नाम का मतलब
जमा हुआ खून (इंसान की तख्लीक के एक मरहले के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अलक़ की पहली पांच आयतें कुरआन की सबसे पहली नाज़िल होने वाली आयतें हैं, जिनमें नबी ﷺ को पढ़ने का हुक्म दिया गया। इसमें अबू जहल जैसे नबी ﷺ को नमाज़ से रोकने वालों की मज़म्मत भी है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह कुरआन के नुज़ूल की शुरुआत की गवाह है, इसकी पहली आयत इक़रा (पढ़ो) इल्म हासिल करने की अहमियत की सबसे बड़ी दलील मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱقْرَأْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ
ٱقْرَأْ
पढ़िए
بِٱسْمِ
नाम से
رَبِّكَ
अपने रब के
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया,
तफ़्सीर:
(ऐ रसलू) अल्लाह आपकी ओर जो वह़्य कर रहा है, उसे अपने उस पालनहार के नाम से शुरू करते हुए पढ़िए, जिसने सभी प्राणियों को पैदा किया है।
आयत 2
خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِنْ عَلَقٍ
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِنْ
from
عَلَقٍ
जमे हुए ख़ून से
पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून के एक लोथड़े से
तफ़्सीर:
जिसने इनसान को एक जमे हुए रक्त के लोथड़े से पैदा किया, जो पहले पानी की बूँद था।
आयत 3
ٱقْرَأْ وَرَبُّكَ ٱلْأَكْرَمُ
ٱقْرَأْ
पढ़िए
وَرَبُّكَ
और रब आपका
ٱلْأَكْرَمُ
सब से ज़्यादा करम वाला है
पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है,
तफ़्सीर:
(ऐ रसलू) अल्लाह आपकी ओर जो वह़्य कर रहा है, उसे पढ़ें, और आपका पालनहार सबसे बड़ा उदार है, जिसकी उदारता की कोई उदार बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि वह बहुत उदारता और उपकार वाला है।
आयत 4
ٱلَّذِى عَلَّمَ بِٱلْقَلَمِ
ٱلَّذِى
वो जिसने
عَلَّمَ
सिखाया
بِٱلْقَلَمِ
साथ क़लम के
जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी,
तफ़्सीर:
जिसने क़लम से सुलेख और लिखना सिखाया।
आयत 5
عَلَّمَ ٱلْإِنسَـٰنَ مَا لَمْ يَعْلَمْ
عَلَّمَ
उसने सिखाया
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مَا
जो
لَمْ
नहीं
يَعْلَمْ
वो जानता था
मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिस वह न जानता था
तफ़्सीर:
उसने इनसान को वह कुछ सिखाया, जो वह नहीं जानता था।
आयत 6
كَلَّآ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَيَطْغَىٰٓ
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
إِنَّ
बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
لَيَطْغَىٰٓ
अलबत्ता सरकशी करता है
कदापि नहीं, मनुष्य सरकशी करता है,
तफ़्सीर:
वास्तव में, अबू जह्ल की तरह दुराचारी व्यक्ति अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने में हद को पार कर जाता है।
आयत 7
أَن رَّءَاهُ ٱسْتَغْنَىٰٓ
أَن
कि
رَّءَاهُ
वो देखता है ख़ुद को
ٱسْتَغْنَىٰٓ
बेनियाज़
इसलिए कि वह अपने आपको आत्मनिर्भर देखता है
तफ़्सीर:
इसलिए कि वह खुद को देखता है कि वह अपने पास मौजूद प्रतिष्ठा और धन के कारण बेनियाज़ हो गया है।
आयत 8
إِنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلرُّجْعَىٰٓ
إِنَّ
बेशक
إِلَىٰ
to
رَبِّكَ
तरफ़ आपके रब के
ٱلرُّجْعَىٰٓ
पलटना है
निश्चय ही तुम्हारे रब ही की ओर पलटना है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ इनसान) क़ियामत के दिन तेरे रब ही की ओर वापस लौटना है। फिर वह हर एक को वह बदला देगा, जिसका वह हक़दार है।
आयत 9
أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يَنْهَىٰ
أَرَءَيْتَ
क्या देखा आपने
ٱلَّذِى
उस शख़्स को जो
يَنْهَىٰ
रोकता है
क्या तुमने देखा उस व्यक्ति को
तफ़्सीर:
क्या आपने अबू जह्ल के मामले से अधिक आश्चर्यजनक कुछ देखा, जो रोकता है।
आयत 10
عَبْدًا إِذَا صَلَّىٰٓ
عَبْدًا
एक बन्दे को
إِذَا
जब
صَلَّىٰٓ
वो नमाज़ पढ़ता है
जो एक बन्दे को रोकता है, जब वह नमाज़ अदा करता है? -
तफ़्सीर:
हमारे बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को, जब वह काबा के पास नमाज़ पढ़ते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पढ़ने के हुक्म (इक़रा) और इंसान की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इल्म हासिल करना और पढ़ना कुरआन का सबसे पहला हुक्म है, यह हमें ता-उम्र सीखते रहने की तालीम देता है।
आयत 11
أَرَءَيْتَ إِن كَانَ عَلَى ٱلْهُدَىٰٓ
أَرَءَيْتَ
क्या देखा आपने
إِن
अगर
كَانَ
हो वो
عَلَى
upon
ٱلْهُدَىٰٓ
हिदायत पर
तुम्हारा क्या विचार है? यदि वह सीधे मार्ग पर हो,
तफ़्सीर:
क्या आपने देखा कि यदि यह व्यक्ति जिसे रोका जा रहा है, अपने पालनहार की ओर से मार्गदर्शन और अंतर्दृष्टि पर है?!
