हिजरत के बाद भी क़ुरैश की दुश्मनी कम न हुई, उन्होंने मदीना के मुशरिक सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई को धमकी भरा पत्र लिखकर मुसलमानों से लड़ने या उन्हें निकालने की मांग की। इसी तरह की घेराबंदी की धमकियों के जवाब में अल्लाह ने पहली बार मुसलमानों को आत्मरक्षा में लड़ाई की इजाज़त दी, हालांकि इसे अभी अनिवार्य (फ़र्ज़) नहीं बल्कि सिर्फ़ अनुमति के तौर पर उतारा गया।
पूरी कहानी:
हिजरत के बाद भी मक्का के काफ़िरों की दुश्मनी ख़त्म नहीं हुई, बल्कि यह देखकर कि मुसलमान उनकी पकड़ से निकलकर मदीना में एक शांतिपूर्ण ठिकाना पा चुके हैं, उनका ग़ुस्सा और भड़क उठा। उन्होंने मदीना के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई को, जो अभी तक खुला मुशरिक था और जिसे अंसार ने अपना सरदार बनाने पर सहमति जता रखी थी, एक धमकी भरा पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि तुमने हमारे आदमी को पनाह दे रखी है, इसलिए या तो उससे लड़ो या उसे निकाल दो, वरना हम अपने पूरे लश्कर के साथ तुम पर हमला बोलकर तुम्हारे लड़ने वालों को क़त्ल कर देंगे और तुम्हारी औरतों की इज़्ज़त लूट लेंगे। यह पत्र पाकर अब्दुल्लाह बिन उबई, जो नबी सल्ल० से पहले से ही जलन रखता था क्योंकि उसे लगता था कि आपकी वजह से उसकी बादशाहत छिन गई, अपने मक्की मुशरिक भाइयों का हुक्म मानने के लिए तैयार हो गया, लेकिन जब यह ख़बर नबी सल्ल० तक पहुंची, तो आप ख़ुद उसके पास गए और सख़्ती से समझाया, जिसके बाद वह अपने इरादे से बाज़ आ गया। इसके अलावा नबी सल्ल० की अपनी जान को भी लगातार ख़तरा बना रहा, हज़रत उबई बिन काब रज़ि० बताते हैं कि जब नबी सल्ल० व साथी मदीना पहुंचे और अंसार ने उन्हें पनाह दी, तो पूरे अरब ने मानो एक कमान से उन पर निशाना साधा, यहां तक कि वे हथियार के बग़ैर न रात गुज़ारते, न सुबह करते। एक मौक़े पर जब घेराबंदी जैसे हालात बने, नबी सल्ल० एक छोटे से क़ुब्बे (डेरे) से सर निकालकर लोगों से फ़रमाया, वापस जाओ, अल्लाह ने मुझे सुरक्षित कर दिया है। यह ख़तरा सिर्फ़ नबी सल्ल० तक सीमित नहीं था, बल्कि सारे ही मुसलमानों को था। ऐसे ख़तरनाक हालात में, जब यह साफ़ हो चुका था कि क़ुरैश किसी भी सूरत होश में आने या अपनी सरकशी छोड़ने को तैयार नहीं, अल्लाह ने मुसलमानों को लड़ाई की इजाज़त दे दी, हालांकि इसे अभी फ़र्ज़ नहीं ठहराया। इस मौक़े पर उतरी आयत में फ़रमाया गया कि जिन लोगों से लड़ाई की जा रही है, उन्हें भी इजाज़त दी गई, क्योंकि वे मज़लूम हैं और अल्लाह उनकी मदद की क़ुदरत रखता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यह इजाज़त सिर्फ़ लड़ाई के लिए लड़ाई नहीं, बल्कि इसका मक़सद बातिल का अंत और अल्लाह की पहचान क़ायम करना है। शुरुआत में यह इजाज़त सिर्फ़ क़ुरैश तक सीमित थी, बाद में हालात बदलने के साथ यह अनिवार्यता में बदल गई और क़ुरैश से आगे बढ़कर सभी दुश्मनों तक फैल गई। इसी हुक्म के बाद मुसलमानों की फ़ौजी मुहिमों (सराया व ग़ज़वों) का सिलसिला अमली तौर पर शुरू हुआ, जिनका मक़सद मदीना के आस-पास के रास्तों की निगरानी करना, वहां बसे क़बीलों से समझौते करना, और मक्का के मुशरिकों, मदीना के मुनाफ़िक़ों व यहूदियों तथा आस-पास के बद्दुओं को यह एहसास दिलाना था कि मुसलमान अब कमज़ोर नहीं, ताक़तवर हो चुके हैं।