छह साल की उम्र में हज़रत आमना अपने बेटे को यसरिब (मदीना) में पिता की क़ब्र दिखाने ले गईं, पर वापसी में रास्ते में अबवा नामक जगह पर उनका इंतक़ाल हो गया, जिससे नबी सल्ल० पूरी तरह यतीम हो गए। इसके बाद दादा अब्दुल मुत्तलिब ने बड़े प्यार से परवरिश की, लेकिन दो साल बाद उनकी भी मृत्यु हो गई और मरने से पहले उन्होंने अपने बेटे अबू तालिब को भतीजे की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंप दी।
पूरी कहानी:
छह साल की उम्र में नबी सल्ल० अपनी मां हज़रत आमना, दाई उम्मे ऐमन और दादा अब्दुल मुत्तलिब के साथ अपने दिवंगत पिता की क़ब्र देखने क़रीब पांच सौ किलोमीटर दूर यसरिब (मदीना) गए और वहां एक महीना ठहरकर वापस चल पड़े, लेकिन रास्ते में ही हज़रत आमना बीमार पड़ गईं और मक्का-मदीना के बीच अबवा नामक स्थान पर उनका इंतक़ाल हो गया, इस तरह नबी सल्ल० छह साल की उम्र में पूरी तरह यतीम व मातृ-विहीन हो गए। इसके बाद बूढ़े दादा अब्दुल मुत्तलिब अपने यतीम पोते को मक्का ले आए और बड़े ही प्रेम व स्नेह से उनकी परवरिश की, यहां तक कि अपनी औलाद से भी बढ़कर चाहते और आदर करते थे, काबा की छाया में बिछे फ़र्श पर सिर्फ़ अब्दुल मुत्तलिब और नबी सल्ल० ही बैठने पाते, बाक़ी उनके चचा भी नहीं। लेकिन जब नबी सल्ल० सिर्फ़ आठ साल दो महीने दस दिन के हुए, तो दादा अब्दुल मुत्तलिब का भी इंतक़ाल हो गया। मरने से पहले उन्होंने अपने बेटे अबू तालिब, जो नबी सल्ल० के पिता अब्दुल्लाह के सगे भाई थे, को भतीजे की परवरिश और देखभाल की वसीयत कर दी। अबू तालिब ने भी अपने भतीजे को बड़ी ख़ूबी से पाला, उन्हें अपनी औलाद से बढ़कर माना और चालीस साल से भी ज़्यादा समय तक उन्हें अपना समर्थन व सुरक्षा दी। इसी दौर की एक और घटना यह भी बताई जाती है कि जब मक्का में अकाल पड़ा तो अबू तालिब नन्हे नबी सल्ल० का हाथ पकड़कर काबा की दीवार से उनकी पीठ टिकाकर वर्षा की दुआ के लिए निकले, और देखते ही देखते बादल घिर आए और मूसलाधार बारिश से पूरी घाटी पानी से भर गई।