हज़रत उमर रज़ि० का इस्लाम लाना
निजी ज़िंदगी
हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ि०, जो पहले इस्लाम के कट्टर विरोधी थे, एक दिन नबी सल्ल० को क़त्ल करने तलवार लेकर निकले, पर रास्ते में मालूम हुआ कि उनकी अपनी बहन फ़ातिमा और बहनोई सईद पहले ही मुसलमान हो चुके हैं। उनके घर पहुंचकर क़ुरआन की तिलावत सुनते हुए मारपीट की, पर बहन के ख़ून बहाने पर दिल पसीज गया, फिर सूरः ताहा की आयतें पढ़कर सीधे नबी सल्ल० के पास दारे अरक़म पहुंचे और इस्लाम क़बूल कर लिया, जिससे मुसलमानों को बड़ी ताक़त मिली।
पूरी कहानी:
अत्याचार और दमन के काले माहौल में एक और बड़ी बिजली चमकी, जब हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ि०, जो सन् 06 नबवी में मुसलमान हुए, इस्लाम की छांव में आ गए। इससे पहले हज़रत उमर रज़ि० इस्लाम के सबसे सख़्त विरोधियों में गिने जाते थे। एक बार वे काबा के परदे में घुसे तो देखा नबी सल्ल० नमाज़ में सूरः अल-हाक़्क़ा की तिलावत कर रहे हैं। क़ुरआन सुनकर वे चकित रह गए, दिल में सोचा यह तो कवि है, पर उसी वक़्त वह आयत तिलावत हुई जो कवि होने की बात का खंडन करती थी, फिर सोचा यह काहिन है, तो वह आयत आई जो काहिन होने का भी खंडन करती थी और साफ़ कहा गया कि यह रब्बुल आलमीन की तरफ़ से उतारा गया कलाम है। हज़रत उमर रज़ि० ख़ुद बताते हैं कि उसी वक़्त इस्लाम मेरे दिल में उतर गया, लेकिन अभी उनके भीतर पुरखों के धर्म की महानता और पूर्वाग्रह इतने गहरे बैठे थे कि वे खुलकर इस्लाम लाने से रुके रहे और विरोध जारी रखा। यहां तक कि एक दिन नबी सल्ल० का काम तमाम करने की नीयत से तलवार लेकर निकल पड़े। रास्ते में नुऐम बिन अब्दुल्लाह से मुलाक़ात हुई, जिन्होंने जब उनका इरादा जाना, तो कहा कि पहले अपने घर की ख़बर लो, तुम्हारी बहन फ़ातिमा और बहनोई सईद बिन ज़ैद पहले ही मुसलमान हो चुके हैं। यह सुनकर हज़रत उमर रज़ि० सीधे अपनी बहन के घर पहुंचे, जहां ख़ब्बाब बिन अरत रज़ि० उन्हें सूरः ताहा पढ़ा-सुना रहे थे। आवाज़ सुनकर वे अंदर घुसे तो सबने परचा छुपा दिया, हज़रत उमर रज़ि० ने पूछताछ की और ग़ुस्से में अपने बहनोई पर हाथ उठाया, जब बहन फ़ातिमा बीच में आईं तो उन्हें भी चोट लगी और ख़ून बह निकला। अपनी बहन को ख़ून से लथपथ देखकर हज़रत उमर रज़ि० का ग़ुस्सा शांत हुआ और उन्होंने वह लिखित परचा देखने की इच्छा जताई। बहन ने कहा कि तुम नापाक (मुशरिक) हो, पहले ग़ुस्ल करो, हज़रत उमर रज़ि० ने ग़ुस्ल किया, फिर परचा पढ़ा जिसमें सूरः ताहा की शुरुआती आयतें लिखी थीं। आयतें पढ़ते ही उनका दिल पिघल गया और वे बोले, मुझे उस आदमी के पास ले चलो। ख़ब्बाब रज़ि० ने ख़ुशी से बताया कि नबी सल्ल० इस वक़्त दारे अरक़म में हैं। हज़रत उमर रज़ि० वहां पहुंचे, दरवाज़ा खटखटाया, अंदर मौजूद सहाबा किराम रज़ि० घबराए, लेकिन हज़रत हमज़ा रज़ि० ने कहा उन्हें आने दो, अगर नेक नीयत से आए हैं तो अच्छा, वरना उन्हीं की तलवार से उनका काम तमाम कर देंगे। नबी सल्ल० ख़ुद बाहर निकले, उनका गिरेबान व तलवार का पेटा पकड़कर सख़्ती से पूछा, उमर, अभी तक बाज़ नहीं आओगे? फिर दुआ की, ऐ अल्लाह, इस्लाम को उमर बिन ख़त्ताब के ज़रिए ताक़त व इज़्ज़त अता फ़रमा। इस पर हज़रत उमर रज़ि० ने कलिमा पढ़कर इस्लाम क़बूल कर लिया, जिसे सुनकर अंदर मौजूद सहाबा किराम रज़ि० ने इतनी ज़ोर से तकबीर कही कि आवाज़ मस्जिदे हराम तक पहुंच गई। हज़रत उमर रज़ि० की ताक़त व रोब का यह हाल था कि इस्लाम लाने की ख़बर से मुशरिकों में हड़कंप मच गया। उन्होंने ख़ुद पहले अबू जहल के घर जाकर अपने इस्लाम की ख़बर सुनाई, फिर अपने मामू आसी बिन हाशिम और जमील बिन मामर के ज़रिए मक्का में एलान करवाया, जिस पर लोगों ने उन पर हमला बोल दिया और ख़ूब मार-पीट हुई, यहां तक कि वे थककर बैठ गए, लेकिन आख़िर में उनके पड़ोसी आस बिन वाइल सह्मी ने आगे आकर उन्हें अपनी पनाह में ले लिया। हज़रत उमर रज़ि० के इस्लाम लाने से मुसलमानों को इज़्ज़त, ताक़त और हौसला मिला, जबकि मुशरिकों को गहरा सदमा पहुंचा।

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