बाइकाट का अंत (काग़ज़ फाड़ा जाना)
मक्की दौर
तीन साल की सख़्त घेराबंदी के बाद हिशाम बिन अम्र की पहल पर मुतइम बिन अदी, ज़ुहैर बिन अबी उमैया, ज़मआ बिन असवद और अबुल बख़्तरी नाम के पांच लोगों ने मिलकर बहिष्कार के अन्यायपूर्ण दस्तावेज़ को रद्द कराने की मुहिम चलाई। ज़ुहैर ने काबा में सबके सामने खुलकर एलान किया और आख़िरकार वह काग़ज़ फाड़ दिया गया, जिससे बनू हाशिम व बनू मुत्तलिब पर लगा बाइकाट ख़त्म हो गया।
पूरी कहानी:
तीन साल की भुखमरी और तकलीफ़ से भरी घेराबंदी के बाद कुछ क़ुरैशियों के दिलों में इस अन्यायपूर्ण बहिष्कार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठनी शुरू हुई। हिशाम बिन अम्र, जो बनू हाशिम से दूर के रिश्तेदार थे और रात में गुप्त रूप से ऊंटों पर सामान लादकर घाटी के क़ैदियों तक पहुंचाया करते थे, ने सबसे पहले मुतइम बिन अदी से बात की और उन्हें बनू हाशिम की रिश्तेदारी व हक़ याद दिलाकर इस अन्याय को ख़त्म करने पर राज़ी किया। मुतइम ने पूछा कि क्या कोई और भी इस काम में साथ है, तो हिशाम ने ज़ुहैर बिन अबी उमैया का नाम लिया, फिर मुतइम के कहने पर एक तीसरा साथी अबुल बख़्तरी बिन हिशाम को भी राज़ी किया, फिर चौथे के तौर पर ज़मआ बिन असवद को भी बनू हाशिम की रिश्तेदारी याद दिलाकर मनाया। इस तरह कुल पांच लोग जमा होकर संकल्प लेते हैं कि वे यह अन्यायपूर्ण काग़ज़ फड़वा कर रहेंगे। अगली सुबह ये सभी लोग अपनी-अपनी सामान्य सभाओं में पहुंचे, ज़ुहैर सज-धजकर आए, पहले काबा के सात चक्कर (तवाफ़) लगाए, फिर लोगों को संबोधित करते हुए ऊंची आवाज़ में बोले, मक्का वालो, क्या हम खाना खाएं, कपड़े पहनें और बनू हाशिम तबाह व बर्बाद हों, न उनसे कुछ ख़रीदा जाए न बेचा जाए? ख़ुदा की क़सम, मैं तब तक बैठूंगा नहीं, जब तक यह ज़ुल्म भरा व रिश्तेदारियां तोड़ने वाला काग़ज़ फाड़ न दिया जाए। एक-एक कर बाक़ी चारों साथियों ने भी उसकी बात का समर्थन किया। अबू जहल ने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन तब तक जनमत बदल चुका था। जब काग़ज़ मंगवाया गया, तो मालूम हुआ कि दीमक ने उसे इस तरह खा लिया था कि सिर्फ़ बिस्मिका अल्लाहुम्मा (अल्लाह के नाम के शब्द) वाला हिस्सा ही सुरक्षित बचा था, बाक़ी सारा अन्यायपूर्ण मज़मून मिट चुका था। यह एक स्पष्ट निशानी थी, लेकिन इसके बावजूद मुशरिक अपने कुफ़्र की राह पर आगे बढ़ते रहे और इसे भी महज़ जादू क़रार देकर टाल दिया। बहरहाल, इस घटना के बाद औपचारिक रूप से बाइकाट ख़त्म हो गया और बनू हाशिम व बनू मुत्तलिब को शेबे अबी तालिब से बाहर निकलकर मक्का में सामान्य जीवन जीने की इजाज़त मिल गई।

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