अगले साल हज के मौसम में यस्रिब से पचहत्तर लोग (73 मर्द, 2 औरतें) रात के अंधेरे में चुपके से निकलकर अक़बा में जमा हुए। नबी सल्ल० के चचा हज़रत अब्बास ने, जो अभी मुसलमान नहीं थे, ज़िम्मेदारी की गंभीरता समझाई, फिर अंसार ने पूरी दृढ़ता से नबी सल्ल० की हर हाल में हिफ़ाज़त, आज्ञापालन और अल्लाह की राह में खर्च करने की बैअत की, जिसे अक़बा की दूसरी बैअत कहा जाता है, और यहीं से मदीना हिजरत का रास्ता खुला।
पूरी कहानी:
अगले साल हज के मौसम में यस्रिब से पचहत्तर लोग, तिहत्तर मर्द और दो औरतें (नसीबा बिन्त काब और अस्मा बिन्त अम्र), मक्का आए। तयशुदा योजना के मुताबिक़ वे रात का एक तिहाई हिस्सा बीतने पर अपने डेरों से चुपके-चुपके निकलकर अक़बा में जमा हुए, जैसे चिड़िया घोंसले से दबे-पांव निकलती है। नबी सल्ल० अपने चचा हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के साथ वहां पहुंचे, जो अभी तक अपनी क़ौम के धर्म पर ही थे, लेकिन भतीजे के मामले में मौजूद रहकर पूरा इत्मीनान हासिल करना चाहते थे। सबसे पहले हज़रत अब्बास ने बात शुरू करते हुए अंसार को साफ़ शब्दों में समझाया कि मुहम्मद हमारे यहां जिस इज़्ज़त व हिफ़ाज़त में हैं, वह तुम जानते हो, लेकिन वे अब तुम्हारे साथ जाने पर राज़ी हो गए हैं, इसलिए अगर तुम उन्हें उनके दुश्मनों से बचाने का इरादा रखते हो, तभी यह ज़िम्मेदारी उठाओ, वरना अभी से छोड़ दो। इस पर अंसार ने जवाब दिया कि हमने आपकी बात सुन ली, अब ऐ अल्लाह के रसूल, आप अपने और अपने रब के लिए जो समझौता पसन्द करें, कर लीजिए। इसके बाद नबी सल्ल० ने क़ुरआन की तिलावत की, अल्लाह की तरफ़ दावत दी और फिर बैअत की शर्तें रखीं। हज़रत जाबिर रज़ि० की रिवायत के मुताबिक़ आपने फ़रमाया कि इस बात पर बैअत करो कि चुस्ती व सुस्ती दोनों हाल में सुनोगे व मानोगे, तंगी व ख़ुशहाली दोनों में माल ख़र्च करोगे, भलाई का हुक्म दोगे व बुराई से रोकोगे, और अल्लाह की राह में किसी मलामत करने वाले की परवाह किए बग़ैर उठ खड़े होगे। बैअत के लिए जब लोग उठे, तो सबसे कम उम्र वाले हज़रत असद बिन ज़ुरारा रज़ि० ने आपका हाथ थाम लिया और कहा, यस्रिब वालो, ज़रा ठहर जाओ, हम ऊंटों के कलेजे मार-मार कर यहां तक इस यक़ीन के साथ पहुंचे हैं कि यह अल्लाह के रसूल हैं, आज इन्हें ले जाने का मतलब है सारे अरब से दुश्मनी, तुम्हारे सरदारों का क़त्ल और तलवारों की मार, अगर यह सब बर्दाश्त कर सको तो ले चलो, वरना अभी छोड़ दो, यही अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा माक़ूल बहाना होगा। यह सुनकर सारे अंसार एक आवाज़ में बोल उठे, असद बिन ज़ुरारा, अपना हाथ हटाओ, ख़ुदा की क़सम, हम इस बैअत को न छोड़ सकते हैं न तोड़ सकते हैं। इसके बाद सबने बारी-बारी नबी सल्ल० से हाथ मिलाकर बैअत की, और बारह नक़ीब (गिरोह-प्रमुख) भी चुने गए, जो अपनी-अपनी क़ौम के मामलों के ज़िम्मेदार बनाए गए। इस बैअत के साथ ही मदीना हिजरत का रास्ता खुल गया, हालांकि जब यह ख़बर क़ुरैश तक पहुंची, तो उन्होंने भी सतर्क होकर इसका पीछा करने की कोशिश की।