नाम का मतलब
तौबा (गुनाहगारों की माफी और तौबा कबूल होने के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अत-तौबा उन चंद सूरतों में से है जिनकी शुरुआत बिस्मिल्लाह से नहीं होती, क्योंकि इसमें अहद तोड़ने वाले मुशरिकों के खिलाफ सख्त एलान है। यह ग़ज़वा-ए-तबूक के दौर में नाज़िल हुई और मुनाफिकों के रवैये को बेनकाब करती है। इसमें जिहाद, अहद-वफा और सच्चे-झूठे ईमान वालों के फर्क पर तफ्सीली गुफ्तगू है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह मुनाफिकों की पहचान और सच्चे ईमान वालों के इम्तिहान के मौज़ू पर बेहद जामे मानी जाती है।
आयत 1
بَرَآءَةٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلَّذِينَ عَـٰهَدتُّم مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
بَرَآءَةٌۭ
بَرَآءَةٌ है (ऐलान)
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَرَسُولِهِۦٓ
और उसके रसूल (की तरफ़ से)
إِلَى
to
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जिनसे
عَـٰهَدتُّم
मुआहिदा किया तुमने
مِّنَ
from
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उद्घॊषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से
तफ़्सीर:
यह अल्लाह तथा उसके रसूल की ओर से ज़िम्मेदारी से बरी होने, तथा उन संधियों के अंत की घोषणा है, जो (ऐ मुसलमानो!) तुमने अरब प्रायद्वीप में बहुदेववादियों के साथ की थी।
आयत 2
فَسِيحُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍۢ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِى ٱللَّهِ ۙ وَأَنَّ ٱللَّهَ مُخْزِى ٱلْكَـٰفِرِينَ
فَسِيحُوا۟
पस चलो फिरो तुम
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أَرْبَعَةَ
चार
أَشْهُرٍۢ
महीने
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
غَيْرُ
नहीं
مُعْجِزِى
आजिज़ करने वाले
ٱللَّهِ ۙ
अल्लाह को
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مُخْزِى
रुस्वा करने वाला है
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
"अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"
तफ़्सीर:
अतः (ऐ बहुदेववादियो!) तुम धरती में चार महीने सुरक्षित रूप से चलो-फिरो। उसके बाद तुम्हारे लिए न कोई संधि होगी और न कोई सुरक्षा। तथा निश्चित रहो कि अगर तुम अपने कुफ़्र पर बने रहे, तो अल्लाह की यातना और दंड से हरगिज़ नहीं बचोगे। तथा इस बात से भी निश्चित रहो कि अल्लाह काफ़िरों को इस दुनिया में क़ल्त और क़ैद करके तथा क़ियामत के दिन आग में डालकर अपमानित करने वाला है। इस घोषणा में वे सभी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी संधि तोड़ दी और जिनकी संधि का समय निर्धारित नहीं था। जहाँ तक उन लोगों की बात है, जिनकी संधि का समय निर्धारित था, तो उनकी संधि को उसके कार्यकाल तक पूरा किया जाएगा, भले ही वह चार महीने से अधिक की हो।
आयत 3
وَأَذَٰنٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلنَّاسِ يَوْمَ ٱلْحَجِّ ٱلْأَكْبَرِ أَنَّ ٱللَّهَ بَرِىٓءٌۭ مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ۙ وَرَسُولُهُۥ ۚ فَإِن تُبْتُمْ فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ وَإِن تَوَلَّيْتُمْ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِى ٱللَّهِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
وَأَذَٰنٌۭ
और ऐलान है
مِّنَ
from Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَرَسُولِهِۦٓ
और उसके रसूल की तरफ़ से
إِلَى
to
ٱلنَّاسِ
तरफ़ लोगों के
يَوْمَ
दिन
ٱلْحَجِّ
(of) the greater Pilgrimage
ٱلْأَكْبَرِ
हज-ए-अकबर के
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بَرِىٓءٌۭ
बरी-उज़-ज़िम्मा है
مِّنَ
[of]
ٱلْمُشْرِكِينَ ۙ
मुशरिकों से
وَرَسُولُهُۥ ۚ
और उसका रसूल भी
فَإِن
फिर अगर
تُبْتُمْ
तौबा कर लो तुम
فَهُوَ
तो वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
وَإِن
और अगर
تَوَلَّيْتُمْ
मुँह फेरा तुमने
فَٱعْلَمُوٓا۟
तो जान लो
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
غَيْرُ
नहीं
مُعْجِزِى
आजिज़ करने वाले
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह को
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِعَذَابٍ
अज़ाब
أَلِيمٍ
दर्दनाक की
सार्वजनिक उद्घॊषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति जिम्मेदार से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो
तफ़्सीर:
तथा अल्लाह की तरफ़ से और उसके रसूल की तरफ़ से क़ुर्बानी के दिन तमाम लोगों को यह सूचना है कि अल्लाह बहुदेववादियों (मुश्रिकों) से बरी है, तथा उसका रसूल भी उनसे अलग है। फिर यदि (ऐ बहुदेववादियो!) तुम अपने शिर्क से तौबा कर लो, तो तुम्हारा तौबा करना तुम्हारे लिए बेहतर है, और यदि तुम तौबा से मुँह फेरो, तो सुनिश्चित हो जाओ कि तुम अल्लाह से कभी नहीं छूट सकते, और उसकी यातना से हरगिज़ नहीं बच सकते। तथा (ऐ रसूल!) आप अल्लाह का इनकार करने वालों को यह बुरी सूचना सुना दें कि एक दर्दनाक अज़ाब उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।
आयत 4
إِلَّا ٱلَّذِينَ عَـٰهَدتُّم مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ثُمَّ لَمْ يَنقُصُوكُمْ شَيْـًۭٔا وَلَمْ يُظَـٰهِرُوا۟ عَلَيْكُمْ أَحَدًۭا فَأَتِمُّوٓا۟ إِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ إِلَىٰ مُدَّتِهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُتَّقِينَ
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उनके जिनसे
عَـٰهَدتُّم
मुआहिदा किया तुमने
مِّنَ
among
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
ثُمَّ
फिर
لَمْ
नहीं
يَنقُصُوكُمْ
उन्होंने कमी की तुमसे
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَمْ
और ना ही
يُظَـٰهِرُوا۟
उन्होंने पुश्त पनाही की
عَلَيْكُمْ
तुम्हारे ख़िलाफ़
أَحَدًۭا
किसी की
فَأَتِمُّوٓا۟
तो पूरा करो
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
عَهْدَهُمْ
अहद उनके
إِلَىٰ
till
مُدَّتِهِمْ ۚ
उनकी मुद्दत तक
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
वो पसंद करता है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नही की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है
तफ़्सीर:
सिवाय उन मुश्रिकों के, जिनसे तुमने संधि की, और उन्होंने अपनी संधि को पूरा किया तथा उसमें कुछ भी कमी नहीं की, तो वे लोग पिछले हुक्म से अलग हैं। ऐसे लोगों की संधि को उसकी अवधि समाप्त होने तक पूरा करो। निःसंदेह अल्लाह उन लोगों से प्रेम करता है, जो उसके आदेशों का पालन करके, जिनमें संधि को पूरा करना भी शामिल है और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहकर, जिनमें विश्वासघात भी शामिल है, उससे डरने वाले हैं।
आयत 5
فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍۢ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
فَإِذَا
फिर जब
ٱنسَلَخَ
गुज़र जाऐं
ٱلْأَشْهُرُ
महीने
ٱلْحُرُمُ
हुरमत वाले
فَٱقْتُلُوا۟
तो क़त्ल करो
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों को
حَيْثُ
जहाँ कहीं
وَجَدتُّمُوهُمْ
पाओ तुम उन्हें
وَخُذُوهُمْ
और पकड़ो उन्हें
وَٱحْصُرُوهُمْ
और घेरो उन्हें
وَٱقْعُدُوا۟
और बैठ जाओ
لَهُمْ
उनके लिए
كُلَّ
हर
مَرْصَدٍۢ ۚ
घात पर
فَإِن
फिर अगर
تَابُوا۟
और वो तौबा कर लें
وَأَقَامُوا۟
और वो क़ायम करें
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتَوُا۟
और वो अदा करें
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
فَخَلُّوا۟
तो छोड़ दो
سَبِيلَهُمْ ۚ
रास्ता उनका
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
फिर जब सम्मानित महीने बीत जाएँ, जिनमें तुमने अपने दुश्मनों को सुरक्षा प्रदान किया है, तो बहुदेववादियों (मुश्रिकों) को जहाँ कहीं भी पाओ, उन्हें क़त्ल करो, उन्हें पकड़ लो, उन्हें उनके गढ़ों में घेर लो और उनके रास्तों में उनकी घात में रहो। फिर यदि वे अल्लाह के समक्ष शिर्क से तौबा कर लें, नमाज़ स्थापित करें तथा ज़कात अदा करें, तो वे तुम्हारे इस्लामी भाई हो गए। इसलिए उनसे युद्ध करना छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदे को बहुत क्षमा करने वाला, उसपर अति दयावान् है।
आयत 6
وَإِنْ أَحَدٌۭ مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ٱسْتَجَارَكَ فَأَجِرْهُ حَتَّىٰ يَسْمَعَ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ أَبْلِغْهُ مَأْمَنَهُۥ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَعْلَمُونَ
وَإِنْ
और अगर
أَحَدٌۭ
कोई एक
مِّنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
ٱسْتَجَارَكَ
पनाह माँगे आपसे
فَأَجِرْهُ
तो पनाह दे दीजिए उसे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَسْمَعَ
वो सुन ले
كَلَـٰمَ
कलाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ثُمَّ
फिर
أَبْلِغْهُ
पहुँचा दीजिए उसे
مَأْمَنَهُۥ ۚ
उसके अमन की जगह
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَوْمٌۭ
लोग
لَّا
(who) do not know
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं
तफ़्सीर:
और यदि मुश्रिकों में से कोई व्यक्ति - जिसका रक्त और धन हलाल हो - आए और (ऐ रसूल!) आपसे शरण माँगे, तो उसके अनुरोध का जवाब दें, ताकि वह क़ुरआन सुन सके, फिर उसे ऐसे स्थान पर पहुँचा दें, जहाँ वह सुरक्षित हो। ऐसा इसलिए कि काफ़िर ऐसे लोग हैं, जो इस्लाम के तथ्यों को नहीं जानते हैं। इसलिए यदि वे क़ुरआन के पाठ को सुनकर उनसे अवगत हो जाएँगे, तो संभव है कि मार्गदर्शन ग्रहण कर लें।
आयत 7
كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِكِينَ عَهْدٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِۦٓ إِلَّا ٱلَّذِينَ عَـٰهَدتُّمْ عِندَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۖ فَمَا ٱسْتَقَـٰمُوا۟ لَكُمْ فَٱسْتَقِيمُوا۟ لَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُتَّقِينَ
كَيْفَ
किस तरह
يَكُونُ
हो सकता है
لِلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन के लिए
عَهْدٌ
कोई अहद
عِندَ
with
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
وَعِندَ
and with
رَسُولِهِۦٓ
और उसके रसूल के नज़दीक
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उनके जिनसे
عَـٰهَدتُّمْ
मुआहिदा किया तुमने
عِندَ
पास
ٱلْمَسْجِدِ
Al-Masjid
ٱلْحَرَامِ ۖ
मस्जिदे हराम के
فَمَا
तो जब तक
ٱسْتَقَـٰمُوا۟
वो सीधे रहें
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فَٱسْتَقِيمُوا۟
पस तुम भी सीधे रहो
لَهُمْ ۚ
उनके लिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
वो पसंद करता है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है। -
तफ़्सीर:
यह उचित नहीं है कि अल्लाह के साथ शिर्क करने वालों की अल्लाह और उसके रसूल के पास कोई संधि तथा सुरक्षा का वचन हो, सिवाय उन बहुदेववादियों के वचन के, जिनके साथ (ऐ ईमान वालो!) तुमने मस्जिदे-हराम के पास हुदैबिय्यह की संधि में समझौता किया था। तो जब तक वे तुम्हारे लिए उस वचन पर क़ायम रहें जो तुम्हारे और उनके बीच है और उसे न तोड़ें, तो तुम भी उनके लिए उसपर क़ायम रहो और उसे न तोड़ो। निःसंदेह अल्लाह अपने मुत्तक़ी बंदों से प्रेम करता है, जो उसके आदेशों का पालन करते और उसके निषेधों से दूर रहते हैं।
आयत 8
كَيْفَ وَإِن يَظْهَرُوا۟ عَلَيْكُمْ لَا يَرْقُبُوا۟ فِيكُمْ إِلًّۭا وَلَا ذِمَّةًۭ ۚ يُرْضُونَكُم بِأَفْوَٰهِهِمْ وَتَأْبَىٰ قُلُوبُهُمْ وَأَكْثَرُهُمْ فَـٰسِقُونَ
كَيْفَ
कैसे (मुमकिन है)
وَإِن
जबकि अगर
يَظْهَرُوا۟
वो ग़लबा पा जाऐं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
لَا
they do not regard (the ties)
يَرْقُبُوا۟
ना वो लिहाज़ करेंगे
فِيكُمْ
तुम्हारे मामले में
إِلًّۭا
किसी क़राबत का
وَلَا
और ना
ذِمَّةًۭ ۚ
किसी मुआहिदे का
يُرْضُونَكُم
वो राज़ी करते हैं तुम्हें
بِأَفْوَٰهِهِمْ
अपने मुँहों से
وَتَأْبَىٰ
और इन्कार करते हैं
قُلُوبُهُمْ
दिल उनके
وَأَكْثَرُهُمْ
और अक्सर उनके
فَـٰسِقُونَ
फ़ासिक़ हैं
कैसे बाक़ी रह सकती है? जबकि उनका हाल यह है कि यदि वे तुम्हें दबा पाएँ तो वे न तुम्हारे विषय में किसी नाते-रिश्ते का ख़याल रखें औऱ न किसी अभिवचन का। वे अपने मुँह ही से तुम्हें राज़ी करते है, किन्तु उनके दिल इनकार करते रहते है और उनमें अधिकतर अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
उनके लिए प्रतिज्ञा और सुरक्षा का वचन कैसे हो सकता है, जबकि वे तुम्हारे शत्रु हैं। और यदि वे तुमपर आधिपत्य प्राप्त कर लें, तो वे तुम्हारे बारे में अल्लाह, या किसी रिश्तेदारी, या किसी प्रतिज्ञा का सम्मान नहीं करेंगे, बल्कि वे तुम्हें बुरी यातना से दंडित करेंगे?! वे तुम्हें उन अच्छे शब्दों से प्रसन्न करते हैं जो उनकी ज़बानें बोलती हैं, लेकिन उनके दिल उनकी ज़बानों का साथ नहीं देते। इसलिए वे जो कहते हैं, उसे पूरा नहीं करते हैं। तथा उनमें से अधिकांश लोग वचन तोड़ने के कारण अल्लाह की आज्ञाकारिता से बाहर हैं।
आयत 9
ٱشْتَرَوْا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا فَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِهِۦٓ ۚ إِنَّهُمْ سَآءَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
ٱشْتَرَوْا۟
उन्होंने बेच डाला
بِـَٔايَـٰتِ
[with] the Verses of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًۭا
थोड़ी में
فَصَدُّوا۟
फिर उन्होंने रोका
عَن
from
سَبِيلِهِۦٓ ۚ
उसके रास्ते से
إِنَّهُمْ
बेशक वो
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
كَانُوا۟
हैं वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल कर रहे हैं
उन्होंने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ा-सा मूल्य स्वीकार किया और इस प्रकार वे उसका मार्ग अपनाने से रूक गए। निश्चय ही बहुत बुरा है, जो कुछ वे कर रहे हैं
तफ़्सीर:
उन्होंने अल्लाह की आयतों का अनुसरण करने के बदले में, जिसमें प्रतिज्ञाओं की पूर्ति भी शामिल है, दुनिया का तुच्छ मूल्य ले लिया, जिससे वे अपनी वासनाओं और इच्छाओं तक पहुँचते हैं। इस तरह उन्होंने अपने आपको सत्य का पालन करने से रोका और उससे मुँह फेर लिया, तथा उन्होंने दूसरों को भी सत्य से रोका। निश्चय उनका वह अमल बहुत बुरा है, जो वे करते रहे हैं।
आयत 10
لَا يَرْقُبُونَ فِى مُؤْمِنٍ إِلًّۭا وَلَا ذِمَّةًۭ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُعْتَدُونَ
لَا
Not
يَرْقُبُونَ
नहीं वो लिहाज़ करते
فِى
towards
مُؤْمِنٍ
किसी मोमिन (के बारे में)
إِلًّۭا
किसी क़राबत का
وَلَا
और ना
ذِمَّةًۭ ۚ
किसी मुआहिदे का
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُعْتَدُونَ
जो हद से बढ़ने वाले हैं
किसी मोमिन के बारे में न तो नाते-रिश्ते का ख़याल रखते है और न किसी अभिवचन का। वही लोग है जिन्होंने सीमा का उल्लंघन किया
तफ़्सीर:
वे अपनी शत्रुता के कारण किसी मोमिन के बारे में अल्लाह का, या किसी रिश्तेदारी, या किसी प्रतिज्ञा का सम्मान नहीं करते हैं। वे अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं; क्योंकि वे अन्याय और आक्रामकता की विशेषता रखते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों से किए अहद के खात्मे का साफ एलान है। यह हमें सिखाता है कि अहद तोड़ने वालों से मुकाबले में भी साफगोई और खुला एलान बेहतर है, धोखे से बचना चाहिए।
आयत 11
فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَإِخْوَٰنُكُمْ فِى ٱلدِّينِ ۗ وَنُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
فَإِن
फिर अगर
تَابُوا۟
वो तौबा कर लें
وَأَقَامُوا۟
और वो क़ायम करें
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتَوُا۟
और वो अदा करें
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
فَإِخْوَٰنُكُمْ
तो भाई हैं तुम्हारे
فِى
in
ٱلدِّينِ ۗ
दीन में
وَنُفَصِّلُ
और हम खोल-खोल कर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
अतः यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो वे धर्म के भाई हैं। और हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर बयान करते हैं, जो जानना चाहें
तफ़्सीर:
यदि वे अपने कुफ़्र से अल्लाह के समक्ष तौबा कर लें, और इस बात की गवाही दें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करें और अपने धन की ज़कात दें - तो वे मुसलमान हो गए और वे धर्म में तुम्हारे भाई हैं। उनके लिए वे सभी अधिकार हैं, जो तुम्हारे लिए हैं और उनपर वे सभी दायित्व हैं, जो तुमपर हैं। तुम्हारे लिए उनसे लड़ना जायज़ नहीं है, क्योंकि उनका इस्लाम उनके खून, धन और सम्मान की रक्षा करता है। हम उन लोगों के लिए आयतों को स्पष्ट करते और उन्हें खोल-खोलकर बयान करते हैं, जो ज्ञान रखते हैं। क्योंकि वही वे लोग हैं, जो उनसे लाभान्वित होते हैं, और दूसरों को भी उनसे लाभान्वित करते हैं।
आयत 12
وَإِن نَّكَثُوٓا۟ أَيْمَـٰنَهُم مِّنۢ بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا۟ فِى دِينِكُمْ فَقَـٰتِلُوٓا۟ أَئِمَّةَ ٱلْكُفْرِ ۙ إِنَّهُمْ لَآ أَيْمَـٰنَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنتَهُونَ
وَإِن
और अगर
نَّكَثُوٓا۟
वो तोड़ दें
أَيْمَـٰنَهُم
अपनी क़समें
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद
عَهْدِهِمْ
अपने अहद करने के
وَطَعَنُوا۟
और वो तअन(ताना) करें
فِى
[in]
دِينِكُمْ
तुम्हारे दीन में
فَقَـٰتِلُوٓا۟
तो जंग करो
أَئِمَّةَ
इमामों से
ٱلْكُفْرِ ۙ
कुफ़्र के
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَآ
no
أَيْمَـٰنَ
नहीं हैं कोई क़समें
لَهُمْ
उनकी
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَنتَهُونَ
वो रुक जाऐं
और यदि अपने अभिवचन के पश्चात वे अपनी क़समॊं कॊ तॊड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन (धर्म) पर चॊटें करनॆ लगॆं, तॊ फिर कुफ़्र (अधर्म) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ, उनकी क़समॆं कुछ नहीं, ताकि वॆ बाज़ आ जाऐं।
तफ़्सीर:
और यदि ये मुश्रिक लोग, जिनसे तुमने एक ज्ञात अवधि के लिए लड़ाई बंद रखने का समझौता कर रखा है, अपने वचनों और प्रतिज्ञाओं को तोड़ दें, और तुम्हारे धर्म में बुराई निकालें और उसमें दोष ढूँढ़ें, तो उनसे युद्ध करो। क्योंकि वे कुफ़्र के अगुवा और सरग़ना हैं और उनकी कोई प्रतिज्ञाएँ और वाचाएँ नहीं हैं, जो उनके रक्त की रक्षा करें। उनसे इस आशा में युद्ध करो कि वे अपने कुफ़्र, अनुबंधों को तोड़ने और धर्म में दोष निकालने से बाज़ आ जाएँ।
आयत 13
أَلَا تُقَـٰتِلُونَ قَوْمًۭا نَّكَثُوٓا۟ أَيْمَـٰنَهُمْ وَهَمُّوا۟ بِإِخْرَاجِ ٱلرَّسُولِ وَهُم بَدَءُوكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۚ أَتَخْشَوْنَهُمْ ۚ فَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَوْهُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
أَلَا
क्या नहीं
تُقَـٰتِلُونَ
तुम जंग करोगे
قَوْمًۭا
ऐसी क़ौम से
نَّكَثُوٓا۟
जिन्होंने तोड़ दीं
أَيْمَـٰنَهُمْ
अपनी क़समें
وَهَمُّوا۟
और उन्होंने इरादा किया
بِإِخْرَاجِ
निकालने का
ٱلرَّسُولِ
रसूल को
وَهُم
हालाँकि वो
بَدَءُوكُمْ
उन्होंने इब्तिदा की थी तुमसे
أَوَّلَ
first
مَرَّةٍ ۚ
पहली मर्तबा
أَتَخْشَوْنَهُمْ ۚ
क्या तुम डरते हो उनसे
فَٱللَّهُ
तो अल्लाह
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
أَن
कि
تَخْشَوْهُ
तुम डरो उससे
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
क्या तुम ऐसॆ लॊगॊं सॆ नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी क़समों को तोड़ डालीं और रसूल को निकाल देना चाहा और वही हैं जिन्होंने तुमसे छेड़ में पहल की? क्या तुम उनसे डरते हो? यदि तुम मोमिन हो तो इसका ज़्यादा हक़दार अल्लाह है कि तुम उससे डरो
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) तुम उन लोगों से युद्ध क्यों नहीं करते, जिन्होंने अपने वचनों और प्रतिज्ञाओं को तोड़ दिया, और दारुन-नदवा में अपनी बैठक में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मक्का से निकालने के लिए प्रयास किया, और उन्होंने ही अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहयोगी खुज़ाआ कबीले के विरुद्ध कुरैश के सहयोगी बक्र क़बीले की मदद करके, तुमसे युद्ध करने में पहल की है। क्या तुम युद्ध में उनके साथ मुठभेड़ से डरते हो?! तो (जान लो कि) यदि तुम वास्तव में ईमान वाले हो, तो अल्लाह इस बात का अधिक हक़दार है कि तुम उससे डरो।
आयत 14
قَـٰتِلُوهُمْ يُعَذِّبْهُمُ ٱللَّهُ بِأَيْدِيكُمْ وَيُخْزِهِمْ وَيَنصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ وَيَشْفِ صُدُورَ قَوْمٍۢ مُّؤْمِنِينَ
قَـٰتِلُوهُمْ
जंग करो उनसे
يُعَذِّبْهُمُ
अज़ाब देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِأَيْدِيكُمْ
तुम्हारे लिए
وَيُخْزِهِمْ
और वो रुस्वा करेगा उन्हें
وَيَنصُرْكُمْ
और वो मदद करेगा तुम्हारी
عَلَيْهِمْ
उनके ख़िलाफ़
وَيَشْفِ
और वो शिफ़ा बख़्शेगा
صُدُورَ
सीनों को
قَوْمٍۢ
(of) a people
مُّؤْمِنِينَ
मोमिन क़ौम के
उनसे लड़ो। अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें यातना देगा और उन्हें अपमानित करेगा और उनके मुक़ाबले में वह तुम्हारी सहायता करेगा। और ईमानवाले लोगों के दिलों का दुखमोचन करेगा;
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) इन मुश्रिकों से लड़ो। क्योंकि यदि तुम उनसे लड़ोगे, तो अल्लाह उन्हें तुम्हारे हाथों से दंडित करेगा, इस प्रकार की तुम उन्हें क़त्ल करोगे, उन्हें हार और क़ैद से अपमानित करेगा, और तुम्हें प्रबल करके तुम्हें उनपर विजय प्रदान करेगा, और उन ईमान वालों के सीनों की बीमारी, जो युद्ध में शामिल नहीं हुए, उनके दुश्मन की हत्या, क़ैद और पराजय, तथा उनपर विश्वासियों की जीत के साथ ठीक कर देगा।
आयत 15
وَيُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ ۗ وَيَتُوبُ ٱللَّهُ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
وَيُذْهِبْ
और वो ले जाएगा
غَيْظَ
ग़ुस्सा
قُلُوبِهِمْ ۗ
उनके दिलों का
وَيَتُوبُ
और मेहरबान होगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
of
مَن
ऊपर जिसके
يَشَآءُ ۗ
वो चाहेगा
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
उनके दिलों का क्रोध मिटाएगा, अल्लाह जिसे चाहेगा, उसपर दया-दृष्टि डालेगा। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और अपने मोमिन बंदों के दिलों से क्रोध को, दुश्मनों पर उन्हें विजय प्रदान करके दूर कर देगा। तथा अल्लाह इन हठी लोगों में से जिसकी चाहता, तौबा क़बूल करता है, यदि वे तौबा करें, जैसा कि (मक्का पर) विजय के दिन मक्का के कुछ लोगों के साथ हुआ था। और अल्लाह उनमें से तौबा करने वालों की सच्चाई को भली-भाँति जानने वाला, तथा अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 16
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تُتْرَكُوا۟ وَلَمَّا يَعْلَمِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ جَـٰهَدُوا۟ مِنكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَا رَسُولِهِۦ وَلَا ٱلْمُؤْمِنِينَ وَلِيجَةًۭ ۚ وَٱللَّهُ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
أَمْ
क्या
حَسِبْتُمْ
गुमान किया तुमने
أَن
कि
تُتْرَكُوا۟
तुम छोड़ दिए जाओगे
وَلَمَّا
हालाँकि अभी तक नहीं
يَعْلَمِ
जाना
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
جَـٰهَدُوا۟
जिहाद किया
مِنكُمْ
तुम में से
وَلَمْ
और नहीं
يَتَّخِذُوا۟
उन्होंने बनाया
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَا
और ना
رَسُولِهِۦ
उसके रसूल के
وَلَا
और ना
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के
وَلِيجَةًۭ ۚ
कोई दिली दोस्त
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
خَبِيرٌۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम ऐसे ही छोड़ दिए जाओगे, हालाँकि अल्लाह ने अभी उन लोगों को छाँटा ही नहीं, जिन्होंने तुममें से जिहाद किया और अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों को छोड़कर किसी को घनिष्ठ मित्र नहीं बनाया? तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) क्या तुमने समझ रखा है कि अल्लाह तुम्हें बिना परीक्षण के यूँ ही छोड़ देगा?! हालाँकि परीक्षण करना अल्लाह के नियमों में से एक नियम है। तुम्हारी परीक्षा होती रहेगी यहाँ तक कि अल्लाह तुममें से निष्ठापूर्वक जिहाद करने वालों को इस तरह जान ले कि वह ज्ञान बंदों के लिए प्रत्यक्ष और स्पष्ट हो, जिन्होंने अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वालों को छोड़कर काफ़िरों में से रहस्यज्ञ और घनिष्ठ मित्र नहीं बनाए, जिनसे वे मित्रता और प्रेम का संबंध रखते हों। तथा तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे सूचित है, उसमें से कुछ भी अल्लाह से छिपा नहीं है और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।
आयत 17
مَا كَانَ لِلْمُشْرِكِينَ أَن يَعْمُرُوا۟ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ شَـٰهِدِينَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِم بِٱلْكُفْرِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ وَفِى ٱلنَّارِ هُمْ خَـٰلِدُونَ
مَا
नहीं
كَانَ
है
لِلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन के लिए
أَن
कि
يَعْمُرُوا۟
वो आबाद करें
مَسَـٰجِدَ
मस्जिदें
ٱللَّهِ
अल्लाह की
شَـٰهِدِينَ
शहादत देने वाले
عَلَىٰٓ
against
أَنفُسِهِم
अपने नफ़्सों पर
بِٱلْكُفْرِ ۚ
कुफ़्र की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
حَبِطَتْ
ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
وَفِى
and in
ٱلنَّارِ
और आग में
هُمْ
वो
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
यह मुशरिकों का काम नहीं कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें और उसके प्रबंधक हों, जबकि वे स्वयं अपने विरुद्ध कुफ़्र की गवाही दे रहे है। उन लोगों का सारा किया-धरा अकारथ गया और वे आग में सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
मुश्रिकों (बहुदेववादियों) के लिए योग्य नहीं है कि वे अल्लाह की मस्जिदों को इबादत तथा विभिन्न प्रकार की आज्ञाकारिता के साथ आबाद करें, जबकि जो कुछ वे कुफ़्र का प्रदर्शन करते हैं, उसके द्वारा वे स्वयं अपने विरुद्ध कुफ़्र की गवाही दे रहे हैं। उनके कर्म व्यर्थ हैं क्योंकि उनके क़बूल होने की शर्त नहीं पाई जाती है और वह (शर्त) अल्लाह पर ईमान है। वे लोग क़ियामत के दिन आग में प्रवेश करेंगे और हमेशा के लिए उसी में रहेंगे, सिवाय इसके कि वे अपनी मृत्यु से पहले बहुदेववाद से तौबा कर लें।
आयत 18
إِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَلَمْ يَخْشَ إِلَّا ٱللَّهَ ۖ فَعَسَىٰٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَن يَكُونُوا۟ مِنَ ٱلْمُهْتَدِينَ
إِنَّمَا
बेशक
يَعْمُرُ
आबाद करता है
مَسَـٰجِدَ
मस्जिदें
ٱللَّهِ
अल्लाह की
مَنْ
वो जो
ءَامَنَ
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَأَقَامَ
और वो क़ायम करे
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتَى
और वो अदा करे
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَلَمْ
और ना
يَخْشَ
वो डरे
إِلَّا
सिवाय
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह के
فَعَسَىٰٓ
तो उम्मीद है
أُو۟لَـٰٓئِكَ
ये लोग
أَن
कि
يَكُونُوا۟
वो होंगे
مِنَ
of
ٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वालों में से
अल्लाह की मस्जिदों का प्रबंधक और उसे आबाद करनेवाला वही हो सकता है जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया, नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से न डरा। अतः ऐसे ही लोग, आशा है कि सीधा मार्ग पानेवाले होंगे
तफ़्सीर:
