नाम का मतलब
नाप-तोल में कमी करने वाले (कारोबार में धोखा देने वालों की मज़म्मत से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुतफ्फिफीन उन लोगों की मज़म्मत में नाज़िल हुई जो लेते वक्त पूरा नापते और देते वक्त कम तौलते थे। इसमें नेक-बद के आमालनामे (इल्लिय्यीन-सिज्जीन) का भी ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह कारोबारी ईमानदारी की सबसे सख्त ताकीद करती है, जो आज के दौर के कारोबार के लिए भी बेहद अहम सबक है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَيْلٌۭ لِّلْمُطَفِّفِينَ
وَيْلٌۭ
हलाकतहै
لِّلْمُطَفِّفِينَ
नाप-तोल में कमी करने वालों के लिए
तबाही है घटानेवालों के लिए,
तफ़्सीर:
नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए विनाश और हानि है।
आयत 2
ٱلَّذِينَ إِذَا ٱكْتَالُوا۟ عَلَى ٱلنَّاسِ يَسْتَوْفُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग
إِذَا
जब
ٱكْتَالُوا۟
वो नाप कर लेते हैं
عَلَى
from
ٱلنَّاسِ
लोगों से
يَسْتَوْفُونَ
वो पूरा-पूरा लेते हैं
जो नापकर लोगों पर नज़र जमाए हुए लेते हैं तो पूरा-पूरा लेते हैं,
तफ़्सीर:
वे ऐसे लोग हैं जो दूसरों से नापकर लेते समय अपना हक़ बिना किसी कमी के पूरा लेते हैं।
आयत 3
وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ
وَإِذَا
और जब
كَالُوهُمْ
वो नाप कर देते हैं उन्हें
أَو
या
وَّزَنُوهُمْ
वो तोल कर देते हैं उन्हें
يُخْسِرُونَ
वो कम देते हैं
किन्तु जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं तो घटाकर देते हैं
तफ़्सीर:
और जब वे लोगों को नापकर या तौलकर देते हैं, तो नाप और तौल में कमी करते हैं। जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना की ओर हिजरत करके आए, तो वहाँ के लोगों की यही स्थिति थी।
आयत 4
أَلَا يَظُنُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ
أَلَا
क्या नहीं
يَظُنُّ
यक़ीन रखते
أُو۟لَـٰٓئِكَ
ये लोग
أَنَّهُم
बेशक वो
مَّبْعُوثُونَ
उठाए जाने वाले हैं
क्या वे समझते नहीं कि उन्हें (जीवित होकर) उठना है,
तफ़्सीर:
क्या इस बुराई को करने वाले ये लोग इस बात पर विश्वास (यक़ीन) नहीं रखते कि वे (मरने के बाद दोबारा) अल्लाह की ओर उठाए जाने वाले हैं?!
आयत 5
لِيَوْمٍ عَظِيمٍۢ
لِيَوْمٍ
For a Day
عَظِيمٍۢ
एक बड़े दिन के लिए
एक भारी दिन के लिए,
तफ़्सीर:
हिसाब और बदले के लिए, एक ऐसे दिन में, जो उसमें पाए जाने वाले क्लेशों और भयावहताओं के कारण बहुत बड़ा और सख़्त होगा।
आयत 6
يَوْمَ يَقُومُ ٱلنَّاسُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
يَوْمَ
जिस दिन
يَقُومُ
खड़े होंगे
ٱلنَّاسُ
लोग
لِرَبِّ
रब के लिए
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
जिस दिन लोग सारे संसार के रब के सामने खड़े होंगे?
तफ़्सीर:
जिस दिन लोग सभी प्राणियों के पालनहार के सामने हिसाब के लिए खड़े होंगे।
आयत 7
كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْفُجَّارِ لَفِى سِجِّينٍۢ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّ
बेशक
كِتَـٰبَ
किताब(आमाल नामा)
ٱلْفُجَّارِ
बदकारों की
لَفِى
(is) surely in
سِجِّينٍۢ
यक़ीनन सिज्जीन में है
कुछ नहीं, निश्चय ही दुराचारियों का काग़ज 'सिज्जीन' में है
तफ़्सीर:
मामला ऐसा नहीं है, जैसा तुमने समझ रखा है कि मौत के बाद दोबारा जीवित नहीं होना है। निश्चय काफ़िरों और मुनाफ़िकों जैसे दुराचारियों का कर्म-पत्र निचली धरती के एक तंग स्थान में है।
आयत 8
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سِجِّينٌۭ
وَمَآ
और क्या चीज़
أَدْرَىٰكَ
बताए आपको
مَا
क्या है
سِجِّينٌۭ
सिज्जीन
तुम्हें क्या मालूम कि 'सिज्जीन' क्या हैं?
