नबी सल्ल० ने हज़रत हमज़ा रज़ि० को तीस मुहाजिरों की कमान देकर एक तीन सौ लोगों वाले क़ुरैशी क़ाफ़िले (जिसमें अबू जहल भी था) का पता लगाने भेजा। समुद्र तट पर दोनों फ़रीक़ आमने-सामने आ गए, लेकिन दोनों के मित्र क़बीला जुहैना के सरदार मज्दी बिन अम्र ने बीच-बचाव कर लड़ाई टलवा दी।
पूरी कहानी:
यह इस्लाम की पहली फ़ौजी मुहिम थी। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ि० को तीस मुहाजिरों की कमान सौंपकर शाम से आ रहे एक तीन सौ आदमियों के क़ुरैशी क़ाफ़िले, जिसमें अबू जहल भी शामिल था, का पता लगाने भेजा। मुसलमान ईस के आस-पास समुद्र तट पर पहुंचे तो क़ाफ़िले का सामना हो गया और दोनों फ़रीक़ लड़ाई के लिए तैयार हो गए, लेकिन क़बीला जुहैना के सरदार मज्दी बिन अम्र ने, जो दोनों तरफ़ के मित्र थे, दौड़-धूप करके लड़ाई नहीं होने दी। यह पहला मौक़ा था जब नबी सल्ल० ने अपने मुबारक हाथों से एक सफ़ेद झंडा बांधा, जिसके झंडाबरदार हज़रत अबू मुरसद कन्नाज़ बिन हुसैन ग़नवी रज़ि० थे।