मस्जिदों को आबाद करने के योग्य और उसके हक़ को पूरा करने वाला केवल वही व्यक्ति है, जो अकेले अल्लाह पर ईमान रखता है और उसके साथ किसी को साझी नहीं बनाता है, तथा क़ियामत के दिन पर ईमान रखता, नमाज़ क़ायम करता, अपने धन की ज़कात देता और पवित्र अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरता है। तो यही वे लोग हैं, जिनके बारे में उम्मीद की जाती है कि वे सीधे रास्ते पर चलेंगे, और जहाँ तक बहुदेववादियों का सवाल है, तो वे इससे बहुत दूर हैं।
आयत 19
۞ أَجَعَلْتُمْ سِقَايَةَ ٱلْحَآجِّ وَعِمَارَةَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ كَمَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَجَـٰهَدَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ لَا يَسْتَوُۥنَ عِندَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
۞ أَجَعَلْتُمْ
क्या बना लिया तुमने
سِقَايَةَ
पानी पिलाना
ٱلْحَآجِّ
हाजियों को
وَعِمَارَةَ
और आबाद करना
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ
हराम को
كَمَنْ
मानिन्द उसके जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَجَـٰهَدَ
और उसने जिहाद किया
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते में
لَا
They are not equal
يَسْتَوُۥنَ
नहीं वो बराबर हो सकते
عِندَ
near
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के नज़दीक
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदे हराम (काबा) के प्रबंध को उस क्यक्ति के काम के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया और उसने अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया?अल्लाह की दृष्टि में वे बराबर नहीं। और अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
(ऐ बहुदेववादियो!) क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने वाले और मस्जिद-ए-हराम की देखभाल करने वाले लोगों को उस व्यक्ति की तरह बना दिया, जो अल्लाह पर ईमान लाया और उसके साथ किसी को साझी नहीं बनाया, तथा क़ियामत के दिन पर ईमान लाया और अपने जान-माल के साथ जिहाद किया, ताकि अल्लाह की बात सबसे ऊँची हो और काफ़िरों की बात सबसे नीची? क्या तुमने इन दोनों प्रकार के लोगों को अल्लाह के यहाँ प्रतिष्ठा में बराबर कर दिया?! वे अल्लाह के यहाँ कदापि बराबर नहीं हो सकते। और अल्लाह बहुदेववाद जैसे अत्याचार में पड़े हुए लोगों को सामर्थ्य नहीं देता, भले ही वे हाजियों को पानी पिलाने जैसे अच्छे काम करते हों।
आयत 20
ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَهَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ أَعْظَمُ دَرَجَةً عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَهَاجَرُوا۟
और उन्होंने हिजरत की
وَجَـٰهَدُوا۟
और उन्होंने जिहाद किया
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
بِأَمْوَٰلِهِمْ
अपने मालों से
وَأَنفُسِهِمْ
और अपनी जानों से
أَعْظَمُ
ज़्यादा बड़े हैं
دَرَجَةً
दर्जे में
عِندَ
near
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के नज़दीक
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْفَآئِزُونَ
जो कामयाब होने वाले हैं
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों से जिहाद किया, अल्लाह के यहाँ दर्जे में वे बहुत बड़े है और वही सफल है
तफ़्सीर:
जो लोग ईमान लाए तथा कुफ़्र की भूमि से इस्लाम की भूमि की ओर हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने धनों और प्राणों के साथ जिहाद किया, उनका दूसरों की तुलना में अल्लाह के यहाँ बहुत बड़ा पद है, तथा इन गुणों से सुसज्जित यही लोग जन्नत पाने में सफल होने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुश्मनी छोड़कर तौबा करने वालों की कद्र का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुश्मनी छोड़कर हक की तरफ आने वाले को भाई की तरह कबूल करना चाहिए।
आयत 21
يُبَشِّرُهُمْ رَبُّهُم بِرَحْمَةٍۢ مِّنْهُ وَرِضْوَٰنٍۢ وَجَنَّـٰتٍۢ لَّهُمْ فِيهَا نَعِيمٌۭ مُّقِيمٌ
يُبَشِّرُهُمْ
ख़ुशख़बरी देता है उन्हें
رَبُّهُم
रब उनका
بِرَحْمَةٍۢ
रहमत की
مِّنْهُ
अपनी तरफ़ से
وَرِضْوَٰنٍۢ
और रज़ामन्दी की
وَجَنَّـٰتٍۢ
और बाग़ात की
لَّهُمْ
उनके लिए
فِيهَا
उनमें
نَعِيمٌۭ
नेअमतें हैं
مُّقِيمٌ
क़ायम रहने वाली
उन्हें उनका रब अपना दयालुता और प्रसन्नता और ऐसे बाग़ों की शुभ-सूचना देता है, जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है
तफ़्सीर:
उनका पालनहार अल्लाह उन्हें अपनी दया की आनंददायक सूचना देता है और यह कि वह उनसे प्रसन्न हो जाएगा, फिर उनसे कभी नाराज़ नहीं होगा, तथा वे ऐसे बाग़ों में प्रवेश करेंगे जिनमें शाश्वत नेमतें हैं, जो कभी बाधित नहीं होंगी।
आयत 22
خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥٓ أَجْرٌ عَظِيمٌۭ
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उनमें
أَبَدًا ۚ
हमेशा-हमेशा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عِندَهُۥٓ
उसके पास
أَجْرٌ
अजर है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
उनमें वे सदैव रहेंगे। निस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है
तफ़्सीर:
वे उन बाग़ों में, दुनिया में किए हुए नेक कार्यों के बदले में, अनंत काल तक रहेंगे। निःसंदेह अल्लाह के यहाँ, निष्ठापूर्वक उसके आदेशों का पालन करने वाले तथा उसके निषेधों से बचने वाले के लिए बड़ा बदला है।
आयत 23
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوٓا۟ ءَابَآءَكُمْ وَإِخْوَٰنَكُمْ أَوْلِيَآءَ إِنِ ٱسْتَحَبُّوا۟ ٱلْكُفْرَ عَلَى ٱلْإِيمَـٰنِ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَّخِذُوٓا۟
ना तुम बनाओ
ءَابَآءَكُمْ
अपने आबा ओ अजदाद को
وَإِخْوَٰنَكُمْ
और अपने भाईयों को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
إِنِ
अगर
ٱسْتَحَبُّوا۟
वो तरजीह दें
ٱلْكُفْرَ
कुफ़्र को
عَلَى
over
ٱلْإِيمَـٰنِ ۚ
ईमान पर
وَمَن
और जो कोई
يَتَوَلَّهُم
दोस्त रखेगा उन्हें
مِّنكُمْ
तुम में से
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
ऐ ईमान लानेवालो! अपने बाप और अपने भाइयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र उन्हें प्रिय हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसके रसूल के द्वारा लाई गई बातों का अनुसरण करने वालो! अपने आनुवंशिक बापों और भाइयों और अपने रिश्तेदारों में से अन्य लोगों को अपना दोस्त मत बनाओ, कि ईमान वालों के रहस्यों को उन पर प्रकट करके और उनके साथ परामर्श करके उनके प्रति वफ़ादार बन जाओ; यदि वे एक अल्लाह पर ईमान लाने पर कुफ़्र को प्राथमिकता दें। तुममें से जो व्यक्ति उनके कुफ़्र पर बने रहने के बावजूद उनसे दोस्ती रखेगा और उनके प्रति स्नेह दिखाएगा, तो निश्चय उसने अल्लाह की अवज्ञा की, और अवज्ञा के कारण अपने आपको विनाश की जगह में डालकर खुद पर अत्याचार किया।
आयत 24
قُلْ إِن كَانَ ءَابَآؤُكُمْ وَأَبْنَآؤُكُمْ وَإِخْوَٰنُكُمْ وَأَزْوَٰجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَٰلٌ ٱقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَـٰرَةٌۭ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَـٰكِنُ تَرْضَوْنَهَآ أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَجِهَادٍۢ فِى سَبِيلِهِۦ فَتَرَبَّصُوا۟ حَتَّىٰ يَأْتِىَ ٱللَّهُ بِأَمْرِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْفَـٰسِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
كَانَ
हैं
ءَابَآؤُكُمْ
आबा ओ अजदाद तुम्हारे
وَأَبْنَآؤُكُمْ
और बेटे तुम्हारे
وَإِخْوَٰنُكُمْ
और भाई तुम्हारे
وَأَزْوَٰجُكُمْ
और बीवियाँ तुम्हारी
وَعَشِيرَتُكُمْ
और ख़ानदान तुम्हारे
وَأَمْوَٰلٌ
और माल
ٱقْتَرَفْتُمُوهَا
कमाया तुमने जिन्हें
وَتِجَـٰرَةٌۭ
और तिजारत
تَخْشَوْنَ
तुम डरते हो
كَسَادَهَا
उसके मन्दा होने से
وَمَسَـٰكِنُ
और घर
تَرْضَوْنَهَآ
तुम पसंद करते हो जिन्हें
أَحَبَّ
ज़्यादा महबूब हैं
إِلَيْكُم
तरफ़ तुम्हारे
مِّنَ
than
ٱللَّهِ
अल्लाह से
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल से
وَجِهَادٍۢ
और जिहाद से
فِى
in
سَبِيلِهِۦ
उसके रास्ते में
فَتَرَبَّصُوا۟
तो इन्तिज़ार करो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَأْتِىَ
ले आए
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِأَمْرِهِۦ ۗ
फ़ैसला अपना
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْفَـٰسِقِينَ
जो फ़ासिक़ हैं
कह दो, "यदि तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नि यों और तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले और माल, जो तुमने कमाए है और कारोबार जिसके मन्दा पड़ जाने का तुम्हें भय है और घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, तुम्हे अल्लाह और उसके रसूल और उसके मार्ग में जिहाद करने से अधिक प्रिय है तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला ले आए। औऱ अल्लाह अवज्ञाकारियों को मार्ग नहीं दिखाता।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : यदि (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियाँ, तुम्हारे रिश्तेदार, तुम्हारा धन जो तुमने कमाया है और तुम्हारा व्यापार जिसके प्रचलन को तुम पसंद करते हो और उसकी मंदी से डरते हो, तथा तुम्हारे घर जिनमें रहने का मोह रखते हो - यदि ये सब तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल से, तथा उसकी राह में जिहाद करने से अधिक प्रिय हैं, तो अल्लाह की ओर से आने वाली यातना की प्रतीक्षा करो। और अल्लाह अपनी आज्ञाकारिता से निकल जाने वालों को उस काम को करने का सामर्थ्य नहीं देता, जिससे वह प्रसन्न होता है।
आयत 25
لَقَدْ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ فِى مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍۢ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْـًۭٔا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ ٱلْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
نَصَرَكُمُ
मदद की तुम्हारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فِى
in
مَوَاطِنَ
जगहों में
كَثِيرَةٍۢ ۙ
बहुत सी
وَيَوْمَ
and (on the) day
حُنَيْنٍ ۙ
और हुनैन के दिन
إِذْ
जब
أَعْجَبَتْكُمْ
भली लगी तुम्हें
كَثْرَتُكُمْ
कसरत तुम्हारी
فَلَمْ
पस ना
تُغْنِ
उसने फ़ायदा दिया
عَنكُمْ
तुम्हें
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَضَاقَتْ
और तंग हो गई
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
بِمَا
बावजूद उसके जो
رَحُبَتْ
कुशादा थी
ثُمَّ
फिर
وَلَّيْتُم
फिर गए तुम
مُّدْبِرِينَ
पीठ फेर कर
अल्लाह बहुत-से अवसरों पर तुम्हारी सहायता कर चुका है और हुनैन (की लड़ाई) के दिन भी, जब तुम अपनी अधिकता पर फूल गए, तो वह तुम्हारे कुछ काम न आई और धरती अपनी विशालता के बावजूद तुम पर तंग हो गई। फिर तुम पीठ फेरकर भाग खड़े हुए
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह ने बहुत-से युद्धों में (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारी कम संख्या और कमज़ोर तैयारी के बावजूद तुम्हारे दुश्मन बहुदेववादियों के खिलाफ तुम्हारी मदद की, जब तुमने अल्लाह पर भरोसा किया और साधनों को अपनाया, तथा अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध नहीं हुए। क्योंकि अधिक संख्या, उनपर तुम्हारी जीत का कारण नहीं थी। तथा हुनैन के दिन भी तुम्हारी मदद की, जब तुम अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध हो गए और कहने लगे : आज हम कम संख्या के कारण नहीं हारेंगे। पर तुम्हारी अधिक संख्या तुम्हारे कुछ काम न आई, जिसपर तुम आत्ममुग्ध थे। चुनाँचे तुम्हारा दुश्मन तुमपर हावी हो गया और धरती अपने विस्तार के बावजूद तुमपर तंग हो गई, फिर तुम अपने शत्रुओं से हारकर भाग खड़े हुए।
आयत 26
ثُمَّ أَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودًۭا لَّمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلْكَـٰفِرِينَ
ثُمَّ
फिर
أَنزَلَ
उतारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَكِينَتَهُۥ
सकीनत अपनी
عَلَىٰ
on
رَسُولِهِۦ
अपने रसूल पर
وَعَلَى
and on
ٱلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिनों पर
وَأَنزَلَ
और उसने उतारे
جُنُودًۭا
ऐसे लश्कर
لَّمْ
नहीं
تَرَوْهَا
नहीं देखा तुमने उन्हें
وَعَذَّبَ
और उसने अज़ाब दिया
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۚ
कुफ़्र किया
وَذَٰلِكَ
और यही है
جَزَآءُ
बदला
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों का
अन्ततः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारी जिनको तुमने नहीं देखा। और इनकार करनेवालों को यातना दी, और यही इनकार करनेवालों का बदला है
तफ़्सीर:
फिर तुम्हारे अपने शत्रुओं से भाग जाने के बाद, अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमान वालों पर शांति उतारी, तो वे लड़ाई के लिए दृढ़ हो गए। तथा अल्लाह ने फ़रिश्ते उतारे जिन्हें तुमने नहीं देखा, और काफ़िरों को इस तरह दंडित किया कि वे मारे गए, बंदी बना लिए गए, (उनके) धनों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया और संतानों को पकड़ लिया गया। यह बदला जो इन लोगों को दिया गया, यही उन काफ़िरों का बदला है, जो अपने रसूल को झुठलाते हैं और उनके लाए हुए संदेश से मुँह मोड़ते हैं।
आयत 27
ثُمَّ يَتُوبُ ٱللَّهُ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
ثُمَّ
फिर
يَتُوبُ
मेहरबान होगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
عَلَىٰ
for
مَن
जिस पर
يَشَآءُ ۗ
वो चाहेगा
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
फिर इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा नसीब करता है। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
फिर जो कोई उस यातना के बाद अपने कुफ़्र और गुमराही से तौबा करेगा, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल करेगा। अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर बहुत दया करने वाला है। क्योंकि वह कुफ़्र और पाप करने के बाद उनकी तौबा क़बूल करता है।
आयत 28
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّمَا ٱلْمُشْرِكُونَ نَجَسٌۭ فَلَا يَقْرَبُوا۟ ٱلْمَسْجِدَ ٱلْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَـٰذَا ۚ وَإِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةًۭ فَسَوْفَ يُغْنِيكُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦٓ إِن شَآءَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمُشْرِكُونَ
मुशरिकीन
نَجَسٌۭ
नापाक हैं
فَلَا
तो ना
يَقْرَبُوا۟
वो क़रीब आऐं
ٱلْمَسْجِدَ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامَ
हराम के
بَعْدَ
बाद
عَامِهِمْ
this, their (final) year
هَـٰذَا ۚ
अपने इस साल के
وَإِنْ
और अगर
خِفْتُمْ
ख़ौफ़ हो तुम्हें
عَيْلَةًۭ
मुफ़लिसी का
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يُغْنِيكُمُ
ग़नी कर देगा तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِن
from
فَضْلِهِۦٓ
अपने फ़ज़ल से
إِن
अगर
شَآءَ ۚ
वो चाहे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
बहत हिकमत वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! मुशरिक तो बस अपवित्र ही है। अतः इस वर्ष के पश्चात वे मस्जिदे हराम के पास न आएँ। और यदि तुम्हें निर्धनता का भय हो तो आगे यदि अल्लाह चाहेगा तो तुम्हें अपने अनुग्रह से समृद्ध कर देगा। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! जान लो कि मुश्रिक (बहुदेववादी) अशुद्ध हैं। ऐसा उस कुफ़्र, अत्याचार, निंदनीय नैतिकता और बुरी आदतों के कारण है, जो उनके अंदर मौजूद है। अतः वे इस वर्ष अर्थात नौ हिजरी के बाद 'हरम-ए-मक्की' (मस्जिद-ए-हराम सहित) में प्रवेश न करें, भले ही वे हज्ज या उम्रा का इरादा रखते हों। और यदि (ऐ मोमिनो!) तुम उनके द्वारा लाए जाने वाले विभिन्न खाद्य पदार्थों और व्यापारों के बंद होने के कारण गरीबी से डरते हो, तो अल्लाह यदि चाहे, तो अपने अनुग्रह से तुम्हारे लिए पर्याप्त हो जाएगा। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारी वर्तमान स्थिति से अवगत है, तुम्हारे लिए जो प्रबंध करता है उसमें हिकमत वाला है।
आयत 29
قَـٰتِلُوا۟ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ ٱلْحَقِّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ حَتَّىٰ يُعْطُوا۟ ٱلْجِزْيَةَ عَن يَدٍۢ وَهُمْ صَـٰغِرُونَ
قَـٰتِلُوا۟
जंग करो
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
لَا
नहीं
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَلَا
और ना
بِٱلْيَوْمِ
in the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
आख़िरी दिन पर
وَلَا
और नहीं
يُحَرِّمُونَ
वो हराम समझते
مَا
जो
حَرَّمَ
हराम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥ
और उसके रसूल ने
وَلَا
और नहीं
يَدِينُونَ
वो दीन बनाते
دِينَ
दीने
ٱلْحَقِّ
हक़ को
مِنَ
from
ٱلَّذِينَ
उनमें से जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُعْطُوا۟
वो दे दें
ٱلْجِزْيَةَ
जिज़या
عَن
willingly
يَدٍۢ
हाथ से
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
صَـٰغِرُونَ
ज़लील हों
वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते है और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते है और न सत्यधर्म का अनुपालन करते है, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगे
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो!! उन यहूदी एवं ईसाई काफ़िरों से युद्ध करो, जो अल्लाह को एकमात्र पूज्य नहीं मानते जिसका कोई साझी नहीं, तथा क़ियामत के दिन पर विश्वास नहीं रखते, अल्लाह और उसके रसूल ने जो मृत मांस, सूअर का मांस, शराब और सूद इत्यादि उनपर हराम क़रार दिए हैं, उनसे नहीं बचते हैं, और अल्लाह की शरीयत का पालन नहीं करते हैं, यहाँ तक कि वे अपमानित होकर अपने हाथों से जिज़्या अदा करें।
आयत 30
وَقَالَتِ ٱلْيَهُودُ عُزَيْرٌ ٱبْنُ ٱللَّهِ وَقَالَتِ ٱلنَّصَـٰرَى ٱلْمَسِيحُ ٱبْنُ ٱللَّهِ ۖ ذَٰلِكَ قَوْلُهُم بِأَفْوَٰهِهِمْ ۖ يُضَـٰهِـُٔونَ قَوْلَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَبْلُ ۚ قَـٰتَلَهُمُ ٱللَّهُ ۚ أَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
وَقَالَتِ
और कहा
ٱلْيَهُودُ
यहूद ने
عُزَيْرٌ
उज़ैर
ٱبْنُ
बेटे हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَقَالَتِ
और कहा
ٱلنَّصَـٰرَى
नसारा ने
ٱلْمَسِيحُ
मसीह
ٱبْنُ
बेटे हैं
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
ذَٰلِكَ
ये
قَوْلُهُم
बात है उनकी
بِأَفْوَٰهِهِمْ ۖ
उनके मुँहों से
يُضَـٰهِـُٔونَ
वो नक़ल करते हैं
قَوْلَ
बात
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
قَـٰتَلَهُمُ
हलाक करे उन्हें
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
أَنَّىٰ
कहाँ से
يُؤْفَكُونَ
वो फेरे जाते हैं
यहूदी करते है, "उज़ैर अल्लाह का बेटा है।" और ईसाई कहते है, "मसीह अल्लाह का बेटा है।" ये उनकी अपने मुँह की बातें हैं। ये उन लोगों की-सी बातें कर रहे है जो इससे पहले इनकार कर चुके है। अल्लाह की मार इन पर! ये कहाँ से औधे हुए जा रहे हैं!
तफ़्सीर:
यहूदी एवं ईसाई दोनों बहुदेववादी हैं। क्योंकि यहूदियों ने उज़ैर अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा कहकर अल्लाह का साझी बनाया और ईसाइयों ने ईसा मसीह को अल्लाह का बेटा कहकर अल्लाह का साझी बनाया। उनकी यह गढ़ी हुई बात, बिना किसी सबूत के मात्र उनके मुँह से कही हुई बात है। उनकी यह बात दरअसल उनके पहले के उन बहुदेववादियों की बात जैसी है, जिन्होंने कहा था कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। अल्लाह उनके इस दावे से बहुत ऊँचा है। अल्लाह उन्हें नष्ट करे। वे स्पष्ट सत्य से असत्य की ओर कैसे फेर दिए जाते हैं?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनियावी माल-औलाद की मोहब्बत में हद से तजावुज़ की मज़म्मत है। यह हमें सिखाता है कि दुनियावी चीज़ों की मोहब्बत दीन और भलाई के काम में रुकावट नहीं बननी चाहिए।
आयत 31
ٱتَّخَذُوٓا۟ أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَـٰنَهُمْ أَرْبَابًۭا مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَٱلْمَسِيحَ ٱبْنَ مَرْيَمَ وَمَآ أُمِرُوٓا۟ إِلَّا لِيَعْبُدُوٓا۟ إِلَـٰهًۭا وَٰحِدًۭا ۖ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ عَمَّا يُشْرِكُونَ
ٱتَّخَذُوٓا۟
उन्होंने बना लिया
أَحْبَارَهُمْ
अपने उलमा को
وَرُهْبَـٰنَهُمْ
और अपने राहिबों को
أَرْبَابًۭا
रब (मुख़्तलिफ़)
مِّن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَٱلْمَسِيحَ
and the Messiah
ٱبْنَ
son
مَرْيَمَ
और मसीह इब्ने मरियम को
وَمَآ
हालाँकि नहीं
أُمِرُوٓا۟
वो हुक्म दिए गए
إِلَّا
मगर
لِيَعْبُدُوٓا۟
ये कि वो इबादत करें
إِلَـٰهًۭا
इलाह की
وَٰحِدًۭا ۖ
एक ही
لَّآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
उन्होंने अल्लाह से हटकर अपने धर्मज्ञाताओं और संसार-त्यागी संतों और मरयम के बेटे ईसा को अपने रब बना लिए है - हालाँकि उन्हें इसके सिवा और कोई आदेश नहीं दिया गया था कि अकेले इष्टि-पूज्य की वे बन्दगी करें, जिसक सिवा कोई और पूज्य नहीं। उसकी महिमा के प्रतिकूल है वह शिर्क जो ये लोग करते है। -
तफ़्सीर:
यहूदियों ने अपने विद्वानों और इसाइयों ने अपने पुजारियों को अल्लाह के अलावा रब बना लिए। वे उनके लिए उस चीज़ को हलाल करते हैं, जो अल्लाह ने उनपर हराम की है और उस चीज़ को उनपर हराम कर देते हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए हलाल की है। तथा ईसाइयों ने मरयम के पुत्र ईसा मसीह को अल्लाह के साथ पूज्य बना लिया। हालाँकि, अल्लाह ने यहूदियों के विद्वानों और ईसाइयों के पुजारियों को तथा उज़ैर और ईसा बिन मरयम को इसके सिवा कोई आदेश नहीं दिया था कि वे एक अल्लाह की इबादत करें और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न करें। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान केवल एक पूज्य है, उसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। अल्लाह इस बात से पवित्र है कि उसका कोई साझी हो, जैसा कि इन मुश्रिकों तथा अन्य लोगों का दावा है।
आयत 32
يُرِيدُونَ أَن يُطْفِـُٔوا۟ نُورَ ٱللَّهِ بِأَفْوَٰهِهِمْ وَيَأْبَى ٱللَّهُ إِلَّآ أَن يُتِمَّ نُورَهُۥ وَلَوْ كَرِهَ ٱلْكَـٰفِرُونَ
يُرِيدُونَ
वो चाहते हैं
أَن
कि
يُطْفِـُٔوا۟
वो बुझा दें
نُورَ
नूर
ٱللَّهِ
अल्लाह का
بِأَفْوَٰهِهِمْ
अपने मुँहों से
وَيَأْبَى
और इन्कार करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि वो इबादत करें
يُتِمَّ
वो पूरा करे
نُورَهُۥ
अपने नूर को
وَلَوْ
और अगरचे
كَرِهَ
नापसंद करें
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िर
चाहते है कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुँह से बुझा दें, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण किए बिना नहीं रहेगा, चाहे इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे
तफ़्सीर:
ये लोग और इनके अलावा अन्य काफ़िर समुदायों का उद्देश्य यह है कि अपने इन झूठे आरोपों और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए संदेश को झुठलाकर इस्लाम का सफाया कर दें और उसे गलत ठहरा दें, तथा अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके रसूल की लाई हुई शरीयत के सत्य होने के स्पष्ट तर्कों और खुले प्रमाणों को अमान्य कर दें। परंतु अल्लाह अपने धर्म को पूरा करके और अन्य धर्मों पर उसे ग़ालिब और सर्वोच्च करके ही रहेगा, भले ही काफ़िरों को उसका अपने धर्म को पूरा करना, उसे ग़ालिब और सर्वोच्च करना बुरा लगे। और जब अल्लाह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो अन्य लोगों का इरादा अमान्य हो जाता है।
आयत 33
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلْهُدَىٰ وَدِينِ ٱلْحَقِّ لِيُظْهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّينِ كُلِّهِۦ وَلَوْ كَرِهَ ٱلْمُشْرِكُونَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَرْسَلَ
भेजा
رَسُولَهُۥ
अपने रसूल को
بِٱلْهُدَىٰ
साथ हिदायत
وَدِينِ
और दीने
ٱلْحَقِّ
हक़ के
لِيُظْهِرَهُۥ
ताकि वो ग़ालिब कर दे उसे
عَلَى
over
ٱلدِّينِ
दीन पर
كُلِّهِۦ
सबके सब
وَلَوْ
और अगरचे
كَرِهَ
नापसंद करें
ٱلْمُشْرِكُونَ
मुशरिक
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा ताकि उसे तमाम दीन (धर्म) पर प्रभावी कर दे, चाहे मुशरिकों को बुरा लगे
तफ़्सीर:
अल्लाह ही ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को क़ुरआन के साथ, जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है, तथा सत्य धर्म इस्लाम के साथ भेजा, ताकि उसमें मौजूद तर्कों, प्रमाणों और आदेशों के साथ उसे अन्य धर्मों पर सर्वोच्च कर दे, भले ही बहुदेववादियों को यह बुरा लगे।
आयत 34
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلْأَحْبَارِ وَٱلرُّهْبَانِ لَيَأْكُلُونَ أَمْوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلْبَـٰطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۗ وَٱلَّذِينَ يَكْنِزُونَ ٱلذَّهَبَ وَٱلْفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍۢ
۞ يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلَّذِينَ
लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِنَّ
बेशक
كَثِيرًۭا
बहुत से
مِّنَ
of
ٱلْأَحْبَارِ
उलमा में से
وَٱلرُّهْبَانِ
और राहिबों में से
لَيَأْكُلُونَ
अलबत्ता खाते हैं
أَمْوَٰلَ
माल
ٱلنَّاسِ
लोगों के
بِٱلْبَـٰطِلِ
नाहक़
وَيَصُدُّونَ
और वो रोकते हैं
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के रास्ते से
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَكْنِزُونَ
जमा करते हैं
ٱلذَّهَبَ
सोना
وَٱلْفِضَّةَ
और चाँदी
وَلَا
और नहीं
يُنفِقُونَهَا
वो ख़र्च करते उसे
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
فَبَشِّرْهُم
पस ख़ुशख़बरी दे दीजिए उन्हें
بِعَذَابٍ
अज़ाब
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक की
ऐ ईमान लानेवालो! अवश्य ही बहुत-से धर्मज्ञाता और संसार-त्यागी संत ऐसे है जो लोगो को माल नाहक़ खाते है और अल्लाह के मार्ग से रोकते है, और जो लोग सोना और चाँदी एकत्र करके रखते है और उन्हें अल्लाह के मार्ग में ख़र्च नहीं करते, उन्हें दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत का अनुसरण करने वालो! बहुत-से यहूदी विद्वान और बहुत-से ईसाई उपासक, लोगों के धनों को बिना किसी वैध अधिकार के लेते हैं। चुनाँचे वे उन्हें रिश्वत और अन्य अवैध ढंग से लेते हैं, और वे लोगों को अल्लाह के धर्म में प्रवेश करने से रोकते हैं। तथा जो लोग सोना-चाँदी जमा करके रखते हैं और अपने ऊपर अनिवार्य उसकी ज़कात नहीं देते, तो (ऐ रसूल!) आप उन्हें क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना की सूचना दे दें, जिससे उन्हें बहुत तकलीफ़ होगी।
आयत 35
يَوْمَ يُحْمَىٰ عَلَيْهَا فِى نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكْوَىٰ بِهَا جِبَاهُهُمْ وَجُنُوبُهُمْ وَظُهُورُهُمْ ۖ هَـٰذَا مَا كَنَزْتُمْ لِأَنفُسِكُمْ فَذُوقُوا۟ مَا كُنتُمْ تَكْنِزُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
يُحْمَىٰ
तपाया जाएगा
عَلَيْهَا
उस (माल) को
فِى
in
نَارِ
आग में
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
فَتُكْوَىٰ
फिर दाग़ी जाऐंगी
بِهَا
साथ उसके
جِبَاهُهُمْ
पेशानियाँ उनकी
وَجُنُوبُهُمْ
और पहलू उनके
وَظُهُورُهُمْ ۖ
और पुश्तें उनकी
هَـٰذَا
ये है
مَا
जो
كَنَزْتُمْ
जमा किया तुमने
لِأَنفُسِكُمْ
अपने नफ़्सों के लिए
فَذُوقُوا۟
पस मज़ा चखो
مَا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْنِزُونَ
तुम जमा करते
जिस दिन उनको जहन्नम की आग में तपाया जाएगा फिर उससे उनके ललाटो और उनके पहलुओ और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा (और कहा जाएगा), "यहीं है जो तुमने अपने लिए संचय किया, तो जो कुछ तुम संचित करते रहे हो, उसका मज़ा चखो!"
