नाम का मतलब
चाश्त का वक्त (सुबह की रोशनी, जिसकी कसम खाई गई है)
पृष्ठभूमि
सूरह अद-दुहा नबी ﷺ को उस वक्त तसल्ली देने के लिए नाज़िल हुई जब कुछ वक्त के लिए वही आना रुक गई थी और मुशरिकों ने ताना दिया। इसमें यतीम और मुहताज की परवरिश की याद दिलाई गई है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह मुश्किल और मायूसी के वक्त सबसे बड़ी तसल्ली देती है, कि अल्लाह ने न तुझे छोड़ा है न नाराज़ हुआ है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلضُّحَىٰ
وَٱلضُّحَىٰ
क़सम है चाश्त की
साक्षी है चढ़ता दिन,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने दिन की शुरुआत की क़सम खाई है।
आयत 2
وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ
وَٱلَّيْلِ
और रात की
إِذَا
जब
سَجَىٰ
वो छा जाए
और रात जबकि उसका सन्नाटा छा जाए
तफ़्सीर:
और रात की क़सम खाई है, जब वह अंधेरी हो जाए और लोग उसमें काम-काज (गति) से रुक जाएँ।
आयत 3
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ
مَا
नहीं
وَدَّعَكَ
छोड़ा आपको
رَبُّكَ
आपके रब ने
وَمَا
और ना
قَلَىٰ
वो नाराज़ हुआ
तुम्हारे रब ने तुम्हें न तो विदा किया और न वह बेज़ार (अप्रसन्न) हुआ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आपके पालनहार ने न आपको छोड़ा और न आपको नापसंद किया, जैसा कि मुश्रिकों का कहना है, जब वह़्य (प्रकाशना) का सिलसिला कुछ दिनों के लिए रुक गया।
आयत 4
وَلَلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ
وَلَلْـَٔاخِرَةُ
और यक़ीनन आख़िरत
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكَ
आपके लिए
مِنَ
than
ٱلْأُولَىٰ
पहली (दुनिया) से
और निश्चय ही बाद में आनेवाली (अवधि) तुम्हारे लिए पहलेवाली से उत्तम है
तफ़्सीर:
और आपके लिए आख़िरत का घर दुनिया से बेहतर है, क्योंकि वहाँ स्थायी नेमतें हैं, जो कभी खत्म नहीं होंगी।
आयत 5
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ
وَلَسَوْفَ
और यक़ीनन अनक़रीब
يُعْطِيكَ
अता करेगा आपको
رَبُّكَ
रब आपका
فَتَرْضَىٰٓ
तो आप राज़ी हो जाऐंगे
और शीघ्र ही तुम्हारा रब तुम्हें प्रदान करेगा कि तुम प्रसन्न हो जाओगे
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह आपको तथा आपकी उम्मत को व्यापक बदला प्रदान करेगा यहाँ तक कि आप ख़ुद को दिए गए और अपनी उम्मत को दिए गए (प्रतिफल) से प्रसन्न हो जाएँगे।
आयत 6
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًۭا فَـَٔاوَىٰ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَجِدْكَ
उसने पाया आपको
يَتِيمًۭا
यतीम
فَـَٔاوَىٰ
फिर उसने ठिकान फ़राहम किया
क्या ऐसा नहीं कि उसने तुम्हें अनाथ पाया तो ठिकाना दिया?
तफ़्सीर:
उसने आपको इस अवस्था में पाया कि आप छोटे थे एवं आपके पिता की मृत्यु हो चुकी थी, तो उसने आपके लिए एक आश्रय स्थल बना दिया, जहाँ आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब, फिर आपके चाचा अबू तालिब ने आपके साथ सहानुभूति व्यक्त की।
आयत 7
وَوَجَدَكَ ضَآلًّۭا فَهَدَىٰ
وَوَجَدَكَ
और उसने पाया आपको
ضَآلًّۭا
राह भूला
فَهَدَىٰ
तो उसने रहनुमाई की
और तुम्हें मार्ग से अपरिचित पाया तो मार्ग दिखाया?
तफ़्सीर:
और उसने आपको इस हाल में पाया कि आप नहीं जानते कि किताब या ईमान क्या है, तो उसने आपको इसके बारे में वे बातें सिखाईं, जो आप नहीं जानते थे।
आयत 8
وَوَجَدَكَ عَآئِلًۭا فَأَغْنَىٰ
وَوَجَدَكَ
और उसने पाया आपको
عَآئِلًۭا
तंग दस्त
فَأَغْنَىٰ
तो उसने ग़नी कर दिया
और तुम्हें निर्धन पाया तो समृद्ध कर दिया?
तफ़्सीर:
और उसने आपको निर्धन पाया, तो आपको धनवान् कर दिया।
आयत 9
فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ
فَأَمَّا
तो रहा
ٱلْيَتِيمَ
यतीम
فَلَا
पस ना
تَقْهَرْ
आप सख़्ती कीजिए(उस पर)
अतः जो अनाथ हो उसे मत दबाना,
तफ़्सीर:
अतः आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार और उसका अपमान न करें जिसने बचपन में अपने पिता को खो दिया है।
आयत 10
وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ
وَأَمَّا
और रहा
ٱلسَّآئِلَ
सवाली
فَلَا
पस ना
تَنْهَرْ
आप झिड़कये (उसे)
और जो माँगता हो उसे न झिझकना,
तफ़्सीर:
तथा आप ज़रूरतमंद सवाली को ने झिड़कें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को तसल्ली देने और यतीम-मुहताज की याद दिलाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल और मायूसी के वक्त में भी अल्लाह ने न छोड़ा है न नाराज़ हुआ, यह तसल्ली हर मुश्किल में काम आती है।
आयत 11
وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ
وَأَمَّا
और लेकिन
بِنِعْمَةِ
(the) Favor
رَبِّكَ
अपने रब की नेअमत को
فَحَدِّثْ
पस बयान कीजिए
और जो तुम्हें रब की अनुकम्पा है, उसे बयान करते रहो
तफ़्सीर:
तथा आप अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करें और उन्हें बयान करते रहें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यतीम-सवाली से नर्मी और अल्लाह की नेमत बयान करने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि यतीम पर सख्ती न करना, सवाली को झिड़कना नहीं, और अल्लाह की नेमतों का चर्चा करना असली शुक्रगुज़ारी है।
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