आयत 12
أَوْ أَمَرَ بِٱلتَّقْوَىٰٓ
أَوْ
या
أَمَرَ
वो हुक्म देता हो
بِٱلتَّقْوَىٰٓ
तक़्वा का
या परहेज़गारी का हुक्म दे (उसके अच्छा होने में क्या संदेह है)
तफ़्सीर:
या वह लोगों को अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर उससे डरने का आदेश देता हो, क्या इस तरह के व्यक्ति को रोका जाना चाहिए?!
आयत 13
أَرَءَيْتَ إِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰٓ
أَرَءَيْتَ
क्या देखा आपने
إِن
अगर
كَذَّبَ
उसने झुठलाया
وَتَوَلَّىٰٓ
और उसने मुँह मोड़ा
तुम्हारा क्या विचार है? यदि उस (रोकनेवाले) ने झुठलाया और मुँह मोड़ा (तो उसके बुरा होने में क्या संदेह है) -
तफ़्सीर:
भला बतलाओ तो सही कि यदि इस रोकने वाले न रसूल के लाए हुए संदेश को झुठलाया और उससे मुँह फेर लिया, तो क्या वह अल्लाह से डरता नहीं है?!
आयत 14
أَلَمْ يَعْلَم بِأَنَّ ٱللَّهَ يَرَىٰ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَعْلَم
वो जानता
بِأَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَرَىٰ
देख रहा है
क्या उसने नहीं जाना कि अल्लाह देख रहा है?
तफ़्सीर:
क्या इस बंदे को नमाज़ से रोकने वाले व्यक्ति ने नहीं जाना कि वह जो कुछ कर रहा है, अल्लाह उसे देख रहा है, उससे उसकी कोई चीज़ छिपी नहीं है?!
आयत 15
كَلَّا لَئِن لَّمْ يَنتَهِ لَنَسْفَعًۢا بِٱلنَّاصِيَةِ
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
يَنتَهِ
वो बाज़ आया
لَنَسْفَعًۢا
तो हम ज़रूर घसीटेंगे (उसे)
بِٱلنَّاصِيَةِ
पेशानी के (बालों से )
कदापि नहीं, यदि वह बाज़ न आया तो हम चोटी पकड़कर घसीटेंगे,
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा इस मूर्ख ने समझ रखा है, यदि उसने हमारे बंदे को कष्ट पहुँचाना और उसे झुठलाना बंद नहीं किया, तो हम उसके माथे की लट पकड़कर जहन्नम की ओर घसीटेंगे।
आयत 16
نَاصِيَةٍۢ كَـٰذِبَةٍ خَاطِئَةٍۢ
نَاصِيَةٍۢ
पेशानी
كَـٰذِبَةٍ
जो झूठी है
خَاطِئَةٍۢ
ख़ताकार है
झूठी, ख़ताकार चोटी
तफ़्सीर:
उस माथे की लट वाला अपने कथन में झूठा और अपने कार्य में गलत है।
आयत 17
فَلْيَدْعُ نَادِيَهُۥ
فَلْيَدْعُ
पस चाहिए कि वो पुकारे
نَادِيَهُۥ
अपनी मजलिस को
अब बुला ले वह अपनी मजलिस को!
तफ़्सीर:
तो - जिस समय उसे उसके माथे की लट पकड़कर आग की ओर घसीटा जाएगा - वह अपने साथियों और अपनी सभा के लोगों को उनसे मदद लेने के लिए बुलाए ताकि वे उसे अज़ाब से बचा लें।
आयत 18
سَنَدْعُ ٱلزَّبَانِيَةَ
سَنَدْعُ
अनक़रीब हम बुला लेंगे
ٱلزَّبَانِيَةَ
दोज़ख़ के फ़रिश्तों को
हम भी बुलाए लेते है सिपाहियों को
तफ़्सीर:
हम भी जहन्नम के कठोर दिल फ़रिश्तों को बुला लेंगे, जो अल्लाह के आदेश का उल्लंघन नहीं करते और वे वही करते हैं, जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है। फिर वह देखे कि दोनों में से कौन-सा समूह अधिक शक्तिशाली और अधिक सक्षम है।
आयत 19
كَلَّا لَا تُطِعْهُ وَٱسْجُدْ وَٱقْتَرِب ۩
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
لَا
(Do) not
تُطِعْهُ
ना आप इताअत कीजिए उसकी
وَٱسْجُدْ
और सजदा कीजिए
وَٱقْتَرِب ۩
और क़ुर्ब हासिल कीजिए
कदापि नहीं, उसकी बात न मानो और सजदे करते और क़रीब होते रहो
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा इस ज़ालिम ने समझ रखा है कि वह आपको कोई नुक़सान पहुँचा सकता है। अतः आप उसके किसी आदेश या निषेध को न मानें, बल्कि अल्लाह को सजदा करें और आज्ञाकारिता के कार्यों के द्वारा उसके निकट हो जाएँ, क्योंकि वे उससे निकट कर देती हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अबू जहल की मज़म्मत और सजदे की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेक बंदों को इबादत से रोकने वालों का अंजाम बुरा होता है, हमें सजदे और इबादत में मशगूल रहना चाहिए।
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