मक्का के रिवाज के अनुसार अब्दुल मुत्तलिब ने नवजात नबी सल्ल० को दूध पिलाने और परवरिश के लिए बदवी क़बीले बनू साद की महिला हलीमा बिन्त अबी ज़ुऐब को सौंपा। शुरू में यतीम होने के कारण किसी दाई ने उन्हें लेने से इंकार किया, पर हलीमा ने आख़िर में उन्हें अपना लिया, और उसी दिन से उनके घर में बरकत, दूध की बहुतायत और समृद्धि उतर आई, जो दो साल तक क़ायम रही।
पूरी कहानी:
अरब के शहरी लोगों में यह रिवाज था कि वे अपने नवजात बच्चों को स्वस्थ भाषा व मज़बूत शरीर के लिए बदवी इलाक़ों की दूध पिलाने वाली औरतों के हवाले कर देते थे। इसी रिवाज के तहत अब्दुल मुत्तलिब ने बनू साद बिन बक्र क़बीले की हलीमा बिन्त अबी ज़ुऐब को नबी सल्ल० की परवरिश सौंपी। हलीमा ख़ुद बताती हैं कि वह अकाल के मुश्किल दिनों में अपने पति व एक कमज़ोर गधी-ऊंटनी के सहारे दूध पीते बच्चों की तलाश में मक्का आई थीं, लेकिन नबी सल्ल० को यतीम जानकर बाक़ी औरतों ने उन्हें लेने से इंकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें बच्चे के बाप से इनाम की उम्मीद रहती थी। आख़िर में जब हलीमा को कोई और बच्चा न मिला, तो उन्होंने नबी सल्ल० को ही ले लिया। इसके बाद हलीमा के मुताबिक़ उसी रात से उनके सीने में भरपूर दूध उतर आया, उनकी दुबली ऊंटनी का थन भी दूध से भर गया, और वापसी में उनकी कमज़ोर गधी पूरे क़ाफ़िले से आगे निकल गई। बनू साद पहुंचने के बाद हलीमा की बकरियां रोज़ पेट भरकर व दूध से लबालब लौटतीं, जबकि इलाक़े में अकाल बदस्तूर जारी था, यह देखकर हलीमा के पति ने कहा कि तुमने एक बरकत वाली रूह हासिल की है। नबी सल्ल० दो साल तक हलीमा के यहां दूध पीते और पलते रहे; इसी दौरान हलीमा के अपने बेटे तथा भांजे अबू सुफ़यान बिन हारिस भी आपके दूध-शरीक भाई बने। दूध छुड़ाने के बाद हलीमा ने बरकत के एहसास के चलते आपको वापस भेजने के बजाय कुछ और समय अपने पास रखने की गुज़ारिश की, जिसे आपकी मां ने मान लिया।