नुबूवत के ग्यारहवें साल हज के मौसम में नबी सल्ल० ने अलग-अलग क़बीलों व लोगों को इस्लाम की दावत दी, जिनमें से कवि सुवैद बिन सामित जैसे कुछ लोगों ने इस्लाम क़बूल किया। सबसे अहम मौक़ा तब आया जब यस्रिब (मदीना) के ख़ज़रज क़बीले के छह लोग अक़बा में मिले, नबी सल्ल० की दावत सुनकर पहचान गए कि यही वह नबी हैं जिनका ज़िक्र यहूदी करते थे, और तुरंत ईमान लाकर मदीना लौटते ही घर-घर इस्लाम का पैग़ाम फैलाने लगे।
पूरी कहानी:
जिस तरह नबी सल्ल० हज के मौसम में मक्का आने वाले क़बीलों को सामूहिक रूप से इस्लाम की दावत देते, उसी तरह अलग-अलग व्यक्तियों को भी दावत देते रहते थे और कई लोगों ने इस्लाम क़बूल भी किया। इनमें एक उदाहरण सुवैद बिन सामित का है, जो यस्रिब के रहने वाले एक सूझ-बूझ वाले कवि और श्रेष्ठ वंश के व्यक्ति थे, जिन्हें उनकी क़ौम कामिल (सम्पूर्ण) की उपाधि देती थी। हज या उमरा के लिए मक्का आने पर नबी सल्ल० ने उन्हें दावत दी, उन्होंने अपनी तरफ़ से लुक़मान की हिकमत भरी बातें पेश कीं, तो नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि यह भी अच्छा है, लेकिन मेरे पास जो है वह इससे बेहतर है, यह क़ुरआन है जो अल्लाह ने मुझ पर उतारा, यह हिदायत और नूर है, फिर उन्हें क़ुरआन सुनाया, जिसे सुनकर सुवैद ने इस्लाम क़बूल कर लिया, हालांकि मदीना लौटते ही वे औस-ख़ज़रज की एक लड़ाई में मारे गए। लेकिन इस दौर की सबसे अहम घटना नुबूवत के ग्यारहवें साल हज के मौसम में घटी, जब नबी सल्ल० अक़बा नाम की जगह पर यस्रिब (मदीना) के ख़ज़रज क़बीले के छह लोगों से मिले। आपने उनके सामने इस्लाम की सच्चाई बयान की, अल्लाह की तरफ़ बुलाया और क़ुरआन सुनाया। इन लोगों ने आपस में कहा कि यह तो वही नबी मालूम होते हैं, जिनका हवाला देकर यहूदी हमें धमकियां दिया करते थे कि एक नबी आने वाला है, ऐसा न हो कि यहूदी उनसे पहले ईमान लाकर हमसे आगे निकल जाएं, इसलिए उन्होंने फ़ौरन आपकी दावत मान ली और मुसलमान हो गए। ये यस्रिब के समझदार लोग थे, और हाल ही में औस व ख़ज़रज के बीच हुई ख़ूनी बुआस की लड़ाई ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया था, इसलिए उन्हें उम्मीद जगी कि नबी सल्ल० की दावत शायद उनकी क़ौमी दुश्मनी का अंत बन जाए। उन्होंने नबी सल्ल० से कहा कि हम अपनी क़ौम को ऐसी हालत में छोड़ आए हैं कि उनमें जैसी दुश्मनी व वैर-भाव है, वैसा किसी और क़ौम में नहीं, उम्मीद है अल्लाह आपके ज़रिए उन्हें एक कर देगा, हम वापस जाकर उन्हें आपकी दावत पर बुलाएंगे और यह दीन जो हमने ख़ुद क़बूल किया है, उन्हें भी पेश करेंगे, अगर अल्लाह ने उन्हें आप पर एक कर दिया, तो आपसे बढ़कर कोई सम्माननीय न होगा। इसके बाद जब ये छहों लोग मदीना वापस गए, तो अपने साथ इस्लाम का पैग़ाम भी ले गए और वहां घर-घर नबी सल्ल० की चर्चा फैल गई, जिसने आगे चलकर मदीना में इस्लाम की मज़बूत नींव डालने की राह खोली।