ग़म का साल - अबू तालिब और हज़रत ख़दीजा रज़ि० की वफ़ात
निजी ज़िंदगी
नुबूवत के दसवें साल चचा अबू तालिब का इंतक़ाल हुआ, जिन्होंने अंत तक अपने पुरखों का धर्म ही अपनाए रखा और कलिमा नहीं पढ़ा, जिस पर सूरः क़सस की आयत उतरी कि आप जिसे चाहें उसे हिदायत नहीं दे सकते। इसके दो-तीन महीने बाद हज़रत ख़दीजा रज़ि०, जो नबी सल्ल० की सबसे बड़ी सहायक व हमदर्द थीं, भी वफ़ात पा गईं। दोनों सहारों के छिन जाने और क़ुरैश के बढ़े हुए ज़ुल्म के कारण इस साल को ग़म का साल (आमुल हुज़्न) कहा गया।
पूरी कहानी:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चचा अबू तालिब, जो चालीस साल से भी ज़्यादा समय तक आपके सबसे बड़े संरक्षक व रक्षक रहे, नुबूवत के दसवें साल इंतक़ाल कर गए। मरणासन्न अवस्था में नबी सल्ल० उनके पास गए और चाहा कि वे कलिमा पढ़ लें ताकि क़यामत के दिन उनकी सिफ़ारिश कर सकें, लेकिन वहां मौजूद अबू जहल और अब्दुल्लाह बिन अबी उमैया ने बीच में टोककर उन्हें अब्दुल मुत्तलिब का धर्म याद दिलाया, जिससे अबू तालिब आख़िर तक अपने पुरखों के धर्म पर ही अड़े रहे और कलिमा नहीं पढ़ा। इस पर सूरः क़सस की आयत उतरी कि आप जिसे पसन्द करें उसे हिदायत नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह जिसे चाहे हिदायत देता है। बाद में नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि उम्मीद है क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश से अबू तालिब को जहन्नम की सबसे उथली जगह में रखा जाए, जो सिर्फ़ उनके टख़नों तक पहुंचे, वरना वे जहन्नम के सबसे गहरे गड्ढे में होते। अबू तालिब के इंतक़ाल के दो-तीन महीने बाद, नुबूवत के दसवें साल रमज़ान के महीने में, हज़रत ख़दीजा रज़ि० भी इंतक़ाल कर गईं, उस वक़्त उनकी उम्र पैंसठ साल और नबी सल्ल० की उम्र पचास साल थी। हज़रत ख़दीजा रज़ि० नबी सल्ल० के लिए अल्लाह की एक बहुत बड़ी नेमत थीं, पच्चीस साल तक साथ रहीं, हर मुश्किल घड़ी में हिम्मत बंधातीं, अपने जान व माल से दावत के काम में मदद करतीं और कठिन जिहाद में बराबर की शरीक रहतीं। नबी सल्ल० ने बाद में फ़रमाया कि जब लोगों ने मुझे झुठलाया, तब उन्होंने मेरी तस्दीक़ की, जब लोगों ने मुझे महरूम किया, तब उन्होंने अपना माल मुझ पर लुटाया। हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने ख़ुद नबी सल्ल० से फ़रमाया कि हज़रत ख़दीजा रज़ि० आ रही हैं, उन्हें उनके रब की ओर से सलाम कहिए और जन्नत में मोती के महल की ख़ुशख़बरी दीजिए। ये दोनों सदमे कुछ ही दिनों के फ़ासले पर आए, जिससे नबी सल्ल० का दिल ग़म से भर गया। इसके बाद क़ुरैश की हिम्मत और बढ़ गई और वे पहले से भी ज़्यादा खुलकर आपको सताने लगे, यहां तक कि एक मूर्ख ने आपके सर पर मिट्टी तक डाल दी, जिसे आपकी बेटी ने रोते हुए साफ़ किया और आपने उन्हें दिलासा देते हुए फ़रमाया, बेटी रोओ नहीं, अल्लाह तुम्हारे अब्बा की हिफ़ाज़त करेगा। इसी दौर में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० भी मक्का छोड़कर हब्शा की तरफ़ निकल पड़े थे, लेकिन बरके ग़माद पहुंचकर इब्ने दुग़ुन्ना से मुलाक़ात हो गई, जो उन्हें अपनी पनाह में वापस मक्का ले आया। लगातार आती इन मुसीबतों की वजह से इस साल को इतिहास में आमुल हुज़्न यानी ग़म का साल कहा जाने लगा।

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