नुबूवत मिलने से पहले भी नबी सल्ल० बुतों, शराब और जाहिलियत के बुरे रस्मो-रिवाज से पूरी तरह दूर रहे, और दो मौक़ों पर अल्लाह ने ख़ुद उन्हें ग़लत महफ़िलों में जाने से रोक दिया। अपनी सच्चाई, अमानतदारी, नम्रता और उत्तम आचरण की वजह से आप अपनी क़ौम में अल-अमीन (भरोसेमंद) की उपाधि से मशहूर हो गए थे।
पूरी कहानी:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शुरू से ही बुतों और झूठे माबूदों से इतनी घिन थी कि लात व उज़्ज़ा जैसे बुतों की क़सम सुनना तक आपको नागवार गुज़रता, आपने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया, न बुतों के नाम की क़ुर्बानी खाई, न बुतपरस्ती के त्योहारों-मेलों में शिरकत की। इब्ने असीर की एक रिवायत के मुताबिक़ नबी सल्ल० ने ख़ुद फ़रमाया कि जाहिलियत के लोगों के जो काम होते थे, उनमें से सिर्फ़ दो बार मेरा ध्यान उनकी तरफ़ गया, और दोनों बार अल्लाह ने बीच में रुकावट डाल दी। एक बार आपने अपने साथी चरवाहे से कहा कि तुम मेरी बकरियां संभालो, मैं मक्का जाकर रात की महफ़िल में शामिल होना चाहता हूं; रास्ते में एक शादी समारोह की आवाज़ सुनकर आप बैठ गए और अल्लाह ने आपको नींद में डाल दिया, सुबह सूरज की गर्मी से आंख खुली और आप वापस लौट आए, बिना किसी महफ़िल में शामिल हुए। कुछ समय बाद जब दोबारा ऐसा इरादा बना, तो फिर वही घटना दोहराई गई, और इसके बाद कभी ऐसा इरादा ही न हुआ। सहीह बुख़ारी में हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० से रिवायत है कि जब काबा का पुनर्निर्माण हो रहा था, तो नबी सल्ल० और हज़रत अब्बास रज़ि० मिलकर पत्थर ढो रहे थे। हज़रत अब्बास रज़ि० ने सुझाव दिया कि अपना तहबंद कंधे पर रख लें ताकि पत्थर से जिस्म को नुक़सान न पहुंचे, लेकिन जैसे ही आपने ऐसा किया, आप बेहोश होकर गिर पड़े, फिर तुरंत तहबंद वापस बांध लिया गया, और उसके बाद कभी आपका सतर खुला हुआ नहीं देखा गया। इन्हीं गुणों की वजह से नबी सल्ल० अपनी क़ौम में मीठे बोल, ऊंचे चरित्र और श्रेष्ठ आचरण के लिए मशहूर हो गए, आप सबसे ज़्यादा नम्र, सज्जन, अच्छे पड़ोसी, अमानतदार और वादे के पक्के माने जाते थे, यहां तक कि लोगों ने आपका नाम ही अल-अमीन (भरोसेमंद) रख दिया। हज़रत ख़दीजा रज़ि० की गवाही में भी आता है कि आप कमज़ोरों का बोझ उठाते, ग़रीबों की मदद करते, मेहमानों का सत्कार करते और ज़रूरतमंदों की ज़रूरत पूरी करते थे।