जाहिलियत काल में अरब समाज में ऊंचे तबके की औरतों को काफ़ी सम्मान व स्वतंत्रता हासिल थी, जबकि निचले तबकों और लौंडियों में निकाह के कई भ्रष्ट रूप और खुला व्यभिचार आम था। व्यापार पर निर्भर कमज़ोर अर्थव्यवस्था और उद्योगों की कमी के बावजूद इस समाज में दानशीलता, वचन-पालन, स्वाभिमान और बदवी सादगी जैसे कुछ बेशकीमती गुण भी मौजूद थे, जिन्हें इस्लाम ने निखार दिया।
पूरी कहानी:
अरब की सामाजिक स्थिति वर्गों के हिसाब से अलग-अलग थी। ऊंचे तबके में औरत को काफ़ी सम्मान, सुरक्षा और आज़ादी हासिल थी, हालांकि निकाह हमेशा उसके अभिभावक (वली) की निगरानी में ही होता था और परिवार का मुखिया पुरुष ही माना जाता था। बाक़ी तबकों में हालत बदतर थी, हज़रत आइशा रज़ि० के हवाले से निकाह की चार भ्रष्ट शक्लों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें आम निकाह के अलावा बेहतर औलाद पाने की नीयत से पराए मर्द से संबंध बनवाना, कई मर्दों का एक ही औरत के पास आना-जाना और खुली वेश्यावृत्ति शामिल थी; बच्चा जन्म लेते ही उसे किसी एक पुरुष से जोड़ दिया जाता था। बेटियों की भ्रूण-हत्या और ग़रीबी के डर से बच्चों की हत्या जैसी क्रूरताएं भी होती थीं, हालांकि यह बड़े पैमाने पर नहीं था। दूसरी ओर, क़बीलाई एकता और पक्षपात इस समाज की बुनियाद थी, हर व्यक्ति अपने क़बीले की हिफ़ाज़त में जान लड़ा देता था, भले ही यह अंधा पक्षपात कभी-कभी बेवजह लड़ाइयों की जड़ भी बन जाता। आर्थिक तौर पर अरब व्यापार पर बुरी तरह निर्भर था, उद्योग-धंधे यमन, हियरा व शाम जैसे सीमावर्ती इलाक़ों तक सीमित थे, और भुखमरी आम बात थी। इन कमियों के बावजूद जाहिलियत के समाज में कुछ प्रशंसनीय गुण भी पाए जाते थे, दान-शीलता व मेहमाननवाज़ी में गर्व करना (यहां तक कि इसी वजह से शराब और जुए को भी सम्मान की चीज़ समझा जाता, क्योंकि इनसे मिलने वाला माल लुटा दिया जाता था), वचन का पक्का पालन, आत्मसम्मान (ग़ैरत) की रक्षा में डटे रहना, जो ठान लिया उसे कर गुज़रना, सहनशीलता और गंभीरता, तथा बदवी सादगी यानी छल-कपट से दूर सच्चाई व ईमानदारी। यही वे गुण थे, जिन्हें बाद में इस्लाम ने सुधार व मार्गदर्शन देकर मानव-समाज के लिए एक आदर्श बना दिया।