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आपको क्या मालूम कि 'सिज्जीन' क्या है?!
आयत 9
كِتَـٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ
كِتَـٰبٌۭ
एक किताब है
مَّرْقُومٌۭ
लिखी हुई
मुहर लगा हुआ काग़ज
तफ़्सीर:
उनका कर्म-पत्र लिखा हुआ है, जो मिट नहीं सकता, और न उसमें कुछ बढ़ाया जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है।
आयत 10
وَيْلٌۭ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُكَذِّبِينَ
وَيْلٌۭ
हलाकत है
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لِّلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों के लिए
तबाही है उस दिन झुठलाने-वालों की,
तफ़्सीर:
उस दिन झुठलाने वालों के लिए विनाश और नुकसान है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नाप-तोल में कमी करने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कारोबार में लेते वक्त पूरा नापना और देते वक्त कम तौलना बड़ा गुनाह है, हमेशा इंसाफ से तौलना चाहिए।
आयत 11
ٱلَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُكَذِّبُونَ
झुठलाते हैं
بِيَوْمِ
(the) Day
ٱلدِّينِ
बदले के दिन को
जो बदले के दिन को झुठलाते है
तफ़्सीर:
जो बदले के दिन को झुठलाते हैं, जिस दिन अल्लाह अपने बंदों को दुनिया में उनके किए हुए कामों का बदला देगा।
आयत 12
وَمَا يُكَذِّبُ بِهِۦٓ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ
وَمَا
और नहीं
يُكَذِّبُ
झुठलाता
بِهِۦٓ
उसे
إِلَّا
मगर
كُلُّ
हर
مُعْتَدٍ
हद से बढ़ने वाला
أَثِيمٍ
सख़्त गुनाहगार
और उसे तो बस प्रत्येक वह क्यक्ति ही झूठलाता है जो सीमा का उल्लंघन करनेवाला, पापी है
तफ़्सीर:
और उस दिन को केवल वही झुठलाता है, जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाला, बहुत बड़ा पापी है।
आयत 13
إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
إِذَا
जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِ
उस पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
قَالَ
वो कहता है
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ हैं
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
जब हमारी आयतें उसे सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले की कहानियाँ है।"
तफ़्सीर:
जब उसके सामने हमारे रसूल पर अवतिरत होने वाली हमारी आयतों को पढ़ा जाता है, तो वह कहता है : यह तो पहले समुदायों की कहानियाँ हैं, अल्लाह की ओर से नहीं हैं।
आयत 14
كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
كَلَّا ۖ
हरगिज़ नहीं
بَلْ ۜ
बल्कि
رَانَ
ज़ंग चढ़ गया है
عَلَىٰ
[over]
قُلُوبِهِم
उनके दिलों पर
مَّا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते रहे है वह उनके दिलों पर चढ़ गया है
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा इन झुठलाने वालों ने समझ रखा है। बल्कि वे जो कुछ पाप किया करते थे, वह उनकी बुद्धियों पर छा गया है और उन्हें ढाँप दिया है। इसलिए वे सत्य को अपने दिलों से नहीं देख सकते।
आयत 15
كَلَّآ إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍۢ لَّمَحْجُوبُونَ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهُمْ
बेशक वो
عَن
from
رَّبِّهِمْ
अपने रब से
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لَّمَحْجُوبُونَ
अलबत्ता हिजाब में रखे जाने वाले हैं
