क़ुरैश के बढ़ते ज़ुल्म से बचने के लिए सहाबा किराम अपनी नमाज़, दावत और आपसी मुलाक़ातें छिपकर करने लगे। नबी सल्ल० ने सफ़ा पहाड़ी पर स्थित अरक़म बिन अबी अरक़म मख़्ज़ूमी के घर को, जो दुश्मनों की नज़रों से दूर था, सन् नुबूवत के पांचवें साल अपनी दावत व शिक्षा का केंद्र बना लिया, जहां मुसलमान सुरक्षित रूप से जमा होकर क़ुरआन सीखते।
पूरी कहानी:
क़ुरैश के अत्याचार और मुसलमानों के क़त्ल तक की कोशिशों को देखते हुए यह अंदेशा था कि अगर टकराव बार-बार होता रहा और लम्बा खिंचता गया, तो मुसलमानों के सफ़ाए की नौबत आ सकती थी। इसलिए हिकमत का तक़ाज़ा यही था कि दावत का काम परदे के पीछे किया जाए। चुनांचे आम सहाबा किराम रज़ि० अपना सलाम, अपनी इबादत, अपनी तब्लीग़ और अपनी बैठकें सब कुछ छिपकर करते थे, हालांकि नबी सल्ल० ख़ुद तब्लीग़ व इबादत का काम मुशरिकों के सामने भी खुल्लम-खुल्ला करते रहते थे, क्योंकि कोई चीज़ आपको इससे रोक नहीं सकती थी, फिर भी मुसलमानों की मस्लहत को देखते हुए आप ख़ुद भी उनके साथ ख़ुफ़िया तौर पर जमा होते थे। इसी सिलसिले में अरक़म बिन अबी अरक़म मख़्ज़ूमी का मकान, जो सफ़ा पहाड़ी पर स्थित था और दुश्मनों व विरोधियों की निगाहों तथा उनकी बैठकों से दूर अलग-थलग वाक़े था, नबी सल्ल० ने सन् नुबूवत के पांचवें साल में अपनी दावत और मुसलमानों के साथ जमा होने का केंद्र बना लिया। यहीं दारे अरक़म में सहाबा किराम रज़ि० सुरक्षित रूप से जमा होकर नबी सल्ल० से क़ुरआन की तालीम लेते, नमाज़ अदा करते और आपस में दीन की बातें साझा करते। यह घर इस्लाम के शुरुआती दौर की दावती गतिविधियों का एक अहम केंद्र बना, जहां कई नए लोग भी आकर इस्लाम क़बूल करते रहे।