सूरह अबासा سورة عبس
मक्की 42 आयतें
नाम का मतलब
त्योरी चढ़ाना (एक नाबीना सहाबी के आने पर नबी ﷺ के मामूली नागवारी के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अबस उस वाकिये पर नाज़िल हुई जब एक नाबीना सहाबी दीन की बात पूछने आए, और नबी ﷺ उस वक्त कुछ रईसों को दावत दे रहे थे। अल्लाह ने इस पर नबी ﷺ को हल्की तनबीह की।
फ़ज़ीलत / सार
यह वाकिया दिखाता है कि इस्लाम में हर इंसान बराबर है, चाहे वह गरीब हो या अमीर, दीन की तलाश करने वाले को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ عَبَسَ وَتَوَلَّىٰٓ
عَبَسَ
उसने तेवरी चढ़ाई
وَتَوَلَّىٰٓ
और उसने मुँह फेर लिया
उसने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया,
तफ़्सीर:
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के माथे पर बल पड़ गया और आपने मुँह फेर लिया।
आयत 2
أَن جَآءَهُ ٱلْأَعْمَىٰ
أَن
कि
جَآءَهُ
आया उसके पास
ٱلْأَعْمَىٰ
एक नाबीना
इस कारण कि उसके पास अन्धा आ गया।
तफ़्सीर:
अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम के आगमन के कारण, जो आपसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते थे और वह एक अंधे व्यक्ति थे। जब वह आए, तो उस समय रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुश्रिकों के प्रमुख लोगों के साथ, उनके मार्गदर्शन स्वीकारने की उम्मीद में, व्यस्त थे।
आयत 3
وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُۥ يَزَّكَّىٰٓ
وَمَا
और क्या चीज़
يُدْرِيكَ
बताए आपको
لَعَلَّهُۥ
शायद कि वो
يَزَّكَّىٰٓ
वो पाक हो जाता
और तुझे क्या मालूम शायद वह स्वयं को सँवारता-निखारता हो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आपको क्या पता कि शायद यह अंधा आदमी अपने गुनाहों से पवित्र हो जाए?!
आयत 4
أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنفَعَهُ ٱلذِّكْرَىٰٓ
أَوْ
या
يَذَّكَّرُ
वो नसीहत पकड़ता
فَتَنفَعَهُ
तो फ़ायदा देती उसे
ٱلذِّكْرَىٰٓ
नसीहत
या नसीहत हासिल करता हो तो नसीहत उसके लिए लाभदायक हो?
तफ़्सीर:
या वह आपसे सुनने वाले उपदेशों से सीख ग्रहण करे, तो उनसे लाभान्वित हो।
आयत 5
أَمَّا مَنِ ٱسْتَغْنَىٰ
أَمَّا
रहा
مَنِ
वो जो
ٱسْتَغْنَىٰ
बेपरवाही करता है
रहा वह व्यक्ति जो धनी हो गया ह
तफ़्सीर:
परंतु जो अपने धन की वजह से आपके लाए हुए धर्म पर ईमान लाने से बेपरवाह हो गया।
आयत 6
فَأَنتَ لَهُۥ تَصَدَّىٰ
فَأَنتَ
तो आप
لَهُۥ
उसके लिए
تَصَدَّىٰ
आप तवज्जो करते हैं
तू उसके पीछे पड़ा है -
तफ़्सीर:
तो आप उसके पीछे पड़ रहे हैं और उसपर ध्यान दे रहे हैं।
आयत 7
وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ
وَمَا
हालाँकि नहीं
عَلَيْكَ
आप पर(ज़िम्मेदारी )
أَلَّا
कि नहीं
يَزَّكَّىٰ
वो पाक होता
हालाँकि वह अपने को न निखारे तो तुझपर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती -
तफ़्सीर:
हालाँकि अगर वह अल्लाह से तौबा करके अपने गुनाहों से पाक-साफ़ नहीं होता है, तो आपपर कोई दोष नहीं है।
आयत 8
وَأَمَّا مَن جَآءَكَ يَسْعَىٰ
وَأَمَّا
और रहा
مَن
वो जो
جَآءَكَ
आया है आपके पास
يَسْعَىٰ
कोशिश करता हुआ
और रहा वह व्यक्ति जो स्वयं ही तेरे पास दौड़ता हुआ आया,
तफ़्सीर:
परंतु जो व्यक्ति भलाई की तलाश में आपके पास दौड़ता हुआ आया।
आयत 9
وَهُوَ يَخْشَىٰ
وَهُوَ
और वो
يَخْشَىٰ
वो डरता है
और वह डरता भी है,
तफ़्सीर:
और वह अपने पालनहार से डरता है।
आयत 10
فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ
فَأَنتَ
तो आप
عَنْهُ
उससे
تَلَهَّىٰ
आप बेरुख़ी बरतते हैं
तो तू उससे बेपरवाई करता है
तफ़्सीर:
तो आप उससे बेपरवाह होकर मुश्रिकों के प्रमुख लोगों के साथ व्यस्त हो जाते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नाबीना सहाबी के वाकिये पर नबी ﷺ की हल्की तनबीह का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दीन की तलाश करने वाले को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, चाहे वह समाज में कितना भी कमतर क्यों न समझा जाता हो।
आयत 11
كَلَّآ إِنَّهَا تَذْكِرَةٌۭ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهَا
बेशक वो
تَذْكِرَةٌۭ
एक नसीहत है
कदापि नहीं, वे (आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत है -
तफ़्सीर:
यह मामला ऐसी नहीं है, यह तो स्वीकार करने वाले के लिए एक उपदेश और चेतावनी है।
आयत 12
فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ
فَمَن
तो जो कोई
شَآءَ
चाहे
ذَكَرَهُۥ
नसीहत हासिल करे उससे
तो जो चाहे उसे याद कर ले -
तफ़्सीर:
अतः जो अल्लाह को याद करना चाहे, उसे याद करे और इस क़ुरआन में जो कुछ है, उससे उपदेश ग्रहण करे।
आयत 13
فِى صُحُفٍۢ مُّكَرَّمَةٍۢ
فِى
In
صُحُفٍۢ
सहीफ़ों में है
مُّكَرَّمَةٍۢ
इज़्ज़त दिए गए
पवित्र पन्नों में अंकित है,
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन फ़रिश्तों के पास सम्मानजनक सहीफ़ों (ग्रंथों) में है।
आयत 14
مَّرْفُوعَةٍۢ مُّطَهَّرَةٍۭ
مَّرْفُوعَةٍۢ
बुलन्द मरतबा
مُّطَهَّرَةٍۭ
निहायत पाकीज़ा
प्रतिष्ठि्त, उच्च,
तफ़्सीर:
जो एक उच्च स्थान पर बुलंद किए हुए, पवित्र किए हुए हैं, उन्हें कोई गंदगी या अशुद्धता छू नहीं सकती।
आयत 15
بِأَيْدِى سَفَرَةٍۢ
بِأَيْدِى
हाथों में है
سَفَرَةٍۢ
लिखने वालों के
ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है
तफ़्सीर:
वे (सहीफ़े) संदेशवाहक-फ़रिश्तों के हाथों में हैं।
आयत 16
كِرَامٍۭ بَرَرَةٍۢ
كِرَامٍۭ
मुअज़्ज़िज़
بَرَرَةٍۢ
नेकोकार
जो प्रतिष्ठित और नेक है
तफ़्सीर:
जो अपने पालनहार के निकट सम्माननीय, तथा बहुत ज़्यादा भलाई और नेकियाँ करने वाले हैं।
आयत 17
قُتِلَ ٱلْإِنسَـٰنُ مَآ أَكْفَرَهُۥ
قُتِلَ
मारा जाए
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
مَآ
how
أَكْفَرَهُۥ
किस क़दर नाशुक्रा है वो
विनष्ट हुआ मनुष्य! कैसा अकृतज्ञ है!