तफ़्सीर:
जो कुछ उन्होंने इकट्ठा किया और उसका हक़ रोक लिया, उसे क़ियामत के दिन जहन्नम की आग में तपाया जाएगा। जब वह बहुत गर्म हो जाएगा, तो उसे उनके माथों, पहलुओं और पीठों पर रखा जाएगा, और उन्हें फटकार के रूप में कहा जाएगा : ये हैं तुम्हारे धन, जो तुमने एकत्र किए थे लेकिन उनमें अनिवार्य अधिकारों का भुगतान नहीं किए थे। तो अब, जो कुछ तुम इकट्ठा कर रहे थे और उसके अधिकारों का भुगतान नहीं कर रहे थे, उसका कष्ट और उसके परिणाम का स्वाद चखो।
आयत 36
إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثْنَا عَشَرَ شَهْرًۭا فِى كِتَـٰبِ ٱللَّهِ يَوْمَ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ مِنْهَآ أَرْبَعَةٌ حُرُمٌۭ ۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلْقَيِّمُ ۚ فَلَا تَظْلِمُوا۟ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمْ ۚ وَقَـٰتِلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ كَآفَّةًۭ كَمَا يُقَـٰتِلُونَكُمْ كَآفَّةًۭ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُتَّقِينَ
إِنَّ
बेशक
عِدَّةَ
गिनती
ٱلشُّهُورِ
महीनों की
عِندَ
with
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
ٱثْنَا
(is) twelve
عَشَرَ
बारह
شَهْرًۭا
महीने है
فِى
in
كِتَـٰبِ
(the) ordinance
ٱللَّهِ
अल्लाह की किताब में
يَوْمَ
जिस दिन
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों को
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
مِنْهَآ
उनमें से
أَرْبَعَةٌ
चार
حُرُمٌۭ ۚ
हुरमत वाले हैं
ذَٰلِكَ
ये है
ٱلدِّينُ
दीन
ٱلْقَيِّمُ ۚ
दुरुस्त
فَلَا
पस ना
تَظْلِمُوا۟
तुम ज़ुल्म करो
فِيهِنَّ
इनमें
أَنفُسَكُمْ ۚ
अपने नफ़्सों पर
وَقَـٰتِلُوا۟
और जंग करो
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन से
كَآفَّةًۭ
इकट्ठे
كَمَا
जैसा कि
يُقَـٰتِلُونَكُمْ
वो जंग करते हैं तुमसे
كَآفَّةًۭ ۚ
इकट्ठे
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
निस्संदेह महीनों की संख्या - अल्लाह के अध्यादेश में उस दिन से जब उसने आकाशों और धरती को पैदा किया - अल्लाह की दृष्टि में बारह महीने है। उनमें चार आदर के है, यही सीधा दीन (धर्म) है। अतः तुम उन (महीनों) में अपने ऊपर अत्याचार न करो। और मुशरिकों से तुम सबके सब लड़ो, जिस प्रकार वे सब मिलकर तुमसे लड़ते है। और जान लो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह के निर्णय और फैसले के अनुसार वर्ष के महीनों की संख्या बारह है, जिसे उसने आकाशों और धरती की रचना के समय ही लौह़-ए-मह़फूज़ में लिख दिया था। इन बारह महीनों में से चार महीनों में अल्लाह ने लड़ने से मना किया है। इनमें से तीन महीने तगातार हैं : 'ज़ुलक़ादा, ज़ुलहिज्जा और मुहर्रम' और एक अकेला, जो कि 'रजब' है। यह जो वर्ष के महीनों की संख्या और उनमें से चार के हुरमत वाले होने का उल्लेख किया गया है, वही सीधा धर्म है। अतः इन हुरमत वाले महीनों के अंदर युद्ध करके और उनकी पवित्रता को भंग करके अपने प्राणों पर अत्याचार न करो। तथा बहुदेववादियों से सब मिलकर युद्ध करो, जैसे वे मिलकर तुमसे युद्ध करते हैं। और यह जान लो कि अल्लाह अपनी मदद और सुदृढ़ीकरण के द्वारा उन लोगों के साथ है, जो उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरते हैं। और जिसके साथ अल्लाह हो, उसे कोई पराजित नही कर सकता।
आयत 37
إِنَّمَا ٱلنَّسِىٓءُ زِيَادَةٌۭ فِى ٱلْكُفْرِ ۖ يُضَلُّ بِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُحِلُّونَهُۥ عَامًۭا وَيُحَرِّمُونَهُۥ عَامًۭا لِّيُوَاطِـُٔوا۟ عِدَّةَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ فَيُحِلُّوا۟ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ ۚ زُيِّنَ لَهُمْ سُوٓءُ أَعْمَـٰلِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلنَّسِىٓءُ
महीनों को आगे पीछे करना
زِيَادَةٌۭ
ज़्यादती है
فِى
in
ٱلْكُفْرِ ۖ
कुफ़्र में
يُضَلُّ
गुमराह किए जाते हैं
بِهِ
साथ उसके
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يُحِلُّونَهُۥ
वो हलाल करते हैं उसे
عَامًۭا
एक साल
وَيُحَرِّمُونَهُۥ
और हराम करते हैं उसे
عَامًۭا
एक साल
لِّيُوَاطِـُٔوا۟
ताकि वो दुरुस्त कर लें
عِدَّةَ
गिनती
مَا
उनकी जो
حَرَّمَ
हराम ठहराए
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فَيُحِلُّوا۟
पस वो हलाल करते हैं
مَا
जो
حَرَّمَ
हराम किया
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिए गए
لَهُمْ
उनके लिए
سُوٓءُ
बुरे
أَعْمَـٰلِهِمْ ۗ
आमाल उनके
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
(आदर के महीनों का) हटाना तो बस कुफ़्र में एक बृद्धि है, जिससे इनकार करनेवाले गुमराही में पड़ते है। किसी वर्ष वे उसे हलाल (वैध) ठहरा लेते है और किसी वर्ष उसको हराम ठहरा लेते है, ताकि अल्लाह के आदृत (महीनों) की संख्या पूरी कर लें, और इस प्रकार अल्लाह के हराम किए हुए को वैध ठहरा ले। उनके अपने बुरे कर्म उनके लिए सुहाने हो गए है और अल्लाह इनकार करनेवाले लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
किसी हुरमत वाले महीने की पवित्रता को एक ग़ैर-हुरमत वाले महीने तक विलंब करना और इसे उसके स्थान पर रखना (जैसा कि पूर्व-इस्लामिक युग में अरब करते थे) उनके अल्लाह के साथ कुफ़्र पर कुफ़्र में वृद्धि है; क्योंकि उन्होंने हुरमत वाले महीनों के बारे में अल्लाह के आदेश का इनकार किया है। शैतान इसके द्वारा उन लोगों को गुमराह करता है, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया जब उसने उनके लिए यह बुरा तरीक़ा जारी किया। वे एक साल हुरमत वाले महीने को किसी हलाल महीने से बदलकर हलाल कर लेते हैं और एक साल उसकी हुरमत को बाक़ी रहने देते हैं, ताकि वे उन महीनों की संख्या के अनुरूप हों जिन्हें अल्लाह ने हुरमत वाला बनाया है, भले ही वे उनकी यथार्था के विपरीत हों। चुनाँचे वे किसी महीने को हलाल बनाते हैं, तो उसके स्थान पर एक महीने को हराम घोषित कर देते हैं। इस तरह वे अल्लाह के हराम किए हुए हुरमत वाले महीनों को हलाल कर लेते हैं और उसके आदेश का उल्लंघन करते हैं। दरअसल शैतान ने उनके लिए बुरे कामों को अच्छा बना दिया और वे उन्हें करने लगे। जिनमें से एक महीनों को आगे-पीछे करना भी है। और अल्लाह उन काफ़िरों को हिदायत नहीं देता, जो अपने कुफ़्र पर अडिग रहते हैं।
आयत 38
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَا لَكُمْ إِذَا قِيلَ لَكُمُ ٱنفِرُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱثَّاقَلْتُمْ إِلَى ٱلْأَرْضِ ۚ أَرَضِيتُم بِٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا مِنَ ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ فَمَا مَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ إِلَّا قَلِيلٌ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
مَا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
إِذَا
जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَكُمُ
तुमसे
ٱنفِرُوا۟
निकलो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
ٱثَّاقَلْتُمْ
बोझल हो जाते हो तुम
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ ۚ
तरफ़ ज़मीन के
أَرَضِيتُم
क्या राज़ी हो गए तुम
بِٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी पर
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
مِنَ
(rather) than
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
आख़िरत के (मुक़ाबले में)
فَمَا
तो नहीं
مَتَـٰعُ
सामान
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
فِى
in (comparison to)
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत के (मुक़ाबले में)
إِلَّا
मगर
قَلِيلٌ
बहुत थोड़ा
ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के मार्ग में निकलो" तो तुम धरती पर ढहे जाते हो? क्या तुम आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन पर राज़ी हो गए? सांसारिक जीवन की सुख-सामग्री तो आख़िरत के हिसाब में है कुछ थोड़ी ही!
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुम्हें अपने दुश्मन से लड़ने के लिए अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए बुलाया जाता है, तो तुम धीमे हो जाते हो और अपने घरों में स्थिरता को तरजीह देते हो?! क्या तुम आख़िरत (परलोक) के शाश्वत आनंद (सुख) के बदले, जो अल्लाह ने अपने मार्ग में जिहाद करने वालों के लिए तैयार कर रखा है, इस दुनिया के क्षणभंगुर जीवन के सुखों और समाप्त हो जाने वाले आनंदों से संतुष्ट हो गए हो?! तो (जान लो कि) आख़िरत के पक्ष में इस सांसारिक जीवन का आनंद बहुत तुच्छ है। फिर एक समझदार व्यक्ति नश्वर को शाश्वत पर, और महान पर तुच्छ को कैसे चुन सकता है?!
आयत 39
إِلَّا تَنفِرُوا۟ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا وَيَسْتَبْدِلْ قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّوهُ شَيْـًۭٔا ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
إِلَّا
अगर नहीं
تَنفِرُوا۟
तुम निकलोगे
يُعَذِّبْكُمْ
वो अज़ाब देगा तुम्हें
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
وَيَسْتَبْدِلْ
और वो बदल देगा
قَوْمًا
कोई क़ौम
غَيْرَكُمْ
तुम्हारे अलावा
وَلَا
और नहीं
تَضُرُّوهُ
तुम ज़रर पहुँचा सकते उसे
شَيْـًۭٔا ۗ
कुछ भी
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
यदि तुम निकालोगे तो वह तुम्हें दुखद यातना देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे गिरोह को ले आएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। और अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है
तफ़्सीर:
यदि (ऐ मोमिनो!) तुम अपने दुश्मन से लड़ने के लिए अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने के लिए नहीं निकलोगे, तो अल्लाह तुम्हें उत्पीड़न, अपमान और अन्य चीजों से दंडित करेगा, तथा तुम्हारे स्थान पर ऐसे लोगों को ले आएगा, जो अल्लाह के आज्ञाकारी होंगे, जब उन्हें जिहाद के लिए निकलने को कहा जाएगा, तो निकल पड़ेंगे। और तुम उसके आदेश की अवहेलना करके उसे कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकोगे। क्योंकि वह तुमसे बेनयाज़ है और तुम उसके मोहताज हो। और अल्लाह हर चीज़ करने में समर्थ है। कोई चीज़ उसे विवश नहीं कर सकती। अतः वह तुम्हारे बिना अपने धर्म और अपने नबी का समर्थन करने में सक्षम है।
आयत 40
إِلَّا تَنصُرُوهُ فَقَدْ نَصَرَهُ ٱللَّهُ إِذْ أَخْرَجَهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ثَانِىَ ٱثْنَيْنِ إِذْ هُمَا فِى ٱلْغَارِ إِذْ يَقُولُ لِصَـٰحِبِهِۦ لَا تَحْزَنْ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَنَا ۖ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَيْهِ وَأَيَّدَهُۥ بِجُنُودٍۢ لَّمْ تَرَوْهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلسُّفْلَىٰ ۗ وَكَلِمَةُ ٱللَّهِ هِىَ ٱلْعُلْيَا ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
إِلَّا
अगर नहीं
تَنصُرُوهُ
तुम मदद करोगे उसकी
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
نَصَرَهُ
मदद की उसकी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِذْ
जब
أَخْرَجَهُ
निकाला उसे
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ثَانِىَ
वो दूसरा (था)
ٱثْنَيْنِ
दो में
إِذْ
when
هُمَا
जब वो दोनों
فِى
(were) in
ٱلْغَارِ
ग़ार में थे
إِذْ
जब
يَقُولُ
वो कह रहा था
لِصَـٰحِبِهِۦ
अपने साथी से
لَا
(Do) not
تَحْزَنْ
ना तुम ग़म करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَنَا ۖ
हमारे साथ है
فَأَنزَلَ
तो उतारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَكِينَتَهُۥ
सकीनत अपनी
عَلَيْهِ
उस पर
وَأَيَّدَهُۥ
और उसने ताईद की उसकी
بِجُنُودٍۢ
ऐसे लश्करों से
لَّمْ
नहीं
تَرَوْهَا
तुमने देखा उन्हें
وَجَعَلَ
और कर दिया
كَلِمَةَ
बात को
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ٱلسُّفْلَىٰ ۗ
पस्त
وَكَلِمَةُ
और बात
ٱللَّهِ
अल्लाह की
هِىَ
वो ही
ٱلْعُلْيَا ۗ
बुलन्द है
وَٱللَّهُ
और है अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمٌ
खूब हिकमत वाला
यदि तुम उसकी सहायता न भी करो तो अल्लाह उसकी सहायता उस समय कर चुका है जब इनकार करनेवालों ने उसे इस स्थिति में निकाला कि वह केवल दो में का दूसरा था, जब वे दोनों गुफ़ा में थे। जबकि वह अपने साथी से कह रहा था, "शोकाकुल न हो। अवश्यमेव अल्लाह हमारे साथ है।" फिर अल्लाह ने उसपर अपनी ओर से सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और उसकी सहायता ऐसी सेनाओं से की जिन्हें तुम देख न सके और इनकार करनेवालों का बोल नीचा कर दिया, बोल तो अल्लाह ही का ऊँचा रहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशील, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
यदि (ऐ मोमिनो!) तुम रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहायता नहीं करते, और अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए उसके आह्वान का जवाब नहीं देते, तो अल्लाह ने तुम्हारे बिना ही उनकी सहायता उस समय की है, जब बहुदेववादियों ने उन्हें (मक्का से) निकाल दिया था। केवल वह और अबू बक्र थे। उनका कोई तीसरा नहीं था। जब वे दोनों 'साैर' नामी गुफा में उन काफ़िरों से छिपे हुए थे, जो उन दोनों को तलाश कर रहे थे। जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथी अबू बक्र सिद्दीक़ से, उन्हें मुश्रिकों द्वारा उनके पकड़े जाने का डर होने पर, कह रहे थे : दुखी मत हो। निःसंदेह अल्लाह अपने समर्थन और मदद के साथ, हमारे साथ है। तो अल्लाह ने अपने रसूल के दिल पर शांति उतार दी और आपपर ऐसे सैनिक उतारे जिन्हें तुम नहीं देखते, और वे फ़रिश्ते थे जो आपका समर्थन कर रहे थे। तथा उसने काफ़िरों की बात नीची कर दी, और अल्लाह की बात ही सर्वोच्च है जब उसने इस्लाम को ऊँचा कर दिया। और अल्लाह अपने अस्तित्व, अपनी प्रबलता और राज्य में प्रभुत्वशाली है, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, अपने प्रबंधन, नियति और विधान में पूर्ण हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सूद और बेवजह माल जमा करने की मज़म्मत है। यह सबक हमें सिखाता है कि सिर्फ माल जमा करना मकसद-ए-हयात नहीं होना चाहिए, इसे सही जगह खर्च करना ज़रूरी है।
आयत 41
ٱنفِرُوا۟ خِفَافًۭا وَثِقَالًۭا وَجَـٰهِدُوا۟ بِأَمْوَٰلِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
ٱنفِرُوا۟
निकलो
خِفَافًۭا
हल्के
وَثِقَالًۭا
और बोझल
وَجَـٰهِدُوا۟
और जिहाद करो
بِأَمْوَٰلِكُمْ
साथ अपने मालों
وَأَنفُسِكُمْ
और अपने नफ़्सों के
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते में
ذَٰلِكُمْ
ये बात
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
हलके और बोझिल निकल पड़ो और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करो! यही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) तुम कठिनाई और आराम में, युवा और बूढ़े अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए निकल पड़ो और अपने धनों और अपनी जानों के साथ जिहाद करो। क्योंकि यह निकलना और धनों और जानों के साथ जिहाद करना, दुनिया एवं आख़िरत के जीवन में, घर में बैठे रहने और जान एवं माल की सुरक्षा से चिपके रहने से ज़्यादा फायदेमंद है। यदि तुम इसका ज्ञान रखते हो, तो इसके लालायित बनो।
आयत 42
لَوْ كَانَ عَرَضًۭا قَرِيبًۭا وَسَفَرًۭا قَاصِدًۭا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَـٰكِنۢ بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ ٱلشُّقَّةُ ۚ وَسَيَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْ يُهْلِكُونَ أَنفُسَهُمْ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
لَوْ
अगर
كَانَ
होता
عَرَضًۭا
सामान
قَرِيبًۭا
क़रीब का
وَسَفَرًۭا
और सफ़र
قَاصِدًۭا
दर्मियाना
لَّٱتَّبَعُوكَ
अलबत्ता वो पैरवी करते आपकी
وَلَـٰكِنۢ
और लेकिन
بَعُدَتْ
दूर हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلشُّقَّةُ ۚ
मुसाफ़त
وَسَيَحْلِفُونَ
और अनक़रीब वो क़समें खाऐंगे
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
لَوِ
अगर
ٱسْتَطَعْنَا
इस्तिताअत रखते हम
لَخَرَجْنَا
अलबत्ता निकलते हम
مَعَكُمْ
साथ तुम्हारे
يُهْلِكُونَ
वो हलाक कर रहे हैं
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
यदि निकट (भविष्य में) ही कुछ मिलनेवाला होता और सफ़र भी हलका होता तो वे अवश्य तुम्हारे पीछे चल पड़ते, किन्तु मार्ग की दूरी उन्हें कठिन और बहुत दीर्घ प्रतीत हुई। अब वे अल्लाह की क़समें खाएँगे कि, "यदि हममें इसकी सामर्थ्य होती तो हम अवश्य तुम्हारे साथ निकलते।" वे अपने आपको तबाही में डाल रहे है और अल्लाह भली-भाँति जानता है कि निश्चय ही वे झूठे है
तफ़्सीर:
यदि आप जिसकी ओर उन मुनाफ़िक़ों को बुला रहे थे, जिन्होंने आपसे पीछे रहने की अनुमति माँगी थी, आसानी से प्राप्त होने वाला ग़नीमत का धन और बिना कठिनाई का सफ़र होता, तो वे (ऐ नबी!) आपका अवश्य अनुसरण करते। लेकिन वह फ़ासला जो आपने उनको शत्रु के पास जाने के लिए तय करने को कहा था, उनसे बहुत दूर था, सो वे पीछे रह गए। और जब आप (युद्ध से) उनके पास लौटेंगे, तो ये पीछे रहने की अनुमति माँगने वाले मुनाफ़िक़ अल्लाह की क़समें खाकर कहेंगे : अगर हम आपके साथ जिहाद में निकलने की ताक़त रखते, तो हम ज़रूर निकलते। वे जिहाद से पीछे रहकर और इन झूठी क़समों के कारण, खुद को अल्लाह की सज़ा के लिए पेश करके, अपनी तबाही मोल ले रहे हैं। जबकि अल्लाह जानता है कि निश्चय वे अपने दावे और अपनी इन क़समों में झूठे हैं।
आयत 43
عَفَا ٱللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ وَتَعْلَمَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
عَفَا
माफ़ कर दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَنكَ
आपको
لِمَ
क्यों
أَذِنتَ
इजाज़त दी आपने
لَهُمْ
उन्हें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَتَبَيَّنَ
ज़ाहिर हो जाते
لَكَ
आपके लिए
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
صَدَقُوا۟
सच कहा
وَتَعْلَمَ
और आप जान लेते
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों को
अल्लाह ने तुम्हे क्षमा कर दिया! तुमने उन्हें क्यों अनुमति दे दी, यहाँ तक कि जो लोग सच्चे है वे तुम्हारे सामने प्रकट हो जाते और झूठों को भी तुम जान लेते?
