हब्शा की दूसरी हिजरत और कुरैश की साज़िशें
मक्की दौर
मक्का वापस आए मुहाजिरों पर क़ुरैश का ज़ुल्म और बढ़ गया, इसलिए नबी सल्ल० ने दोबारा हब्शा हिजरत का मशवरा दिया। इस बार 82-83 मर्द और क़रीब 18 औरतों ने हिजरत की। क़ुरैश ने अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को नजाशी के दरबार में मुसलमानों को वापस मांगने भेजा, लेकिन हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब रज़ि० के प्रभावशाली भाषण और क़ुरआन की तिलावत से प्रभावित होकर न्यायप्रिय नजाशी ने मुसलमानों की हिफ़ाज़त की और क़ुरैश की मांग ठुकरा दी।
पूरी कहानी:
जब पहले मुहाजिरों में से कुछ मक्का वापस आए, तो उन पर और आम मुसलमानों पर क़ुरैश का अन्याय व अत्याचार पहले से भी ज़्यादा बढ़ गया, क्योंकि क़ुरैश को नजाशी के मुसलमानों के साथ अच्छे व्यवहार की ख़बर मिल चुकी थी और वे इस पर बहुत नाराज़ थे। मजबूर होकर नबी सल्ल० ने सहाबा किराम रज़ि० को दोबारा हब्शा हिजरत का मशवरा दिया, लेकिन यह दूसरी हिजरत पहली के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल थी, क्योंकि इस बार क़ुरैश पहले से ही चौकन्ना था और ऐसी किसी कोशिश को नाकाम करने पर तुला हुआ था, फिर भी मुसलमान उनसे ज़्यादा मुस्तैद साबित हुए और अल्लाह ने उनका सफ़र आसान बना दिया, चुनांचे वे क़ुरैश की पकड़ में आने से पहले ही हब्श के बादशाह के पास पहुंच गए। इस बार कुल 82 या 83 मर्दों और अठारह या उन्नीस औरतों ने हिजरत की। मुशरिकों को यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि मुसलमान अपनी जान व दीन बचाकर एक शांतिपूर्ण जगह पहुंच गए हैं, इसलिए उन्होंने अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को, जो सूझ-बूझ वाले माने जाते थे और अभी मुसलमान नहीं हुए थे, नजाशी और उसके दरबारियों के लिए तोहफ़े व उपहार देकर हब्शा भेजा। इन दोनों ने पहले दरबारियों को उपहार देकर अपनी बात मनवा ली, फिर नजाशी के सामने मुसलमानों के ख़िलाफ़ अपनी दलीलें रखीं, लेकिन नजाशी ने न्यायप्रियता दिखाते हुए मुसलमानों का पक्ष सुने बिना कोई फ़ैसला देने से इंकार कर दिया और हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब रज़ि० को दरबार में बुलाया। हज़रत जाफ़र रज़ि० ने वहां अज्ञानता-युग की बुराइयों, बुतपरस्ती, अत्याचार और फिर इस्लाम की तालीम व नबी सल्ल० की सच्चाई का विस्तार से बयान किया और सूरः मरयम की कुछ आयतें भी सुनाईं, जिन्हें सुनकर नजाशी और उसके बिशप रो पड़े। इस पर नजाशी ने क़ुरैश के दूतों की मांग ठुकरा दी और मुसलमानों को अपनी हिफ़ाज़त में रख लिया। अगले दिन अम्र बिन आस ने एक और चाल चली और नजाशी से कहा कि ये लोग हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बुरी बात कहते हैं, यानी उन्हें सिर्फ़ अल्लाह का बंदा मानते हैं। नजाशी ने फिर हज़रत जाफ़र रज़ि० से पूछा, जिन्होंने क़ुरआन की वे आयतें पढ़ीं जिनमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम व हज़रत मरयम का ज़िक्र है, तो नजाशी ने कहा कि यही बात हमारे यहां भी मानी जाती है, और क़ुरैश के दूतों के लाए हुए तोहफ़े वापस लौटाकर मुसलमानों को पूरी सुरक्षा और सम्मान के साथ रहने दिया।

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