तफ़्सीर:
धिक्कार है काफिर इनसान पर, वह अल्लाह का कितना कृतघ्न है!
आयत 18
مِنْ أَىِّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ
مِنْ
From
أَىِّ
what
شَىْءٍ
किस चीज़ से
خَلَقَهُۥ
उसने पैदा किया उसे
उसको किस चीज़ से पैदा किया?
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उसे किस चीज़ से पैदा किया है कि वह धरती पर अभिमान करता है और उसकी नाशुक्री करता है?!
आयत 19
مِن نُّطْفَةٍ خَلَقَهُۥ فَقَدَّرَهُۥ
مِن
From
نُّطْفَةٍ
एक नुत्फ़े से
خَلَقَهُۥ
उसने पैदा किया उसे
فَقَدَّرَهُۥ
फिर उसने तक़दीर मुक़र्रर की उसकी
तनिक-सी बूँद से उसको पैदा किया, तो उसके लिए एक अंदाजा ठहराया,
तफ़्सीर:
उसने उसे थोड़े पानी (एक बूँद) से बनाया, और उसकी रचना को कई चरणों में निर्धारित किया।
आयत 20
ثُمَّ ٱلسَّبِيلَ يَسَّرَهُۥ
ثُمَّ
फिर
ٱلسَّبِيلَ
रास्ता
يَسَّرَهُۥ
उसने आसान किया उसका
फिर मार्ग को देखो, उसे सुगम कर दिया,
तफ़्सीर:
फिर, इन चरणों के बाद, उसके लिए अपनी माँ के पेट से बाहर निकलना आसान कर दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की नाशुक्री और तख्लीक की मिसाल का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इंसान को उसकी पैदाइश से लेकर मौत तक हर मरहले पर अल्लाह की मदद हासिल है, इसका शुक्र अदा करना चाहिए।
आयत 21
ثُمَّ أَمَاتَهُۥ فَأَقْبَرَهُۥ
ثُمَّ
फिर
أَمَاتَهُۥ
उसने मौत दी उसे
فَأَقْبَرَهُۥ
फिर उसने क़ब्र दी उसे
फिर उसे मृत्यु दी और क्रब में उसे रखवाया,
तफ़्सीर:
फिर, जीवन में उसके लिए जो आयु निर्धारित की थी, उसके (पूरा होने के) बाद उसे मौत दी, और उसके लिए एक क़ब्र बना दी, जिसमें वह पुनर्जीवित किए जाने तक रहेगा।
आयत 22
ثُمَّ إِذَا شَآءَ أَنشَرَهُۥ
ثُمَّ
फिर
إِذَا
जब
شَآءَ
वो चाहेगा
أَنشَرَهُۥ
वो उठा खड़ा करेगा उसे
फिर जब चाहेगा उसे (जीवित करके) उठा खड़ा करेगा। -
तफ़्सीर:
फिर जब वह चाहेगा, उसे हिसाब और बदले के लिए पुनः जीवित करके उठाएगा।
आयत 23
كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَآ أَمَرَهُۥ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
لَمَّا
अभी तक नहीं
يَقْضِ
उसने पूरा किया
مَآ
जो
أَمَرَهُۥ
उसने हुक्म दिया था उसे
कदापि नहीं, उसने उसको पूरा नहीं किया जिसका आदेश अल्लाह ने उसे दिया है
तफ़्सीर:
मामला ऐसा नहीं है, जैसा कि यह काफ़िर सोचता है कि उसपर उसके रब का जो हक़ था, उसे अदा कर दिया। वास्तव में, उसने उन दायित्वों को नहीं निभाया, जो अल्लाह ने उसपर अनिवार्य किए हैं।
आयत 24
فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَـٰنُ إِلَىٰ طَعَامِهِۦٓ
فَلْيَنظُرِ
पस चाहिए कि देखे
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
إِلَىٰ
at
طَعَامِهِۦٓ
तरफ़ अपने खाने के
अतः मनुष्य को चाहिए कि अपने भोजन को देखे,
तफ़्सीर:
अतः अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि अपने उस भोजन को देखे, जो वह खाता है, कि वह कैसे प्राप्त होता है?!
