अक़बा की पहली बैअत
मक्की दौर
अगले साल हज के मौसम में यस्रिब के बारह लोगों ने मिना के पास अक़बा में नबी सल्ल० से मुलाक़ात की और अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करने, चोरी, ज़िना, औलाद की हत्या और बोहतान न करने की शर्तों पर बैअत (प्रतिज्ञा) की, जो अक़बा की पहली बैअत कहलाई। इसके बाद नबी सल्ल० ने हज़रत मुसअब बिन उमैर रज़ि० को अपना पहला दूत (सफ़ीर) बनाकर मदीना भेजा, जिनकी दावत से मदीना के लगभग हर घर में इस्लाम फैल गया।
पूरी कहानी:
अगले साल हज के मौसम में यस्रिब (मदीना) से बारह लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मिना के पास अक़बा में मिले और आपसे बैअत की। यह बैअत बाद में हुदैबिया के समझौते और मक्का-विजय के वक़्त औरतों से ली गई बैअत जैसी ही शर्तों पर आधारित थी। हज़रत उबादा बिन सामित रज़ि० इस बैअत का विवरण देते हुए बताते हैं कि नबी सल्ल० ने फ़रमाया, आओ मुझसे इस बात पर बैअत करो कि अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं करोगे, चोरी नहीं करोगे, ज़िना नहीं करोगे, अपनी औलाद को क़त्ल नहीं करोगे, अपने हाथ-पांव के बीच से गढ़कर कोई बोहतान (झूठा इल्ज़ाम) नहीं लाओगे, और किसी भली बात में मेरी नाफ़रमानी नहीं करोगे। जो इन सारी बातों को पूरा करेगा, उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है, और जो इनमें से किसी बात में लग्ज़िश कर बैठे, फिर दुनिया में ही उसकी सज़ा पा ले, तो वह उसके लिए कफ़्फ़ारा बन जाएगी, और अगर अल्लाह उस पर परदा डाल दे, तो उसका मामला अल्लाह के हवाले है, चाहे सज़ा दे या माफ़ कर दे। हज़रत उबादा रज़ि० कहते हैं कि हमने इन्हीं शर्तों पर आपसे बैअत की। हज के दिन ख़त्म होने और बैअत पूरी होने के बाद, नबी सल्ल० ने इन नए मुसलमानों के साथ यस्रिब में अपना पहला दूत (सफ़ीर) भेजा, ताकि वह मुसलमानों को इस्लामी शिक्षाएं व अहकाम सिखाए और जो लोग अभी तक शिर्क पर हैं, उनमें इस्लाम की दावत फैलाए। इसके लिए आपने शुरुआती मुसलमानों में से एक होनहार नौजवान हज़रत मुसअब बिन उमैर अब्दरी रज़ि० को चुना। मदीना पहुंचकर हज़रत मुसअब रज़ि० हज़रत असद बिन ज़ुरारा रज़ि० के घर ठहरे और दोनों ने मिलकर यस्रिब वालों में जमकर दावत का काम किया। उनकी मेहनत इतनी कामयाब रही कि जल्द ही अंसार का शायद ही कोई घराना बचा जिसमें कुछ मर्द-औरत मुसलमान न हुए हों, सिर्फ़ बनू उमैया बिन ज़ैद, ख़त्मा और वाइल के घराने बाक़ी रह गए, जो अपने मशहूर कवि क़ैस बिन असलत की बात मानते थे और उसने उन्हें ख़ंदक़ की लड़ाई (सन् 05 हि०) तक इस्लाम से रोके रखा। अगले साल हज के मौसम से पहले हज़रत मुसअब रज़ि० इस ज़बरदस्त कामयाबी की ख़ुशख़बरी लेकर मक्का लौटे और नबी सल्ल० को यस्रिब के क़बीलों की जंगी ताक़त व अच्छी योग्यताओं के बारे में विस्तार से बताया।

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