जब नबी सल्ल० लगभग बीस वर्ष के थे, तो उक़ाज़ के बाज़ार में क़ुरैश-किनाना और क़ैस ऐलान क़बीलों के बीच एक लड़ाई छिड़ी, जिसे हराम महीने में लड़े जाने की वजह से फ़िजार की लड़ाई कहा गया। नबी सल्ल० इस लड़ाई में अपने चचाओं का साथ देने गए, जहां उनका काम सिर्फ़ चचाओं को तीर पकड़ाना था; आख़िरकार दोनों पक्षों में मारे गए लोगों की गिनती के आधार पर हर्ज़ाना तय कर सुलह हो गई।
पूरी कहानी:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्र के बीसवें साल में उक़ाज़ के प्रसिद्ध बाज़ार में क़ुरैश व बनू किनाना और क़ैस ऐलान क़बीलों के बीच ज़ीक़ादा के हराम महीने में एक लड़ाई भड़क उठी, जो फ़िजार की लड़ाई के नाम से मशहूर हुई, यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें हराम महीने की पवित्रता का उल्लंघन हुआ था। इसकी शुरुआत बनू किनाना के एक व्यक्ति बराज़ द्वारा क़ैस ऐलान के तीन लोगों को क़त्ल करने से हुई। जब यह ख़बर उक़ाज़ पहुंची, तो दोनों पक्ष भड़क कर लड़ पड़े। क़ुरैश व किनाना के सेनापति हर्ब बिन उमैया थे, जो अपनी उम्र और बुज़ुर्गी की वजह से बड़ा सम्मान रखते थे। शुरुआत में क़ैस का पलड़ा भारी रहा, फिर दोपहर तक क़ुरैश-किनाना हावी होने लगे, इतने में सुलह की आवाज़ उठी और यह तय हुआ कि दोनों तरफ़ के मारे गए लोगों की गिनती की जाए और जिस पक्ष में ज़्यादा मौतें हुई हों, दूसरा पक्ष उन्हें उतना ज़्यादा हर्ज़ाना (दियत) अदा करे, इसी शर्त पर लड़ाई ख़त्म कर दी गई और पुरानी दुश्मनी मिटा दी गई। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी अपने चचाओं के साथ इस लड़ाई में शरीक हुए थे, जहां आपका काम चचाओं को तीर पकड़ाना और उनकी मदद करना भर था।