आयत 25
أَنَّا صَبَبْنَا ٱلْمَآءَ صَبًّۭا
اَنَّا
बेशक हम
صَبَبْنَا
उँडेला हमने
ٱلْمَآءَ
पानी
صَبًّۭا
ख़ूब उँडेलना
कि हमने ख़ूब पानी बरसाया,
तफ़्सीर:
चुनाँचे उसकी उत्पत्ति आकाश से जमकर और बहुतायत के साथ बरसने वाली वर्षा से हुई है।
आयत 26
ثُمَّ شَقَقْنَا ٱلْأَرْضَ شَقًّۭا
ثُمَّ
फिर
شَقَقْنَا
फाड़ी हमने
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन
شَقًّۭا
ख़ूब फाड़ना
फिर धरती को विशेष रूप से फाड़ा,
तफ़्सीर:
फिर हमने धरती को फाड़ा, तो उससे कोंपल निकल आया।
आयत 27
فَأَنۢبَتْنَا فِيهَا حَبًّۭا
فَأَنۢبَتْنَا
फिर उगाया हमने
فِيهَا
उसमें
حَبًّۭا
ग़ल्ला
फिर हमने उसमें उगाए अनाज,
तफ़्सीर:
फिर हमने उसमें गेहूं, मक्का और अन्य अनाज उगाए।
आयत 28
وَعِنَبًۭا وَقَضْبًۭا
وَعِنَبًۭا
और उंगूर
وَقَضْبًۭا
और तरकारी
और अंगूर और तरकारी,
तफ़्सीर:
और हमने उसमें अंगूर और हरी घास उगाए, ताकि वह उनके जानवरों के लिए चारा हो जाए।
आयत 29
وَزَيْتُونًۭا وَنَخْلًۭا
وَزَيْتُونًۭا
और ज़ैतून
وَنَخْلًۭا
और खजूर
और ज़ैतून और खजूर,
तफ़्सीर:
और हमने उसमें ज़ैतून और खजूर के पेड़ उगाए।
आयत 30
وَحَدَآئِقَ غُلْبًۭا
وَحَدَآئِقَ
और बाग़ात
غُلْبًۭا
घने
और घने बाग़,
तफ़्सीर:
और हमने उसमें बहुत सारे पेड़ों वाले बाग़ उगाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
खाने-पीने की नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि रोज़मर्रा का खाना भी अल्लाह की एक बड़ी नेमत है, जिसकी कद्र कम ही की जाती है।
आयत 31
وَفَـٰكِهَةًۭ وَأَبًّۭا
وَفَـٰكِهَةًۭ
और फल
وَأَبًّۭا
और चारा
और मेवे और घास-चारा,
तफ़्सीर:
तथा हमने उसमें फल उगाए और तुम्हारे जानवरों के चरने के लिए घास (चारा) उगाए।
आयत 32
مَّتَـٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ
مَّتَـٰعًۭا
फ़ायदे की चीज़ें हैं
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ
और तुम्हारे मवेशियों के लिए
तुम्हारे लिए और तुम्हारे चौपायों के लिेए जीवन-सामग्री के रूप में
तफ़्सीर:
तुम्हारे लाभ के लिए और तुम्हारे पशुओं के उपयोग के लिए।
आयत 33
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلصَّآخَّةُ
فَإِذَا
तो जब
جَآءَتِ
आ जाएगी
ٱلصَّآخَّةُ
कान बहरा कर देने वाली सख़्त आवाज़
फिर जब वह बहरा कर देनेवाली प्रचंड आवाज़ आएगी,
तफ़्सीर:
फिर जब वह भयानक आवाज़ आ जाएगी, जो कानों को बहरा कर देगी। इससे अभिप्राय सूर में दूसरी फूँक है।
आयत 34
يَوْمَ يَفِرُّ ٱلْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ
يَوْمَ
उस दिन
يَفِرُّ
भागेगा
ٱلْمَرْءُ
इन्सान
مِنْ
from
أَخِيهِ
अपने भाई से
जिस दिन आदमी भागेगा अपने भाई से,
तफ़्सीर:
जिस दिन इनसान अपने भाई से दूर भागेगा।
आयत 35
وَأُمِّهِۦ وَأَبِيهِ
وَأُمِّهِۦ
और अपनी माँ से
وَأَبِيهِ
और अपने बाप से
और अपनी माँ और अपने बाप से,
तफ़्सीर:
तथा वह अपनी माता और अपने पिता से दूर भागेगा।
