दारुन्नदवा - नबी सल्ल० के क़त्ल की साज़िश
मक्की दौर
जब क़ुरैश ने देखा कि लगभग सभी मुसलमान मदीना जा चुके हैं और वहां मुसलमानों की एक मज़बूत पनाहगाह बन गई है, तो उन्होंने 26 सफ़र सन् 14 नबवी को दारुन्नदवा में एक ख़तरनाक बैठक बुलाई, जिसमें हर क़बीले के एक-एक नौजवान को मिलाकर नबी सल्ल० का क़त्ल करने की योजना बनाई गई, ताकि ख़ून का बदला बनू हाशिम पूरे अरब से न ले सकें। जिब्रील अलैहिस्सलाम ने तुरंत इसकी ख़बर देकर नबी सल्ल० को हिजरत की इजाज़त दी।
पूरी कहानी:
जब क़ुरैश ने देखा कि लगभग सारे मुसलमान मक्का छोड़कर मदीना जा चुके हैं और वहां मुसलमानों की एक मज़बूत, संगठित पनाहगाह बन गई है, तो उन्हें एहसास हुआ कि नबी सल्ल० अगर मदीना पहुंच गए, तो उनकी पकड़ से हमेशा के लिए निकल जाएंगे। इसलिए अक़बा की बड़ी बैअत के लगभग ढाई महीने बाद, 26 सफ़र सन् 14 नबवी, यानी 12 सितम्बर सन् 622 ईस्वी को मक्का की पार्लियामेंट दारुन्नदवा में इतिहास की सबसे ख़तरनाक बैठक हुई, जिसमें क़ुरैश के तमाम क़बीलों के नुमाइन्दे जमा हुए, जिनमें अबू जहल, जुबैर बिन मुतइम, शैबा व उत्बा बिन रबीआ, अबू सुफ़यान बिन हर्ब, नज़्र बिन हारिस, अबुल बख़्तरी, ज़मआ बिन असवद, हकीम बिन हिज़ाम, उमैया बिन ख़लफ़ जैसे प्रमुख सरदार शामिल थे। इस बैठक का मक़सद यह तय करना था कि इस्लामी दावत के अलमबरदार यानी नबी सल्ल० का क़िस्सा हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया जाए। रिवायत के अनुसार इस बैठक में इब्लीस भी एक बूढ़े शेख़ की शक्ल में दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ और अपनी सलाह देने लगा। बैठक में कई प्रस्ताव आए, जैसे नबी सल्ल० को क़ैद कर देना या मक्का से निकाल देना, लेकिन आख़िरकार अबू जहल के सुझाव पर यह ख़तरनाक योजना तय हुई कि हर क़बीले से एक-एक ताक़तवर नौजवान चुना जाए, और वे सब मिलकर एक साथ नबी सल्ल० पर तलवार से वार करें, ताकि उनका ख़ून सारे क़बीलों में बंट जाए और बनू हाशिम अकेले किसी एक क़बीले से बदला न ले सकें, बल्कि उन्हें मजबूरन दियत (ख़ून-बहा) पर राज़ी होना पड़े। यह प्रस्ताव पारित होते ही हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम अल्लाह की वह्य लेकर नबी सल्ल० के पास पहुंचे, क़ुरैश की इस साज़िश की ख़बर दी और बताया कि अल्लाह ने आपको हिजरत की इजाज़त दे दी है, साथ ही यह भी हिदायत दी कि आप आज रात अपने उस बिस्तर पर न सोएं जिस पर आम तौर पर सोते हैं। यह सूचना पाकर नबी सल्ल० ठीक दोपहर के वक़्त हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० के घर पहुंचे, ताकि उनके साथ हिजरत के सारे प्रोग्राम व मरहले तय कर सकें।

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