इस्लाम से पहले अधिकांश अरबवासी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के तौहीदी दीन से भटककर मूर्तिपूजा में पड़ चुके थे — इसकी शुरुआत अम्र बिन लुहय नामी सरदार से मानी जाती है, जो शाम से बुत हुबल लेकर आया। काबा के इर्द-गिर्द 360 से ज़्यादा बुत जमा हो गए थे, साथ ही यहूदी, ईसाई, मजूसी और साबी धर्मों के अनुयायी भी अरब में मौजूद थे, लेकिन सभी धर्म किसी न किसी रूप में बिगड़ चुके थे।
पूरी कहानी:
अरब के मूल निवासी शुरू में हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की तालीम से मिले दीने इब्राहीमी यानी एक अल्लाह की इबादत (तौहीद) पर क़ायम थे, लेकिन समय बीतने के साथ यह तालीम धुंधली पड़ती गई। इतिहास इस बदलाव का मुख्य कारण ख़ुज़ाआ के सरदार अम्र बिन लुहय को मानता है, जिसने शाम की यात्रा के दौरान वहां मूर्तिपूजा देखी और उसे भी दीन का हिस्सा समझकर हुबल नामक बुत मक्का लाकर काबा में स्थापित कर दिया। यहीं से अरब में बुतपरस्ती की शुरुआत हुई और देखते-देखते हर क़बीले और लगभग हर घर का अपना बुत बन गया, यहां तक कि मक्का-विजय के समय काबा के इर्द-गिर्द तीन सौ साठ बुत मौजूद थे, जिन्हें नबी सल्ल० ने तुड़वा दिया। इस बुतपरस्ती के पीछे यह सोच काम करती थी कि नेक फ़रिश्ते, नबी और वली अल्लाह के ख़ास क़रीबी हैं, इसलिए उनकी मूर्तियां बनाकर उनके ज़रिए अल्लाह तक पहुंचा यानी सिफ़ारिश दिलाई जा सकती है। इसी सोच से जुड़े कई रीति-रिवाज भी प्रचलित थे — बुतों के नाम पर जानवर वध करना, खेती व मवेशी की पैदावार का हिस्सा बुतों को अर्पित करना, बहीरा-साइबा-वसीला-हामी जैसे जानवरों को बुतों के नाम पर आज़ाद छोड़ना, फ़ाल (शकुन) के तीरों और जुए के तीरों से फ़ैसले लेना, और कहानों (भविष्यवक्ताओं), नजूमियों (ज्योतिषियों) व पक्षियों की उड़ान से अपशकुन-शुभशकुन तय करना। क़ुरैश ने ख़ुद को हुम्स कहकर दीने इब्राहीमी में अपनी मनमानी नई बातें भी जोड़ दी थीं, जैसे हज के दौरान अरफ़ात न जाना, एहराम की हालत में घर के मुख्य दरवाज़े से न घुसना, और तवाफ़ के दौरान अजीबोग़रीब पाबंदियां लगाना। इस्लाम से पहले अरब में मूर्तिपूजा के अलावा यहूदी, ईसाई, मजूसी (पारसी) और साबी धर्म भी मौजूद थे। यहूदी धर्म दो बार के पलायन से अरब पहुंचा, पहले बाबिल की तबाही के बाद, फिर रोमियों के फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े के बाद, और यसरिब (मदीना), ख़ैबर व तैमा में बनू क़ुरैज़ा, बनू नज़ीर व बनू क़ैनुक़ाअ जैसे प्रभावशाली यहूदी क़बीले बस गए; यमन में भी यहूदी धर्म फैला, जहां बादशाह ज़ूनवास ने नजरान के ईसाइयों को धर्म बदलने पर मजबूर करने के लिए खाई में जलाकर मार डालने जैसा क्रूर कांड किया। ईसाई धर्म हब्शी व रूमी विजेताओं के साथ आया और नजरान, शाम की सरहद पर बसे आले ग़स्सान व कुछ अन्य क़बीलों तथा हियरा के कुछ बादशाहों में फैला। मजूसी (पारसी) धर्म मुख्यतः फ़ारस से सटे इराक़ी अरब क्षेत्रों में और साबी (सितारा-पूजक) धर्म कुछ पुराने इलाक़ों में सीमित रूप से बाक़ी था। कुल मिलाकर, इस्लाम के आगमन के समय अरब में मौजूद हर धर्म किसी न किसी तरह बिगड़ चुका था और उसका असल शिक्षाओं से नाता टूट चुका था।