आयत 36
وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَبَنِيهِ
وَصَـٰحِبَتِهِۦ
और अपनी बीवी से
وَبَنِيهِ
और अपने बेटों से
और अपनी पत्नी और अपने बेटों से
तफ़्सीर:
तथा वह अपनी पत्नी और अपने बेटों से दूर भागेगा।
आयत 37
لِكُلِّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍۢ شَأْنٌۭ يُغْنِيهِ
لِكُلِّ
वास्ते हर
ٱمْرِئٍۢ
शख़्स के
مِّنْهُمْ
उनमें से
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
شَأْنٌۭ
ऐसी हालत होगी
يُغْنِيهِ
जो बेपरवा कर देगी उसे
उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को उस दिन ऐसी पड़ी होगी जो उसे दूसरों से बेपरवाह कर देगी
तफ़्सीर:
उनमें से प्रत्येक व्यक्ति की उस दिन की परेशानी की तीव्रता से ऐसी स्थिति होगी, जो उसे दूसरे से बेपरवाह कर देगी।
आयत 38
وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ مُّسْفِرَةٌۭ
وُجُوهٌۭ
कुछ चेहरे
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
مُّسْفِرَةٌۭ
रौशन होंगे
कितने ही चेहरे उस दिन रौशन होंगे,
तफ़्सीर:
उस दिन सौभाग्यशाली लोगों के चेहरे रोशन होंगे।
आयत 39
ضَاحِكَةٌۭ مُّسْتَبْشِرَةٌۭ
ضَاحِكَةٌۭ
हँसते होंगे
مُّسْتَبْشِرَةٌۭ
ख़ुशख़बरी पाने वाले होंगे
हँसते, प्रफुल्लित
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अपनी दया से उनके लिए जो कुछ तैयार कर रखा है, उससे वे खुश होंगे।
आयत 40
وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌۭ
وَوُجُوهٌۭ
और कुछ चेहरे
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
عَلَيْهَا
उन पर
غَبَرَةٌۭ
ग़ुबार होगा
और कितने ही चेहरे होंगे जिनपर उस दिन धूल पड़ी होगी,
तफ़्सीर:
तथा उस दिन अभागा लोगों के चेहरे धूल से ढके होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन की हौलनाकी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कयामत के दिन इंसान अपने सबसे करीबी रिश्तेदारों (मां-बाप, भाई-बहन) से भी भागेगा, हर किसी को अपनी फिक्र होगी।
आयत 41
تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ
تَرْهَقُهَا
छा रही होगी उन पर
قَتَرَةٌ
स्याही
उनपर कलौंस छा रही होगी
तफ़्सीर:
उनपर कालिख छाई होगी।
आयत 42
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَفَرَةُ ٱلْفَجَرَةُ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْكَفَرَةُ
जो काफ़िर हैं
ٱلْفَجَرَةُ
फ़ाजिर हैं
वहीं होंगे इनकार करनेवाले दुराचारी लोग!
तफ़्सीर:
वे लोग जिनकी स्थितियों का वर्णन किया गया है, यही लोग हैं जो कुफ़्र और कुकर्म दोनों करने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नती और दोज़खी चेहरों के फर्क के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि उस दिन नेक अमल करने वालों के चेहरे रोशन होंगे, यह हमें नेकी की तरफ मुतवज्जह करता है।
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