अरब की हुकूमतें और सरदारियां
मक्की दौर
इस्लाम से पहले अरब में दो तरह के शासक थे — यमन, हियरा (इराक़) और शाम (आले ग़स्सान) के ताजपोश बादशाह, और बाक़ी क़बीलों के स्वतंत्र सरदार। मक्का व हिजाज़ की सरदारी हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद से होते हुए क़बीला जुरहुम, फिर ख़ुज़ाआ, और अंततः क़ुसई बिन किलाब के हाथों क़ुरैश के पास आई, जिन्होंने काबा की देखभाल से जुड़े कई अहम पद आपस में बांट रखे थे।
पूरी कहानी:
इस्लाम से पहले अरब के शासन का ढांचा दो हिस्सों में बंटा था। एक ओर यमन, हियरा (इराक़ के निकट, फ़ारस के अधीन) और शाम की सरहद पर बसे आले ग़स्सान जैसे ताजपोश बादशाह थे, जो प्रायः बड़ी साम्राज्यों यानी रोम व फ़ारस के प्रभाव या संरक्षण में शासन करते थे — जैसे यमन पर बारी-बारी हिमयरी, हब्शी (अबीसीनियाई) और फिर फ़ारसी गवर्नरों का क़ब्ज़ा रहा, यहां तक कि आख़िरी फ़ारसी गवर्नर बाज़ान ने स्वयं इस्लाम स्वीकार कर यमन को इस्लाम के अधीन ला दिया। दूसरी ओर अरब के भीतरी हिस्सों में स्वतंत्र क़बीलाई सरदार थे, जो अपने-अपने क़बीले पर लगभग निरंकुश अधिकार रखते और युद्ध, संधि व माल-बंटवारे के फ़ैसले लेते थे। हिजाज़ और मक्का की सरदारी का एक अलग ही इतिहास था। यह सत्ता पहले हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद और उनके ससुराली क़बीले जुरहुम के पास रही, लेकिन जुरहुम के अत्याचार व कुप्रबंधन के चलते क़बीला ख़ुज़ाआ ने उन्हें खदेड़कर मक्का पर लगभग तीन सौ वर्षों तक शासन किया। अंततः क़ुसई बिन किलाब, जो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल से थे, ने कुछ संघर्ष और मध्यस्थता के बाद ख़ुज़ाआ से सत्ता छीनकर मक्का व काबा की देखभाल क़ुरैश के हाथों में सौंप दी। क़ुसई ने दारुन्नदवा (परामर्श भवन) बनवाया, जहां क़ुरैश के महत्वपूर्ण मामलों पर फ़ैसले होते थे, और शहर की ज़िम्मेदारियां कई हिस्सों में बांट दीं — जैसे काबा की देखभाल व कुंजी (हिजाबत), हाजियों के लिए पानी की व्यवस्था (सिक़ाया), उनके आतिथ्य का प्रबंध (रिफ़ादा), झंडे की ज़िम्मेदारी (लिवा) और परामर्श सभा की अध्यक्षता। ये पद बाद में क़ुसई की संतान से होते हुए अब्दे मुनाफ़, फिर हाशिम, फिर अब्दुल मुत्तलिब यानी नबी सल्ल० के दादा तक पहुंचे। इनके अलावा भी क़ुरैश के भीतर न्याय, राजदूतत्व, सेना व झंडाबरदारी जैसे कई और पद अलग-अलग उपक़बीलों में बंटे हुए थे, जिससे मक्का की व्यवस्था किसी संसदीय ढांचे जैसी चलती थी। कुल मिलाकर, अरब के भीतरी भाग में कोई केंद्रीय बादशाह न होते हुए भी हिजाज़ की सरकार को उसके धार्मिक महत्व के कारण विशेष सम्मान प्राप्त था, यद्यपि वह राजनीतिक रूप से बहुत सीमित शक्ति ही रखती थी।

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