तफ़्सीर:
अल्लाह ने (ऐ रसूल!) आपके उन्हें पीछे रहने की अनुमति देने के इज्तिहाद (निर्णय) को क्षमा कर दिया। आपने उन्हें इसकी अनुमति क्यों दी? यहाँ तक कि आपके लिए यह स्पष्ट हो जाता कि कौन लोग अपने बहाने में सच्चे हैं और कौन झूठे। ताकि आप उनमें से सच्चे लोगों को अनुमति देते, न कि झूठे लोगों को।
आयत 44
لَا يَسْتَـْٔذِنُكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ أَن يُجَـٰهِدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلْمُتَّقِينَ
لَا
(Would) not ask your permission
يَسْتَـْٔذِنُكَ
नहीं इजाज़त माँगते आपसे
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान लाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
أَن
कि
يُجَـٰهِدُوا۟
वो जिहाद करें
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों के
وَأَنفُسِهِمْ ۗ
और अपनी जानों के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते है, वे तुमसे कभी यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करने से माफ़ रखा जाए। और अल्लाह डर रखनेवालों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जो लोग अल्लाह और क़ियामत के दिन पर सच्चा ईमान रखते हैं, उनका यह काम नहीं है कि अपने धनों और अपनी जानों के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने से पीछे रहने की आपसे अनुमति माँगें, बल्कि उनका हाल यह होना चाहिए कि जब उनसे निकलने को कहा जाए, तो निकल पड़ें और अपने धनों और अपनी जानों के साथ जिहाद करें। और अल्लाह अपने उन डर रखने वाले बंदों को जानता है, जो आपसे उसी समय अनुमति माँगते हैं, जब उनके साथ कोई ऐसी मजबूरी हो, जो उन्हें आपके साथ निकलने से रोकती हो।
आयत 45
إِنَّمَا يَسْتَـْٔذِنُكَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَٱرْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِى رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ
إِنَّمَا
बेशक
يَسْتَـْٔذِنُكَ
इजाज़त माँगते हैं आपसे
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नही वो ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَٱرْتَابَتْ
और शक करते हैं
قُلُوبُهُمْ
दिल उनके
فَهُمْ
पस वो
فِى
in
رَيْبِهِمْ
अपने शक में
يَتَرَدَّدُونَ
वो मुतरदिद/हैरान हैं
तुमसे छुट्टी तो बस वही लोग माँगते है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान नहीं रखते, और जिनके दिल सन्देह में पड़े है, तो वे अपने सन्देह ही में डाँवाडोल हो रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जो लोग आपसे अल्लाह की राह में जिहाद से पीछे रहने की अनुमति माँग रहे हैं, वे मुनाफ़िक़ लोग हैं, जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न क़ियामत के दिन पर ईमान रखते हैं, तथा उनके दिलों में अल्लाह के धर्म के बारे में शक है। अतः वे अपने संदेह में भ्रमित भटक रहे हैं, सत्य का मार्ग नहीं पाते हैं।
आयत 46
۞ وَلَوْ أَرَادُوا۟ ٱلْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا۟ لَهُۥ عُدَّةًۭ وَلَـٰكِن كَرِهَ ٱللَّهُ ٱنۢبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ ٱقْعُدُوا۟ مَعَ ٱلْقَـٰعِدِينَ
۞ وَلَوْ
और अगर
أَرَادُوا۟
वो इरादा करते
ٱلْخُرُوجَ
निकलने का
لَأَعَدُّوا۟
ज़रूर वो तैयार करते
لَهُۥ
उसके लिए
عُدَّةًۭ
साज़ो सामान
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَرِهَ
नापसंद किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱنۢبِعَاثَهُمْ
उठना उनका
فَثَبَّطَهُمْ
तो उसने रोक दिया उन्हें
وَقِيلَ
और कहा
ٱقْعُدُوا۟
बैठ जाओ
مَعَ
with
ٱلْقَـٰعِدِينَ
साथ बैठने वालों के
यदि वे निकलने का इरादा करते तो इसके लिए कुछ सामग्री जुटाते, किन्तु अल्लाह ने उनके उठने को नापसन्द किया तो उसने उन्हें रोक दिया। उनके कह दिया गया, "बैठनेवालों के साथ बैठ रहो।"
तफ़्सीर:
यदि वे अपने इस दावे में सच्चे होते कि वे आपके साथ अल्लाह की राह में जिहाद के लिए निकलना चाहते थे, तो वे उपकरण तैयार करके अवश्य उसके लिए तैयारी करते। परंतु अल्लाह ने उनका आपके साथ निकलना पसंद नहीं किया। इसलिए उनके लिए निकलना भारी बना दिया यहाँ तक कि उन्होंने अपने घरों में बैठने को तरजीह दी।
आयत 47
لَوْ خَرَجُوا۟ فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًۭا وَلَأَوْضَعُوا۟ خِلَـٰلَكُمْ يَبْغُونَكُمُ ٱلْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّـٰعُونَ لَهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ
لَوْ
अगर
خَرَجُوا۟
वो निकलते
فِيكُم
तुम में
مَّا
ना
زَادُوكُمْ
वो ज़्यादा करते तुम्हें
إِلَّا
मगर
خَبَالًۭا
ख़राबी में
وَلَأَوْضَعُوا۟
और अलबत्ता वो (घोड़े) दौड़ाते
خِلَـٰلَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
يَبْغُونَكُمُ
वो तलाश में रहते तुम में
ٱلْفِتْنَةَ
फ़ितने की
وَفِيكُمْ
और तुम में
سَمَّـٰعُونَ
सुनने वाले (जासूस) हैं
لَهُمْ ۗ
उनके लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
यदि वे तुम्हारे साथ निकलते भी तो तुम्हारे अन्दर ख़राबी के सिवा किसी और चीज़ की अभिवृद्धि नहीं करते। और वे तुम्हारे बीच उपद्रव मचाने के लिए दौड़-धूप करते और तुममें उनकी सुननेवाले है। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
इन मुनाफ़िक़ों का तुम्हारे साथ न निकलना ही अचछा था। यदि वे तुम्हरे साथ निकलते, तो तुम्हारी हिम्मत तोड़कर और संदेह पैदा करके, तुम्हारे अंदर बिगाड़ के सिवा कुछ न बढ़ाते, और तुम्हें विभाजित करने के लिए तुम्हारे बीच द्वेष की बातें फैलाते। और (ऐ नबी!) तुम्हारे अंदर ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जो उनके फैलाए हुए झूठ को सुनते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और फैलाते हैं। जिसके कारण तुम्हारे बीच मतभेद पैदा होता है। और अल्लाह उन अत्याचारी मुनाफ़िकों को भली-भाँति जानता है, जो ईमान वालों के बीच साज़िशें करते हैं और संदेह फैलाते हैं।
आयत 48
لَقَدِ ٱبْتَغَوُا۟ ٱلْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا۟ لَكَ ٱلْأُمُورَ حَتَّىٰ جَآءَ ٱلْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ ٱللَّهِ وَهُمْ كَـٰرِهُونَ
لَقَدِ
अलबत्ता तहक़ीक़
ٱبْتَغَوُا۟
उन्होंने (डालना) चाहा
ٱلْفِتْنَةَ
फ़ितना
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
وَقَلَّبُوا۟
और उलट-पुलट किए
لَكَ
आपके लिए
ٱلْأُمُورَ
मामलात
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
جَآءَ
आ गया
ٱلْحَقُّ
हक़
وَظَهَرَ
और ज़ाहिर हो गया
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
وَهُمْ
जबकि वो
كَـٰرِهُونَ
नापसंद करने वाले थे
उन्होंने तो इससे पहले भी उपद्रव मचाना चाहा था और वे तुम्हारे विरुद्ध घटनाओं और मामलों के उलटने-पलटने में लगे रहे, यहाँ तक कि हक़ आ गया और अल्लाह को आदेश प्रकट होकर रहा, यद्यपि उन्हें अप्रिय ही लगता रहा
तफ़्सीर:
ये मुनाफ़िक़ लोग तबूक के युद्ध से पहले भी मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करके और उनकी एकता को भंग करके उपद्रव मचाने का प्रयास कर चुके हैं, तथा तरकीबों की व्यवस्था करके (ऐ रसूल!) आपके लिए मामलों में विविधता लाते रहे हैं और उलट-फेर करते रहे हैं, शायद उनकी चालें जिहाद करने के आपके संकल्प को प्रभावित कर दें, यहाँ तक कि आपके लिए अल्लाह की मदद और उसका समर्थन आ गया और अल्लाह ने अपने दीन को प्रभुत्व प्रदान किया और अपने दुश्मनों को वशीभूत कर दिया। जबकि वे इसे नापसंद करते थे; क्योंकि वे सत्य पर असत्य की जीत चाहते थे।
आयत 49
وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ٱئْذَن لِّى وَلَا تَفْتِنِّىٓ ۚ أَلَا فِى ٱلْفِتْنَةِ سَقَطُوا۟ ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَقُولُ
कहता है
ٱئْذَن
इजाज़त दीजिए
لِّى
मुझे
وَلَا
और ना
تَفْتِنِّىٓ ۚ
आप फ़ितने में डालिए मुझे
أَلَا
ख़बरदार
فِى
in
ٱلْفِتْنَةِ
फ़ितने में तो
سَقَطُوا۟ ۗ
वो पड़ चुके हैं
وَإِنَّ
और बेशक
جَهَنَّمَ
जहन्नम
لَمُحِيطَةٌۢ
अलबत्ता घेरने वाली है
بِٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
उनमें कोई है, जो कहता है, "मुझे इजाज़त दे दीजिए, मुझे फ़ितने में न डालिए।" जान लो कि वे फ़ितने में तो पड़ ही चुके है और निश्चय ही जहन्नम भी इनकार करनेवालों को घेर रही है
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ों में से कुछ ऐसे हैं, जो गढ़े हुए बहाने पेश करते हैं और कहते हैं : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे जिहाद से पीछे रहने की अनुमति प्रदान करें और मुझे अपने साथ निकलने पर मजबूर न करें, कहीं ऐसा न हो कि मैं रूमी शत्रुओं की स्त्रियों को देखकर किसी गुनाह में पड़ जाऊँ। सुन लो! वास्तव में, वे जो दावा करते हैं उससे कहीं अधिक बड़े फ़ितने में पड़ चुके हैं, जो कि निफ़ाक़ का फ़ितना और युद्ध से पीछे रहने का फ़ितना है। निःसंदेह क़ियामत के दिन जहन्नम काफ़िरों को अवश्य घेरने वाली है। उनमें से कोई भी उससे बच नहीं सकता और न ही वे उससे भागने की कोई जगह पाएँगे।
आयत 50
إِن تُصِبْكَ حَسَنَةٌۭ تَسُؤْهُمْ ۖ وَإِن تُصِبْكَ مُصِيبَةٌۭ يَقُولُوا۟ قَدْ أَخَذْنَآ أَمْرَنَا مِن قَبْلُ وَيَتَوَلَّوا۟ وَّهُمْ فَرِحُونَ
إِن
अगर
تُصِبْكَ
पहुँचती है आपको
حَسَنَةٌۭ
कोई भलाई
تَسُؤْهُمْ ۖ
वो बुरी लगती है उन्हें
وَإِن
और अगर
تُصِبْكَ
पहुँचती है आपको
مُصِيبَةٌۭ
कोई मुसीबत
يَقُولُوا۟
वो कहते हैं
قَدْ
तहक़ीक़
أَخَذْنَآ
संभाल लिया हमने
أَمْرَنَا
मामला अपना
مِن
before
قَبْلُ
पहले से
وَيَتَوَلَّوا۟
और वो मुँह मोड़ जाते हैं
وَّهُمْ
इस हाल में कि वो
فَرِحُونَ
ख़ुश होने वाले हैं
यदि तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है, तो उन्हें बुरा लगता है औऱ यदि तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे कहते है, "हमने तो अपना काम पहले ही सँभाल लिया था।" और वे ख़ुश होते हुए पलटते है
तफ़्सीर:
यदि (ऐ अल्लाह के रसूल!) आपको विजय या ग़नीमत के धन के रूप में अल्लाह की ओर से कोई आनंदकर नेमत प्राप्त होती है, तो वे उसे नापसंद करते हैं और उसके लिए शोक मनाते हैं। और यदि कठिनाई या दुश्मन की विजय के रूप में आपपर कोई विपत्ति आ पड़ती है, तो ये मुनाफ़िक़ लोग कहते हैं : हमने अपने लिए सावधानी बरती और हमने उस समय समझदारी (विवेक) से काम लिया जब हम लड़ाई के लिए नहीं निकले, जिस तरह कि ईमान वाले निकले थे। जिसके कारण उन्हें क़त्ल और क़ैद का सामना करना पड़ा। फिर ये मुनाफ़िक़ लोग अपनी सुरक्षा से खुश अपने परिवारों की ओर लौटते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जिहाद में सुस्ती दिखाने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़िम्मेदारी से जी चुराना और बहाने बनाना कमज़ोर किरदार की निशानी है।
आयत 51
قُل لَّن يُصِيبَنَآ إِلَّا مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَنَا هُوَ مَوْلَىٰنَا ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّن
हरगिज़ नहीं
يُصِيبَنَآ
पहुँचेगा हमें
إِلَّا
मगर (वो ही)
مَا
जो
كَتَبَ
लिख दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَنَا
हमारे लिए
هُوَ
वो
مَوْلَىٰنَا ۚ
मौला है हमारा
وَعَلَى
And on
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल करें
ٱلْمُؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले
कह दो, "हमें कुछ भी पेश नहीं आ सकता सिवाय उसके जो अल्लाह ने लिख दिया है। वही हमारा स्वामी है। और ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुनाफ़िक़ों से कह दें : अल्लाह ने हमारे लिए जो कुछ लिख दिया है, उसके अलावा हमें कुछ भी नहीं पहुँचेगा। क्योंकि वही महिमावान हमारा मालिक और हमारा आश्रय है जिसका हम सहारा लेते हैं, और हम अपने मामलों में उसी पर भरोसा करते हैं। तथा ईमान वाले अपने मामलों को केवल उसी को सौंपते हैं। क्योंकि वही उनके लिए पर्याप्त, और सबसे अच्छा काम बनाने वाला है।
आयत 52
قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَآ إِلَّآ إِحْدَى ٱلْحُسْنَيَيْنِ ۖ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ أَن يُصِيبَكُمُ ٱللَّهُ بِعَذَابٍۢ مِّنْ عِندِهِۦٓ أَوْ بِأَيْدِينَا ۖ فَتَرَبَّصُوٓا۟ إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
नहीं
تَرَبَّصُونَ
तुम इन्तिज़ार करते
بِنَآ
हमारे बारे में
إِلَّآ
मगर
إِحْدَى
एक का
ٱلْحُسْنَيَيْنِ ۖ
दो भलाईयों में से
وَنَحْنُ
और हम
نَتَرَبَّصُ
हम इन्तिज़ार करते हैं
بِكُمْ
तुम्हारे बारे में
أَن
कि
يُصِيبَكُمُ
पहुँचाए तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِعَذَابٍۢ
कोई अज़ाब
مِّنْ
from
عِندِهِۦٓ
अपने पास से
أَوْ
या
بِأَيْدِينَا ۖ
हमारे हाथों से
فَتَرَبَّصُوٓا۟
पस तुम इन्तिज़ार करो
إِنَّا
बेशक हम
مَعَكُم
साथ तुम्हारे
مُّتَرَبِّصُونَ
इन्तिज़ार करने वाले हैं
कहो, "तुम हमारे लिए दो भलाईयों में से किसी एक भलाई के सिवा किसकी प्रतीक्षा कर सकते है? जबकि हमें तुम्हारे हक़ में इसी की प्रतिक्षा है कि अल्लाह अपनी ओर से तुम्हें कोई यातना देता है या हमारे हाथों दिलाता है। अच्छा तो तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहे है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : तुम हमारे लिए जीत या शहादत के अलावा किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो?! और हम तुम्हारे बारे में प्रतीक्षा कर रहे हैं कि अल्लाह तुम्हें अपने पास से कोई यातना दे, जो तुम्हें नष्ट कर दे या हमारे हाथों तुम्हें क़त्ल करवाकर या बंदी बनाकर सज़ा दे, यदि वह हमें तुमसे लड़ाई की अनुमति प्रदान कर दे। तो तुम हमारे परिणाम की प्रतीक्षा करो। हम भी तुम्हारे परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं।
आयत 53
قُلْ أَنفِقُوا۟ طَوْعًا أَوْ كَرْهًۭا لَّن يُتَقَبَّلَ مِنكُمْ ۖ إِنَّكُمْ كُنتُمْ قَوْمًۭا فَـٰسِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَنفِقُوا۟
ख़र्च करो
طَوْعًا
ख़ुशी से
أَوْ
या
كَرْهًۭا
नाख़ुशी से
لَّن
हरगिज़ नहीं
يُتَقَبَّلَ
वो क़ुबूल किया जाएगा
مِنكُمْ ۖ
तुम से
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
كُنتُمْ
हो तुम
قَوْمًۭا
लोग
فَـٰسِقِينَ
नाफ़रमान
कह दो, "तुम चाहे स्वेच्छापूर्वक ख़र्च करो या अनिच्छापूर्वक, तुमसे कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। निस्संदेह तुम अवज्ञाकारी लोग हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : जो कुछ तुम अपने धन में से खर्च करते हो, उसे स्वेच्छा से या अनिच्छा से खर्च करो। जो कुछ तुमने खर्च किया है वह तुम्हारे कुफ़्र और अल्लाह की अवज्ञा के कारण तुमसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा।
आयत 54
وَمَا مَنَعَهُمْ أَن تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَـٰتُهُمْ إِلَّآ أَنَّهُمْ كَفَرُوا۟ بِٱللَّهِ وَبِرَسُولِهِۦ وَلَا يَأْتُونَ ٱلصَّلَوٰةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَـٰرِهُونَ
وَمَا
और नहीं
مَنَعَهُمْ
मानेअ/रुकावट हुआ उनके
أَن
कि
تُقْبَلَ
क़ुबूल किए जाऐं
مِنْهُمْ
उनसे
نَفَقَـٰتُهُمْ
सदक़ात उनके
إِلَّآ
मगर
أَنَّهُمْ
ये कि वो
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
وَبِرَسُولِهِۦ
और साथ उसके रसूल के
وَلَا
और नहीं
يَأْتُونَ
वो आते
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़ को
إِلَّا
मगर
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كُسَالَىٰ
सुस्त होते हैं
وَلَا
और नहीं
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते
إِلَّا
मगर
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كَـٰرِهُونَ
नापसंद करने वाले हैं
उनके ख़र्च के स्वीकृत होने में इसके अतिरिक्त और कोई चीज़ बाधक नहीं कि उन्होंने अल्लाह औऱ उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया। नमाज़ को आते है तो बस हारे जी आते है और ख़र्च करते है, तो अनिच्छापूर्वक ही
तफ़्सीर:
उनकी ख़र्च की हुई चीज़ों को स्वीकार न किए जाने के तीन कारण हैं : उनका अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करना, उनका नमाज़ पढ़ते समय आलस्य और सुस्ती, तथा वे अपना धन स्वेच्छा से खर्च नहीं करते हैं, बल्कि उसे अनैच्छिक रूप से खर्च करते हैं; क्योंकि वे न तो अपनी नमाज़ों में प्रतिफल की आशा रखते हैं और न ही अपने खर्च करने में।
आयत 55
فَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَٰلُهُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُعَذِّبَهُم بِهَا فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَـٰفِرُونَ
فَلَا
पस ना
تُعْجِبْكَ
ताज्जुब में डालें आपको
أَمْوَٰلُهُمْ
माल उनके
وَلَآ
और ना
أَوْلَـٰدُهُمْ ۚ
औलाद उनकी
إِنَّمَا
बेशक
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُعَذِّبَهُم
कि वो अज़ाब दे उन्हें
بِهَا
साथ उनके
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَتَزْهَقَ
और निकलें
أَنفُسُهُمْ
जानें उनकी
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كَـٰفِرُونَ
काफ़िर हों
अतः उनके माल तुम्हें मोहित न करें और न उनकी सन्तान ही। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें सांसारिक जीवन में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे इनकार करनेवाले ही रहे
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आपको इन मुनाफ़िक़ों के धन तथा उनकी संतान विस्मित न करें और न ही आप उन्हें अच्छा समझें। क्योंकि उनके धन एवं संतान का परिणाम बहुत बुरा है। अल्लाह उन्हें उनके लिए अज़ाब बना देगा कि उसे कमाने में कड़ी मेहनत करेंगे और थकान सहेंगे और दूसरी ओर अल्लाह उनमें विपत्तियाँ उतारता रहेगा यहाँ तक कि अल्लाह उनके कुफ़्र ही की हालत में उनके प्राण निकालेगा, फिर वे जहन्नम के सबसे निचले गड्ढे में अनंत काल के लिए यातना दिए जाएँगे।
आयत 56
وَيَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَـٰكِنَّهُمْ قَوْمٌۭ يَفْرَقُونَ
وَيَحْلِفُونَ
और वो कसमें खाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَمِنكُمْ
अलबत्ता तुम में से हैं
وَمَا
हालाँकि नहीं
هُم
वो
مِّنكُمْ
तुम में से
وَلَـٰكِنَّهُمْ
और लेकिन वो
قَوْمٌۭ
ऐसे लोग हैं
يَفْرَقُونَ
जो डरते हैं
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि वे तुम्हीं में से है, हालाँकि वे तुममें से नहीं है, बल्कि वे ऐसे लोग है जो त्रस्त रहते है
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) मुनाफ़िक़ तुम्हारे लिए अल्लाह की झूठी शपथ खाकर कहते हैं कि निःसंदेह वे अवश्य तुममें से हैं। हालाँकि वे अंदरूनी तौर पर तुममें से नहीं हैं, भले ही वे यह प्रकट करें कि वे तुममें से हैं। परंतु वे ऐसे लोग हैं जो डरते हैं कि उन्हें उसी क़त्ल और क़ैद का सामना न करना पड़े, जिसका सामना बहुदेववादियों को करना पड़ा। इसलिए वे बचने के लिए इस्लाम को प्रकट करते हैं।
आयत 57
لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَـًٔا أَوْ مَغَـٰرَٰتٍ أَوْ مُدَّخَلًۭا لَّوَلَّوْا۟ إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ
لَوْ
अगर
يَجِدُونَ
वो पाऐं
مَلْجَـًٔا
कोई जाय पनाह
أَوْ
या
مَغَـٰرَٰتٍ
कोई ग़ार
أَوْ
या
مُدَّخَلًۭا
कोई घुस बैठने की जगह
لَّوَلَّوْا۟
अलबत्ता वो मुड़ कर भाग जाऐं
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
يَجْمَحُونَ
वो सरपट दौड़ते हैं
यदि वे कोई शरण पा लें या कोई गुफा या घुस बैठने की जगह, तो अवश्य ही वे बगटुट उसकी ओर उल्टे भाग जाएँ
तफ़्सीर:
यदि इन मुश्रिकों को शरण लेने के लिए कोई क़िला मिल जाए, जिसमें वे अपनी रक्षा कर सकें, या पहाड़ों के अंदर गुफाएँ मिल जाएँ, जिनमें वे छिप सकें, या कोई सुरंग मिल जाए, जिसमें वे प्रवेश कर सकें, तो वे अवश्य उसमें शरण लेंगे ओर दौड़कर उसमें घुस जाएँगे।
आयत 58
وَمِنْهُم مَّن يَلْمِزُكَ فِى ٱلصَّدَقَـٰتِ فَإِنْ أُعْطُوا۟ مِنْهَا رَضُوا۟ وَإِن لَّمْ يُعْطَوْا۟ مِنْهَآ إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ
وَمِنْهُم
और कुछ उनमें से हैं
مَّن
जो
يَلْمِزُكَ
इलज़ाम लगाते हैं आप पर
فِى
concerning
ٱلصَّدَقَـٰتِ
सदक़ात के बारे में
فَإِنْ
फिर अगर
أُعْطُوا۟
वो दिए जाऐं
مِنْهَا
उनमें से
رَضُوا۟
वो राज़ी हो जाते हैं
وَإِن
और अगर
لَّمْ
ना
يُعْطَوْا۟
वो दिए जाऐं
مِنْهَآ
उनमें से
إِذَا
तब
هُمْ
वो
يَسْخَطُونَ
वो नाराज़ हो जाते हैं
और उनमें से कुछ लोग सदक़ो के विषय में तुम पर चोटे करते है। किन्तु यदि उन्हें उसमें से दे दिया जाए तो प्रसन्न हो जाएँ और यदि उन्हें उसमें से न दिया गया तो क्या देखोगे कि वे क्रोधित होने लगते है
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो सदक़ों के वितरण के बारे में (ऐ रसूल!) आपकी आलोचना करते हैं, जब उन्हें उनमें से वह चीज़ नहीं मिलती, जो वे चाहते हैं। यदि आप उन्हें वह चीज़ दे दें, जो वे माँगते हैं, तो वे आपसे प्रसन्न हो जाते हैं। और यदि आप उन्हें वह चीज़ न दें, जो वे माँगते हैं, तो वे नाराज़गी दिखाते हैं।
आयत 59
وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا۟ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَقَالُوا۟ حَسْبُنَا ٱللَّهُ سَيُؤْتِينَا ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ وَرَسُولُهُۥٓ إِنَّآ إِلَى ٱللَّهِ رَٰغِبُونَ
وَلَوْ
और काश
أَنَّهُمْ
ये कि वो
رَضُوا۟
वो राज़ी हो जाते
مَآ
उस पर जो
ءَاتَىٰهُمُ
दिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥ
और उसके रसूल ने
وَقَالُوا۟
और वो कहते
حَسْبُنَا
काफ़ी है हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह
سَيُؤْتِينَا
अनक़रीब देगा हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
وَرَسُولُهُۥٓ
और उसका रसूल (भी)
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
رَٰغِبُونَ
रग़बत करने वाले हैं
यदि अल्लाह और उसके रसूल ने जो कुछ उन्हें दिया था, उसपर वे राज़ी रहते औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह हमें जल्द ही अपने अनुग्रह से देगा और उसका रसूल भी। हम तो अल्लाह ही की ओऱ उन्मुख है।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता)
तफ़्सीर:
यदि ये मुनाफ़िक़, जो सदक़ों के विभाजन के बारे में आपकी आलोचना करते हैं, उससे संतुष्ट होते, जो अल्लाह ने उनके लिए नियत किया है और जो उसके रसूल ने उन्हें उनमें से दिया है, तथा वे कहते : अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है, अल्लाह हमें अपने अनुग्रह से जो चाहे, देगा और उसके रसूल भी हमें अल्लाह की दी हुई चीज़ों में से प्रदान करेंगे। हम केवल अल्लाह ही से आशा रखते हैं कि वह हमें अपने अनुग्रह से प्रदान करे। यदि उन्होंने ऐसा किया होता, तो यह उनके लिए आपकी आलोचना करने से बेहतर होता।
आयत 60
۞ إِنَّمَا ٱلصَّدَقَـٰتُ لِلْفُقَرَآءِ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱلْعَـٰمِلِينَ عَلَيْهَا وَٱلْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِى ٱلرِّقَابِ وَٱلْغَـٰرِمِينَ وَفِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ ۖ فَرِيضَةًۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
۞ إِنَّمَا
बेशक
ٱلصَّدَقَـٰتُ
सदक़ात तो
لِلْفُقَرَآءِ
फ़ुक़रा के लिए हैं
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिस्कीनों के लिए
وَٱلْعَـٰمِلِينَ
और जो काम करने वाले हैं
عَلَيْهَا
उन पर
وَٱلْمُؤَلَّفَةِ
और उलफ़त दिलाए गए
قُلُوبُهُمْ
दिल जिनके
وَفِى
and in
ٱلرِّقَابِ
और गर्दनों (के आज़ाद) करने में
وَٱلْغَـٰرِمِينَ
और क़र्ज़दारों (के लिए)
وَفِى
and in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
और अल्लाह के रास्ते में
وَٱبْنِ
and the wayfarer
ٱلسَّبِيلِ ۖ
और मुसाफ़िर/राहगीर (के लिए)
فَرِيضَةًۭ
फ़रीज़ा है
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
सदक़े तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए है, जो काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
अनिवार्य ज़कात फ़क़ीरों को दी जाएगी, इससे अभिप्राय वे ज़रूरतमंद हैं जिनके पास पेशे या नौकरी से प्राप्त कुछ धन है, लेकिन यह उनके लिए पर्याप्त नहीं है और उनकी स्थिति पर ध्यान नहीं दिया जाता है। और मिस्कीनों को, जिनके पास शायद ही कुछ होता है और वे अपनी दयनीय स्थिति या अपनी बात कहने के कारण लोगों से छिपे नहीं होते हैं। और ज़कात कर्मियों को, जिन्हें शासक ज़कात वसूल करने के कार्य पर नियुक्त करता है। और उन काफ़िरों को, जिन्हें परचाना अभीष्ट हो ताकि वे इस्लाम ले आएँ, या कमज़ोर ईमान वालों को, ताकि उनका ईमान मज़बूत हो जाए, या ऐसे व्यक्ति को, जिसकी बुराई को उसके द्वारा दूर किया जाए। और गुलामों को आज़ाद करने के लिए खर्च किया जाएगा, और बिना फ़िज़ूलखर्ची और अवज्ञा के क़र्ज़ लेने वालों को, यदि उनके पास अपना क़र्ज़ चुकाने का सामर्थ्य न हो। और अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने वाले मुजाहिदों की तैयारी में खर्च किया जाएगा और उस यात्री पर, जिसका खर्च सफर के दौरान खत्म हो गया। ज़कात के व्यय को केवल इन्हीं लोगों तक सीमित रखना अल्लाह की ओर से एक दायित्व है, और अल्लाह अपने बंदों के हितों के बारे में जानने वाला, अपने प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों के बहानों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चा ईमान वाला अपनी ज़िम्मेदारी से भागता नहीं, बल्कि उसे निभाता है।
आयत 61
وَمِنْهُمُ ٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ ٱلنَّبِىَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٌۭ ۚ قُلْ أُذُنُ خَيْرٍۢ لَّكُمْ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِينَ وَرَحْمَةٌۭ لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنكُمْ ۚ وَٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ ٱللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَمِنْهُمُ
और कुछ उनमें से हैं
ٱلَّذِينَ
जो
يُؤْذُونَ
अज़ियत देते हैं
ٱلنَّبِىَّ
नबी को
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
هُوَ
वो
أُذُنٌۭ ۚ
कान हैं
قُلْ
कह दीजिए
أُذُنُ
कान हैं
خَيْرٍۢ
भलाई का
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
يُؤْمِنُ
वो ईमान रखता है
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَيُؤْمِنُ
और वो ऐतमाद करता है
لِلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مِنكُمْ ۚ
तुम में से
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُؤْذُونَ
अज़ियत देते हैं
رَسُولَ
(the) Messenger
ٱللَّهِ
अल्लाह के रसूल को
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो नबी को दुख देते है और कहते है, "वह तो निरा कान है!" कह दो, "वह सर्वथा कान तुम्हारी भलाई के लिए है। वह अल्लाह पर ईमान रखता है और ईमानवालों पर भी विश्वास करता है। और उन लोगों के लिए सर्वथा दयालुता है जो तुममें से ईमान लाए है। रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते है, उनके लिए दुखद यातना है।"
तफ़्सीर:
तथा मुनाफ़िक़ों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने शब्दों के साथ कष्ट पहुँचाते हैं। वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहनशीलता को देखकर कहते हैं : वह हर एक की बात सुनते हैं और उसपर विश्वास कर लेते हैं, और सत्य और झूठ के बीच अंतर नहीं करते हैं। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : रसूल अच्छे के अलावा कुछ नहीं सुनते। वह अल्लाह पर विश्वास रखते हैं और सच्चे ईमान वाले जो कहते हैं उस पर विश्वास करते हैं और उनपर दया करते हैं। क्योंकि आपका रसूल बनाकर भेजा जाना उन लोगों के लिए दया है जो आपपर ईमान रखते हैं। और जो लोग आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को किसी भी तरह के दुर्व्यवहार से कष्ट पहुँचाते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 62
يَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمْ لِيُرْضُوكُمْ وَٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَحَقُّ أَن يُرْضُوهُ إِن كَانُوا۟ مُؤْمِنِينَ
يَحْلِفُونَ
वो क़समें खाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
لِيُرْضُوكُمْ
ताकि वो राज़ी करें तुम्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَرَسُولُهُۥٓ
और उसका रसूल
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
أَن
कि
يُرْضُوهُ
वो राज़ी करें उसे
إِن
अगर
كَانُوا۟
हैं वो
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वे तुम लोगों के सामने अल्लाह की क़समें खाते है, ताकि तुम्हें राज़ी कर लें, हालाँकि यदि वे मोमिन है तो अल्लाह और उसका रसूल इसके ज़्यादा हक़दार है कि उनको राज़ी करें
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) मुनाफ़िक़ तुम्हारे सामने अल्लाह की क़सम खाते हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट पहुँचाए। ऐसा तुम्हें खुश करने के लिए कह रहें। हालाँकि अल्लाह और उसके रसूल ईमान और सत्कर्म द्वारा खुश किए जाने के ज़्यादा हक़दार हैं, यदि ये लोग सच्चे ईमान वाले हैं।
आयत 63
أَلَمْ يَعْلَمُوٓا۟ أَنَّهُۥ مَن يُحَادِدِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَأَنَّ لَهُۥ نَارَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدًۭا فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ ٱلْخِزْىُ ٱلْعَظِيمُ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَعْلَمُوٓا۟
वो जानते
أَنَّهُۥ
बेशक वो
مَن
जो
يُحَادِدِ
मुख़ालिफ़त करता है
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
فَأَنَّ
तो बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
نَارَ
आग है
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
خَـٰلِدًۭا
हमेशा रहने वाला है
فِيهَا ۚ
उसमें
ذَٰلِكَ
ये
ٱلْخِزْىُ
रुस्वाई है
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
क्या उन्हें मालूम नहीं कि जो अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करता है, उसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें वह सदैव रहेगा। यह बहुत बड़ी रुसवाई है
तफ़्सीर:
क्या इन मुनाफ़िक़ों को नहीं पता कि वे ऐसा करने से अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करने वाले हैं, और यह कि जो भी उनसे दुश्मनी करेगा, वह क़ियामत के दिन जहन्नम की आग में प्रवेश करेगा, जिसमें वह हमेशा रहेगा?! यही बहुत बड़ा अपमान और रुसवाई है।
आयत 64
يَحْذَرُ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ أَن تُنَزَّلَ عَلَيْهِمْ سُورَةٌۭ تُنَبِّئُهُم بِمَا فِى قُلُوبِهِمْ ۚ قُلِ ٱسْتَهْزِءُوٓا۟ إِنَّ ٱللَّهَ مُخْرِجٌۭ مَّا تَحْذَرُونَ
يَحْذَرُ
डरते हैं
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ
मुनाफ़िक़
أَن
कि
تُنَزَّلَ
उतारी जाए
عَلَيْهِمْ
उन पर
سُورَةٌۭ
कोई सूरत
تُنَبِّئُهُم
जो ख़बर दे उन्हें
بِمَا
उसकी जो
فِى
(is) in
قُلُوبِهِمْ ۚ
उनके दिलों में है
قُلِ
कह दीजिए
ٱسْتَهْزِءُوٓا۟
कि मज़ाक़ उड़ा लो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مُخْرِجٌۭ
ज़ाहिर करने वाला है
مَّا
वो जिससे
تَحْذَرُونَ
तुम डरते हो
मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) डर रहे है कि कहीं उनके बारे में कोई ऐसी सूरा न अवतरित हो जाए जो वह सब कुछ उनपर खोल दे, जो उनके दिलों में है। कह दो, "मज़ाक़ उड़ा लो, अल्लाह तो उसे प्रकट करके रहेगा, जिसका तुम्हें डर है।"
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ इस बात से डरते हैं कि अल्लाह अपने रसूल पर कोई ऐसी सूरत न उतार दे, जो मोमिनों को, उनके दिल के अंदर मौजूद कुफ़्र से अवगत करा दे। (ऐ रसूल!) आप कह दें : (ऐ मुनाफ़िक़ो!) तुम मज़ाक़ उड़ाते और धर्म (इस्लाम) के अंदर दोष निकालते रहो। निश्चय अल्लाह कोई सूरत उतारकर अथवा अपने रसूल को उसके बारे में सूचित करके, उस बात को प्रकट करने वाला है, जिससे तुम डर रहे हो।
आयत 65
وَلَئِن سَأَلْتَهُمْ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلْعَبُ ۚ قُلْ أَبِٱللَّهِ وَءَايَـٰتِهِۦ وَرَسُولِهِۦ كُنتُمْ تَسْتَهْزِءُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
سَأَلْتَهُمْ
पूछो तुम उनसे
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
إِنَّمَا
बेशक
كُنَّا
थे हम
نَخُوضُ
हम बहस कर रहे
وَنَلْعَبُ ۚ
और हम दिल्लगी करते
قُلْ
कह दीजिए
أَبِٱللَّهِ
क्या अल्लाह का
وَءَايَـٰتِهِۦ
और उसकी आयात का
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल का
كُنتُمْ
थे तुम
تَسْتَهْزِءُونَ
मज़ाक़ उड़ाते
और यदि उनसे पूछो तो कह देंगे, "हम तो केवल बातें और हँसी-खेल कर रहे थे।" कहो, "क्या अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल के साथ हँसी-मज़ाक़ करते थे?
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आप मुनाफ़िक़ों से उसके बारे में पूछें, जो उन्होंने व्यंग्य किया है और मोमिनों को बुरा-भला कहा है, जबकि अल्लाह ने आपको उसके बारे में सूचित कर दिया, तो वे अवश्य कहेंगे : हम तो यूँ ही बातचीत और हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे, हम गंभीर मुद्रा में नहीं थे। (ऐ रसूल!) आप कह दें : क्या तुम अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल का मज़ाक़ उड़ा रहे थे?!
