हिजरत के वक़्त मदीना में तीन मशहूर यहूदी क़बीले (बनू क़ैनुक़ाअ, बनू नज़ीर, बनू क़ुरैज़ा) माली तौर पर मज़बूत लेकिन नस्लीय घमंड और सूदखोरी में लिप्त थे, वहीं औस व ख़ज़रज नाम के दो अरब क़बीले वर्षों की ख़ूनी लड़ाइयों से थक चुके थे। नबी सल्ल० की दावत ने पहली बार इन दोनों क़बीलों को एकता की राह दिखाई, जबकि मक्का के क़ुरैश ने हिजरत के बाद भी मुसलमानों का माल ज़ब्त कर मदीना का आर्थिक बाइकाट कराया।
पूरी कहानी:
हिजरत के समय मदीना (यस्रिब) के हालात को समझने के लिए दो पहलू देखने ज़रूरी हैं, अंदरूनी और बाहरी। अंदरूनी तौर पर मदीना में तीन प्रमुख यहूदी क़बीले, बनू क़ैनुक़ाअ, बनू नज़ीर और बनू क़ुरैज़ा, आबाद थे, जो व्यापार, ब्याज और खेती में माहिर होने के कारण आर्थिक रूप से काफ़ी मज़बूत थे। इनके अरबों के साथ शादी-ब्याह के रिश्ते भी बन चुके थे, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी इसराईली-यहूदी राष्ट्रीयता पर गर्व करते और अरबों को उम्मी (अनपढ़, तुच्छ) समझकर उनका माल हड़पना अपने लिए जायज़ मानते थे। इनके पास दीन के नाम पर सिर्फ़ फ़ालगिरी, जादू और झाड़-फूंक जैसी चीज़ें रह गई थीं, फिर भी वे ख़ुद को रूहानी नेता व पेशवा समझते थे। ये लोग साज़िश रचने और क़बीलों में फूट डालने में बड़े माहिर थे, चालाकी से पड़ोसी अरब क़बीलों औस व ख़ज़रज के बीच दुश्मनी के बीज बोते रहते, जिस वजह से इन दोनों क़बीलों में सालों तक ख़ूनी लड़ाइयां (जैसे बुआस की लड़ाई) चलती रहीं और वे थककर चूर हो चुके थे। नबी सल्ल० की दावत ने इन्हीं थके-हारे क़बीलों को पहली बार एकता व भाईचारे की उम्मीद दिखाई, जैसा कि छह भाग्यवान आत्माओं और अक़बा की बैअतों की घटनाओं में देखा जा चुका है। दूसरी ओर, बाहरी हालात यह थे कि मक्का के क़ुरैश, जो मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन थे, दस साल तक आतंक, धमकी और ज़ुल्म के तमाम हथकंडे इस्तेमाल कर चुके थे। जब मुसलमानों ने हिजरत कर ली, तो क़ुरैश ने उनकी ज़मीनें, मकान और माल-दौलत सब ज़ब्त कर लिया और मुसलमानों व उनके घरवालों के बीच रुकावट बनकर खड़े हो गए, बल्कि नबी सल्ल० को क़त्ल करने की साज़िश तक कर चुके थे। इसके बाद भी क़ुरैश ने अपनी हैसियत यानी हरम के रखवाले होने का फ़ायदा उठाकर अरब के दूसरे मुशरिक क़बीलों को भड़काकर मदीना का लगभग पूरा आर्थिक बाइकाट करा दिया, जिससे मदीना में आने वाली ज़रूरी चीज़ें बहुत कम रह गईं, जबकि वहां मुहाजिर शरणार्थियों की तादाद रोज़ बढ़ रही थी। इस तरह मदीना पहुंचकर भी नबी सल्ल० और मुसलमानों के सामने भीतर से क़बीलाई एकता क़ायम करने और बाहर से क़ुरैश की दुश्मनी व आर्थिक घेराबंदी से निपटने की दोहरी चुनौती खड़ी थी।