दूसरी बैअत के बाद नबी सल्ल० ने आम मुसलमानों को मदीना हिजरत की इजाज़त दे दी, चुनांचे मुसलमान चुपके-चुपके, अकेले-अकेले या छोटे जत्थों में मक्का छोड़कर मदीना जाने लगे। इस दौरान उन्हें क़ुरैश की तरफ़ से रोकने, तंग करने और परिवारों से जुदा करने जैसी तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा, फिर भी दो महीने के अंदर लगभग सभी मुसलमान मदीना पहुंच गए।
पूरी कहानी:
अक़बा की दूसरी बैअत के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों को मदीना हिजरत की इजाज़त दे दी और फ़रमाया कि अल्लाह ने तुम्हारे लिए एक भाईचारे वाला घर और सुरक्षित ठिकाना तैयार कर दिया है। इसके बाद मुसलमान अकेले-अकेले या छोटे-छोटे जत्थों में चुपके से मक्का छोड़कर मदीना की ओर रवाना होने लगे। इस हिजरत के दौरान कई मुसलमानों को क़ुरैश की तरफ़ से गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हज़रत अबू सलमा रज़ि० जब मदीना जाने लगे, तो उनकी पत्नी हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० के मायके वालों ने उन्हें रोक लिया, फिर उनके ससुराल वालों ने बच्चे को भी छीन लिया, जिससे हज़रत अबू सलमा रज़ि० अकेले ही मदीना चले गए। हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० एक पूरा साल हर रोज़ रोती हुई उसी जगह जातीं जहां यह घटना घटी थी, आख़िर उनके घरवालों को तरस आया और उन्हें बेटे समेत जाने की इजाज़त दे दी, तब वे अकेली ही लगभग पांच सौ किलोमीटर का सफ़र तय करके, रास्ते में मिले उस्मान बिन अबी तलहा की मदद से मदीना पहुंचीं। हज़रत सुहैब रूमी रज़ि० जब हिजरत का इरादा किया, तो क़ुरैश के लोगों ने उनका सारा माल छीनने की शर्त पर ही उन्हें जाने दिया, जिसे सुनकर नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि सुहैब ने मुनाफ़े का सौदा किया। इन तमाम रुकावटों, धमकियों और परिवार से जुदाई के बावजूद, दो महीने के भीतर लगभग सभी मुसलमान मक्का छोड़कर मदीना पहुंच गए, सिर्फ़ नबी सल्ल०, हज़रत अबूबक्र रज़ि०, हज़रत अली रज़ि० और कुछ मजबूर व क़ैद लोग मक्का में रह गए।