आयत 66
لَا تَعْتَذِرُوا۟ قَدْ كَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَـٰنِكُمْ ۚ إِن نَّعْفُ عَن طَآئِفَةٍۢ مِّنكُمْ نُعَذِّبْ طَآئِفَةًۢ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ مُجْرِمِينَ
لَا
(Do) not
تَعْتَذِرُوا۟
ना तुम उज़र पेश करो
قَدْ
तहक़ीक़
كَفَرْتُم
कुफ़्र किया तुमने
بَعْدَ
बाद
إِيمَـٰنِكُمْ ۚ
अपने ईमान के
إِن
अगर
نَّعْفُ
हम माफ़ कर दें
عَن
[on]
طَآئِفَةٍۢ
एक गिरोह को
مِّنكُمْ
तुम में से
نُعَذِّبْ
(तो) हम अज़ाब देंगे
طَآئِفَةًۢ
एक गिरोह को
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
كَانُوا۟
हैं वो
مُجْرِمِينَ
मुजरिम
"बहाने न बनाओ, तुमने अपने ईमान के पश्चात इनकार किया। यदि हम तुम्हारे कुछ लोगों को क्षमा भी कर दें तो भी कुछ लोगों को यातना देकर ही रहेंगे, क्योंकि वे अपराधी हैं।"
तफ़्सीर:
तुम ये झूठे बहाने न बनाओ, क्योंकि तुमने उपहास करके अपने छिपे हुए कुफ़्र को प्रकाश में ला दिया है। यदि हम तुम्हारे एक समूह को, निफ़ाक़ से किनारा करने, उससे तौबा करने और अल्लाह के लिए निष्ठावान हो जाने के कारण क्षमा कर दें, तो भी तुम्हारे एक समूह को, उसके निफ़ाक़ पर बने रहने और उससे तौबा न करने के कारण अवश्य यातना देंगे।
आयत 67
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتُ بَعْضُهُم مِّنۢ بَعْضٍۢ ۚ يَأْمُرُونَ بِٱلْمُنكَرِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمَعْرُوفِ وَيَقْبِضُونَ أَيْدِيَهُمْ ۚ نَسُوا۟ ٱللَّهَ فَنَسِيَهُمْ ۗ إِنَّ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ
मुनाफ़िक़ मर्द
وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتُ
और मुनाफ़िक़ औरतें
بَعْضُهُم
बाज़ उनके
مِّنۢ
(are) of
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ से हैं
يَأْمُرُونَ
वो हुक्म देते हैं
بِٱلْمُنكَرِ
बुराई का
وَيَنْهَوْنَ
और वो रोकते हैं
عَنِ
what
ٱلْمَعْرُوفِ
भलाई से
وَيَقْبِضُونَ
और वो बंद रखते हैं
أَيْدِيَهُمْ ۚ
अपने हाथों को
نَسُوا۟
वो भूल गए
ٱللَّهَ
अल्लाह को
فَنَسِيَهُمْ ۗ
तो उसने भुला दिया उन्हें
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनफिक़
هُمُ
वो ही
ٱلْفَـٰسِقُونَ
फ़ासिक़/नाफ़रमान हैं
मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफ़िक़ स्त्रियाँ सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वे बुराई का हुक्म देते है और भलाई से रोकते है और हाथों को बन्द किए रहते है। वे अल्लाह को भूल बैठे तो उसने भी उन्हें भुला दिया। निश्चय ही मुनाफ़िक़ अवज्ञाकारी हैं
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ पुरुष और महिलाएँ, सबके सब निफ़ाक़ की स्थितियों में एक जैसे हैं, और वे मोमिनों के विपरीत हैं। वे बुराई का आदेश देते हैं, भलाई से रोकते हैं और अपने धन में कंजूसी करते हैं। इसलिए वे उसे अल्लाह के रास्ते में खर्च नहीं करते हैं। उन्होंने अल्लाह की आज्ञा का पालन करना छोड़ दिया, तो अल्लाह ने भी उन्हें अपनी तौफ़ीक़ से वंचित कर दिया। निश्चय मुनाफ़िक़ लोग ही अल्लाह के आज्ञापालन और सत्य के मार्ग से निकलकर उसकी अवज्ञा और गुमराही के मार्ग की ओर जाने वाले हैं।
आयत 68
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ وَٱلْكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ هِىَ حَسْبُهُمْ ۚ وَلَعَنَهُمُ ٱللَّهُ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌۭ مُّقِيمٌۭ
وَعَدَ
वादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ मर्दों से
وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ
और मुनाफ़िक़ औरतों से
وَٱلْكُفَّارَ
और काफ़िरों से
نَارَ
आग का
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उसमें
هِىَ
वो ही
حَسْبُهُمْ ۚ
काफ़ी है उन्हें
وَلَعَنَهُمُ
और लानत की उन पर
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
مُّقِيمٌۭ
क़ायम रहने वाला
अल्लाह ने मुनाफ़िक़ पुरुषों और मुनाफ़िक़ स्त्रियों और इनकार करनेवालों से जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वे सदैव ही रहेंगे। वही उनके लिए काफ़ी है और अल्लाह ने उनपर लानत की, और उनके लिए स्थाई यातना है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों से, जिन्होंने तौबा नहीं की, उन्हें जहन्नम की आग में दाख़िल करने का वादा किया है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे। यह उन्हें दंड के रूप में पर्याप्त होगा, तथा अल्लाह उन्हें अपनी दया से निष्कासित कर देगा और उनके लिए निरंतर यातना होगी।
आयत 69
كَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ كَانُوٓا۟ أَشَدَّ مِنكُمْ قُوَّةًۭ وَأَكْثَرَ أَمْوَٰلًۭا وَأَوْلَـٰدًۭا فَٱسْتَمْتَعُوا۟ بِخَلَـٰقِهِمْ فَٱسْتَمْتَعْتُم بِخَلَـٰقِكُمْ كَمَا ٱسْتَمْتَعَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُم بِخَلَـٰقِهِمْ وَخُضْتُمْ كَٱلَّذِى خَاضُوٓا۟ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
كَٱلَّذِينَ
उन लोगों की तरह जो
مِن
before you
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले थे
كَانُوٓا۟
थे वो
أَشَدَّ
बहुत शदीद
مِنكُمْ
तुम से
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
وَأَكْثَرَ
और ज़्यादा थे
أَمْوَٰلًۭا
माल में
وَأَوْلَـٰدًۭا
और औलाद में
فَٱسْتَمْتَعُوا۟
पस उन्होंने फ़ायदा उठाया
بِخَلَـٰقِهِمْ
अपने हिस्से से
فَٱسْتَمْتَعْتُم
पस तुमने फ़ायदा उठाया
بِخَلَـٰقِكُمْ
अपने हिस्से से
كَمَا
जिस तरह
ٱسْتَمْتَعَ
फ़ायदा उठाया
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
مِن
before you
قَبْلِكُم
जो तुमसे पहले थे
بِخَلَـٰقِهِمْ
अपने हिस्से से
وَخُضْتُمْ
और बहस की तुमने
كَٱلَّذِى
जिस तरह
خَاضُوٓا۟ ۚ
उन्होंने बहस की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
حَبِطَتْ
ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
उन लोगों की तरह, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं, वे शक्ति में तुमसे बढ़-बढ़कर थे और माल और औलाद में भी बढ़े हुए थे। फिर उन्होंने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा और तुमने भी अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, जिस प्रकार कि तुमसे पहले के लोगों ने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, और जिस वाद-विवाद में तुम पड़े थे तुम भी वाद-विवाद में पड़ गए। ये वही लोग है जिनका किया-धरा दुनिया और आख़िरत में अकारथ गया, और वही घाटे में है
तफ़्सीर:
(ऐ मुनाफ़िक़ो!) तुम, कुफ़्र और मज़ाक उड़ाने के मामले में अपने से पहले झुठलाने वाले समुदायों की तरह हो। वे तुमसे अधिक शक्तिशाली और अधिक धन और संतान वाले थे। चुनाँचे उन्होंने सांसारिक सुखों और इच्छाओं के अपने लिखे हिस्से का आनंद लिया। फिर तुमने उसमें से अपने लिए नियत हिस्से का आनंद लिया, जैसा कि पिछले झुठलाने वाले समुदायों ने अपने हिस्से का आनंद लिया था। तथा तुमने उसी तरह सत्य को झुठलाया और रसूल पर दोष लगाया, जिस तरह उन्होंने सत्य को झुठलाया और अपने रसूलों पर दोष लगाया था। ये इन निंदनीय गुणों से विशेषित लोग ही हैं, जिनके कर्म कुफ़्र के कारण अल्लाह की दृष्टि में भ्रष्ट होने की वजह से व्यर्थ हो गए और यही वास्तविक नुकसान उठाने वाले लोग हैं, जिन्होंने खुद को विनाश के स्थानों में ले जाकर अपना नुकसान किया है।
आयत 70
أَلَمْ يَأْتِهِمْ نَبَأُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَوْمِ نُوحٍۢ وَعَادٍۢ وَثَمُودَ وَقَوْمِ إِبْرَٰهِيمَ وَأَصْحَـٰبِ مَدْيَنَ وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتِ ۚ أَتَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَأْتِهِمْ
आई उनके पास
نَبَأُ
ख़बर
ٱلَّذِينَ
उनकी जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
قَوْمِ
(the) people
نُوحٍۢ
क़ौमे नूह
وَعَادٍۢ
और आद
وَثَمُودَ
और समूद
وَقَوْمِ
and (the) people
إِبْرَٰهِيمَ
और कौमे इब्राहीम
وَأَصْحَـٰبِ
and (the) companions
مَدْيَنَ
और मदयन वाले
وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتِ ۚ
और उल्टी हुई बस्तियों वाले
أَتَتْهُمْ
आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَمَا
पस नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَظْلِمَهُمْ
कि वो ज़ुल्म करे उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी ही जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
क्या उन्हें उन लोगों का वृतान्त नहीं पहुँचा जो उनसे पहले गुज़रे - नूह के लोगो का, आद और समूद का, और इबराहीम की क़ौम का और मदयनवालों का और उन बस्तियों का जिन्हें उलट दिया गया? उसके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे, फिर अल्लाह ऐसा न था कि वह उनपर अत्याचार करता, किन्तु वे स्वयं अपने-आप पर अत्याचार कर रहे थे
तफ़्सीर:
क्या इन मुनाफ़िक़ों के पास यह खबर नहीं आई कि झुठलाने वाले समुदायों ने क्या किया, और उन्हें क्या दंड दिया गया : जैसे नूह अलैहिस्सलाम की जाति, हूद अलैहिस्सलाम की जाति, सालेह अलैहिस्सलाम की जाति, इबराहीम अलैहिस्सलाम की जाति, मदयन वाले और लूत अलैहिस्सलाम की जाति की बस्तियों वाले; उनके पास उनके रसूल स्पष्ट प्रमाणों और खुले तर्कों के साथ आए। फिर अल्लाह ऐसा न था कि उनपर अत्याचार करता; क्योंकि उनके रसूलों ने उन्हें सावधान कर दिया था। परंतु वे अल्लाह के साथ कुफ़्र करने और उसके रसूलों को झुठलाने के कारण खुद अपने ऊपर अत्याचार करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ज़कात के मुस्तहिक (हकदार) लोगों की कैटेगरीज़ बताई गई हैं। यह हमें सिखाता है कि सदका-ज़कात सही हकदारों तक पहुंचाना समाजी इंसाफ की बुनियाद है।
आयत 71
وَٱلْمُؤْمِنُونَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَآءُ بَعْضٍۢ ۚ يَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَيُطِيعُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ سَيَرْحَمُهُمُ ٱللَّهُ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
وَٱلْمُؤْمِنُونَ
और मोमिन मर्द
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتُ
और मोमिन औरतें
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
أَوْلِيَآءُ
दोस्त हैं
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ के
يَأْمُرُونَ
वो हुक्म देते हैं
بِٱلْمَعْرُوفِ
भलाई का
وَيَنْهَوْنَ
और वो रोकते हैं
عَنِ
from
ٱلْمُنكَرِ
बुराई से
وَيُقِيمُونَ
और वो क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَيُؤْتُونَ
और वो अदा करते हैं
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَيُطِيعُونَ
और वो अताअत करते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥٓ ۚ
और उसके रसूल की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
سَيَرْحَمُهُمُ
ज़रूर रहम करेगा उन पर
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
रहे मोमिन मर्द औऱ मोमिन औरतें, वे सब परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है, जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा। निस्सन्देह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तथा ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्रियाँ एक-दूसरे के समर्थक और मददगार हैं; क्योंकि ईमान ने उन्हें एक-दूसरे से जोड़ दिया है। वे भलाई अर्थात हर उस कार्य का आदेश देते हैं, जो अल्लाह को पसंद है, जैसे तौहीद और नमाज़ आदि, और बुराई अर्थात हर उस कार्य से रोकते हैं, जिससे अल्लाह घृणा करता है, जैसे कुफ़्र और सूद आदि, तथा पूरी नमाज़ को पूर्णतम तरीक़े से अदा करते हैं और अल्लाह तथा उसके रसूल का कहा मानते हैं। ये लोग जो इन प्रशंसनीय गुणों से सुसज्जित हैं, अल्लाह उन्हें अपनी दया में प्रवेश करेगा। निःसंदेह अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 72
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا وَمَسَـٰكِنَ طَيِّبَةًۭ فِى جَنَّـٰتِ عَدْنٍۢ ۚ وَرِضْوَٰنٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ أَكْبَرُ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
وَعَدَ
वादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों मर्दों से
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
और मोमिन औरतों से
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात का
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उनमें
وَمَسَـٰكِنَ
और घर
طَيِّبَةًۭ
पाकीज़ा
فِى
in
جَنَّـٰتِ
बाग़ात में
عَدْنٍۢ ۚ
अदन के
وَرِضْوَٰنٌۭ
और रज़ामन्दी
مِّنَ
of
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
أَكْبَرُ ۚ
सबसे बड़ी है
ذَٰلِكَ
यही
هُوَ
वो
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी है
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों से अल्लाह ने ऐसे बाग़ों का वादा किया है जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जिनमें वे सदैव रहेंगे और सदाबहार बाग़ों में पवित्र निवास गृहों का (भी वादा है) और, अल्लाह की प्रसन्नता और रज़ामन्दी का; जो सबसे बढ़कर है। यही सबसे बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने ईमान वाले पुरुषों तथा ईमान वाली स्त्रियों से वादा किया है कि वह क़ियामत के दिन उन्हें ऐसी जन्नतों में प्रवेश करेगा, जिनके महलों के नीचे से नहरें प्रवाहित होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे, उसमें न उन्हें कभी मौत आएगी और न उनकी नेमतें खत्म होंगी। तथा अल्लाह ने उनसे स्थायी बाग़ों में अच्छे आवासों में प्रवेश देने का वादा किया है। और उनपर अल्लाह की उतरने वाली प्रसन्नता, इन सबसे बढ़कर है। यही बदला, जिसका उल्लेख किया गया, बहुत बड़ी कामयाबी है, जिसके बराबर कोई कामयाबी नहीं हो सकती।
आयत 73
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ جَـٰهِدِ ٱلْكُفَّارَ وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱغْلُظْ عَلَيْهِمْ ۚ وَمَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
جَـٰهِدِ
जिहाद कीजिए
ٱلْكُفَّارَ
कुफ़्फ़ार
وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ
और मुनाफ़िक़ीन से
وَٱغْلُظْ
और सख़्ती कीजिए
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
وَمَأْوَىٰهُمْ
और ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ ۖ
जहन्नम है
وَبِئْسَ
और बहुत ही बुरा
ٱلْمَصِيرُ
ठिकाना है
ऐ नबी! इनकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों से जिहाद करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ। अन्ततः उनका ठिकाना जहन्नम है और वह जा पहुँचने की बहुत बुरी जगह है!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप काफ़िरों के साथ तलवार से जिहाद करें और मुनाफ़िक़ों के साथ ज़ुबान एवं तर्क से जिहाद करें, तथा उन दोनों पक्षों पर सख़्ती करें। क्योंकि वे इसी के योग्य हैं। और क़ियामत के दिन उनका ठिकाना जहन्नम है और वह बहुत बुरा स्थान है।
आयत 74
يَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ مَا قَالُوا۟ وَلَقَدْ قَالُوا۟ كَلِمَةَ ٱلْكُفْرِ وَكَفَرُوا۟ بَعْدَ إِسْلَـٰمِهِمْ وَهَمُّوا۟ بِمَا لَمْ يَنَالُوا۟ ۚ وَمَا نَقَمُوٓا۟ إِلَّآ أَنْ أَغْنَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ مِن فَضْلِهِۦ ۚ فَإِن يَتُوبُوا۟ يَكُ خَيْرًۭا لَّهُمْ ۖ وَإِن يَتَوَلَّوْا۟ يُعَذِّبْهُمُ ٱللَّهُ عَذَابًا أَلِيمًۭا فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَمَا لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍۢ
يَحْلِفُونَ
वो क़समें खाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
مَا
नहीं
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
وَلَقَدْ
हालाँकि अलबत्ता तहक़ीक़
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
كَلِمَةَ
कलमा
ٱلْكُفْرِ
कुफ़्र का
وَكَفَرُوا۟
और उन्होंने कुफ़्र किया
بَعْدَ
बाद
إِسْلَـٰمِهِمْ
अपने इस्लाम के
وَهَمُّوا۟
और उन्होंने इरादा किया
بِمَا
उसका जो
لَمْ
नहीं
يَنَالُوا۟ ۚ
वो पा सके
وَمَا
और नहीं
نَقَمُوٓا۟
उन्होंने इन्तिक़ाम लिया
إِلَّآ
मगर
أَنْ
ये कि
أَغْنَىٰهُمُ
ग़नी कर दिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥ
और उसके रसूल ने
مِن
of
فَضْلِهِۦ ۚ
अपने फ़ज़ल से
فَإِن
फिर अगर
يَتُوبُوا۟
वो तौबा कर लें
يَكُ
होगा
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُمْ ۖ
उनके लिए
وَإِن
और अगर
يَتَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ें
يُعَذِّبْهُمُ
अज़ाब देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
और आख़िरत में
وَمَا
और ना होगा
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍۢ
कोई मददगार
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि उन्होंने नहीं कहा, हालाँकि उन्होंने अवश्य ही कुफ़्र की बात कही है और अपने इस्लाम स्वीकार करने के पश्चात इनकार किया, और वह चाहा जो वे न पा सके। उनके प्रतिशोध का कारण तो यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दिया। अब यदि वे तौबा कर लें तो उन्हीं के लिए अच्छा है और यदि उन्होंने मुँह मोड़ा तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में दुखद यातना देगा और धरती में उनका न कोई मित्र होगा और न सहायक
तफ़्सीर:
ये मुनाफ़िक़ अल्लाह की झूठी शपथ खाकर कहते हैं : आपको उनके विषय में जो बात पहुँची है कि उन्होंने आपको बुरा-भला कहा है और आपके धर्म पर दोष लगाया है, वह बात उन्होंने नहीं कही है। हालाँकि निःसंदेह उन्होंने कुफ़्र की ओर ले जाने वाली वह बात सचमुच कही है, जिसकी सूचना आपको मिली है और उन्होंने ईमान का प्रदर्शन करने के बाद कुफ़्र का प्रदर्शन किया है। तथा उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या करने का इरादा किया, जिसमें वे सफल न हो सके। उन्होंने उस चीज़ को नकार दिया, जिसे नकारा नहीं जाता और वह यह कि अल्लाह ने उनपर अनुग्रह करते हुए उन्हें उस ग़नीमत के धन द्वारा समृद्ध कर दिया, जो उसने अपने नबी को प्रदान किया। अब यदि वे अपने निफ़ाक से तौबा कर लें, तो यह उनके लिए निफ़ाक़ पर जमे रहने से बेहतर होगा। और यदि तौबा करने से मुँह फेर लें, तो अल्लाह उन्हें दुनिया में क़त्ल और क़ैद के रूप में दर्दनाक यातना से पीड़ित करेगा तथा वह आखिरत में उन्हें आग से दर्दनाक अज़ाब देगा। और उनका कोई संरक्षक नहीं होगा, जो उनकी सहायता करके उन्हें अज़ाब से बचा सके, और न कोई सहायक होगा, जो उनपर से अज़ाब को दूर कर सके।
आयत 75
۞ وَمِنْهُم مَّنْ عَـٰهَدَ ٱللَّهَ لَئِنْ ءَاتَىٰنَا مِن فَضْلِهِۦ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
۞ وَمِنْهُم
और कुछ उनमें से वो हैं
مَّنْ
जिन्होंने
عَـٰهَدَ
अहद किया
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
ءَاتَىٰنَا
वो देगा हमें
مِن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
لَنَصَّدَّقَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर सदक़ा करेंगे
وَلَنَكُونَنَّ
और अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐंगे
مِنَ
among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में से
और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होने अल्लाह को वचन दिया था कि "यदि उसने हमें अपने अनुग्रह से दिया तो हम अवश्य दान करेंगे और नेक होकर रहेंगे।"
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ो में से कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अल्लाह को यह कहते हुए वचन दिया था : यदि अल्लाह ने हमें अपने अनुग्रह से कुछ प्रदान किया, तो हम अवश्य ज़रूरतमंदों को दान करेंगे और अच्छे कार्य करने वालों में से हो जाएँगे।
आयत 76
فَلَمَّآ ءَاتَىٰهُم مِّن فَضْلِهِۦ بَخِلُوا۟ بِهِۦ وَتَوَلَّوا۟ وَّهُم مُّعْرِضُونَ
فَلَمَّآ
फिर जब
ءَاتَىٰهُم
उसने दिया उन्हें
مِّن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
بَخِلُوا۟
वो बुख़्ल करने लगे
بِهِۦ
साथ उसके
وَتَوَلَّوا۟
और वो मुँह मोड़ गए
وَّهُم
इस हाल में कि वो
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले थे
किन्तु जब अल्लाह ने उन्हें अपने अनुग्रह से दिया तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और पहलू बचाकर फिर गए
तफ़्सीर:
फिर जब अल्लाह ने उन्हें अपने अनुग्रह में से कुछ प्रदान कर दिया, तो उन्होंने अल्लाह से किए हुए अपने वादे को पूरा नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने धन को रोक लिया और दान में कुछ भी नहीं दिया और ईमान से मुँह मोड़ते हुए फिर गए।
आयत 77
فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًۭا فِى قُلُوبِهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُۥ بِمَآ أَخْلَفُوا۟ ٱللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا۟ يَكْذِبُونَ
فَأَعْقَبَهُمْ
तो उसने सज़ा दी उन्हें
نِفَاقًۭا
निफ़ाक़ (डाल कर)
فِى
in
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों में
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
उस दिन तक
يَلْقَوْنَهُۥ
वो मुलाक़ात करेंगे उससे
بِمَآ
बवजह उसके जो
أَخْلَفُوا۟
उन्होंने ख़िलाफ़ किया
ٱللَّهَ
अल्लाह से
مَا
जिसका
وَعَدُوهُ
उन्होंने वादा किया था उससे
وَبِمَا
और बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْذِبُونَ
वो झूठ बोलते
फिर परिणाम यह हुआ कि उसने उनके दिलों में उस दिन तक के लिए कपटाचार डाल दिया, जब वे उससे मिलेंगे, इसलिए कि उन्होंने अल्लाह से जो प्रतिज्ञा की थी उसे भंग कर दिया और इसलिए भी कि वे झूठ बोलते रहे
तफ़्सीर:
तो इसका परिणाम यह हुआ कि अल्लाह ने उनके दिलों में क़ियामत के दिन तक के लिए निफ़ाक़ को स्थिर कर दिया; उनके अल्लाह के वादे को तोड़ने और झूठ बोलने पर उनके लिए दंड के रूप में।
आयत 78
أَلَمْ يَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَىٰهُمْ وَأَنَّ ٱللَّهَ عَلَّـٰمُ ٱلْغُيُوبِ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَعْلَمُوٓا۟
वो जानते
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
سِرَّهُمْ
राज़ उनके
وَنَجْوَىٰهُمْ
और सरगोशियाँ उनकी
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَّـٰمُ
ख़ूब जानने वाला है
ٱلْغُيُوبِ
ग़ैबों को
क्या उन्हें खबर नहीं कि अल्लाह उनका भेद और उनकी कानाफुसियों को अच्छी तरह जानता है और यह कि अल्लाह परोक्ष की सारी बातों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
क्या इन मुनाफ़िक़ों को यह नहीं मालूम कि अल्लाह उस छल-कपट और चाल को जानता है, जो वे अपनी सभाओं में छिपाते हैं और यह कि अल्लाह परोक्ष की सभी बातों को अच्छी तरह जानने वाला है? इसलिए उनके कामों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 79
ٱلَّذِينَ يَلْمِزُونَ ٱلْمُطَّوِّعِينَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ فِى ٱلصَّدَقَـٰتِ وَٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ ۙ سَخِرَ ٱللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَلْمِزُونَ
वो ताना देते हैं
ٱلْمُطَّوِّعِينَ
ख़ुशी से देने वालों को
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
فِى
concerning
ٱلصَّدَقَـٰتِ
सदक़ात में
وَٱلَّذِينَ
और उनको (भी) जो
لَا
not
يَجِدُونَ
नहीं वो पाते
إِلَّا
सिवाय
جُهْدَهُمْ
अपनी मेहनत के
فَيَسْخَرُونَ
तो वो मज़ाक़ उड़ाते हैं
مِنْهُمْ ۙ
उनका
سَخِرَ
मज़ाक़ उड़ाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِنْهُمْ
उनका
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌ
दर्दनाक
जो लोग स्वेच्छापूर्वक देनेवाले मोमिनों पर उनके सदक़ो (दान) के विषय में चोटें करते है और उन लोगों का उपहास करते है, जिनके पास इसके सिवा कुछ नहीं जो वे मशक़्क़त उठाकर देते है, उन (उपहास करनेवालों) का उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
जो लोग स्वेच्छापूर्वक दान देने वाले मोमिनों को अल्प-दान देने का ताना देते हैं, जो केवल थोड़ी-सी चीज़ पाते हैं जो उनकी भरसक परिश्रम का परिणाम होता है। इसलिए ये उनका उपहास करते हुए कहते हैं : उनके इस दान से क्या होने वाला है?! उनके ईमान वालों का उपहास करने के बदले के तौर पर अल्लाह ने उनका उपहास किया और उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 80
ٱسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةًۭ فَلَن يَغْفِرَ ٱللَّهُ لَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْفَـٰسِقِينَ
ٱسْتَغْفِرْ
आप बख़्शिश माँगिए
لَهُمْ
उनके लिए
أَوْ
या
لَا
(do) not
تَسْتَغْفِرْ
ना आप बख़्शिश माँगिए
لَهُمْ
उनके लिए
إِن
अगर
تَسْتَغْفِرْ
आप बख़्शिश माँगेंगे
لَهُمْ
उनके लिए
سَبْعِينَ
सत्तर
مَرَّةًۭ
बार
فَلَن
पस हरगिज़ ना
يَغْفِرَ
माफ़ करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَهُمْ ۚ
उन्हें
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि उन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِٱللَّهِ
अल्लाह का
وَرَسُولِهِۦ ۗ
और उसके रसूल का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْفَـٰسِقِينَ
जो फ़ासिक़ हैं
तुम उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो या उनके लिए क्षमा की प्रार्थना न करो। यदि तुम उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करोगे, तो भी अल्लाह उन्हें क्षमा नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनके लिए क्षमा याचना करें अथवा न करें। यदि आप उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा याचना करें, तो यह अपनी बहुतायत के बावजूद उनके लिए अल्लाह की क्षमा की प्राप्ति तक कभी नहीं पहुँचाएगी। क्योंकि वे अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करने वाले हैं और अल्लाह जान बूझकर अपनी शरीयत के दायरे से निकल जाने वालों को सत्य की तौफ़ीक़ नहीं देता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सच्चे ईमान वालों की सिफात (एक-दूसरे का साथ देना, नेकी का हुक्म देना) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि आपस में एक-दूसरे का साथ देना ईमान वालों की पहचान है।
आयत 81
فَرِحَ ٱلْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَـٰفَ رَسُولِ ٱللَّهِ وَكَرِهُوٓا۟ أَن يُجَـٰهِدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَالُوا۟ لَا تَنفِرُوا۟ فِى ٱلْحَرِّ ۗ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرًّۭا ۚ لَّوْ كَانُوا۟ يَفْقَهُونَ
فَرِحَ
ख़ुश हो गए
ٱلْمُخَلَّفُونَ
पीछे छोड़े जाने वाले
بِمَقْعَدِهِمْ
अपने बैठ रहने पर
خِلَـٰفَ
पीछे
رَسُولِ
(the) Messenger
ٱللَّهِ
अल्लाह के रसूल के
وَكَرِهُوٓا۟
और उन्होंने नापसंद किया
أَن
कि
يُجَـٰهِدُوا۟
वो जिहाद करें
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों
وَأَنفُسِهِمْ
और अपनी जानों के
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَنفِرُوا۟
ना तुम निकलो
فِى
in
ٱلْحَرِّ ۗ
गर्मी में
قُلْ
कह दीजिए
نَارُ
आग
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद है
حَرًّۭا ۚ
गर्मी के ऐतबार से
لَّوْ
काश कि
كَانُوا۟
होते वो
يَفْقَهُونَ
वो समझते
