिक हक़दार हैं। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। अतः वह जानता है कि उसके बंदों के हित में क्या है, इसलिए वह उसे उनके लिए धर्मसंगत कर देता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईमान वालों की आपसी ज़िम्मेदारी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ईमान वाले एक-दूसरे के मददगार और ज़िम्मेदार होते हैं, यही भाईचारे की बुनियाद है।
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