बुहैरा राहिब से मुलाक़ात
निजी ज़िंदगी
जब नबी सल्ल० लगभग बारह वर्ष के हुए, तो चचा अबू तालिब उन्हें साथ लेकर व्यापार के सिलसिले में शाम देश गए। रास्ते में बसरा नगर में बुहैरा नामी एक ईसाई राहिब ने आपके गुणों और नुबूवत की निशानियों के आधार पर आपको पहचान लिया और अबू तालिब को यहूदियों के ख़तरे से आगाह कर आपको मक्का वापस भेजने की सलाह दी।
पूरी कहानी:
जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़रीब बारह साल दो महीने दस दिन के हुए, तो चचा अबू तालिब उन्हें साथ लेकर व्यापारिक क़ाफ़िले के साथ शाम देश के सफ़र पर निकले और बसरा नामक नगर पहुंचे, जो उस दौर में रूमी अधिकृत क्षेत्र की राजधानी था। यहां जर्जीस नामी एक ईसाई राहिब रहता था, जो बुहैरा की उपाधि से मशहूर था। जब क़ाफ़िले ने पड़ाव डाला, तो यह राहिब, जो आमतौर पर कभी बाहर नहीं निकलता था, अपनी गिरजा से निकलकर आया, क़ाफ़िले का सत्कार किया और नबी सल्ल० के गुणों की बुनियाद पर उन्हें पहचान कर अबू तालिब से कहा कि यह बालक पूरी दुनिया के सरदार हैं, अल्लाह इन्हें समस्त संसार के लिए रहमत बनाकर भेजेगा। अबू तालिब के पूछने पर बुहैरा ने बताया कि जब क़ाफ़िला घाटी में दाख़िल हुआ, तो कोई पेड़-पौधा या पत्थर ऐसा नहीं बचा जो सज्दे में न झुक गया हो, और यह सज्दा सिर्फ़ किसी नबी के आगे ही होता है; इसके अलावा उसने आपके कंधे के नीचे मुहर-ए-नुबूवत (नुबूवत की निशानी) को भी पहचान लिया, जिसका ज़िक्र उनकी धार्मिक किताबों में मौजूद था। बुहैरा ने अबू तालिब को सचेत किया कि वे इस बालक को आगे शाम न ले जाएं, क्योंकि यहूदियों से ख़तरा है, अगर उन्होंने भी इन्हें पहचान लिया तो नुक़सान पहुंचा सकते हैं। इस सलाह पर अबू तालिब ने कुछ नौकरों के साथ नबी सल्ल० को वापस मक्का भेज दिया।

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