पीछे रह जानेवाले अल्लाह के रसूल के पीछे अपने बैठ रहने पर प्रसन्न हुए। उन्हें यह नापसन्द हुआ कि अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करें। और उन्होंने कहा, "इस गर्मी में न निकलो।" कह दो, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म है," यदि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)
तफ़्सीर:
तबूक के युद्ध से पीछे छोड़ दिए गए मुनाफ़िक़, अल्लाह के रसूल के आदेश का उल्लंघन करते हुए, अल्लाह के मार्ग में जिहाद से अपने बैठ रहने पर प्रसन्न हुए, तथा उन्होंने अपने धन एवं प्राण के साथ अल्लाह के मार्ग में मोमिनों की तरह जिहाद करने को नापसंंद किया, और अपने मुनाफ़िक़ भाइयों को हतोत्साहित करते हुए कहा : इस गर्मी में न निकलो। क्योंकि तबूक का युद्ध सख़्त गर्मी के दिनों में हुआ था। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : जहन्नम की आग, जो मुनाफ़िक़ों की प्रतीक्षा कर रही है, इस गर्मी से कहीं ज़्यादा गर्म है, जिससे वे भागे हैं, यदि वे जानते होते।
आयत 82
فَلْيَضْحَكُوا۟ قَلِيلًۭا وَلْيَبْكُوا۟ كَثِيرًۭا جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
فَلْيَضْحَكُوا۟
पस चाहिए कि वो हँसें
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
وَلْيَبْكُوا۟
और चाहिए कि वो रोऐं
كَثِيرًۭا
बहुत ज़्यादा
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
अब चाहिए कि जो कुछ वे कमाते रहे है, उसके बदले में हँसे कम और रोएँ अधिक
तफ़्सीर:
अतः जिहाद से पीछे रहने वाले इन मुनाफ़िक़ों को अपने नश्वर सांसारिक जीवन में थोड़ा हँसना चाहिए और उन्हें अपने बाक़ी रहने वाले आखिरत के जीवन में बहुत ज़्यादा रोना चाहिए। यह उस कुफ़्र, पाप और अवज्ञा का बदला है, जो उन्होंने दुनिया में कमाया है।
आयत 83
فَإِن رَّجَعَكَ ٱللَّهُ إِلَىٰ طَآئِفَةٍۢ مِّنْهُمْ فَٱسْتَـْٔذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخْرُجُوا۟ مَعِىَ أَبَدًۭا وَلَن تُقَـٰتِلُوا۟ مَعِىَ عَدُوًّا ۖ إِنَّكُمْ رَضِيتُم بِٱلْقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ فَٱقْعُدُوا۟ مَعَ ٱلْخَـٰلِفِينَ
فَإِن
फिर अगर
رَّجَعَكَ
वापस लौटा लाए आपको
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِلَىٰ
to
طَآئِفَةٍۢ
तरफ़ एक गिरोह के
مِّنْهُمْ
अमन में से
فَٱسْتَـْٔذَنُوكَ
फिर वो इजाज़त तलब करें आपसे
لِلْخُرُوجِ
निकलने के लिए
فَقُل
पस कह दीजिए
لَّن
हरगिज़ ना
تَخْرُجُوا۟
तुम निकलोगे
مَعِىَ
साथ मेरे
أَبَدًۭا
कभी भी
وَلَن
और हरगिज़ ना
تُقَـٰتِلُوا۟
तुम जंग करोगे
مَعِىَ
साथ मेरे
عَدُوًّا ۖ
दुश्मन से
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
رَضِيتُم
राज़ी हो गए तुम
بِٱلْقُعُودِ
बैठने पर
أَوَّلَ
(the) first
مَرَّةٍۢ
पहली बार
فَٱقْعُدُوا۟
पस बैठे रहो
مَعَ
with
ٱلْخَـٰلِفِينَ
साथ पीछे रहने वालों के
अव यदि अल्लाह तुम्हें उनके किसी गिरोह की ओर रुजू कर दे और भविष्य में वे तुमसे साथ निकलने की अनुमति चाहें तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी नहीं निकल सकते और न मेरे साथ होकर किसी शत्रु से लड़ सकते हो। तुम पहली बार बैठ रहने पर ही राज़ी हुए, तो अब पीछे रहनेवालों के साथ बैठे रहो।"
तफ़्सीर:
तो (ऐ नबी!) यदि अल्लाह आपको इन मुनाफ़िक़ों के किसी समूह की ओर वापस लाए, जो अपने निफ़ाक़ पर क़ायम हो। फिर वह आपके साथ किसी अन्य युद्ध में निकलने की अनुमति माँगे, तो आप उनसे कह दें : (ऐ मुनाफ़िक़ो!) तुम मेरे साथ अल्लाह की राह में जिहाद के लिए कभी नहीं निकलोगे। यह तुम्हारे लिए एक सज़ा के तौर पर और तुम्हारे मेरे साथ मौजूद होने से निष्कर्षित होने वाली बुराइयों से बचाव के रूप में है। तुम तबूक के युद्ध में पीछे बैठ रहने पर खुश थे, इसलिए पीछे रहने वाले बीमारों, स्त्रियों और बच्चों के साथ बैठे रहो।
आयत 84
وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰٓ أَحَدٍۢ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًۭا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِۦٓ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ فَـٰسِقُونَ
وَلَا
और ना
تُصَلِّ
आप नमाज़ पढ़िए
عَلَىٰٓ
for
أَحَدٍۢ
किसी एक पर
مِّنْهُم
इनमें से
مَّاتَ
मर जाए (जो)
أَبَدًۭا
कभी भी
وَلَا
और ना
تَقُمْ
आप खड़े हों
عَلَىٰ
by
قَبْرِهِۦٓ ۖ
उसकी क़ब्र पर
إِنَّهُمْ
बेशक उन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِٱللَّهِ
अल्लाह से
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल से
وَمَاتُوا۟
और वो मर गए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
فَـٰسِقُونَ
फ़ासिक़ थे
औऱ उनमें से जिस किसी व्यक्ति की मृत्यु हो उसकी जनाज़े की नमाज़ कभी न पढ़ना और न कभी उसकी क़ब्र पर खड़े होना। उन्होंने तो अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और मरे इस दशा में कि अवज्ञाकारी थे
तफ़्सीर:
इन मुनाफ़िक़ों में से कोई मर जाए, तो (ऐ रसूल!) आप उसका कभी जनाज़ा न पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर उसकी क्षमा की प्रार्थना के लिए खड़े होना। क्योंकि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया है और अल्लाह की अवज्ञा करते हुए मरे हैं। और जो कोई ऐसा हो, उसका न तो जनाज़ा पढ़ा जाएगा और न उसके लिए दुआ की जाएगी।
आयत 85
وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَٰلُهُمْ وَأَوْلَـٰدُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِى ٱلدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَـٰفِرُونَ
وَلَا
और ना
تُعْجِبْكَ
ताज्जुब में डालें आपको
أَمْوَٰلُهُمْ
माल उनके
وَأَوْلَـٰدُهُمْ ۚ
और औलाद उनकी
إِنَّمَا
बेशक
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يُعَذِّبَهُم
वो अज़ाब दे उन्हें
بِهَا
साथ उनके
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَتَزْهَقَ
और निकलें
أَنفُسُهُمْ
जानें उनकी
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كَـٰفِرُونَ
काफ़िर हों
और उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न करें। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें संसार में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे काफ़िर हों
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपको इन मुनाफ़िक़ों के धन तथा उनकी संतान आश्चर्यचकित न करें। अल्लाह तो यह चाहता है कि उन्हें इनके द्वारा सांसारिक जीवन में यातना दे, क्योंकि वे इस रास्ते में आने वाली कठिनाइयों और विपत्तियों को झेलते हैं, और यह कि उनके प्राण उनके शरीर से इस दशा में निकलें कि वे काफ़िर हों।
आयत 86
وَإِذَآ أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ ءَامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَجَـٰهِدُوا۟ مَعَ رَسُولِهِ ٱسْتَـْٔذَنَكَ أُو۟لُوا۟ ٱلطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا۟ ذَرْنَا نَكُن مَّعَ ٱلْقَـٰعِدِينَ
وَإِذَآ
और जब
أُنزِلَتْ
उतारी जाती है
سُورَةٌ
कोई सूरत
أَنْ
कि
ءَامِنُوا۟
ईमान लाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَجَـٰهِدُوا۟
और जिहाद करो
مَعَ
साथ
رَسُولِهِ
उसके रसूल के
ٱسْتَـْٔذَنَكَ
इजाज़त माँगते हैं आपसे
أُو۟لُوا۟
(the) men
ٱلطَّوْلِ
वुसअत वाले
مِنْهُمْ
उनमें से
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
ذَرْنَا
छोड़ दीजिए हमें
نَكُن
कि हम हो जाऐं
مَّعَ
with
ٱلْقَـٰعِدِينَ
साथ बैठने वालों के
और जब कोई सूरा उतरती है कि "अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल के साथ होकर जिहाद करो।" तो उनके सामर्थ्यवान लोग तुमसे छुट्टी माँगने लगते है और कहते है कि "हमें छोड़ दो कि हम बैठनेवालों के साथ रह जाएँ।"
तफ़्सीर:
तथा जब अल्लाह अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर कोई सूरत उतारता है, जिसमें अल्लाह पर ईमान लाने तथा उसके रास्ते में जिहाद करने का आदेश होता है, तो उन मुनाफ़िक़ों में से धनवान लोग आपसे पीछे रहने की अनुमति माँगते हैं और कहते हैं : आप हमें छोड़ दें कि हम कमज़ोरों और अपाहिजों जैसे बहाने वाले लोगों के साथ पीछे रह जाएँ।
आयत 87
رَضُوا۟ بِأَن يَكُونُوا۟ مَعَ ٱلْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ
رَضُوا۟
वो राज़ी हो गए
بِأَن
कि
يَكُونُوا۟
वो हों
مَعَ
with
ٱلْخَوَالِفِ
साथ पीछे रहने वालों के
وَطُبِعَ
और मोहर लगा दी गई
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يَفْقَهُونَ
नहीं वो समझते
वे इसी पर राज़ी हुए कि पीछे रह जानेवाली स्त्रियों के साथ रह जाएँ और उनके दिलों पर तो मुहर लग गई है, अतः वे समझते नहीं
तफ़्सीर:
इन मुनाफ़िक़ों ने अपने लिए अपमान और रुसवाई को पसंद कर लिया, जब वे बहाने वाले लोगों के साथ (जिहाद से) पीछे रह जाने पर संतुष्ट हो गए, तथा अल्लाह ने उनके कुफ़्र एवं निफ़ाक़ के कारण उनके दिलों पर मुहर लगा दी। अतः वे नहीं जानते कि किस चीज़ में उनका हित है।
आयत 88
لَـٰكِنِ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ جَـٰهَدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلْخَيْرَٰتُ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
لَـٰكِنِ
लेकिन
ٱلرَّسُولُ
रसूल
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
جَـٰهَدُوا۟
उन्होंने जिहाद किया
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों के
وَأَنفُسِهِمْ ۚ
और अपनी जानों के
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
لَهُمُ
जिनके लिए
ٱلْخَيْرَٰتُ ۖ
भलाईयाँ हैं
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
किन्तु, रसूल और उसके ईमानवाले साथियों ने अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया, और वही लोग है जिनके लिए भलाइयाँ है और वही लोग है जो सफल है
तफ़्सीर:
जहाँ तक रसूल और उनके साथ के ईमान वालों का सवाल है, तो वे इन लोगों की तरह अल्लाह के मार्ग में जिहाद से पीछे नहीं रहे। बल्कि उन्होंने अल्लाह के मार्ग में अपने धन तथा प्राण के साथ जिहाद किया। जिसके परिणामस्वरूप अल्लाह के पास उनका बदला उनके लिए सांसारिक लाभों की प्राप्ति था जैसे कि विजय और ग़नीमत के धन, तथा परलोक में भी लाभ प्राप्त होगा, जिसमें जन्नत में प्रवेश, वांछित उद्देश्य की प्राप्ति और भय से मुक्ति शामिल है।
आयत 89
أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
أَعَدَّ
तैयार कर रखा है
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात को
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उनमें
ذَٰلِكَ
यही है
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनके नीचे नहरें बह रह हैं, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनके लिए ऐसे स्वर्ग तैयार किए हैं, जिनके महलों के नीचे से नहरें बहती हैं। वे वहाँ हमेशा के लिए रहेंगे, कभी भी नष्ट नहीं होंगे। यही बदला ही वह बड़ी सफलता है, जिसके बराबर कोई सफलता नहीं हो सकती।
आयत 90
وَجَآءَ ٱلْمُعَذِّرُونَ مِنَ ٱلْأَعْرَابِ لِيُؤْذَنَ لَهُمْ وَقَعَدَ ٱلَّذِينَ كَذَبُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ ۚ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَجَآءَ
और आ गए
ٱلْمُعَذِّرُونَ
उज़र करने वाले
مِنَ
of
ٱلْأَعْرَابِ
बदवियों/देहातियों में से
لِيُؤْذَنَ
कि इजाज़त दी जाए
لَهُمْ
उन्हें
وَقَعَدَ
और बैठ गए
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَبُوا۟
झूठ बोला
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَرَسُولَهُۥ ۚ
और उसके रसूल से
سَيُصِيبُ
अनक़रीब पहुँचेगा
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنْهُمْ
उनमें से
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
बहाने करनेवाले बद्दूल भी आए कि उन्हें (बैठे रहने की) छुट्टी मिल जाए। और जो अल्लाह और उसके रसूल से झूठ बोले वे भी बैठे रहे। उनमें से जिन्होंने इनकार किया उन्हें शीघ्र ही एक दुखद यातना पहुँचकर रहेगी
तफ़्सीर:
मदीना और उसके आस-पास के देहातियों में से कुछ लोग, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बहाने लेकर आए, ताकि आप उन्हें अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए निकलने से पीछे रहने की अनुमति प्रदान कर दें। जबकि कुछ अन्य लोग भी पीछे रह गए, जिन्होंने जिहाद में न निकलने का बिल्कुल भी कोई बहाना पेश नहीं किया; क्योंकि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सच्चा नहीं मानते थे और अल्लाह के वादे पर विश्वास नहीं करते थे। ये लोग अपने इस कुफ़्र के कारण एक दर्दनाक और कष्टदायी यातना से पीड़ित होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जिहाद में पीछे रह जाने वालों की मज़म्मत है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक्त में साथ न देना बाद में पछतावे का सबब बनता है।
आयत 91
لَّيْسَ عَلَى ٱلضُّعَفَآءِ وَلَا عَلَى ٱلْمَرْضَىٰ وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ مَا يُنفِقُونَ حَرَجٌ إِذَا نَصَحُوا۟ لِلَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۚ مَا عَلَى ٱلْمُحْسِنِينَ مِن سَبِيلٍۢ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
لَّيْسَ
नहीं है
عَلَى
on
ٱلضُّعَفَآءِ
ज़ईफ़ों पर
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلْمَرْضَىٰ
मरीज़ों पर
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
لَا
not
يَجِدُونَ
नहीं वो पाते
مَا
वो (चीज़) जो
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करें
حَرَجٌ
कोई हरज
إِذَا
जब
نَصَحُوا۟
वो ख़ैरख़्वाही करें
لِلَّهِ
वास्ते अल्लाह के
وَرَسُولِهِۦ ۚ
और उसके रसूल के
مَا
नहीं है
عَلَى
(is) on
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों पर
مِن
any
سَبِيلٍۢ ۚ
कोई मुआख़ज़ा
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
बहुत रहम करने वाला है
न तो कमज़ोरों के लिए कोई दोष की बात है और न बीमारों के लिए और न उन लोगों के लिए जिन्हें ख़र्च करने के लिए कुछ प्राप्त नहीं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठावान हों। उत्तमकारों पर इलज़ाम की कोई गुंजाइश नहीं है। अल्लाह तो बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
महिलाओं, बच्चों, बीमारों, बुज़ुर्गों, अंधों और उन गरीबों पर जिनके पास युद्ध की तैयारी में खर्च करने को कुछ नहीं होता, इन सभी लोगों पर जिहाद में निकलने से पीछे रहने में कोई गुनाह नहीं है; क्योंकि उनके पास उचित बहाने मौजूद हैं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठावान हों और उसकी शरीयत पर अमल करें। इन बहाने वालों में से भलाई करने वालों को दंडित करने के लिए कोई रास्ता नहीं है। और अल्लाह भलाई करने वालों के पापों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 92
وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ إِذَا مَآ أَتَوْكَ لِتَحْمِلَهُمْ قُلْتَ لَآ أَجِدُ مَآ أَحْمِلُكُمْ عَلَيْهِ تَوَلَّوا۟ وَّأَعْيُنُهُمْ تَفِيضُ مِنَ ٱلدَّمْعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُوا۟ مَا يُنفِقُونَ
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
إِذَا
when
مَآ
जब भी
أَتَوْكَ
वो आए आपके पास
لِتَحْمِلَهُمْ
ताकि आप सवार करें उन्हें
قُلْتَ
कहा आपने
لَآ
Not
أَجِدُ
नहीं मैं पाता
مَآ
वो जो
أَحْمِلُكُمْ
मैं सवार करुँ तुम्हें
عَلَيْهِ
जिस पर
تَوَلَّوا۟
वो पलट गए
وَّأَعْيُنُهُمْ
और आँखें उनकी
تَفِيضُ
बह रही थीं
مِنَ
[of]
ٱلدَّمْعِ
आँसुओं से
حَزَنًا
ग़म की वजह से
أَلَّا
कि नहीं
يَجِدُوا۟
वो पाते
مَا
जो
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च कर सकें
और न उन लोगों पर आक्षेप करने की कोई गुंजाइश है जिनका हाल यह है कि जब वे तुम्हारे पास आते है, कि तुम उनके लिए सवारी का प्रबन्ध कर दो, तुम कहते हो, "मुझे ऐसा कुछ प्राप्त नहीं जिसपर तुम्हें सवार करूँ।" वे इस दशा में लौटते है कि इस ग़म में उनकी आँखे आँसू बहा रही होती है कि वे अपने पास ख़र्च करने को कुछ नहीं पाते
तफ़्सीर:
इसी तरह आपसे पीछे रहने वाले उन लोगों पर भी कोई पाप नहीं है, कि जब वे (ऐ रसूल!) आपके पास यह अनुरोध लेकर आए कि आप उनके लिए सवारी का प्रबंध कर दें, और आपने उनसे कहा कि मैं तुम्हारे लिए सवारी की व्यवस्था करने के लिए कुछ नहीं पाता; तो वे आपके पास से इस दशा में वापस हुए कि उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, उन्हें इस बात का अफसोस था कि उन्हें खुद अपने पास से या आपके पास से वह नहीं मिला जो वे खर्च करें।
आयत 93
۞ إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَسْتَـْٔذِنُونَكَ وَهُمْ أَغْنِيَآءُ ۚ رَضُوا۟ بِأَن يَكُونُوا۟ مَعَ ٱلْخَوَالِفِ وَطَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
۞ إِنَّمَا
बेशक
ٱلسَّبِيلُ
मुआख़ज़ा तो
عَلَى
(is) on
ٱلَّذِينَ
उन पर है जो
يَسْتَـْٔذِنُونَكَ
इजाज़त तलब करते हैं आपसे
وَهُمْ
हालाँकि वो
أَغْنِيَآءُ ۚ
ग़नी हैं
رَضُوا۟
वो राज़ी हो गए
بِأَن
कि
يَكُونُوا۟
हों वो
مَعَ
with
ٱلْخَوَالِفِ
साथ पीछे रहने वालों के
وَطَبَعَ
और मोहर लगा दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
इल्ज़ाम तो बस उनपर है जो धनवान होते हुए तुमसे छुट्टी माँगते है। वे इसपर राज़ी हुए कि पीछे डाले गए लोगों के साथ रह जाएँ। अल्लाह ने तो उनके दिलों पर मुहर लगा दी है, इसलिए वे जानते नहीं
तफ़्सीर:
जब अल्लाह ने यह स्पष्ट कर दिया कि बहाने वाले लोगों को दंडित करने का कोई रास्ता नहीं है, तो उन लोगों का उल्लेख किया, जो दंड और पकड़ के योग्य हैं। चुनाँचे फरमाया : सज़ा और पकड़ के हक़दार वे लोग हैं, जो (ऐ रसूल!) आपसे युद्ध से पीछे रहने की अनुमति माँगते हैं। हालाँकि उनके पास युद्ध की तैयारी के साधन मौजूद हैं। उन्होंने घरों में पीछे रहने वाली स्त्रियों के साथ रहकर अपने लिए अपमान और रुसवाई से संतुष्ट हो गए, तथा अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी। अतः कोई उपदेश उनपर असर नहीं करता। और इस मुहर लगने के कारण उन्हें पता ही नहीं है कि कौन-सा काम उनके हित में है ताकि उसे अपनाएँ और किसमें उनका अहित है ताकि उससे दूर रहें।
आयत 94
يَعْتَذِرُونَ إِلَيْكُمْ إِذَا رَجَعْتُمْ إِلَيْهِمْ ۚ قُل لَّا تَعْتَذِرُوا۟ لَن نُّؤْمِنَ لَكُمْ قَدْ نَبَّأَنَا ٱللَّهُ مِنْ أَخْبَارِكُمْ ۚ وَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُۥ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَىٰ عَـٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
يَعْتَذِرُونَ
वो उज़र पेश करेंगे
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
إِذَا
जब
رَجَعْتُمْ
लौटोगे तुम
إِلَيْهِمْ ۚ
तरफ़ उनके
قُل
कह दीजिए
لَّا
(Do) not
تَعْتَذِرُوا۟
ना तुम उज़र पेश करो
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम ऐतबार करेंगे
لَكُمْ
तुम्हारा
قَدْ
तहक़ीक़
نَبَّأَنَا
बता दीं हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنْ
of
أَخْبَارِكُمْ ۚ
बाज़ ख़बरें तुम्हारी
وَسَيَرَى
और अनक़रीब देखेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَمَلَكُمْ
अमल तुहारा
وَرَسُولُهُۥ
और उसका रसूल (भी)
ثُمَّ
फिर
تُرَدُّونَ
तुम लौटाए जाओगे
إِلَىٰ
to
عَـٰلِمِ
तरफ़ जानने वाले
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब
وَٱلشَّهَـٰدَةِ
और हाज़िर के
فَيُنَبِّئُكُم
फिर वो बताएगा तुम्हें
بِمَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
जब तुम पलटकर उनके पास पहुँचोगे तो वे तुम्हारे सामने बहाने करेंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म्हारी बात कदापि नहीं मानेंगे। हमें अल्लाह ने तुम्हारे वृत्तांत बता दिए है। अभी अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारे काम को देखेगा, फिर तुम उसकी ओर लौटोगे, जो छिपे और खुले का ज्ञान रखता है। फिर जो कुछ तुम करते रहे हो वह तुम्हे बता देगा।"
तफ़्सीर:
जिहाद से पीछे रह जाने वाले मुनाफिक़, मुसलमानों के जिहाद से लौटने के समय, उनके सामने कमज़ोर और बेतुके बहाने पेश करेंगे। ऐसे में, अल्लाह अपने नबी और मोमिनों को उन्हें यह जवाब देने का निर्देश देता है : झूठे बहाने मत करो, जो कुछ तुमने हमें बताया है हम कदापि उसपर विश्वास नहीं करेंगे। अल्लाह ने हमें तुम्हारे दिलों की कुछ बातें बता दी हैं। अल्लाह और उसके रसूल देखेंगे : क्या तुम लोग तौबा करते हो, ताकि अल्लाह तुम्हारी तौबा स्वीकार कर ले, या तुम अपने निफ़ाक़ ही पर जमे रहते हो? फिर तुम अल्लाह की ओर लौटाए जाओगे, जो हर चीज़ का ज्ञान रखता है। तो वह तुम्हें बताएगा जो कुछ तुम किया करते थे और तुम्हें उसका बदला देगा। अतः तुम तौबा और सत्कर्म में जल्दी करो।
आयत 95
سَيَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمْ إِذَا ٱنقَلَبْتُمْ إِلَيْهِمْ لِتُعْرِضُوا۟ عَنْهُمْ ۖ فَأَعْرِضُوا۟ عَنْهُمْ ۖ إِنَّهُمْ رِجْسٌۭ ۖ وَمَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
سَيَحْلِفُونَ
अनक़रीब वो क़समें खाऐंगे
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
إِذَا
जब
ٱنقَلَبْتُمْ
लौटोगे तुम
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
لِتُعْرِضُوا۟
ताकि तुम ऐराज़ करो
عَنْهُمْ ۖ
उनसे
فَأَعْرِضُوا۟
तो ऐराज़ कर लो
عَنْهُمْ ۖ
उनसे
إِنَّهُمْ
क्योंकि वो
رِجْسٌۭ ۖ
गंदगी हैं
وَمَأْوَىٰهُمْ
और ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ
जहन्नम है
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
उसका जो
كَانُوا۟
हैं वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
जब तुम पलटकर उनके पास जाओगे तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो। तो तुम उन्हें छोड़ ही दो। निश्चय ही वे गन्दगी है और उनका ठिकाना जहन्नम है। जो कुछ वे कमाते रहे है, यह उसी का बदला है
तफ़्सीर:
ये पीछे रह जाने वाले लोग, जब (ऐ ईमान वालो!) तुम उनकी ओर वापस जाओगे तो अपने झूठे बहानों की पुष्टि के लिए, अल्लाह की क़समें खाएँगे; ताकि तुम उनकी भर्त्सना और निंदा करने से रुक जाओ। अतः आप उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दें, क्रोधित व्यक्ति के छोड़ने की तरह। निश्चय ये अशुद्ध और दुष्ट हृदय वाले हैं और इनका ठिकाना जहाँ ये शरण लेंगे, जहन्नम है। यह बदला है उस पाखंड और पाप का, जो वे कमाया करते थे।
आयत 96
يَحْلِفُونَ لَكُمْ لِتَرْضَوْا۟ عَنْهُمْ ۖ فَإِن تَرْضَوْا۟ عَنْهُمْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَرْضَىٰ عَنِ ٱلْقَوْمِ ٱلْفَـٰسِقِينَ
يَحْلِفُونَ
वो क़समें खाऐंगे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
لِتَرْضَوْا۟
ताकि तुम राज़ी हो जाओ
عَنْهُمْ ۖ
उनसे
فَإِن
फिर अगर
تَرْضَوْا۟
तुम राज़ी हो भी जाओ
عَنْهُمْ
उनसे
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(is) not pleased
يَرْضَىٰ
नहीं वो राज़ी होता
عَنِ
with
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلْفَـٰسِقِينَ
जो फ़ासिक़ हैं
वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उनसे राज़ी हो जाओ, किन्तु यदि तुम उनसे राज़ी भी हो गए तो अल्लाह ऐसे लोगो से कदापि राज़ी न होगा, जो अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) ये पीछे रह जाने वाले लोग, तुम्हारे आगे क़समें खाएँगे; ताकि तुम उनसे खुश हो जाओ और उनके बहाने स्वीकार कर लो। पर तुम उनसे खुश न होना। यदि तुम उनसे खुश हो गए, तो तुम अपने पालनहार की अवहेलना करने वाले ठहरोगे। क्योंकि अल्लाह कुफ़्र और निफ़ाक़ के द्वारा उसकी आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले लोगों से खुश नहीं होता। अतः (ऐ मुसलमानो!) ऐसे लोगों से खुश होने से सावधान रहो, जिनसे अल्लाह प्रसन्न नहीं होता।
आयत 97
ٱلْأَعْرَابُ أَشَدُّ كُفْرًۭا وَنِفَاقًۭا وَأَجْدَرُ أَلَّا يَعْلَمُوا۟ حُدُودَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
ٱلْأَعْرَابُ
देहाती/बदवी
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त हैं
كُفْرًۭا
कुफ़्र
وَنِفَاقًۭا
और निफ़ाक़ में
وَأَجْدَرُ
और ज़्यादा लायक़ हैं
أَلَّا
कि ना
يَعْلَمُوا۟
वो जानें
حُدُودَ
हुदूद को
مَآ
उसकी जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
to
رَسُولِهِۦ ۗ
अपने रसूल पर
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
बहुत हिकमत वाला है
वे बद्दूग इनकार और कपटाचार में बहुत-ही बढ़े हुए है। और इसी के ज़्यादा योग्य है कि उनकी सीमाओं से अनभिज्ञ रहें, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल पर अवतरित किया है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
देहात के रहने वाले यदि अविश्वास या पाखंड के मार्ग पर चल पड़ें, तो उनका कुफ्र अन्य शहरी क्षेत्र के लोगों के कुफ़्र से अधिक गंभीर और उनका पाखंड उन लोगों की तुलना में अधिक सख़्त होगा। तथा ये लोग इस बात के अधिक योग्य हैं कि धर्म से अनभिज्ञ हों और इनके बारे में इस बात की अधिक संभावना है कि धार्मिक कर्तव्यों, सुन्नतों तथा उन आदेशों के नियमों को न जानें, जिन्हें अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारा है। क्योंकि वे उजड्डपन, अक्खड़पन और लोगों के साथ मेल-मिलाप और संपर्क के अभाव से पीड़ित हैं। अल्लाह उनकी स्थितियों को जानने वाला है। उनकी कोई बात उससे छिपी नहीं है। वह अपने प्रबंधन और अपने विधान में हिकमत वाला है।
आयत 98
وَمِنَ ٱلْأَعْرَابِ مَن يَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ مَغْرَمًۭا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ ٱلدَّوَآئِرَ ۚ عَلَيْهِمْ دَآئِرَةُ ٱلسَّوْءِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
وَمِنَ
And among
ٱلْأَعْرَابِ
और देहातियों/बदवियों में से
مَن
कोई है जो
يَتَّخِذُ
बना लेता है
مَا
उसे जो
يُنفِقُ
वो ख़र्च करता है
مَغْرَمًۭا
तावान
وَيَتَرَبَّصُ
और वो इन्तिज़ार करता है
بِكُمُ
तुम्हारे बारे में
ٱلدَّوَآئِرَ ۚ
गर्दिशों का
عَلَيْهِمْ
उन पर है
دَآئِرَةُ
गर्दिश
ٱلسَّوْءِ ۗ
बुरी
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
खूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
और कुछ बद्दूज ऐसे है कि वे जो कुछ ख़र्च करते है, उसे तावान समझते है और तुम्हारे हक़ मं बुरी गर्दिशों (बुरे दिन) की प्रतीक्षा में हैं, बुरी गर्दिश में तो वही है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
देहात में रहने वाले पाखंडियों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अल्लाह के मार्ग में खर्च किए हुए धन को घाटा और जुर्माना समझते हैं, क्योंकि उनका भ्रम है कि यदि उन्होंने खर्च किया तो उन्हें प्रतिफल नहीं मिलेगा और अगर खर्च नहीं किया तो अल्लाह उन्हें दंडित नहीं करेगा। किंतु इसके बावजूद कभी-कभी दिखावा और अपने बचाव के लिए खर्च कर देते हैं। वे इस बात की प्रतीक्षा में रहते हैं कि (ऐ ईमान वालो!) तुमपर कोई बुराई उतर पड़े और उन्हें तुमसे छुटकारा मिल जाए। वे जिस बुराई और गंभीर परिणाम वाले कालचक्र के मुसलमानों पर उतरने की कामना कर रहे हैं, अल्लाह उसे ईमान वालों के बजाय, स्वयं उन्हीं पर उतार दे। वे जो कुछ कहते हैं अल्लाह उसे सुनने वाला और जो कुछ छिपाते हैं उसे जानने वाला है।
आयत 99
