क़ुरैश के क़त्ल के मंसूबे की रात हज़रत अली रज़ि० को अपने बिस्तर पर सुलाकर नबी सल्ल० घर से निकल गए और घेरा डाले बैठे मुशरिकों की आंखों में अल्लाह ने धूल झोंक दी। हज़रत अबूबक्र रज़ि० के साथ सौर पहाड़ की एक गुफा में तीन दिन छिपे रहे, फिर गाइड की मदद से मदीना की तरफ़ रवाना हुए। रास्ते में सुराक़ा का पीछा नाकाम रहा और आख़िरकार क़ुबा होते हुए मदीना पहुंचकर हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ि० के घर ठहरे।
पूरी कहानी:
जब दारुन्नदवा की साज़िश के मुताबिक़ हर क़बीले का एक-एक नौजवान क़त्ल के इरादे से नबी सल्ल० के घर के बाहर घात लगाए बैठा था, तो नबी सल्ल० ने हज़रत अली रज़ि० को अपने बिस्तर पर सुला दिया और ख़ुद घर से बाहर निकले। आपने मुशरिकों की सफ़ों को चीरते हुए एक मुट्ठी कंकरियां उनके सरों पर डालीं और सूरः यासीन की आयतें तिलावत फ़रमाईं, जिसमें बयान है कि अल्लाह ने उनके आगे-पीछे रुकावट खड़ी कर उन्हें ढांक दिया है, इसलिए वे देख नहीं पा रहे। इसके बाद नबी सल्ल० हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० के घर पहुंचे, वहां से दोनों एक खिड़की के रास्ते निकलकर रात ही रात उलटी दिशा यानी यमन की तरफ़ रुख़ करते हुए सौर नामी पहाड़ की एक गुफा में जा छिपे, ताकि खोजियों को धोखा दिया जा सके। तीन दिन तक वे इस गुफा में रहे। इस दौरान हज़रत अबूबक्र रज़ि० के बेटे हज़रत अब्दुल्लाह रात के अंधेरे में मक्का जाकर हालात की ख़बर लाते और सुबह होने से पहले वापस मक्का लौट जाते जैसे वहीं रात गुज़ारी हो, हज़रत अबूबक्र रज़ि० के ग़ुलाम आमिर बिन फ़ुहैरा बकरियां चराते हुए रात को दूध पहुंचाते और लौटते वक़्त अब्दुल्लाह के क़दमों के निशान बकरियों से मिटा देते, और हज़रत अस्मा रज़ि० खाना पहुंचाती रहीं। उधर मक्का में क़ुरैश पर जुनून सवार हो गया, ग़ुस्से में हज़रत अली रज़ि० को घसीटकर काबा तक ले गए और हज़रत अस्मा रज़ि० से पूछताछ की, जिस पर अबू जहल ने उन्हें थप्पड़ तक मार दिया। क़ुरैश ने हर एक को ज़िंदा या मुर्दा पकड़वाने पर सौ-सौ ऊंटों के इनाम का एलान कर दिया, जिसके बाद खोजी दस्ते चारों तरफ़ फैल गए और गुफा के मुंह तक भी पहुंच गए, जिससे हज़रत अबूबक्र रज़ि० घबरा उठे, लेकिन नबी सल्ल० ने उन्हें दिलासा देते हुए फ़रमाया, अबूबक्र, ख़ामोश रहो, हम दो नहीं, तीसरे ख़ुद अल्लाह हैं। अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उन्हें बचा लिया और खोजी बिना कुछ पाए वापस लौट गए। तीन दिन बाद जब तलाश कुछ ठंडी पड़ी, तो अब्दुल्लाह बिन उरैक़ित नामी एक ग़ैर-मुस्लिम लेकिन भरोसेमंद रास्ता-दिखाने वाले की मदद से दोनों हज़रात तटीय रास्ते से मदीना की ओर रवाना हुए। रास्ते में सुराक़ा बिन मालिक नामी एक व्यक्ति इनाम के लालच में पीछा करता हुआ नज़दीक पहुंच गया, लेकिन हर बार उसका घोड़ा रेत में धंस जाता, आख़िर उसने डरकर पीछा छोड़ दिया और उल्टे नबी सल्ल० से हिफ़ाज़त का वादा ले लिया। सफ़र के दौरान एक चरवाहे की बकरी का दूध निकालकर नबी सल्ल० को पिलाया गया, जिससे उनकी थकान कुछ दूर हुई। आख़िरकार नबी सल्ल० पहले क़ुबा पहुंचे, जहां कुछ दिन ठहरकर एक मस्जिद (मस्जिदे क़ुबा) की नींव रखी, फिर मदीना में दाख़िल हुए। मदीना में आपने पूछा कि हमारे किस आदमी का घर सबसे नज़दीक है, तो हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ि० ने अपना घर व दरवाज़ा पेश किया और नबी सल्ल० वहीं ठहरे। कुछ दिनों बाद आपकी पत्नी हज़रत सौदा रज़ि०, बेटियां हज़रत फ़ातिमा व उम्मे कुलसूम रज़ि०, हज़रत उसामा बिन ज़ैद और उम्मे ऐमन भी हज़रत अब्दुल्लाह बिन अबूबक्र रज़ि० के साथ मदीना पहुंच गईं, अलबत्ता बेटी हज़रत ज़ैनब रज़ि० अपने पति अबुल आस के पास मक्का में ही रह गईं, जो बद्र की लड़ाई के बाद मदीना आ सकीं। हज़रत आइशा रज़ि० बताती हैं कि मदीना पहुंचने पर उन्होंने पाया कि यह अल्लाह की ज़मीन पर सबसे ज़्यादा बीमारियों वाली जगह थी, बतहान घाटी सड़े पानी से बहती थी, और शुरुआती दिनों में ख़ुद हज़रत अबूबक्र रज़ि० व हज़रत बिलाल रज़ि० भी तेज़ बुख़ार में पड़ गए।