जब क़ुरैश की धमकियां बेअसर रहीं, तो उन्होंने उत्बा बिन रबीआ के ज़रिए नबी सल्ल० को धन, सरदारी और बादशाहत तक का प्रलोभन देकर दावत छोड़ने का प्रस्ताव रखा, जिसे आपने सूरः फ़ुस्सिलत की तिलावत सुनाकर अस्वीकार कर दिया। इसके बाद अबू जहल ने पत्थर से सज्दे में क़त्ल करने की स्कीम बनाई पर डर के मारे पीछे हट गया, और क़ुरैश ने बारी-बारी एक-दूसरे के माबूद पूजने का प्रस्ताव भी रखा, जिसके जवाब में सूरः क़ुल या अय्युहल काफ़िरून उतरी।
पूरी कहानी:
जब धमकियों और अत्याचार से भी नबी सल्ल० की दावत नहीं रुकी, तो क़ुरैश के सरदारों ने सौदेबाज़ी का रास्ता अपनाया। उन्होंने उत्बा बिन रबीआ को, जो एक समझदार व्यक्ति माना जाता था, नबी सल्ल० के पास भेजा। उत्बा ने पेशकश की कि अगर आप माल चाहते हैं तो हम आपको इतना धन इकट्ठा कर देंगे कि आप हम सबसे ज़्यादा मालदार हो जाएं, अगर सरदारी चाहते हैं तो हम आपको अपना सरदार बना लेंगे, अगर बादशाहत चाहते हैं तो हम आपको बादशाह बना देंगे, और अगर यह सब कुछ किसी जिन्न के असर की वजह से है जिससे आप छुटकारा नहीं पा सकते, तो हम आपके इलाज के लिए धन ख़र्च करेंगे, बस आप यह दावत छोड़ दें। नबी सल्ल० ने पूरी बात सुनने के बाद पूछा, अबुल वलीद, क्या कह चुके? फिर सूरः फ़ुस्सिलत की शुरुआती आयतें तिलावत करनी शुरू कीं, जिसमें अल्लाह की तरफ़ से उतारी गई किताब, ख़ुशख़बरी व चेतावनी और लोगों की मुख़ालफ़त का ज़िक्र था। जब आप सज्दे की आयत तक पहुंचे तो सज्दा किया और फ़रमाया, अबुल वलीद, जो सुनना था सुन चुके, अब तुम्हारा काम तुम जानो। उत्बा हैरान होकर वापस अपने साथियों के पास गया, तो उसका चेहरा बदला हुआ था। लोगों ने पूछा तो उसने कहा कि मैंने ऐसा कलाम सुना है जैसा पहले कभी नहीं सुना, यह न कविता है, न जादू, न कहानत, मेरी मानो तो इस आदमी को उसके हाल पर छोड़ दो, क्योंकि जो मैंने सुना है उससे कोई बड़ी घटना ज़रूर घटेगी, अगर अरब ने उसे मार डाला तो तुम्हारा काम दूसरों से हो जाएगा, और अगर वह अरब पर छा गया तो उसकी बादशाहत तुम्हारी भी बादशाहत होगी। लेकिन क़ुरैश ने उसकी बात नहीं मानी, बल्कि सख़्त धमकी देकर कहा कि अब हम तुम्हें मिटाकर रहेंगे या ख़ुद मिट जाएंगे, जिससे नबी सल्ल० ग़मगीन होकर वापस लौट आए। इसके बाद अबू जहल ने खुलेआम एलान किया कि जब मुहम्मद सज्दे में जाएंगे, तो वह एक भारी पत्थर से उनका सर कुचल देगा। अगली सुबह वह पत्थर लेकर बैठ गया, लेकिन जब नबी सल्ल० सज्दे में गए और अबू जहल पत्थर लेकर बढ़ा, तो अचानक डर के मारे पीछे हट गया, हाथ सिकुड़ गए और पत्थर गिरा दिया। पूछने पर उसने बताया कि उसने नबी सल्ल० और अपने बीच एक ख़तरनाक व भयावह दृश्य देखा, जिसने उसे डरा दिया। नबी सल्ल० ने बाद में फ़रमाया कि वह फ़रिश्ता जिब्रील थे, अगर अबू जहल क़रीब आता तो वे उसे पकड़ लेते। इसी दौर में क़ुरैश ने एक और प्रस्ताव रखा कि नबी सल्ल० एक साल उनके माबूदों की पूजा करें और वे एक साल अल्लाह की इबादत करेंगे, इस पर अल्लाह ने सूरः क़ुल या अय्युहल काफ़िरून नाज़िल की, जिसमें साफ़ ऐलान किया गया कि जिसे तुम पूजते हो, उसे मैं कभी नहीं पूज सकता। जब यह भी नाकाम रहा, तो क़ुरैश ने एक और शर्त रखी कि नबी सल्ल० क़ुरआन में कुछ तब्दीली कर दें या कोई और क़ुरआन लाएं, जिसके जवाब में अल्लाह ने फ़रमाया कि मुझे इसका अधिकार नहीं कि मैं अपनी तरफ़ से इसमें तब्दीली करूं, मैं तो सिर्फ़ वह्य की पैरवी करता हूं। इस तरह क़ुरैश की हर सौदेबाज़ी, धमकी और चाल नाकाम होती चली गई और नबी सल्ल० अपनी दावत पर अडिग रहे।