सूरह अल-फ़ज्र سورة الفجر
मक्की 30 आयतें
नाम का मतलब
सुबह की रोशनी (कसम खाई गई फज्र की रोशनी के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-फज्र में पिछली कौमों (आद, समूद, फिरऔन) के अंजाम और दुनियावी माल-ओ-दौलत की आज़माइश का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह के आखिर में इत्मीनान वाली रूह (नफ्से-मुत्मइन्ना) की जन्नत में दाखिल होने की खुशखबरी है, जो सुकून की तलाश करने वालों के लिए बड़ी तसल्ली है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلْفَجْرِ
وَٱلْفَجْرِ
क़सम है फ़जर की
साक्षी है उषाकाल,
तफ़्सीर:
अल्लाह पाक ने फ़ज्र (उषाकाल) की क़सम खाई है।
आयत 2
وَلَيَالٍ عَشْرٍۢ
وَلَيَالٍ
And the nights
عَشْرٍۢ
और दस रातों की
साक्षी है दस रातें,
तफ़्सीर:
और ज़ुल-हिज्जा के महीने की प्रथम दस रातों की क़सम खाई है।
आयत 3
وَٱلشَّفْعِ وَٱلْوَتْرِ
وَٱلشَّفْعِ
और जुफ़्त
وَٱلْوَتْرِ
और ताक़ की
साक्षी है युग्म और अयुग्म,
तफ़्सीर:
तथा सम (जोड़े वाली) और विषम (अकेली) चीज़ों की क़सम खाई है।
आयत 4
وَٱلَّيْلِ إِذَا يَسْرِ
وَٱلَّيْلِ
और रात की
إِذَا
जब
يَسْرِ
वो चलती है
साक्षी है रात जब वह विदा हो रही हो
तफ़्सीर:
और रात की क़सम खाई है, जब वह आए, चले और प्रस्थान करे। इन क़समों का जवाब यह है कि : तुम अपने कर्मों का अवश्य बदला दिए जाओगे।
आयत 5
هَلْ فِى ذَٰلِكَ قَسَمٌۭ لِّذِى حِجْرٍ
هَلْ
क्या है
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
قَسَمٌۭ
एक बड़ी क़सम
لِّذِى
for those
حِجْرٍ
अक़्ल वालों के लिए
क्या इसमें बुद्धिमान के लिए बड़ी गवाही है?
तफ़्सीर:
क्या उपर्युक्त में ऐसी क़सम है, जो अक़्ल वाले व्यक्ति को आश्वस्त कर सकताी है?!
आयत 6
أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
كَيْفَ
कैसे
فَعَلَ
किया
رَبُّكَ
आपके रब ने
بِعَادٍ
साथ आद के
क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने क्या किया आद के साथ,
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल) आपने नहीं देखा कि आपके रब ने हूद अलैहिस्सलाम की जाति 'आद' के साथ किस तरह किया, जब उन्होंने उसके रसूल को झुठलाया?!
आयत 7
إِرَمَ ذَاتِ ٱلْعِمَادِ
إِرَمَ
जो इरम(क़बीले) के थे
ذَاتِ
possessors (of)
ٱلْعِمَادِ
सुतूनों वाले
स्तम्भों वाले 'इरम' के साथ?
तफ़्सीर:
यह 'आद' जाति का गोत्र है, जो अपने दादा 'इरम' की ओर मंसूब है, जिसके लोग बहुत लंबे होते थे।
आयत 8
ٱلَّتِى لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِى ٱلْبِلَـٰدِ
ٱلَّتِى
वो जो
لَمْ
नहीं
يُخْلَقْ
पैदा किया गया
مِثْلُهَا
उन जैसा
فِى
in
ٱلْبِلَـٰدِ
शहरों में
वे ऐसे थे जिनके सदृश बस्तियों में पैदा नहीं हुए
तफ़्सीर:
वह ऐसी जाति थी कि जिसके समान अल्लाह ने दुनिया के देशों में किसी को पैदा नहीं किया।
आयत 9
وَثَمُودَ ٱلَّذِينَ جَابُوا۟ ٱلصَّخْرَ بِٱلْوَادِ
وَثَمُودَ
और समूद
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
جَابُوا۟
तराशा
ٱلصَّخْرَ
चट्टानों को
بِٱلْوَادِ
वादी में
और समूद के साथ, जिन्होंने घाटी में चट्टाने तराशी थी,
तफ़्सीर:
क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने सालेह अलैहिस्सलाम की जाति समूद के साथ कि तरह किया, जिन्होंने 'ह़िज्र' नामी स्थान पर पहाड़ों की चट्टानों को काटकर घर बनाए?!