कुछ नहीं, अवश्य ही वे उस दिन अपने रब से ओट में होंगे,
तफ़्सीर:
वे सचमुच क़ियामत के दिन अपने पालनहार को देखने से वंचित कर दिए जाएँँगे।
आयत 16
ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُوا۟ ٱلْجَحِيمِ
ثُمَّ
फिर
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَصَالُوا۟
अलबत्ता झोंके जाने वाले हैं
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम में
फिर वे भड़कती आग में जा पड़ेगे
तफ़्सीर:
फिर वे अवश्य जहन्नम में दाख़िल होकर उसकी गर्मी को झेलेंगे।
आयत 17
ثُمَّ يُقَالُ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ
ثُمَّ
फिर
يُقَالُ
कहा जाएगा
هَـٰذَا
ये है
ٱلَّذِى
वो चीज़
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
जिसे
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाया करते
फिर कहा जाएगा, "यह वही है जिस तुम झुठलाते थे"
तफ़्सीर:
फिर उनसे क़ियामत के दिन उन्हें फटकार लगाते हुए कहा जाएगा : यह यातना जो तुम्हें झेलनी पड़ी है, यह वही है, जिसे तुम दुनिया में झुठलाया करते थे, जब तुम्हारे रसूल तुम्हें इसके बारे में बताते थे।
आयत 18
كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْأَبْرَارِ لَفِى عِلِّيِّينَ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّ
बेशक
كِتَـٰبَ
किताब
ٱلْأَبْرَارِ
नेक लोगों की
لَفِى
(will be) surely in
عِلِّيِّينَ
यक़ीनन इल्लीयीन में है
कुछ नही, निस्संदेह वफ़ादार लोगों का काग़ज़ 'इल्लीयीन' (उच्च श्रेणी के लोगों) में है।-
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा तुमने समझ रखा है कि न हिसाब होगा, न बदला दिया जाएगा। निःसंदेह नेक लोगों का कर्म-पत्र निश्चय 'इल्लिय्यीन' में है।
आयत 19
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا عِلِّيُّونَ
وَمَآ
और क्या चीज़
أَدْرَىٰكَ
बताए आपको
مَا
क्या है
عِلِّيُّونَ
इल्लीयीन
और तुम क्या जानो कि 'इल्लीयीन' क्या है? -
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आपको क्या मालूम कि 'इल्लिय्यीन' क्या है?!
आयत 20
كِتَـٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ
كِتَـٰبٌۭ
एक किताब है
مَّرْقُومٌۭ
लिखी हुई
लिखा हुआ रजिस्टर
तफ़्सीर:
उनका कर्म-पत्र लिखा हुआ है, जो मिट नहीं सकता, और न उसमें कुछ बढ़ाया जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सिज्जीन (बुरे लोगों के आमालनामे) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि झुठलाने और हद से बढ़ने वालों का आमालनामा एक बुरी जगह दर्ज होता है, इससे बचना चाहिए।
आयत 21
يَشْهَدُهُ ٱلْمُقَرَّبُونَ
يَشْهَدُهُ
हाज़िर रहते है उस पर
ٱلْمُقَرَّبُونَ
मुक़र्रब (फ़रिश्ते )
जिसे देखने के लिए सामीप्य प्राप्त लोग उपस्थित होंगे,
तफ़्सीर:
इस कर्म-पत्र के पास हर आसमान के निकटवर्ती फ़रिश्ते उपस्थित रहते हैं।
आयत 22
إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍ
إِنَّ
बेशक
ٱلْأَبْرَارَ
नेक लोग
لَفِى
(will be) surely in
نَعِيمٍ
यक़ीनन नेअमतों मे होंगे
निस्संदेह अच्छे लोग नेमतों में होंगे,
तफ़्सीर:
निःसंदेह बहुत अधिक नेकी करने वाले लोग क़ियामत के दिन स्थायी आनंद में होंगे।
आयत 23
عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ
عَلَى
On
ٱلْأَرَآئِكِ
मसनदों पर
يَنظُرُونَ
वो देख रहे होंगे
ऊँची मसनदों पर से देख रहे होंगे
तफ़्सीर:
