नुबूवत के सातवें साल मुहर्रम में क़ुरैश ने बनू हाशिम और बनू मुत्तलिब के पूरे क़बीले का सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार कर दिया और उन्हें एक लिखित दस्तावेज़ के ज़रिए शेबे अबी तालिब (अबी तालिब की घाटी) में तीन साल तक क़ैद रहने पर मजबूर किया, जहां भुखमरी की हालत यह हुई कि बच्चों व औरतों की भूख से बिलखती आवाज़ें घाटी के बाहर तक सुनाई देती थीं।
पूरी कहानी:
जब क़ुरैश की सारी धमकियां, सौदेबाज़ियां और साज़िशें नाकाम हो गईं, तो उन्होंने नबी सल्ल० को पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए बनू हाशिम और बनू मुत्तलिब के पूरे क़बीले का सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार करने का फ़ैसला किया, चाहे वे मुसलमान हों या मुशरिक, सिर्फ़ इसलिए कि यह क़बीले नबी सल्ल० की हिफ़ाज़त कर रहे थे। इसके लिए क़ुरैश ने एक लिखित दस्तावेज़ तैयार किया, जिसमें तय हुआ कि इन क़बीलों से कोई निकाह न किया जाए, कोई व्यापार न किया जाए, न उनसे कुछ ख़रीदा जाए और न उन्हें कुछ बेचा जाए, जब तक वे नबी सल्ल० को उनके हवाले न कर दें। यह दस्तावेज़ काबा के भीतर लटका दिया गया और यह घटना नबी सल्ल० के पैग़म्बर बनाए जाने के सातवें साल मुहर्रम की चांद रात की है। इसके बाद बनू हाशिम व बनू मुत्तलिब के सभी लोग, नबी सल्ल० समेत, शेबे अबी तालिब में जाकर रहने पर मजबूर हो गए और यह बहिष्कार क़रीब तीन साल तक चला। इस दौरान हालात बेहद संगीन हो गए, अनाज व खाने-पीने के सामान का आना बंद हो गया, क्योंकि मक्का में जो भी अनाज आता, मुशरिक उसे पहले ही ख़रीद लेते, जिससे घाटी में क़ैद लोगों को पत्ते और चमड़े तक खाने पड़े। भूख से बिलखते बच्चों व औरतों की आवाज़ें घाटी के बाहर तक सुनाई देती थीं। हुर्मत वाले महीनों के अलावा वे ज़रूरत की चीज़ें ख़रीदने घाटी से बाहर भी नहीं निकल सकते थे, और अगर कभी बाहर से आए क़ाफ़िलों से सामान ख़रीदने की कोशिश करते, तो मक्का वाले क़ीमतें इतनी बढ़ा देते कि ख़रीदना मुश्किल हो जाता। हज़रत ख़दीजा रज़ि० के भतीजे हकीम बिन हिज़ाम कभी-कभी चोरी-छिपे अपनी फूफी के लिए गेहूं भिजवा देते थे, एक बार अबू जहल ने रोकने की कोशिश की, पर अबुल बख़्तरी के हस्तक्षेप से गेहूं पहुंच गया। अबू तालिब को नबी सल्ल० की जान का इतना ख़तरा महसूस होता था कि वे रोज़ रात को उनकी सोने की जगह बदल देते, ताकि अगर कोई क़ातिल हमला करना चाहे तो धोखा खाए। इस क़ैद के बावजूद नबी सल्ल० और मुसलमान हज के दिनों में बाहर निकलकर हज पर आने वालों को इस्लाम की दावत देते रहे।