आयत 10
وَفِرْعَوْنَ ذِى ٱلْأَوْتَادِ
وَفِرْعَوْنَ
और फ़िरऔन
ذِى
owner of
ٱلْأَوْتَادِ
मेख़ों वाले के
और मेखोवाले फ़िरऔन के साथ?
तफ़्सीर:
क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने फ़िरऔन के साथ किस तरह किया, जिसके पास लोगों को यातना देने के लिए मेंखें थीं?
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों (आद, समूद, फिरऔन) के अंजाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ताकतवर कौमों की सरकशी भी आखिरकार तबाह हुई, ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए।
आयत 11
ٱلَّذِينَ طَغَوْا۟ فِى ٱلْبِلَـٰدِ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
طَغَوْا۟
सरकशी की
فِى
in
ٱلْبِلَـٰدِ
शहरों में
वे लोग कि जिन्होंने देशो में सरकशी की,
तफ़्सीर:
ये सभी लोग अत्याचार और अन्याय में सीमा पार कर गए। हर एक ने अपने-अपने देश में सीमा पार किया।
आयत 12
فَأَكْثَرُوا۟ فِيهَا ٱلْفَسَادَ
فَأَكْثَرُوا۟
फिर उन्होंने कसरत से किया
فِيهَا
उनमें
ٱلْفَسَادَ
फ़साद
और उनमें बहुत बिगाड़ पैदा किया
तफ़्सीर:
उन्होंने उन नगरों में, कुफ़्र और पाप फैलाकर, बहुत अधिक बिगाड़ पैदा किया।
आयत 13
فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ
فَصَبَّ
तो बरसाया
عَلَيْهِمْ
उन पर
رَبُّكَ
आपके रब ने
سَوْطَ
कोड़ा
عَذَابٍ
अज़ाब का
अततः तुम्हारे रब ने उनपर यातना का कोड़ा बरसा दिया
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने उन्हें गंभीर यातना चखाई और उन्हें धरती से उखाड़ फेंका।
आयत 14
إِنَّ رَبَّكَ لَبِٱلْمِرْصَادِ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَبِٱلْمِرْصَادِ
अलबत्ता घात में है
निस्संदेह तुम्हारा रब घात में रहता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) निश्चय आपका पालनहार लोगों के कर्मों को देख रहा है और उनका निरीक्षण कर रहा है, ताकि अच्छा कार्य करने वाले को जन्नत के साथ और बुरा कार्य करने वाले को जहन्नम के साथ पुरस्कृत करे।
आयत 15
فَأَمَّا ٱلْإِنسَـٰنُ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكْرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَكْرَمَنِ
فَأَمَّا
तो रहा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
إِذَا
when
مَا
जब
ٱبْتَلَىٰهُ
आज़माता है उसे
رَبُّهُۥ
रब उसका
فَأَكْرَمَهُۥ
फिर वो इज़्ज़त देता है उसे
وَنَعَّمَهُۥ
और वो नेअमत देता है उसे
فَيَقُولُ
तो वो कहता है
رَبِّىٓ
मेरे रब ने
أَكْرَمَنِ
इज़्ज़त दी मुझे
किन्तु मनुष्य का हाल यह है कि जब उसका रब इस प्रकार उसकी परीक्षा करता है कि उसे प्रतिष्ठा और नेमत प्रदान करता है, तो वह कहता है, "मेरे रब ने मुझे प्रतिष्ठित किया।"
तफ़्सीर:
जहाँ तक इनसान का मामला है, तो उसका स्वभाव यह है कि यदि उसका पालनहार उसका परीक्षण करे और उसे सम्मानित करे, तथा उसे धन, संतान और प्रतिष्ठा प्रदान करे, तो वह सोचता है कि यह उसे अल्लाह के निकट सम्मान प्राप्त होने के कारण है। चुनाँचे वह कहता है : मेरे पालनहार ने मुझे सम्मानित किया, क्योंकि मैं उसके सम्मान के योग्य था।
आयत 16
وَأَمَّآ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَهَـٰنَنِ
وَأَمَّآ
और लेकिन
إِذَا
when
مَا
जब कभी
ٱبْتَلَىٰهُ
वो आज़माता है उसे
فَقَدَرَ
फिर वो तंग कर देता है
عَلَيْهِ
उस पर
رِزْقَهُۥ
रिज़्क़ उसका
فَيَقُولُ
तो वो कहता है
رَبِّىٓ
मेरे रब ने
أَهَـٰنَنِ
ज़लील कर दिया मुझे
किन्तु जब कभी वह उसकी परीक्षा इस प्रकार करता है कि उसकी रोज़ी नपी-तुली कर देता है, तो वह कहता है, "मेरे रब ने मेरा अपमान किया।"
तफ़्सीर:
लेकिन जब अल्लाह उसका परीक्षण करे और उसकी आजीविका उसके लिए तंग कर दे, तो वह सोचता है कि इसका कारण यह है कि उसके पालनहार के पास उसका कोई सम्मान नहीं है। चुनाँचे वह कहता है : मेरे पालनहार ने मुझे अपमानित किया।
आयत 17
كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ ٱلْيَتِيمَ
كَلَّا ۖ
हरगिज़ नहीं
بَل
बल्कि
لَّا
नहीं
تُكْرِمُونَ
तुम इज़्ज़त देते
ٱلْيَتِيمَ
यतीम को
कदापि नहीं, बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते,
तफ़्सीर:
हरगिज़ नहीं, यह मामला ऐसा नहीं है, जैसा कि इस व्यक्ति ने कल्पना की है कि नेमत बंदे से अल्लाह के खुश होने का प्रमाण है और सज़ा बंदे से अल्लाह के नाराज़ होने का प्रमाण है। बल्कि, वास्तविकता यह है कि अल्लाह ने तुम्हें जो जीविका प्रदान की है, तुम उससे अनाथ का सम्मान नहीं करते हो।
आयत 18
وَلَا تَحَـٰٓضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ
وَلَا
और नहीं
تَحَـٰٓضُّونَ
तुम आपस में तरग़ीब देते
عَلَىٰ
to
طَعَامِ
खाना खिलाने पर
ٱلْمِسْكِينِ
मिसकीन के
और न मुहताज को खिलान पर एक-दूसरे को उभारते हो,
तफ़्सीर:
तथा तुम उस ग़रीब को भोजन कराने के लिए एक-दूसरे से आग्रह नहीं करते हो, जिसके पास खाने के लिए कुछ नहीं होता।
आयत 19
وَتَأْكُلُونَ ٱلتُّرَاثَ أَكْلًۭا لَّمًّۭا
وَتَأْكُلُونَ
और तुम खा जाते हो
ٱلتُّرَاثَ
मीरास को
أَكْلًۭا
खा जाना
لَّمًّۭا
समेट कर
और सारी मीरास समेटकर खा जाते हो,
तफ़्सीर:
और तुम कमज़ोरों; महिलाओं और अनाथों के हक़ों को, हलाल-हराम की परवाह किए बिना, बुरी तरह खा जाते हो।
आयत 20
وَتُحِبُّونَ ٱلْمَالَ حُبًّۭا جَمًّۭا
وَتُحِبُّونَ
और तुम मुहब्बत रखते हो
ٱلْمَالَ
माल से
حُبًّۭا
मुहब्बत
جَمًّۭا
बहुत ज़्यादा
और धन से उत्कट प्रेम रखते हो
तफ़्सीर:
और तुम धन से बहुत प्यार करते हो। इसलिए उसे अल्लाह के मार्ग में खर्च करने में कंजूसी करते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनियावी माल की आज़माइश और यतीम-मिस्कीन की नाकद्री का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेमत मिलने को इज़्ज़त और तंगी को ज़िल्लत समझना गलत है, दोनों अल्लाह की आज़माइश हैं।
आयत 21
كَلَّآ إِذَا دُكَّتِ ٱلْأَرْضُ دَكًّۭا دَكًّۭا
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِذَا
जब
دُكَّتِ
रेज़ा-रेज़ा कर दी जाएगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
دَكًّۭا
pounded
دَكًّۭا
ख़ूब रेज़ा-रेज़ा करना
कुछ नहीं, जब धरती कूट-कूटकर चुर्ण-विचुर्ण कर दी जाएगी,
तफ़्सीर:
तुम्हें हरगिज़ ऐसा नहीं करना चाहिए, और उस समय को याद रखो, जब धरती ज़ोर-ज़ोर से हिला दी जाएगी।
आयत 22
وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلْمَلَكُ صَفًّۭا صَفًّۭا
وَجَآءَ
और आएगा
رَبُّكَ
रब आपका
وَٱلْمَلَكُ
और फ़रिश्ते
صَفًّۭا
rank
صَفًّۭا
सफ़ दर सफ़
और तुम्हारा रब और फ़रिश्ता (बन्दों की) एक-एक पंक्ति के पास आएगा,
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आपका पालनहार बंदों के बीच निर्णय करने के लिए आएगा और फ़रिश्ते भी पंक्तिबद्ध होकर आ जाएँगे।
आयत 23
وَجِا۟ىٓءَ يَوْمَئِذٍۭ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍۢ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكْرَىٰ
وَجِا۟ىٓءَ
और लाई जाएगी
يَوْمَئِذٍۭ
उस दिन
بِجَهَنَّمَ ۚ
जहन्नम
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يَتَذَكَّرُ
नसीहत पकड़ेगा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
وَأَنَّىٰ
और क्योंकर होगा
لَهُ
उसके लिए
ٱلذِّكْرَىٰ
नसीहत पकड़ना
और जहन्नम को उस दिन लाया जाएगा, उस दिन मनुष्य चेतेगा, किन्तु कहाँ है उसके लिए लाभप्रद उस समय का चेतना?