वे अलंकृत बिस्तरों पर बैठे अपने पालनहार को तथा हर उस चीज़ को देख रहे होंगे, जो उनके दिलों को प्रसन्न और हर्षित कर देगी।
आयत 24
تَعْرِفُ فِى وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ ٱلنَّعِيمِ
تَعْرِفُ
आप पहचान लेंगे
فِى
in
وُجُوهِهِمْ
उनके चेहरों में
نَضْرَةَ
रौनक़
ٱلنَّعِيمِ
नेअमत की
उनके चहरों से तुम्हें नेमतों की ताज़गी और आभा को बोध हो रहा होगा,
तफ़्सीर:
आप जब उन्हें देखेंगे, तो आपको उनके चेहरों पर सुंदरता और मनोहरता के रूप में उनके नेमतों से आनंदित होने का निशान दिखाई देगा।
आयत 25
يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍۢ مَّخْتُومٍ
يُسْقَوْنَ
वो पिलाए जाऐंगे
مِن
of
رَّحِيقٍۢ
ख़ालिस शराब
مَّخْتُومٍ
मोहर बन्द
उन्हें मुहरबंद विशुद्ध पेय पिलाया जाएगा,
तफ़्सीर:
उनके सेवक उन्हें ऐसी शुद्ध शराब पिलाएँगे, जिसके बर्तन पर मुहर लगी होगी।
आयत 26
خِتَـٰمُهُۥ مِسْكٌۭ ۚ وَفِى ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ ٱلْمُتَنَـٰفِسُونَ
خِتَـٰمُهُۥ
उसकी मोहर
مِسْكٌۭ ۚ
मुश्क होगी
وَفِى
And for
ذَٰلِكَ
और उसमें
فَلْيَتَنَافَسِ
पस चाहिए कि एक दूसरे पर बाज़ी ले जाऐं
ٱلْمُتَنَـٰفِسُونَ
बाज़ी ले जाने वाले
मुहर उसकी मुश्क ही होगी - जो लोग दूसरी पर बाज़ी ले जाना चाहते हो वे इस चीज़ को प्राप्त करने में बाज़ी ले जाने का प्रयास करे -
तफ़्सीर:
उससे उसके अंत तक कस्तूरी की खुशबू आ रही होगी। अतः प्रतिस्पर्धा करने वालों को, अल्लाह को प्रसन्न करने वाले कार्य करके और उसे क्रोधित करने वाले कार्य छोड़कर, इस उदार बदले (को प्राप्त करने) में प्रतिस्पर्धा करना चाहिए।
आयत 27
وَمِزَاجُهُۥ مِن تَسْنِيمٍ
وَمِزَاجُهُۥ
और आमेज़िश उसकी
مِن
(is) of
تَسْنِيمٍ
तसनीम होगी
और उसमें 'तसनीम' का मिश्रण होगा,
तफ़्सीर:
और इस मुहरबंद शराब में तसनीम नामी चश्मे का पानी मिलाया जाएगा।
आयत 28
عَيْنًۭا يَشْرَبُ بِهَا ٱلْمُقَرَّبُونَ
عَيْنًۭا
जो एक चश्मा है
يَشْرَبُ
पिऐंगे
بِهَا
उससे
ٱلْمُقَرَّبُونَ
मुक़र्रब लोग
हाल यह है कि वह एक स्रोत है, जिसपर बैठकर सामीप्य प्राप्त लोग पिएँगे
तफ़्सीर:
यह जन्नत के शीर्ष पर एक चश्मा है, जिससे अल्लाह के निकटवर्ती बंदे शुद्ध पानी पिएँगे। जबकि अन्य सभी ईमान वाले उसका पानी दूसरे पेय के साथ मिश्रित करके पिएँगे।
आयत 29
إِنَّ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ كَانُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يَضْحَكُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
أَجْرَمُوا۟
जुर्म किए
كَانُوا۟
थे वो
مِنَ
at
ٱلَّذِينَ
उन लोगों पर जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
يَضْحَكُونَ
वो हँसा करते
जो अपराधी है वे ईमान लानेवालों पर हँसते थे,
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने कुफ़्र की राह पर क़ायम रहकर जुर्म किया, वे ईमान वालों पर उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए हँसते थे।
आयत 30
وَإِذَا مَرُّوا۟ بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ
وَإِذَا
और जब
مَرُّوا۟
वो गुज़रते
بِهِمْ
उनके पास से
يَتَغَامَزُونَ
वो एक दूसरे को आँख से इशारे करते
और जब उनके पास से गुज़रते तो आपस में आँखों और भौंहों से इशारे करते थे,
तफ़्सीर:
और जब वे ईमान वालों के पास से गुज़रते, तो एक-दूसरे को मज़ाक़ और उपहास के तौर पर आँखों से इशारे करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इल्लिय्यीन (नेक लोगों के आमालनामे) और कुफ्फार के मज़ाक उड़ाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेक लोगों का मज़ाक उड़ाने वाले खुद आखिरत में मज़ाक का निशाना बनेंगे।
आयत 31
وَإِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمُ ٱنقَلَبُوا۟ فَكِهِينَ
وَإِذَا
और जब
ٱنقَلَبُوٓا۟
वो पलट कर जाते
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَهْلِهِمُ
अपने घर वालों के
ٱنقَلَبُوا۟
वो पलटते
فَكِهِينَ
दिल्लगी करते हुए
और जब अपने लोगों की ओर पलटते है तो चहकते, इतराते हुए पलटते थे,
तफ़्सीर:
और जब वे अपने परिवारों में लौटते, तो वे अपने कुफ़्र और मोमिनों के परिहास का आनंद लेते हुए लौटते थे।
आयत 32
وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ لَضَآلُّونَ
وَإِذَا
और जब
رَأَوْهُمْ
वो देखते उन्हें
قَالُوٓا۟
वो कहते
إِنَّ
बेशक
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
لَضَآلُّونَ
यक़ीनन गुमराह हैं
और जब उन्हें देखते तो कहते, "ये तो भटके हुए है।"
तफ़्सीर:
और जब वे मुसलमानों को देखते, तो कहते थे : निश्चय ये लोग सत्य के मार्ग से भटके हुए हैं, क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता के धर्म को छोड़ दिया है।
आयत 33
وَمَآ أُرْسِلُوا۟ عَلَيْهِمْ حَـٰفِظِينَ
وَمَآ
हालाँकि नहीं
أُرْسِلُوا۟
वो भेजे गए थे
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَـٰفِظِينَ
निगहबान बना कर
हालाँकि वे उनपर कोई निगरानी करनेवाले बनाकर नहीं भेजे गए थे
तफ़्सीर:
जबकि अल्लाह ने उन्हें इन (ईमान वालों) के कामों को संरक्षित करने की ज़िम्मेवारी नहीं सौंपी थी कि वे इस तरह की बात कहते।
आयत 34
فَٱلْيَوْمَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنَ ٱلْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ
فَٱلْيَوْمَ
पस आज के दिन
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مِنَ
at
ٱلْكُفَّارِ
काफ़िरों पर
يَضْحَكُونَ
वो हँस रहे होंगे
तो आज ईमान लानेवाले, इनकार करनेवालों पर हँस रहे हैं,
तफ़्सीर:
तो क़ियामत के दिन, अल्लाह पर ईमान रखने वाले काफ़िरों पर हँसेंगे, जैसे कि काफिर दुनिया में उन पर हँसा करते थे।
आयत 35
عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ
عَلَى
On
ٱلْأَرَآئِكِ
मसनदों पर
يَنظُرُونَ
वो देख रहे होंगे
ऊँची मसनदों पर से देख रहे है
तफ़्सीर:
वे सजाए गए बिस्तरों पर बैठे उस स्थायी आनंद को देख रहे होंगे, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार किया है।
आयत 36
هَلْ ثُوِّبَ ٱلْكُفَّارُ مَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ
هَلْ
क्या
ثُوِّبَ
बदला दिए गए
ٱلْكُفَّارُ
काफ़िर
مَا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْعَلُونَ
वो किया करते
क्या मिल गया बदला इनकार करनेवालों को उसका जो कुछ वे करते रहे है?
तफ़्सीर:
निश्चय काफ़िरों को उनके उन कर्मों का, जो उन्होंने दुनिया में किया था, अपमानजनक यातना के रूप में बदला दिया गया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन नेक-बद के उल्टे हाल के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया में जो मज़ाक उड़ाते थे, आखिरत में नेक लोग उन्हें देखकर हंसेंगे, यह हमें दुनिया की हकीकत समझाता है।
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