मेराज (इसरा व मेराज)
मक्की दौर
मेराज की रात नबी सल्ल० को बुराक़ पर बिठाकर मस्जिदे हराम से बैतुल मक़दिस ले जाया गया, जहां आपने सारे नबियों की इमामत में नमाज़ पढ़ाई। इसके बाद सात आसमानों की सैर कराई गई, जहां आदम, यह्या, ईसा, यूसुफ़, इदरीस, हारून और मूसा अलैहिमुस्सलाम से मुलाक़ात हुई, और आख़िर में अल्लाह की बारगाह में पचास नमाज़ों का हुक्म मिला, जिसे मूसा अलैहिस्सलाम के बार-बार मशवरे पर आप वापस जाकर घटवाते रहे, यहां तक कि पांच नमाज़ें रह गईं।
पूरी कहानी:
इसरा व मेराज की यह महान घटना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मक्की ज़िंदगी के आख़िरी दौर की मानी जाती है, संभवतः पहली अक़बा बैअत से कुछ पहले या दोनों बैअतों के बीच घटी। हदीसों के मुताबिक़ नबी सल्ल० को आपके मुबारक जिस्म समेत बुराक़ नामी सवारी पर हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम के साथ मस्जिदे हराम से बैतुल मक़दिस (यरुशलम) तक की रात्रि यात्रा (इसरा) कराई गई। वहां आपने बुराक़ को मस्जिद के दरवाज़े के छल्ले से बांधा, फिर सारे नबियों की इमामत करते हुए नमाज़ पढ़ाई। इसके बाद उसी रात आपको बैतुल मक़दिस से आसमानों की सैर (मेराज) कराई गई। पहले आसमान पर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई, जिन्होंने आपकी नुबूवत का इक़रार किया और आपको अपने दाहिनी व बाईं ओर भाग्यवान व भाग्यहीन आत्माएं दिखाईं। दूसरे आसमान पर हज़रत यह्या व हज़रत ईसा अलैहिमस्सलाम से, तीसरे पर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से, चौथे पर हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम से, पांचवें पर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम से और छठे आसमान पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से भेंट हुई, हर एक ने आपका स्वागत किया, सलाम का जवाब दिया और आपकी नुबूवत की तस्दीक़ की। इसके बाद हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम आपको अल्लाह की बारगाह में ले गए, जहां अल्लाह ने उम्मत पर पचास नमाज़ें फ़र्ज़ कर दीं। वापसी में जब आप हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास से गुज़रे, तो उन्होंने कहा कि आपकी उम्मत इतनी नमाज़ों की ताक़त नहीं रखेगी, वापस जाकर कमी के लिए अर्ज़ कीजिए। नबी सल्ल० बार-बार अल्लाह की बारगाह में लौटते रहे और हर बार कुछ नमाज़ें कम होती गईं, यहां तक कि सिर्फ़ पांच नमाज़ें रह गईं। मूसा अलैहिस्सलाम ने फिर भी वापस जाकर और कमी की सलाह दी, लेकिन नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि अब मुझे अपने रब से शर्म महसूस हो रही है, मैं इसी पर राज़ी हूं और इसे स्वीकार करता हूं। इसके बाद आवाज़ आई कि मैंने अपना फ़र्ज़ लागू कर दिया और अपने बंदों पर से कमी कर दी, यानी पांच नमाज़ों का सवाब पचास नमाज़ों के बराबर रखा गया। इस घटना पर विद्वानों में मतभेद रहा है कि क्या नबी सल्ल० ने अल्लाह को अपनी आंखों से देखा या नहीं, ज़्यादातर सहाबा व विद्वानों की राय है कि यह क़ुर्ब (नज़दीकी) दिल से महसूस किया गया रूहानी अनुभव था। इसरा व मेराज की इस घटना को क़ुरआन में सूरः इसरा व सूरः नज्म में बयान किया गया है, और यह इस बात का प्रतीक भी है कि जिस तरह यहूदियों को उनके कुकर्मों की वजह से मानव-जाति के धार्मिक नेतृत्व से हटाया जा रहा था, वैसे ही अब यह ज़िम्मेदारी नबी सल्ल० और उनकी उम्मत को सौंपी जा रही थी।

⚠️ कुछ गलत लगा?

अगर आपको इस पेज पर कोई ग़लती (तर्जुमा, तथ्य, या कुछ और) दिखी हो, तो हमें बताएं — हम जांच करके ठीक करेंगे।

0%