وَمِنَ ٱلْأَعْرَابِ مَن يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ قُرُبَـٰتٍ عِندَ ٱللَّهِ وَصَلَوَٰتِ ٱلرَّسُولِ ۚ أَلَآ إِنَّهَا قُرْبَةٌۭ لَّهُمْ ۚ سَيُدْخِلُهُمُ ٱللَّهُ فِى رَحْمَتِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَمِنَ
But among
ٱلْأَعْرَابِ
और देहातियों/बदवियों में से
مَن
कोई है जो
يُؤْمِنُ
ईमान रखता है
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَيَتَّخِذُ
और वो बना लेता है
مَا
उसे जो
يُنفِقُ
वो ख़र्च करता है
قُرُبَـٰتٍ
क़ुरबतों (का ज़रिया)
عِندَ
with
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
وَصَلَوَٰتِ
और दुआओं का
ٱلرَّسُولِ ۚ
रसूल की
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهَا
बेशक वो
قُرْبَةٌۭ
क़ुरबत (का ज़रिया) है
لَّهُمْ ۚ
उनके लिए
سَيُدْخِلُهُمُ
अनक़रीब दाख़िल करेगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِى
to
رَحْمَتِهِۦٓ ۗ
अपनी रहमत में
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
बहुत रहम करने वाला है
और बद्दु,ओं में ऐसे भी लोग है जो अल्लाह और अन्तिम दिन को मानते है और जो कुछ ख़र्च करते है, उसे अल्लाह के यहाँ निकटताओं का और रसूल की दुआओं को प्राप्त करने का साधन बनाते है। हाँ! निस्संदेह वह उनके हक़ में निकटता ही है। अल्लाह उन्हें शीघ्र ही अपनी दयालुता में दाख़िल करेगा। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
देहात में रहने वालों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो अल्लाह पर तथा क़ियामत के दिन पर ईमान रखते हैं और अल्लाह के रास्ते में जो धन खर्च करते हैं, उसे अल्लाह की निकटता प्राप्त करने का ज़रिया तथा रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दुआ और क्षमायाचना की प्राप्ति का साधन समझते हैं। सुन लो, उसका अल्लाह के रास्ते में खर्च करना और रसूल का उसके लिए दुआ करना, निश्चय ही उसके लिए अल्लाह के पास निकटता प्राप्त करने का साधन है, जिसका अल्लाह के पास उसे यह प्रतिफल मिलेगा कि अल्लाह उसे अपनी विशाल दया में प्रवेश करेगा, जिसमें उसकी क्षमा और उसकी जन्नत शामिल है। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 100
وَٱلسَّـٰبِقُونَ ٱلْأَوَّلُونَ مِنَ ٱلْمُهَـٰجِرِينَ وَٱلْأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحْسَـٰنٍۢ رَّضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى تَحْتَهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
وَٱلسَّـٰبِقُونَ
और सबक़त करने वाले
ٱلْأَوَّلُونَ
सब से पहले
مِنَ
among
ٱلْمُهَـٰجِرِينَ
मुहाजिरीन में से
وَٱلْأَنصَارِ
और अन्सार में से
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱتَّبَعُوهُم
पैरवी की उनकी
بِإِحْسَـٰنٍۢ
साथ एहसान के
رَّضِىَ
राज़ी हो गया
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَنْهُمْ
उनसे
وَرَضُوا۟
और वो राज़ी हो गए
عَنْهُ
उससे
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात को
تَجْرِى
बहती हैं
تَحْتَهَا
नीचे उनके
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उसमें
أَبَدًۭا ۚ
हमेशा-हमेशा
ذَٰلِكَ
यही है
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
सबसे पहले आगे बढ़नेवाले मुहाजिर और अनसार और जिन्होंने भली प्रकार उनका अनुसरण किया, अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। और उसने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे है, जिनके नीचे नहरें बह रही है, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने सबसे पहले ईमान लाने में जल्दी की, चाहे वे मुहाजिरीन हों, जो अपना घर और देश छोड़कर अल्लाह की ओर निकल पड़े, या अंसार, जिन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मदद की, तथा वे लोग जिन्होंने अक़ीदा, कथनों और कर्मों में अच्छाई के साथ ईमान की ओर पहल करने वाले मुहाजिरीन और अंसार का अनुसरण किया - अल्लाह इन सभी लोगों से खुश हो गया और उनकी आज्ञाकारिता को स्वीकार कर लिया, तथा वे लोग भी उससे प्रसन्न हो गए, क्योंकि उसने उन्हें अपना महान प्रतिफल प्रदान किया और उनके लिए ऐसी जन्नतें तैयार कर रखी हैं, जिनके महलों के नीचे नहरें बहती हैं, जिनमें वे सदैव रहने वाले हैं। यह बदला ही महान सफलता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सच्चे मजबूर लोगों की माफी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो सच में मजबूर हों उनके उज़्र को समझना चाहिए, हर किसी को एक ही तराज़ू से नहीं तौलना चाहिए।
आयत 101
وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْأَعْرَابِ مُنَـٰفِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ ٱلْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا۟ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍۢ
وَمِمَّنْ
और उनमें से जो
حَوْلَكُم
तुम्हारे आस पास हैं
مِّنَ
of
ٱلْأَعْرَابِ
देहातियों/बदवियों में से
مُنَـٰفِقُونَ ۖ
कुछ मुनाफ़िक़ हैं
وَمِنْ
and (also) from
أَهْلِ
और कुछ रहने वालों में से
ٱلْمَدِينَةِ ۖ
मदीना के
مَرَدُوا۟
जो अड़ गए हैं
عَلَى
in
ٱلنِّفَاقِ
मुनाफ़िक़त पर
لَا
not
تَعْلَمُهُمْ ۖ
नहीं तुम जानते उन्हें
نَحْنُ
हम
نَعْلَمُهُمْ ۚ
जानते हैं उन्हें
سَنُعَذِّبُهُم
अनक़रीब हम अज़ाब देंगे उन्हें
مَّرَّتَيْنِ
दो बार
ثُمَّ
फिर
يُرَدُّونَ
वो लौटाए जाऐंगे
إِلَىٰ
to
عَذَابٍ
तरफ़ अज़ाब
عَظِيمٍۢ
बहुत बड़े के
और तुम्हारे आस-पास के बद्दुनओं में और मदीनावालों में कुछ ऐसे कपटाचारी है जो कपट-नीति पर जमें हुए है। उनको तुम नहीं जानते, हम उन्हें भली-भाँति जानते है। शीघ्र ही हम उन्हें दो बार यातना देंगे। फिर वे एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे
तफ़्सीर:
देहात के वासियों में से जो लोग मदीना के आस-पास हैं, उनमें से कुछ लोग मुनाफ़िक़ हैं और मदीना वालों में से भी कुछ लोग मुनाफ़िक़ हैं, जो निफाक़ पर क़ायम और उसपर जमे हुए हैं। (ऐ रसूल!) आप उन्हें नहीं जानते, अल्लाह ही उन्हें भली-भाँति जानता है। शीघ्र ही अल्लाह उन्हें दो बार यातना देगा : एक बार दुनिया में उनके पाखंड को उजागर करके तथा उन्हें क़त्ल किए जाने और बंदी बनाए जाने के द्वारा, तथा दूसरी बार आख़िरत में क़ब्र की यातना देकर। फिर वे क़ियामत के दिन जहन्नम के पाताल में एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे।
आयत 102
وَءَاخَرُونَ ٱعْتَرَفُوا۟ بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا۟ عَمَلًۭا صَـٰلِحًۭا وَءَاخَرَ سَيِّئًا عَسَى ٱللَّهُ أَن يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
وَءَاخَرُونَ
और कुछ दूसरे
ٱعْتَرَفُوا۟
जिन्होंने ऐतराफ़ किया
بِذُنُوبِهِمْ
अपने गुनाहों का
خَلَطُوا۟
उन्होंने मिला दिए
عَمَلًۭا
कुछ अमल
صَـٰلِحًۭا
नेक
وَءَاخَرَ
और दूसरे
سَيِّئًا
बुरे
عَسَى
उम्मीद है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يَتُوبَ
वो मेहरबान हो
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
और दूसरे कुछ लोग है जिन्होंने अपने गुनाहों का इक़रार किया। उन्होंने मिले-जुले कर्म किए, कुछ अच्छे और कुछ बुरे। आशा है कि अल्लाह की कृपा-स्पष्ट उनपर हो। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
तथा मदीना वालों में से कुछ अन्य लोग भी हैं, जो बिना किसी कारण (बहाने) के युद्ध से पीछे रह गए। लेकिन उन्होंने झूठे बहाने बनाने के बजाय, स्वयं स्वीकार कर लिया कि उनके पास (युद्ध में शामिल न होने का) कोई कारण (बहाना) नहीं था। उन्होंने अपने पिछले अच्छे कर्मों, जैसे अल्लाह की आज्ञाकारिता करने, उसके नियमों का पालन करने और उसके मार्ग में जिहाद करने के साथ एक बुरे काम को मिला दिया। उन्हें आशा है कि अल्लाह उनके पश्चाताप को स्वीकार करेगा और उन्हें क्षमा कर देगा। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 103
خُذْ مِنْ أَمْوَٰلِهِمْ صَدَقَةًۭ تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ ۖ إِنَّ صَلَوٰتَكَ سَكَنٌۭ لَّهُمْ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
خُذْ
ले लीजिए
مِنْ
from
أَمْوَٰلِهِمْ
उनके मालों में से
صَدَقَةًۭ
सदक़ा
تُطَهِّرُهُمْ
आप पाक कीजिए उन्हें
وَتُزَكِّيهِم
और आप तज़किया कीजिए उनका
بِهَا
साथ उसके
وَصَلِّ
और दुआए रहमत कीजिए
عَلَيْهِمْ ۖ
उनके हक़ में
إِنَّ
बेशक
صَلَوٰتَكَ
दुआ आपकी
سَكَنٌۭ
सुकून का ज़रिया है
لَّهُمْ ۗ
उनके लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
तुम उनके माल में से दान लेकर उन्हें शुद्ध करो और उनके द्वारा उन (की आत्मा) को विकसित करो और उनके लिए दुआ करो। निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिए सर्वथा परितोष है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनके मालों में से ज़कात लें, जिसके द्वारा आप उन्हें अवज्ञा और पापों की गंदगी से शुद्ध करें और उसके साथ उनके अच्छे कर्मों को विकसित करें। तथा उसे उनसे लेने के बाद, उनके लिए दुआ करें। निःसंदेह आपकी दुआ उनके लिए दया और संतोष का कारण है। अल्लाह आपकी दुआ को सुनने वाला, उनके कार्यों और इरादों को जानने वाला है।
आयत 104
أَلَمْ يَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ يَقْبَلُ ٱلتَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِۦ وَيَأْخُذُ ٱلصَّدَقَـٰتِ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَعْلَمُوٓا۟
वो जानते
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही
يَقْبَلُ
वो क़ुबूल करता है
ٱلتَّوْبَةَ
तौबा को
عَنْ
from
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों से
وَيَأْخُذُ
और वो ले लेता है
ٱلصَّدَقَـٰتِ
सदक़ात
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह ही अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और सदक़े लेता है और यह कि अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
जिहाद से पीछे रह जाने वालों और पश्चाताप करके अल्लाह की ओर लौटने वालों को पता होना चाहिए कि अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा क़बूल करता है, और यह कि वह दान को स्वीकार करता है, जबकि उसे उसकी कोई आवश्यकता नहीं है, तथा दान करने वाले को उसके दान का सवाब देता है। निःसंदेह पवित्र अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 105
وَقُلِ ٱعْمَلُوا۟ فَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُۥ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۖ وَسَتُرَدُّونَ إِلَىٰ عَـٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَقُلِ
और कह दीजिए
ٱعْمَلُوا۟
अमल करो
فَسَيَرَى
पस अनक़रीब देखेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَمَلَكُمْ
अमल तुम्हारा
وَرَسُولُهُۥ
और रसूल उसका
وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۖ
और अहले ईमान भी
وَسَتُرَدُّونَ
और अनक़रीब तुम लौटाए जाओगो
إِلَىٰ
to
عَـٰلِمِ
तरफ़ जानने वाले
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब
وَٱلشَّهَـٰدَةِ
और हाज़िर के
فَيُنَبِّئُكُم
फिर वो बताएगा तुम्हें
بِمَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
कह दो, "कर्म किए जाओ। अभी अल्लाह और उसका रसूल और ईमानवाले तुम्हारे कर्म को देखेंगे। फिर तुम उसकी ओर पलटोगे, जो छिपे और खुले को जानता है। फिर जो कुछ तम करते रहे हो, वह सब तुम्हें बता देगा।"
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप इन जिहाद से पीछे रह जाने वालों और अपने पाप से तौबा करने वालों से कह दीजिए : जो चीज़ तुमसे छूट गई है, उसके नुक़सान की भरपाई करो, अपने कार्यों को अल्लाह के लिए ख़ालिस (विशुद्ध) रखो और उसे प्रसन्न करने वाले कार्य करो। अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वाले तुम्हारे कार्यों को देखेंगे। तथा क़ियामत के दिन तुम अपने पालनहार की ओर लौटाए जाओगे, जो हर चीज़ का ज्ञान रखता है। वह जानता है जो कुछ तुम गुप्त रखते हो और जो कुछ तुम प्रदर्शित करते हो। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम दुनिया में किया करते थे और तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 106
وَءَاخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِأَمْرِ ٱللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
وَءَاخَرُونَ
और कुछ दूसरे
مُرْجَوْنَ
जो मुअख़्ख़र रखे गए हैं
لِأَمْرِ
हुक्म के लिए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِمَّا
ख़्वाह
يُعَذِّبُهُمْ
वो अज़ाब दे उन्हें
وَإِمَّا
और ख़्वाह
يَتُوبُ
वो मेहरबान हो
عَلَيْهِمْ ۗ
उन पर
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
बहुत हिकमत वाला है
और कुछ दूसरे लोग भी है जिनका मामला अल्लाह का हुक्म आने तक स्थगित है, चाहे वह उन्हें यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तबूक की लड़ाई से पीछे रहने वालों में से कुछ दूसरे लोग भी हैं, जिनके पास कोई बहाना नहीं था। इनका मामला अल्लाह का फ़ैसला और इनके बारे में उसका आदेश आने तक स्थगित कर दिया गया है। अल्लाह उनके बारे में जो चाहे, फैसला करे : या तो वह उन्हें दंडित करे यदि वे तौबा न करें, या उनकी तौबा स्वीकार करे अगर वे तौबा कर लें। अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके दंड का हक़दार है और कौन उसकी क्षमा के योग्य है। वह अपने विधान और प्रबंधन में हिकमत वाला है। ये लोग : मुरारा बिन रबी', कअब बिन मालिक और हिलाल बिन उमैया थे।
आयत 107
وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مَسْجِدًۭا ضِرَارًۭا وَكُفْرًۭا وَتَفْرِيقًۢا بَيْنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًۭا لِّمَنْ حَارَبَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ مِن قَبْلُ ۚ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَآ إِلَّا ٱلْحُسْنَىٰ ۖ وَٱللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना ली
مَسْجِدًۭا
एक मस्जिद
ضِرَارًۭا
ज़रर पहुँचाने के लिए
وَكُفْرًۭا
और कुफ़्र के लिए
وَتَفْرِيقًۢا
और जुदाई डालने के लिए
بَيْنَ
among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
दर्मियान ईमान वालों के
وَإِرْصَادًۭا
और घात लगाने के लिए
لِّمَنْ
उस शख़्स के लिए जिसने
حَارَبَ
जंग की
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल से
مِن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
وَلَيَحْلِفُنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर क़समें खाऐंगे
إِنْ
नहीं
أَرَدْنَآ
इरादा किया था हमने
إِلَّا
मगर
ٱلْحُسْنَىٰ ۖ
भलाई का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَشْهَدُ
वो गवाही देता है
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
और कुछ ऐसे लोग भी हैं , जिन्होंने मस्जिद बनाई इसलिए कि नुक़सान पहुँचाएँ और कुफ़्र करें और इसलिए कि ईमानवालों के बीच फूट डाले और उस व्यक्ति के घात लगाने का ठिकाना बनाएँ, जो इससे पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ चुका है। वे निश्चय ही क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है
तफ़्सीर:
तथा मुनाफ़िक़ो में से वे लोग भी हैं, जिन्होंने एक मस्जिद बनाई पर अल्लाह की आज्ञाकारिता के लिए नहीं, बल्कि मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने के लिए, मुनाफ़िक़ों को मज़बूत करके कुफ़्र का प्रदर्शन करने के लिए, ईमान वालों के बीच फूट डालने के लिए और उन लोगों को तैयारी का स्थान तथा घात स्थल प्रदान करने के लिए, जिन्होंने मस्जिद के निर्माण से पूर्व अल्लाह और उसके रसूल से लड़ाई की। निश्चय ये मुनाफ़िक़ तुमसे अवश्य ही क़समें खाकर कहेंगे : हमारा मक़सद तो केवल मुसलमानों के साथ आसानी (दयालुता) का था। जबकि अल्लाह गवाही देता है कि निश्चय वे अपने इस दावे में झूठे हैं।
आयत 108
لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًۭا ۚ لَّمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى ٱلتَّقْوَىٰ مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَن تَقُومَ فِيهِ ۚ فِيهِ رِجَالٌۭ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلْمُطَّهِّرِينَ
لَا
(Do) not
تَقُمْ
ना आप खड़े हों
فِيهِ
उसमें
أَبَدًۭا ۚ
कभी भी
لَّمَسْجِدٌ
अलबत्ता मस्जिद
أُسِّسَ
जिसकी बुनियाद रखी गई
عَلَى
on
ٱلتَّقْوَىٰ
तक़वा पर
مِنْ
from
أَوَّلِ
(the) first
يَوْمٍ
पहले दिन से
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
أَن
कि
تَقُومَ
आप खड़े हों
فِيهِ ۚ
उसमें
فِيهِ
उसमें
رِجَالٌۭ
कुछ लोग हैं
يُحِبُّونَ
जो पसंद करते हैं
أَن
कि
يَتَطَهَّرُوا۟ ۚ
वो पाक साफ़ रहें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُحِبُّ
वो पसंद करता है
ٱلْمُطَّهِّرِينَ
पाक साफ़ रहने वालों को
तुम कभी भी उसमें खड़े न होना। वह मस्जिद जिसकी आधारशिला पहले दिन ही से ईशपरायणता पर रखी गई है, वह इसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खड़े हो। उसमें ऐसे लोग पाए जाते हैं, जो अच्छी तरह स्वच्छ रहना पसन्द करते है, और अल्लाह भी पाक-साफ़ रहनेवालों को पसन्द करता है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप इस तरह की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए मुनाफ़िक़ों के आमंत्रण को स्वीकार न करें। क्योंकि क़ुबा की मस्जिद, जिसे शुरू ही से तक़्वा (धर्मपरायणता) पर स्थापित किया गया है, आपका उसमें नमाज़ पढ़ना इस मस्जिद की तुलना में अधिक उपयुक्त है, जिसे कुफ़्र पर स्थापित किया गया है। क़ुबा की मस्जिद में ऐसे लोग हैं, जो अशुद्धियों और गंदगियों से पानी के द्वारा और पापों से तौबा और क्षमायाचना के द्वारा शुद्ध रहना पसंद करते हैं, और अल्लाह अशुद्धताओं, गंदगियों और पापों से शुद्ध रहने वालों को पसंद करता है।
आयत 109
أَفَمَنْ أَسَّسَ بُنْيَـٰنَهُۥ عَلَىٰ تَقْوَىٰ مِنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنٍ خَيْرٌ أَم مَّنْ أَسَّسَ بُنْيَـٰنَهُۥ عَلَىٰ شَفَا جُرُفٍ هَارٍۢ فَٱنْهَارَ بِهِۦ فِى نَارِ جَهَنَّمَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
أَفَمَنْ
क्या भला जिसने
أَسَّسَ
बुनियाद रखी
بُنْيَـٰنَهُۥ
अपनी इमारत की
عَلَىٰ
on
تَقْوَىٰ
तक़वा पर
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَرِضْوَٰنٍ
और रज़ामंदी पर
خَيْرٌ
बेहतर है
أَم
या
مَّنْ
जिसने
أَسَّسَ
बुनियाद रखी
بُنْيَـٰنَهُۥ
अपनी इमारत की
عَلَىٰ
on
شَفَا
एक किनारे पर
جُرُفٍ
खाई
هَارٍۢ
गिरने वाली के
فَٱنْهَارَ
तो वो ले गिरी
بِهِۦ
उसे
فِى
in
نَارِ
आग में
جَهَنَّمَ ۗ
जहन्नम की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो जालिम हैं
फिर क्या वह अच्छा है जिसने अपने भवन की आधारशिला अल्लाह के भय और उसकी ख़ुशी पर रखी है या वह, जिसने अपने भवन की आधारशिला किसी खाई के खोखले कगार पर रखी, जो गिरने को है। फिर वह उसे लेकर जहन्नम की आग में जा गिरा? अल्लाह तो अत्याचारी लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
क्या जिसने अपने भवन की आधारशिला अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उसके तक़्वा तथा अधिक से अधिक नेकी के कार्य करके अल्लाह की प्रसन्नता पर रखी है, वह उसके बराबर है, जिसने मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने, कुफ़्र को मज़बूत करने और ईमान वालों के बीच विभेद पैदा करने के लिए मस्जिद बनाई?! दोनों कभी बराबर नहीं हो सकते। पहले व्यक्ति का भवन शक्तिशाली और मज़बूत है, जिसके गिरने का डर नहीं है। जबकि दूसरे व्यक्ति का उदाहरण उस व्यक्ति की तरह है, जिसने किसी गड्ढे के किनारे एक भवन बनाया, पर वह ढह गया और गिर गया और उसके साथ ही उसका भवन जहन्नम की गहराई में जा गिरा। सच्चाई यह है कि अल्लाह कुफ़्र और निफ़ाक़ वग़ैरह के ज़रिए अत्याचार करने वाले लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता।
आयत 110
لَا يَزَالُ بُنْيَـٰنُهُمُ ٱلَّذِى بَنَوْا۟ رِيبَةًۭ فِى قُلُوبِهِمْ إِلَّآ أَن تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
لَا
Not
يَزَالُ
हमेशा रहेगी
بُنْيَـٰنُهُمُ
इमारत उनकी
ٱلَّذِى
वो जो
بَنَوْا۟
उन्होंने बनाई
رِيبَةًۭ
शक का सबब
فِى
in
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों में
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَقَطَّعَ
टुकड़े-टुकड़े हो जाऐं
قُلُوبُهُمْ ۗ
दिल उनके
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
उनका यह भवन जो उन्होंने बनाया है, सदैव उनके दिलों में खटक बनकर रहेगा। हाँ, यदि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो दूसरी बात है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
उनकी यह मस्जिद, जिसे उन्होंने (मुसलमानों को) नुक़सान पहुँचाने के लिए बनाया है, सदा उनके दिलों में संदेह और निफ़ाक़ के रूप में बसी रहेगी, यहाँ तक कि मौत से अथवा तलवार के द्वारा वध से उनके दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ। अल्लाह अपने बंदों के कामों को जानने वाला, उनके अच्छे या बुरे कर्म का बदला देने में हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों की मस्जिद-ए-ज़िरार (फसाद के लिए बनाई मस्जिद) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेकी के नाम पर फसाद फैलाने वालों से होशियार रहना चाहिए।
आयत 111
۞ إِنَّ ٱللَّهَ ٱشْتَرَىٰ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ أَنفُسَهُمْ وَأَمْوَٰلَهُم بِأَنَّ لَهُمُ ٱلْجَنَّةَ ۚ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيَقْتُلُونَ وَيُقْتَلُونَ ۖ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّۭا فِى ٱلتَّوْرَىٰةِ وَٱلْإِنجِيلِ وَٱلْقُرْءَانِ ۚ وَمَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِۦ مِنَ ٱللَّهِ ۚ فَٱسْتَبْشِرُوا۟ بِبَيْعِكُمُ ٱلَّذِى بَايَعْتُم بِهِۦ ۚ وَذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
ٱشْتَرَىٰ
ख़रीद लीं
مِنَ
from
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों से
أَنفُسَهُمْ
जानें उनकी
وَأَمْوَٰلَهُم
और माल उनके
بِأَنَّ
बवजह उसके कि
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْجَنَّةَ ۚ
जन्नत है
يُقَـٰتِلُونَ
वो जंग करते हैं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते मे
فَيَقْتُلُونَ
फिर वो मारते हैं
وَيُقْتَلُونَ ۖ
और वो मारे जाते हैं
وَعْدًا
वादा है
عَلَيْهِ
उसके ज़िम्मे
حَقًّۭا
सच्चा
فِى
in
ٱلتَّوْرَىٰةِ
तौरात में
وَٱلْإِنجِيلِ
और इन्जील
وَٱلْقُرْءَانِ ۚ
और क़ुरआन में
وَمَنْ
और कौन
أَوْفَىٰ
ज़्यादा पूरा करने वाला है
بِعَهْدِهِۦ
अपने अहद को
مِنَ
than
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह से
فَٱسْتَبْشِرُوا۟
पस ख़ुशियाँ मनाओ
بِبَيْعِكُمُ
अपने सौदे पर
ٱلَّذِى
वो जो
بَايَعْتُم
सौदा किया तुमने
بِهِۦ ۚ
साथ उसके
وَذَٰلِكَ
और ये
هُوَ
वो ही है
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों से उनके प्राण और उनके माल इसके बदले में खरीद लिए है कि उनके लिए जन्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते है, तो वे मारते भी है और मारे भी जाते है। यह उनके ज़िम्मे तौरात, इनजील और क़ुरआन में (किया गया) एक पक्का वादा है। और अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला हो भी कौन सकता है? अतः अपने उस सौदे पर खु़शियाँ मनाओ, जो सौदा तुमने उससे किया है। और यही सबसे बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह ने (अपनी कृपा से) ईमान वालों से उनके प्राणों को एक उच्च क़ीमत अर्थात जन्नत के बदले में ख़रीद लिया है, (हालाँकि वे अल्लाह ही की संपत्ति हैं)। क्योंकि वे काफ़िरों से लड़ते हैं ताकि अल्लाह का वचन सर्वोच्च हो। चुनाँचे वे काफ़िरों को क़त्ल करते हैं और काफ़िर उन्हें क़त्ल करते हैं। अल्लाह ने इसका सच्चा वादा मूसा अलैहिस्सलाम की पुस्तक तौरात, ईसा अलैहिस्सलाम की पुस्तक इनजील और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पुस्तक क़ुरआन में किया है, तथा अल्लाह से बढ़कर अपना वादा पूरा करने वाला कोई नहीं है। अतः (ऐ ईमान वालो!) अपने इस सौदे से प्रसन्न हो जाओ, जो तुमने अल्लाह से किया है। क्योंकि तुमने इसमें बहुत लाभ कमाया है और यह सौदा ही बहुत बड़ी सफलता है।
आयत 112
ٱلتَّـٰٓئِبُونَ ٱلْعَـٰبِدُونَ ٱلْحَـٰمِدُونَ ٱلسَّـٰٓئِحُونَ ٱلرَّٰكِعُونَ ٱلسَّـٰجِدُونَ ٱلْـَٔامِرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَٱلنَّاهُونَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَٱلْحَـٰفِظُونَ لِحُدُودِ ٱللَّهِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
ٱلتَّـٰٓئِبُونَ
जो तौबा करने वाले
ٱلْعَـٰبِدُونَ
इबादत करने वाले
ٱلْحَـٰمِدُونَ
हम्द करने वाले
ٱلسَّـٰٓئِحُونَ
सियाहत करने वाले
ٱلرَّٰكِعُونَ
रुकू करने वाले
ٱلسَّـٰجِدُونَ
सजदा करने वाले
ٱلْـَٔامِرُونَ
हुक्म देने वाले
بِٱلْمَعْرُوفِ
नेकी का
وَٱلنَّاهُونَ
और रोकने वाले
عَنِ
[on]
ٱلْمُنكَرِ
बुराई से
وَٱلْحَـٰفِظُونَ
और हिफ़ाज़त करने वाले हैं
لِحُدُودِ
(the) limits
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की हुदूद की
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
वे ऐसे हैं, जो तौबा करते हैं, बन्दगी करते है, स्तुति करते हैं, (अल्लाह के मार्ग में) भ्रमण करते हैं, (अल्लाह के आगे) झुकते है, सजदा करते है, भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते हैं और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की रक्षा करते हैं -और इन ईमानवालों को शुभ-सूचना दे दो
तफ़्सीर:
यह प्रतिफल प्राप्त करने वाले लोग वे हैं, जो अल्लाह को पसंद न आने वाली और उसे क्रोधित करने वाली चीज़ों की उपेक्षाकर उसे पसंद आने वाली तथा प्रसन्न करने वाली चीज़ों की ओर लौटने वाले हैं, जो अल्लाह के भय और विनम्रता के कारण विनयशील होकर उसकी आज्ञाकारिता में बहुत परिश्रम करते हैं, जो हर परिस्थिति में अपने रब की स्तुति करने वाले, रोज़े रखने वाले, नमाज़ पढ़ने वाले, अल्लाह ने या उसके रसूल ने जिसका आदेश दिया है उसका आदेश देने वाले, अल्लाह और उसके रसूल ने जिससे मना किया है उससे मनाही करने वाले, तथा अल्लाह के आदेशों की, उनका अनुपालन करके और उसके निषेधों की, उनसे बचकर रक्षा करने वाले हैं। (ऐ रसूल!) आप इन गुणों से विशेषित मोमिनों को उस चीज़ की सूचना दे दें, जो उन्हें दुनिया और आखिरत में प्रसन्न कर देगी।
आयत 113
مَا كَانَ لِلنَّبِىِّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَن يَسْتَغْفِرُوا۟ لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوٓا۟ أُو۟لِى قُرْبَىٰ مِنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَحِيمِ
مَا
नहीं
كَانَ
है (लायक़)
لِلنَّبِىِّ
नबी के
وَٱلَّذِينَ
और उनके
ءَامَنُوٓا۟
जो ईमान लाए
أَن
कि
يَسْتَغْفِرُوا۟
वो बख़्शिश माँगें
لِلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन के लिए
وَلَوْ
और अगरचे
كَانُوٓا۟
हों वो
أُو۟لِى
near of kin
قُرْبَىٰ
क़राबत वाले
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो गया
لَهُمْ
उनके लिए
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
أَصْحَـٰبُ
साथी हैं
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
