नुबूवत के पांचवें साल रजब महीने में मुसलमानों का पहला गिरोह, जिसमें बारह मर्द और चार औरतें शामिल थीं, हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ि० और उनकी पत्नी हज़रत रुक़ैया रज़ि० (नबी सल्ल० की बेटी) के नेतृत्व में रात के अंधेरे में गुप्त रूप से निकलकर शुऐबा बंदरगाह से समुद्री रास्ते हब्शा (अबीसीनिया) पहुंच गया, क्योंकि वहां के बादशाह नजाशी न्यायप्रिय माने जाते थे। क़ुरैश ने पीछा किया पर मुसलमान पहले ही निकल चुके थे।
पूरी कहानी:
क़ुरैश के बढ़ते ज़ुल्म व सितम से मुसलमानों के लिए मक्का में रहना मुश्किल हो गया, और नुबूवत के पांचवें साल के दौरान यह अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। इसी दौरान सूरः ज़ुमर में हिजरत की तरफ़ इशारा किया गया कि अल्लाह की ज़मीन तंग नहीं है और सब्र करने वालों को उनका बदला बेहिसाब मिलेगा। नबी सल्ल० को मालूम था कि हब्शा (अबीसीनिया) का बादशाह नजाशी एक न्यायप्रिय शासक है, जिसके यहां किसी पर ज़ुल्म नहीं होता, इसलिए आपने मुसलमानों को हुक्म दिया कि वे अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए हब्शा हिजरत कर जाएं। इसके बाद एक तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ रजब सन् 05 नुबूवत में सहाबा किराम रज़ि० के पहले गिरोह ने हब्शा की ओर हिजरत की, जिसमें बारह मर्द और चार औरतें शामिल थीं। हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ि० इस गिरोह के अमीर (सरदार) थे और उनके साथ उनकी पत्नी, नबी सल्ल० की साहबज़ादी हज़रत रुक़ैया रज़ि० भी थीं। नबी सल्ल० ने इस जोड़े के बारे में फ़रमाया कि हज़रत इब्राहीम और हज़रत लूत अलैहिमस्सलाम के बाद यह पहला घराना है, जिसने अल्लाह की राह में हिजरत की। ये लोग राज़दारी बरतते हुए रात के अंधेरे में चुपके से निकले, ताकि क़ुरैश को इसका पता न चल सके, और लाल सागर के बंदरगाह शुऐबा पहुंचे, जहां संयोग से दो व्यापारिक जहाज़ मौजूद थे, जिन्होंने उन्हें अपनी शरण में लेकर समुद्र पार हब्शा पहुंचा दिया। क़ुरैश को बाद में उनके जाने का पता चला और उन्होंने तट तक पीछा भी किया, लेकिन तब तक सहाबा किराम रज़ि० निकल चुके थे, इसलिए क़ुरैश को नाकाम वापस लौटना पड़ा। मुसलमानों ने हब्शा पहुंचकर चैन की सांस ली, लेकिन उसी साल रमज़ान में एक और घटना घटी, जब नबी सल्ल० ने हरम में क़ुरैश के बड़े जमावड़े के सामने सूरः अन्नज्म की तिलावत शुरू की और सूरः के अंत में सज्दे की आयत आने पर सब लोग, मुसलमान हों या मुशरिक, अनायास सज्दे में गिर पड़े, क्योंकि कलामे इलाही की महानता ने सबकी लगाम मोड़ दी थी। बाद में जब मुशरिकों को एहसास हुआ कि वे वही काम कर बैठे जिसे मिटाने में उन्होंने पूरी ताक़त लगा रखी थी, तो उन्होंने अपनी सफ़ाई में यह झूठ गढ़ा कि नबी सल्ल० ने उनके बुतों की तारीफ़ में कुछ कहा था, हालांकि यह सरासर झूठ था, गढ़ा हुआ बहाना भर, ताकि सज्दा करने की अपनी ग़लती को छुपाया जा सके। यह ग़लत ख़बर हब्शा के मुहाजिरों तक भी पहुंची कि क़ुरैश मुसलमान हो गए हैं, जिस पर कुछ लोग शव्वाल महीने में मक्का वापसी को निकल पड़े, लेकिन जब मक्का के क़रीब पहुंचकर असली हक़ीक़त मालूम हुई, तो कुछ लोग सीधे हब्शा लौट गए और कुछ छिपकर या किसी क़ुरैशी की पनाह लेकर मक्का में दाख़िल हुए।