नाम का मतलब
सबसे बुलंद (अल्लाह की सिफत, सबसे ऊंचा)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-आला में अल्लाह की तस्बीह, तख्लीक की तर्तीब और आसान की गई तालीम (कुरआन) का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
नबी ﷺ इस सूरह को नमाज़ों में अक्सर पढ़ते थे, इसकी तिलावत को खास पसंदीदा माना जाता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ سَبِّحِ ٱسْمَ رَبِّكَ ٱلْأَعْلَى
سَبِّحِ
तस्बीह कीजिए
ٱسْمَ
नाम की
رَبِّكَ
अपने रब के
ٱلْأَعْلَى
जो बहुत बुलन्द है
तसबीह करो, अपने सर्वाच्च रब के नाम की,
तफ़्सीर:
अपने उस पानलहार की पवित्रता का वर्णन करें, जो अपनी सृष्टि के ऊपर है, उसे याद करते और उसका महिमामंडन करते समय अपनी ज़बान से उसका नाम लेते हुए।
आयत 2
ٱلَّذِى خَلَقَ فَسَوَّىٰ
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
فَسَوَّىٰ
फिर उसने दुरुस्त किया
जिसने पैदा किया, फिर ठीक-ठाक किया,
तफ़्सीर:
जिसने इनसान को ठीक-ठाक पैदा किया और उसके क़द को सुगठित और सानुपातिक बनाया।
आयत 3
وَٱلَّذِى قَدَّرَ فَهَدَىٰ
وَٱلَّذِى
और वो जिसने
قَدَّرَ
अंदाज़ा किया
فَهَدَىٰ
फिर उसने हिदायत बख़्शी
जिसने निर्धारित किया, फिर मार्ग दिखाया,
तफ़्सीर:
जिसने जीवों के प्रकार, उनके वर्गों, जातियों और विशेषताओं का निर्धारण किया, और प्रत्येक प्राणी को उस चीज़ की ओर निर्देशित किया, जो उसके उपयुक्त है और उसके साथ मेल खाती है।
आयत 4
وَٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلْمَرْعَىٰ
وَٱلَّذِىٓ
और वो जिसने
أَخْرَجَ
निकाला
ٱلْمَرْعَىٰ
चारा
जिसने वनस्पति उगाई,
तफ़्सीर:
और जिसने धरती से चारा उगाया, जिसे तुम्हारे जानवर चरते हैं।
आयत 5
فَجَعَلَهُۥ غُثَآءً أَحْوَىٰ
فَجَعَلَهُۥ
फिर उसने बना दिया उसे
غُثَآءً
कूड़ा
أَحْوَىٰ
स्याह
फिर उसे ख़ूब घना और हरा-भरा कर दिया
तफ़्सीर:
फिर उसे काले रंग की सूखी घास बना दी, जबकि वह पहले हरी ताज़ी (घास) थी।
आयत 6
سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنسَىٰٓ
سَنُقْرِئُكَ
अनक़रीब हम पढ़ा देंगे आपको
فَلَا
फिर नहीं
تَنسَىٰٓ
आप भूलेंगे
हम तुम्हें पढ़ा देंगे, फिर तुम भूलोगे नहीं
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) हम आपको क़ुरआन पढ़ा देंगे और इसे आपके सीने में इकट्ठा कर देंगे और आप इसे कभी नहीं भूलेंगे। इसलिए इसके पढ़ने में जिबरील से आगे ने बढ़ें, जैसा कि आप भूलने के डर से पहले किया करते थे।
आयत 7
إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ وَمَا يَخْفَىٰ
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَعْلَمُ
वो जानता है
ٱلْجَهْرَ
ज़ाहिर को
وَمَا
और उसको जो
يَخْفَىٰ
पोशीदा है
बात यह है कि अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। निश्चय ही वह जानता है खुले को भी और उसे भी जो छिपा रहे
तफ़्सीर:
सिवाय इसके कि अल्लाह यह चाहे कि किसी हिकमत के तहत आप उसमें से कोई बात भूल जाएँ। निश्चय अल्लाह खुली तथा छिपी सभी बातों को जानता है। उससे इसमें से कोई बात छिपी नहीं है।
आयत 8
وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرَىٰ
وَنُيَسِّرُكَ
और हम आसानी कर देंगे आपके लिए
لِلْيُسْرَىٰ
आसान(रास्ते) की
हम तुम्हें सहज ढंग से उस चीज़ की पात्र बना देंगे जो सहज एवं मृदुल (आरामदायक) है
तफ़्सीर:
और हम आपके लिए जन्नत में दाख़िल करने वाले ऐसे कार्य करना आसान कर देंगे, जो अल्लाह को प्रसन्न करने वाले हैं।
आयत 9
فَذَكِّرْ إِن نَّفَعَتِ ٱلذِّكْرَىٰ
فَذَكِّرْ
पस नसीहत कीजिए
إِن
अगर
نَّفَعَتِ
फ़ायदा दे
ٱلذِّكْرَىٰ
नसीहत करना
अतः नसीहत करो, यदि नसीहत लाभप्रद हो!