नबी और ईमान लानेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें, यद्यपि वे उसके नातेदार ही क्यों न हो, जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे भड़कती आगवाले हैं
तफ़्सीर:
नबी के लिए उचित नहीं है और न ही ईमान वालों के लिए उचित है कि वे मुश्रिकों के लिए अल्लाह से क्षमा याचना करें, भले ही वे उनके रिश्तेदार हों, जबकि उनके लिए यह स्पष्ट हो गया कि वे शिर्क की अवस्था में मरने के कारण जहन्नमियों में से हैं।
आयत 114
وَمَا كَانَ ٱسْتِغْفَارُ إِبْرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوْعِدَةٍۢ وَعَدَهَآ إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥٓ أَنَّهُۥ عَدُوٌّۭ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ ۚ إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ لَأَوَّٰهٌ حَلِيمٌۭ
وَمَا
और ना
كَانَ
था
ٱسْتِغْفَارُ
इस्तिग़फ़ार करना
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम का
لِأَبِيهِ
अपने बाप के लिए
إِلَّا
मगर
عَن
because
مَّوْعِدَةٍۢ
एक वादे की वजह से
وَعَدَهَآ
उसने वादा किया उसका
إِيَّاهُ
उससे
فَلَمَّا
फिर जब
تَبَيَّنَ
ज़ाहिर हो गया
لَهُۥٓ
उसके लिए
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
لِّلَّهِ
अल्लाह का
تَبَرَّأَ
वो बेज़ार हो गया
مِنْهُ ۚ
उससे
إِنَّ
बेशक
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
لَأَوَّٰهٌ
अलबत्ता बहुत आह वा ज़ारी करने वाला
حَلِيمٌۭ
बहुत बुर्दबार था
इबराहीम ने अपने बाप के लिए जो क्षमा की प्रार्थना की थी, वह तो केवल एक वादे के कारण की थी, जो वादा वह उससे कर चुका था। फिर जब उसपर यह बात खुल गई कि वह अल्लाह का शत्रु है तो वह उससे विरक्त हो गया। वास्तव में, इबराहीम बड़ा ही कोमल हृदय, अत्यन्त सहनशील था
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम का अपने पिता के लिए क्षमायाचना करना केवल इस कारण था कि उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि वह उनके लिए अवश्य क्षमायाचना करेंगे; इस आशा में कि वह इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। परंतु जब इबराहीम अलैहिस्सलाम के लिए यह स्पष्ट हो गया कि उनका पिता अल्लाह का दुश्मन है, क्योंकि उसे उनके उपदेश से कोई फायदा नहीं हुआ, या इसलिए कि उन्हें वह़्य के द्वारा मालूम हो गया था कि उसकी मृत्यु एक काफ़िर के रूप में होगी, तो वह उससे अलग हो गए। उनका अपने पिता के लिए क्षमायाचना करना उनका अपना इजतिहाद था, किसी आदेश का उल्लंघन नहीं था जिसकी अल्लाह ने उनकी ओर वह़्य की थी। निःसंदेह इबराहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के सामने अत्यधिक गिड़गिड़ाने वाले और अपनी अत्याचारी क़ौम को बहुत माफ़ करने वाले थे।
आयत 115
وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوْمًۢا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰهُمْ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُضِلَّ
कि वो भटका दे
قَوْمًۢا
किसी क़ौम को
بَعْدَ
बाद इसके
إِذْ
जब
هَدَىٰهُمْ
उसने हिदायत दी उन्हें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُبَيِّنَ
वो वाज़ेह कर दे
لَهُم
उनके लिए
مَّا
वो जिससे
يَتَّقُونَ ۚ
वो बचें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ का
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म रखने वाला है
अल्लाह ऐसा नहीं कि लोगों को पथभ्रष्ट ठहराए, जबकि वह उनको राह पर ला चुका हो, जब तक कि उन्हें साफ़-साफ़ वे बातें बता न दे, जिनसे उन्हें बचना है। निस्संदेह अल्लाह हर चीज़ को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
अल्लाह किसी जाति को मार्गदर्शन प्रदान करने के बाद उसके लिए पथभ्रष्टता का फ़ैसला नही करता, जब तक कि वह उनके लिए उन निषेधों को स्पष्ट नहीं कर देता जिनसे बचना अनिवार्य है। फिर यदि वे निषेध की व्याख्या करने के बाद उस कार्य को करें जो उनके लिए निषिद्ध ठहराया गया है, तो उनपर पथभ्रष्टता का फैसला कर देता है। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है। और उसने तुम्हें वह सिखाया है जो तुम नहीं जानते थे।
आयत 116
إِنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۚ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَهُۥ
उसी के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन की
يُحْىِۦ
वो ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ ۚ
और वो मौत देता है
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍۢ
कोई मददगार
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, वही जिलाता है और मारता है। अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक
तफ़्सीर:
निःसंदेह आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है। उन दोनों में उसका कोई साझी नहीं, उन दोनों में उससे कुछ भी छिपा नहीं है। वह जिसे जीवन देना चाहता है, उसे जीवन देता है और जिसे मारना चाहता है, उसे मारता है। और (ऐ लोगो!) तुम्हारा अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक नहीं है, जो तुम्हारे मामलों का प्रभारी हो, और न तुम्हारा कोई सहायक है, जो तुमसे बुराई को दूर करे और तुम्हारे दुश्मन के खिलाफ तुम्हारी मदद करे।
आयत 117
لَّقَد تَّابَ ٱللَّهُ عَلَى ٱلنَّبِىِّ وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ وَٱلْأَنصَارِ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ فِى سَاعَةِ ٱلْعُسْرَةِ مِنۢ بَعْدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقٍۢ مِّنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّهُۥ بِهِمْ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ
لَّقَد
अलबत्ता तहक़ीक़
تَّابَ
मेहरबान हुआ
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَى
to
ٱلنَّبِىِّ
नबी पर
وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ
और मुहाजिरीन
وَٱلْأَنصَارِ
और अन्सार पर
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱتَّبَعُوهُ
पैरवी की उसकी
فِى
in
سَاعَةِ
घड़ी में
ٱلْعُسْرَةِ
तंगी की
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
[what]
كَادَ
जो क़रीब था कि
يَزِيغُ
टेढ़े हो जाते
قُلُوبُ
दिल
فَرِيقٍۢ
एक गिरोह के
مِّنْهُمْ
उनमें से
ثُمَّ
फिर
تَابَ
वो मेहरबान हुआ
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِهِمْ
उन पर
رَءُوفٌۭ
बहुत शफ़क़त करने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
अल्लाह नबी पर मेहरबान हो गया और मुहाजिरों और अनसार पर भी, जिन्होंने तंगी की घड़ी में उसका साथ दिया, इसके पश्चात कि उनमें से एक गिरोह के दिल कुटिलता की ओर झुक गए थे। फिर उसने उनपर दया-दृष्टि दर्शाई। निस्संदेह, वह उनके लिए अत्यन्त करुणामय, दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को माफ़ कर दिया, जो आपने मुनाफ़िक़ों को तबूक के युद्ध से पीछे रहने की अनुमति प्रदान कर दी थी। तथा मुहाजिरों और अंसार को भी माफ़ कर दिया, जो उससे पीछे नहीं रहे, बल्कि भीषण गरमी, माली परेशानी और शक्तिशाली दुश्मन का सामना होने के बावजूद तबूक के युद्ध में आपके साथ निकल पड़े। जबकि उनमें से एक समूह के दिल विपरीत परिस्थितियों के कारण बहकने लगे थे, जो युद्ध छोड़ने का इरादा कर चुके थे। फिर अल्लाह ने उन्हें दृढ़ रहने और लड़ाई के लिए निकलने की तौफ़ीक़ प्रदान की और उनकी तौबा क़बूल कर ली। निःसंदेह अल्लाह उनपर कृपा करने वाला और दयावान् है और यह उसकी दया ही है कि उन्हें तौबा की तौफ़ीक़ दी और उनकी तौबा क़बूल कर ली।
आयत 118
وَعَلَى ٱلثَّلَـٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُوا۟ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ ٱلْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ أَنفُسُهُمْ وَظَنُّوٓا۟ أَن لَّا مَلْجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيْهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
وَعَلَى
And on
ٱلثَّلَـٰثَةِ
और उन तीनों पर (भी)
ٱلَّذِينَ
जो
خُلِّفُوا۟
छोड़ दिए गए
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
ضَاقَتْ
तंग हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
بِمَا
बावजूद इसके
رَحُبَتْ
कि वो कुशादा थी
وَضَاقَتْ
और तंग हो गए
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَنفُسُهُمْ
नफ़्स उनके
وَظَنُّوٓا۟
और उन्होंने यक़ीन कर लिया
أَن
कि
لَّا
(there is) no
مَلْجَأَ
नहीं कोई जाए पनाह
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
إِلَّآ
मगर
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
ثُمَّ
फिर
تَابَ
वो मेहरबान हुआ
عَلَيْهِمْ
उन पर
لِيَتُوبُوٓا۟ ۚ
ताकि वो तौबा करें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
और उन तीनों पर भी जो पीछे छोड़ दिए गए थे, यहाँ तक कि जब धरती विशाल होते हुए भी उनपर तंग हो गई और उनके प्राण उनपर दुभर हो गए और उन्होंने समझा कि अल्लाह से बचने के लिए कोई शरण नहीं मिल सकती है तो उसी के यहाँ। फिर उसने उनपर कृपा-दृष्टि की ताकि वे पलट आएँ। निस्संदेह अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन तीनों व्यक्तियों अर्थात् कअब बिन मालिक, मुरारा बिन रबी' और हिलाल बिन उमय्यह को भी क्षमा कर दिया, जिनके अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ तबूक की ओर निकलने से पीछे रह जाने के बाद उनकी तौबा के क़बूल होने का मामला स्थगित कर दिया गया था। चुनाँचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों को इन तीनों से अलग-थलग रहने का आदेश दे दिया, जिसपर उन्हें दु:ख और शोक ने घेर लिया, यहाँ तक कि धरती अपने विस्तार के बावजूद उनपर तंग हो गई और उन्हें जिस अकेलेपन का सामना हुआ उसके कारण उनके दिल संकुचित हो गए और उन्होंने जान लिया कि एकमात्र अल्लाह के सिवा उनके लिए कोई शरण लेने का स्थान नहीं है। इसलिए अल्लाह ने उनपर दया करते हुए उन्हें तौबा की तौफ़ीक़ दी, फिर उनकी तौबा क़बूल फरमाई। निःसंदेह वह अपने बंदों की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 119
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَكُونُوا۟ مَعَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَكُونُوا۟
और हो जाओ
مَعَ
साथ
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चे लोगों के
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखों और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने, उसके रसूल का अनुसरण करने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर अल्लाह से डरो तथा उन लोगों के साथ रहो, जो अपने ईमान तथा अपने वचन और कर्म में सच्चे हैं। क्योंकि तुम्हारे लिए मोक्ष केवल सच्चाई में है।
आयत 120
مَا كَانَ لِأَهْلِ ٱلْمَدِينَةِ وَمَنْ حَوْلَهُم مِّنَ ٱلْأَعْرَابِ أَن يَتَخَلَّفُوا۟ عَن رَّسُولِ ٱللَّهِ وَلَا يَرْغَبُوا۟ بِأَنفُسِهِمْ عَن نَّفْسِهِۦ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ لَا يُصِيبُهُمْ ظَمَأٌۭ وَلَا نَصَبٌۭ وَلَا مَخْمَصَةٌۭ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا يَطَـُٔونَ مَوْطِئًۭا يَغِيظُ ٱلْكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنْ عَدُوٍّۢ نَّيْلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُم بِهِۦ عَمَلٌۭ صَـٰلِحٌ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ
مَا
ना
كَانَ
था
لِأَهْلِ
(for) the people
ٱلْمَدِينَةِ
मदीना वालों के (लायक़)
وَمَنْ
और उनके जो
حَوْلَهُم
उनके आस पास थे
مِّنَ
of
ٱلْأَعْرَابِ
देहातियों/बदवियों में से
أَن
कि
يَتَخَلَّفُوا۟
वो पीछे रह जाऐं
عَن
after
رَّسُولِ
the Messenger
ٱللَّهِ
अल्लाह के रसूल से
وَلَا
और ना
يَرْغَبُوا۟
कि वो रग़बत रखें
بِأَنفُسِهِمْ
अपनी जानों की
عَن
to
نَّفْسِهِۦ ۚ
आपकी जान से (ज़्यादा)
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह इसके कि वो
لَا
(does) not
يُصِيبُهُمْ
नहीं पहुँचती उन्हें
ظَمَأٌۭ
कोई प्यास
وَلَا
और ना
نَصَبٌۭ
कोई थकावट
وَلَا
और ना
مَخْمَصَةٌۭ
कोई भूख
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَلَا
और नहीं
يَطَـُٔونَ
वो रौंदते
مَوْطِئًۭا
किसी जगह को
يَغِيظُ
जो ग़ुस्सा दिलाए
ٱلْكُفَّارَ
कुफ़्फ़ार को
وَلَا
और नहीं
يَنَالُونَ
वो हासिल करते
مِنْ
on
عَدُوٍّۢ
दुश्मन पर
نَّيْلًا
कोई कामयाबी
إِلَّا
मगर
كُتِبَ
लिखा जाता है
لَهُم
उनके लिए
بِهِۦ
साथ उसके
عَمَلٌۭ
अमल
صَـٰلِحٌ ۚ
नेक
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُضِيعُ
नहीं वो ज़ाया करता
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُحْسِنِينَ
नेको कारों का
मदीनावालों और उसके आसपास के बद्दूहओं को ऐसा नहीं चाहिए था कि अल्लाह के रसूल को छोड़कर पीछे रह जाएँ और न यह कि उसकी जान के मुक़ाबले में उन्हें अपनी जान अधिक प्रिय हो, क्योंकि वह अल्लाह के मार्ग में प्यास या थकान या भूख की कोई भी तकलीफ़ उठाएँ या किसी ऐसी जगह क़दम रखें, जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के या जो चरका भी वे शत्रु को लगाएँ, उसपर उनके हक में अनिवार्यतः एक सुकर्म लिख लिया जाता है। निस्संदेह अल्लाह उत्तमकार का कर्मफल अकारथ नहीं जाने देता
तफ़्सीर:
मदीना वालों तथा उनके आस-पास के देहात के वासियों के लिए उचित नहीं है कि जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम स्वयं जिहाद के लिए निकलें, तो वे आपसे पीछे रह जाएँ। उनके लिए यह भी उचित नहीं है कि वे अपने प्राणों के मामले में कंजूसी करें और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्राण की उपेक्षा कर अपने प्राणों की रक्षा करें। बल्कि उनके लिए अनिवार्य है कि आपके प्राण की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दें; क्योंकि उन्हें अल्लाह के मार्ग में जो भी प्यास, थकान या भूख पहुँचती है, तथा वे जिस स्थान पर भी उतरते हैं, जहाँ उनकी उपस्थिति काफ़िरों के क्रोध को भड़काती है, और वे किसी दुश्मन को क़त्ल, या क़ैद या पराजय से पीड़ित करते, या ग़नीमत का धन प्राप्त करते हैं - तो उसके बदले में अल्लाह उनके लिए एक सत्कर्म का सवाब लिख देता है जिसे वह उनसे स्वीकार करता है। निःसंदेह अल्लाह सत्कर्मियों के प्रतिफल को नष्ट नहीं करता, बल्कि उन्हें उसका पूर्ण बदला देता है और उससे भी बढ़ाकर देता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह से सौदे (जान-माल जन्नत के बदले) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपनी सलाहियतें और वक्त अल्लाह की राह में लगाना सबसे बड़ा फायदेमंद सौदा है।
आयत 121
وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةًۭ صَغِيرَةًۭ وَلَا كَبِيرَةًۭ وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحْسَنَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَلَا
और नहीं
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते
نَفَقَةًۭ
कोई ख़र्च करना
صَغِيرَةًۭ
छोटा
وَلَا
और ना
كَبِيرَةًۭ
बड़ा
وَلَا
और नहीं
يَقْطَعُونَ
वो तय करते
وَادِيًا
कोई वादी
إِلَّا
मगर
كُتِبَ
लिखा जाता है (अजर)
لَهُمْ
उनके लिए
لِيَجْزِيَهُمُ
ताकि बदला दे उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَحْسَنَ
बहुत अच्छा
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
और वे थो़ड़ा या ज़्यादा जो कुछ भी ख़र्च करें या (अल्लाह के मार्ग में) कोई घाटी पार करें, उनके हक़ में अनिवार्यतः लिख लिया जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें उनके अच्छे कर्मों का बदला प्रदान करे
तफ़्सीर:
और वे जो भी थोड़ा या अधिक धन खर्च करते हैं और जो भी घाटी पार करते हैं, तो उनके उस खर्च करने और यात्रा को लिख लिया जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें पुरस्कृत करे। चुनाँचे वह उन्हें आख़िरत में उनके सर्वोत्तम कार्यों का बदला प्रदान करेगा।
आयत 122
۞ وَمَا كَانَ ٱلْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا۟ كَآفَّةًۭ ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍۢ مِّنْهُمْ طَآئِفَةٌۭ لِّيَتَفَقَّهُوا۟ فِى ٱلدِّينِ وَلِيُنذِرُوا۟ قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوٓا۟ إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ
۞ وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिनों के (लायक़)
لِيَنفِرُوا۟
कि वो निकल पड़ें
كَآفَّةًۭ ۚ
सारे के सारे
فَلَوْلَا
फिर क्यों ना
نَفَرَ
निकली
مِن
from
كُلِّ
every
فِرْقَةٍۢ
हर गिरोह से
مِّنْهُمْ
उनमें से
طَآئِفَةٌۭ
एक जमाअत
لِّيَتَفَقَّهُوا۟
ताकि वो समझ बूझ हासिल करें
فِى
in
ٱلدِّينِ
दीन में
وَلِيُنذِرُوا۟
और ताकि वो डराऐं
قَوْمَهُمْ
अपनी कौम को
إِذَا
जब
رَجَعُوٓا۟
वो लौटें
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَحْذَرُونَ
वो डरें
यह तो नहीं कि ईमानवाले सब के सब निकल खड़े हों, फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते, ताकि वे धर्म में समझ प्राप्ति करते और ताकि वे अपने लोगों को सचेत करते, जब वे उनकी ओर लौटते, ताकि वे (बुरे कर्मों से) बचते?
तफ़्सीर:
मोमिनों के लिए उचित नहीं है कि वे सब के सब लड़ाई के लिए निकल खड़े हों, ताकि ऐसा न हो कि यदि उनका दुश्मन उनपर गालिब आ जाए तो उनका सफ़ाया कर दिया जाए। इसलिए ऐसा क्यों नहीं किया गया कि उनका एक समूह जिहाद के लिए निकलता और एक समूह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ रहता। ताकि वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से क़ुरआन और शरीयत के अहकाम सुनकर धर्म की समझ हासिल करते और अपनी जाति के लोगों को सचेत करते जब वे जो कुछ उन्होंने सीखा था उसे लेकर उनके पास लौटते; इस आशा में कि वे अल्लाह की यातना और उसके दंड से सावधान हो जाएँ तथा उसके आदेशों का पालन करने लगें और उसके निषेधों से बचने लगें। यह आयत उन सैन्यदलों के बारे में है, जिन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आस-पास के क्षेत्रों में भेजते थे और उनके लिए अपने सहाबा के एक समूह का चयन करते थे।
आयत 123
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَـٰتِلُوا۟ ٱلَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ ٱلْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا۟ فِيكُمْ غِلْظَةًۭ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُتَّقِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
قَـٰتِلُوا۟
जंग करो
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
يَلُونَكُم
तुम्हारे आस पास हैं
مِّنَ
of
ٱلْكُفَّارِ
कुफ़्फ़ार में से
وَلْيَجِدُوا۟
और चाहिए के वो पाऐं
فِيكُمْ
तुम में
غِلْظَةًۭ ۚ
सख़्ती
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
ऐ ईमान लानेवालो! उन इनकार करनेवालों से लड़ो जो तुम्हारे निकट है और चाहिए कि वे तुममें सख़्ती पाएँ, और जान रखो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने ईमान वालों को उन काफ़िरों से लड़ने का आदेश दिया है, जो उनके आस-पास रहते हैं; क्योंकि वे अपनी निकटता के कारण मोमिनों के लिए खतरे का कारण बनते हैं। इसी तरह उन्हें भयभीत करने और उनकी बुराई को दूर करने के लिए मुसलमानों को शक्ति और कठोरता दिखाने का भी आदेश दिया है। तथा सर्वशक्तिमान अल्लाह अपनी सहायता और समर्थन के साथ परहेज़गार मोमिनों के संग है।
आयत 124
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتْ سُورَةٌۭ فَمِنْهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَـٰذِهِۦٓ إِيمَـٰنًۭا ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فَزَادَتْهُمْ إِيمَـٰنًۭا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
وَإِذَا
And whenever
مَآ
और जब भी
أُنزِلَتْ
नाज़िल की जाती है
سُورَةٌۭ
कोई सूरत
فَمِنْهُم
तो उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَقُولُ
कहता है
أَيُّكُمْ
कौन है तुम में
زَادَتْهُ
ज़्यादा किया उसको
هَـٰذِهِۦٓ
इस (सूरत) ने
إِيمَـٰنًۭا ۚ
ईमान में
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
فَزَادَتْهُمْ
तो उसने ज़्यादा कर दिया उन्हें
إِيمَـٰنًۭا
ईमान में
وَهُمْ
और वो
يَسْتَبْشِرُونَ
वो ख़ुश होते हैं
जब भी कोई सूरा अवतरित की गई, तो उनमें से कुछ लोग कहते है, "इसने तुममें से किसके ईमान को बढ़ाया?" हाँ, जो लोग ईमान लाए है इसने उनके ईमान को बढ़ाया है। और वे आनन्द मना रहे है
तफ़्सीर:
जब अल्लाह अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर कोई सूरत अवतरित करता है, तो मुनाफ़िक़ों में से कुछ लोग उपहास करते हुऐ पूछते हैं : इस अवतिरत होने वाली सूरत ने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दुवारा लाई गई शरीयत पर किसके विश्वास को बढ़ायाॽ चुनाँचे जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूल को सच्चा माना, तो इस सूरत के अवतरण ने उनके पूर्व विश्वास में और वृद्धि कर दी, तथा वे उस अवतरित वह़्य (प्रकाशना) से प्रसन्न हैं; क्योंकि उसमें उनके दुनिया और आख़िरत के लाभ निहित हैं।
आयत 125
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ كَـٰفِرُونَ
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग
فِى
in
قُلُوبِهِم
दिलों में जिनके
مَّرَضٌۭ
मर्ज़ है
فَزَادَتْهُمْ
तो उसने ज़्यादा कर दिया उन्हें
رِجْسًا
नजासत में
إِلَىٰ
to
رِجْسِهِمْ
तरफ़ उनकी नजासत के
وَمَاتُوا۟
और वो मर गए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كَـٰفِرُونَ
काफ़िर थे
रहे वे लोग जिनके दिलों में रोग है, उनकी गन्दगी में अभिवृद्धि करते हुए उसने उन्हें उनकी अपनी गन्दगी में और आगे बढ़ा दिया। और वे मरे तो इनकार की दशा ही में
तफ़्सीर:
जहाँ तक मुनाफ़िक़ों का संबंध है, तो अहकाम और कहानियों पर आधारित इस क़ुरआन का अवतरण उनके रोग और गंदगी को और बढ़ा देता है, क्योंकि वे उस उतरने वाली वह़्य को झुठलाते हैं। अतः क़ुरआन के अवतरण में वृद्धि के साथ उनके दिल की बीमारी बढ़ जाती है; क्योंकि जब भी कोई वह़्य उतरती थी, वे उसके बारे में संदेह करते थे और वे कुफ़्र ही की अवस्था में मर गए।
आयत 126
أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِى كُلِّ عَامٍۢ مَّرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ
أَوَلَا
क्या भला नहीं
يَرَوْنَ
वो देखते
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
يُفْتَنُونَ
आज़माए जाते हैं
فِى
[in]
كُلِّ
every
عَامٍۢ
हर साल में
مَّرَّةً
एक बार
أَوْ
या
مَرَّتَيْنِ
दो बार
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يَتُوبُونَ
नहीं वो तौबा करते
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَذَّكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ते हैं
क्या वे देखते नहीं कि प्रत्येक वर्ष वॆ एक या दो बार आज़माईश में डाले जाते है ? फिर भी न तो वे तौबा करते हैं और न चेतते।
तफ़्सीर:
क्या ये मुनाफ़िक़ लोग सीख ग्रहण करते हुए नहीं देखते कि अल्लाह हर साल एक या दो बार उनकी हालत को प्रकट करके और उनके निफ़ाक़ का पर्दाफ़ाश करके उनकी परीक्षा लेता है?! फिर यह जानने के बावजूद कि अल्लाह ही उनके साथ ऐसा करता है, वे उसके समक्ष अपने कुफ़्र (अविश्वास) से तौबा नहीं करते हैं और अपने निफ़ाक़ को नहीं छोड़ते हैं और न ही उससे उपदेश ग्रहण करते हैं, जो उनके साथ घटित हुआ है और यह कि वह अल्लाह की ओर से है!
आयत 127
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتْ سُورَةٌۭ نَّظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ هَلْ يَرَىٰكُم مِّنْ أَحَدٍۢ ثُمَّ ٱنصَرَفُوا۟ ۚ صَرَفَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَفْقَهُونَ
وَإِذَا
And whenever
مَآ
और जब भी
أُنزِلَتْ
नाज़िल की जाती है
سُورَةٌۭ
कोई सूरत
نَّظَرَ
देखता है
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनका
إِلَىٰ
to
بَعْضٍ
तरफ़ बाज़ के
هَلْ
क्या
يَرَىٰكُم
देख रहा है तुम्हें
مِّنْ
any
أَحَدٍۢ
कोई एक
ثُمَّ
फिर
ٱنصَرَفُوا۟ ۚ
वो फिर जाते हैं
صَرَفَ
फेर दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قُلُوبَهُم
उनके दिलों को
بِأَنَّهُمْ
बवजह इसके कि वो
قَوْمٌۭ
ऐसे लोग हैं
لَّا
not
يَفْقَهُونَ
नहीं वो समझते
और जब कोई सूरा अवतरित होती है, तो वे परस्पर एक-दूसरे को देखने लगते है कि "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है।" फिर पलट जाते है। अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए, क्योंकि वे ऐसे लोग है जो समझते नहीं है
तफ़्सीर:
और जब अल्लाह अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर कोई सूरत उतारता है, जिसमें मुनाफ़िक़ों की स्थितियों का ज़िक्र होता है, तो कुछ मुनाफ़िक़ यह कहते हुए एक-दूसरे को देखते हैं : क्या तुम्हें कोई देख रहा है? यदि कोई उन्हें न देख रहा हो, तो मजलिस से चले जाते हैं। सुन लो! अल्लाह ने उनके दिलों को मार्गदर्शन और भलाई से फेर दिया है और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो नहीं समझते।
आयत 128
لَقَدْ جَآءَكُمْ رَسُولٌۭ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِٱلْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَكُمْ
आ गया तुम्हारे पास
رَسُولٌۭ
एक रसूल
مِّنْ
from
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों में से
عَزِيزٌ
गिराँ है
عَلَيْهِ
उस पर
مَا
(is) what
عَنِتُّمْ
कि मशक़्कत में पड़ो तुम
حَرِيصٌ
हरीस है
عَلَيْكُم
तुम पर (भलाई का)
بِٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
رَءُوفٌۭ
बहुत शफ़क़त करने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आ गया है। तुम्हारा मुश्किल में पड़ना उसके लिए असह्य है। वह तुम्हारे लिए लालयित है। वह मोमिनों के प्रति अत्यन्त करुणामय, दयावान है
तफ़्सीर:
निःसंदेह तुम्हारे पास (ऐ अरब के लोगो!) तुम्हारे ही वर्ग से एक रसूल आया है, वह तुम्हारी ही तरह एक अरबी है। उसके लिए वह बहुत कष्टदायक है, जिससे तुम्हें कष्ट पहुँचे। वह तुम्हारे मार्गदर्शन का बहुत इच्छुक और तुम्हारा बहुत ध्यान रखने वाला है तथा वह विशेष रूप से ईमान वालों के प्रति बहुत करुणा और दया वाला है।
आयत 129
فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقُلْ حَسْبِىَ ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَهُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ें
فَقُلْ
तो कह दीजिए
حَسْبِىَ
काफ़ी है मुझे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
عَلَيْهِ
इसी पर
تَوَكَّلْتُ ۖ
भरोसा किया मैंने
وَهُوَ
और वो
رَبُّ
रब है
ٱلْعَرْشِ
अर्शे
ٱلْعَظِيمِ
अज़ीम का
अब यदि वे मुँह मोड़े तो कह दो, "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं! उसी पर मैंने भऱोसा किया और वही बड़े सिंहासन का प्रभु है।"
तफ़्सीर:
फिर अगर वे आपसे मुँह मोड़ें और उसपर ईमान न लाएँ, जो आप लेकर आए हैं, तो (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है, जिसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। मैंने उसी अकेले (अल्लाह) पर भरोसा किया और वही महिमावान महान सिंहासन (अर्श) का मालिक है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सच्चों के साथ रहने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चे और भरोसेमंद लोगों की सोहबत इंसान के किरदार को मज़बूत बनाती है।
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