तफ़्सीर:
उस दिन जहन्नम को इस तरह लाया जाएगा कि उसकी सत्तर हज़ार लगामें होंगी। हर लगाम के साथ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते होंगे जो उसे खींच रहे होंगे। उस दिन इनसान याद करेगा कि उसने अल्लाह के पक्ष में क्या-क्या कोताही की है। लेकिन उस दिन याद करना उसे कहाँ से लाभ देगा; क्योंकि वह प्रतिदान दिवस है, कार्य दिवस नहीं?!
आयत 24
يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى
يَقُولُ
वो कहेगा
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
قَدَّمْتُ
आगे भेजा होता मैं ने
لِحَيَاتِى
अपनी ज़िन्दगी के लिए
वह कहेगा, "ऐ काश! मैंने अपने जीवन के लिए कुछ करके आगे भेजा होता।"
तफ़्सीर:
वह बड़े अफ़सोस के साथ कहेगा : ऐ काश! मैंने अपने इस आख़िरत के जीवन के लिए नेक कार्य किए होते, जो वास्तविक जीवन है।
आयत 25
فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌۭ
فَيَوْمَئِذٍۢ
तो उस दिन
لَّا
not
يُعَذِّبُ
ना अज़ाब देगा
عَذَابَهُۥٓ
अज़ाब उस जैसा
أَحَدٌۭ
कोई एक
फिर उस दिन कोई नहीं जो उसकी जैसी यातना दे,
तफ़्सीर:
उस दिन अल्लाह की यातना की तरह कोई यातना नहीं देगा, क्योंकि अल्लाह की यातना अधिक गंभीर और स्थायी है।
आयत 26
وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌۭ
وَلَا
And not
يُوثِقُ
और ना बाँधेगा
وَثَاقَهُۥٓ
बाँधना उस जैसा
أَحَدٌۭ
कोई एक
और कोई नहीं जो उसकी जकड़बन्द की तरह बाँधे
तफ़्सीर:
और न उसके काफ़िरों को ज़ंजीरों में बाँधने की तरह कोई बाँधेगा।
आयत 27
يَـٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ
يَـٰٓأَيَّتُهَا
O
ٱلنَّفْسُ
ऐ नफ़्स
ٱلْمُطْمَئِنَّةُ
जो मुत्मइन है
"ऐ संतुष्ट आत्मा!
तफ़्सीर:
जहाँ तक मोमिन की आत्मा की बात है, तो उसे मौत के समय और क़ियामत के दिन कहा जाएगा : ऐ ईमान और नेक कार्य से संतुष्ट आत्मा!
आयत 28
ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةًۭ مَّرْضِيَّةًۭ
ٱرْجِعِىٓ
वापस चलो
إِلَىٰ
to
رَبِّكِ
तरफ़ अपने रब के
رَاضِيَةًۭ
राज़ी हो कर
مَّرْضِيَّةًۭ
पसंदीदा बन कर
लौट अपने रब की ओर, इस तरह कि तू उससे राज़ी है वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा। -
तफ़्सीर:
अपने पालनहार की ओर लौट चल, इस हाल में कि तू भरपूर बदला पाकर उससे संतुष्ट है, और अपने अच्छे कार्यों के कारण उसके निकट पसंदीदा (संतोषजनक) है।
आयत 29
فَٱدْخُلِى فِى عِبَـٰدِى
فَٱدْخُلِى
फिर दाख़िल हो जाओ
فِى
among
عِبَـٰدِى
मेरे बन्दों में
अतः मेरे बन्दों में सम्मिलित हो जा
तफ़्सीर:
अतः तू मेरे नेक बंदों में शामिल हो जा।
आयत 30
وَٱدْخُلِى جَنَّتِى
وَٱدْخُلِى
और दाख़िल हो जाओ
جَنَّتِى
मेरी जन्नत में
और प्रवेश कर मेरी जन्नत में।"
तफ़्सीर:
और उनके साथ मेरी जन्नत में दाख़िल हो जा, जिसे मैंने उनके लिए तैयार कर रखी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के मंज़र और इत्मीनान वाली रूह की खुशखबरी के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि जो रूह अल्लाह की याद से मुत्मइन्न (संतुष्ट) होती है, उसे कयामत के दिन खुशखबरी और जन्नत में दाखिले की दावत मिलेगी।
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