तफ़्सीर:
अतः आप लोगों को उस क़ुरआन के द्वारा नसीहत करते रहें, जिसकी हम आपकी ओर वह़्य (प्रकाशना) करते हैं, तथा जब तक उपदेश सुनी जाती है, तब तक उन्हें उपदेश देते रहें।
आयत 10
سَيَذَّكَّرُ مَن يَخْشَىٰ
سَيَذَّكَّرُ
अनक़रीब नसीहत पकड़ेगा
مَن
वो जो
يَخْشَىٰ
डरता होगा
नसीहत हासिल कर लेगा जिसको डर होगा,
तफ़्सीर:
आपके उपदेशों से वही व्यक्ति सीख ग्रहण करेगा, जो अल्लाह से डरता है। क्योंकि वही उपदेश से लाभान्वित होता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की तस्बीह, तख्लीक की तर्तीब और कुरआन को आसान बनाए जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह ने कुरआन को याद रखना और समझना आसान बनाया है, इसे नसीहत हासिल करने के लिए पढ़ना चाहिए।
आयत 11
وَيَتَجَنَّبُهَا ٱلْأَشْقَى
وَيَتَجَنَّبُهَا
और इज्तिनाब करेगा उससे
ٱلْأَشْقَى
सबसे ज़्यादा बदबख़्त
किन्तु उससे कतराएगा वह अत्यन्त दुर्भाग्यवाला,
तफ़्सीर:
और काफ़िर उपदेश से दूर और अलग रहेगा, क्योंकि वह आख़िरत में जहन्नम में दाखिल होने के कारण लोगों में सबसे बड़ा अभागा ठहरेगा।
आयत 12
ٱلَّذِى يَصْلَى ٱلنَّارَ ٱلْكُبْرَىٰ
ٱلَّذِى
वो जो
يَصْلَى
जलेगा
ٱلنَّارَ
आग मे
ٱلْكُبْرَىٰ
बहुत बड़ी
जो बड़ी आग में पड़ेगा,
तफ़्सीर:
जो आख़िरत की सबसे बड़ी आग में दाखिल होगा और हमेशा के लिए उसकी तपिश और गर्मी को झेलेगा।
आयत 13
ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يَمُوتُ
ना वो मरेगा
فِيهَا
उसमें
وَلَا
और ना
يَحْيَىٰ
वो जिएगा
फिर वह उसमें न मरेगा न जिएगा
तफ़्सीर:
फिर वह हमेशा के लिए जहन्नम में रहेगा, न तो उसमें मरेगा कि उस यातना से आराम पा जाए, जो वह झेल रहा होगा, और न ही वह एक अच्छा और सम्मानजनक जीवन जिएगा।
आयत 14
قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ
قَدْ
यक़ीनन
أَفْلَحَ
फ़लाह पा गया
مَن
वो जो
تَزَكَّىٰ
पाक हुआ
सफल हो गया वह जिसने अपने आपको निखार लिया,
तफ़्सीर:
वह व्यक्ति सफल हो गया, जिसने अपने आपको शिर्क और गुनाहों से पाक कर लिया।
आयत 15
وَذَكَرَ ٱسْمَ رَبِّهِۦ فَصَلَّىٰ
وَذَكَرَ
और उसने ज़िक्र किया
ٱسْمَ
नाम
رَبِّهِۦ
अपने रब का
فَصَلَّىٰ
फिर उसने नमाज़ पढ़ी
और अपने रब के नाम का स्मरण किया, अतः नमाज़ अदा की
तफ़्सीर:
और अपने पालनहार को, उसके निर्धारित किए हुए अज़कार (दुआओं) के साथ याद किया और उसी तरीक़े से नमाज़ पढ़ी, जिस तरीक़े से पढ़ना आवश्यक है।
आयत 16
بَلْ تُؤْثِرُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا
بَلْ
बल्कि
تُؤْثِرُونَ
तुम तरजीह देते हो
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
नहीं, बल्कि तुम तो सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो,
तफ़्सीर:
बल्कि तुम दुनिया के जीवन को प्रधान रखते हो और उसे आख़िरत पर वरीयता देते हो, हालाँकि दोनों के बीच भारी असमानता है।
आयत 17
وَٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ
وَٱلْـَٔاخِرَةُ
और आख़िरत
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَبْقَىٰٓ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाली है
हालाँकि आख़िरत अधिक उत्तम और शेष रहनेवाली है
तफ़्सीर:
हालाँकि आख़िरत अधिक उत्तम और दुनिया तथा उसके आनंदों एवं सुख-सामग्रियों से बेहतर और अधिक स्थायी है, क्योंकि उसकी नेमतें कभी समाप्त नहीं होंगी।
आयत 18
إِنَّ هَـٰذَا لَفِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ
إِنَّ
यक़ीनन
هَـٰذَا
ये
لَفِى
surely (is) in
ٱلصُّحُفِ
अलबत्ता सहीफ़ों में है
ٱلْأُولَىٰ
पहले
निस्संदेह यही बात पहले की किताबों में भी है;
तफ़्सीर:
ये आदेश और समाचार, जिनका हमने आपसे उल्लेख किया है, निश्चय क़ुरआन से पहले उतरने वाले सह़ीफ़ों (दिव्य ग्रंथों) में भी मौजूद थे।
आयत 19
صُحُفِ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ
صُحُفِ
सहीफ़े
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَمُوسَىٰ
और मूसा के
इबराईम और मूसा की किताबों में
तफ़्सीर:
ये इबराहीम और मूसा अलैहिमस्सलाम पर उतरने वाले सह़ीफ़े हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया-आखिरत की तरजीह और पिछली किताबों के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया को आखिरत पर तरजीह देना बड़ी गलती है, जबकि आखिरत ही बेहतर और बाकी रहने वाली है।
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