नबी सल्ल० ने हज़रत उबैदा बिन हारिस रज़ि० को मुहाजिरों के साथ भेजा, जिनका राबिग़ की घाटी में अबू सुफ़यान की दो सौ आदमियों की टुकड़ी से सामना हुआ। दोनों तरफ़ से तीर चले पर कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई, अलबत्ता क़ुरैश की फ़ौज के दो आदमी वहीं मुसलमानों से आ मिले।
पूरी कहानी:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत उबैदा बिन हारिस बिन मुत्तलिब रज़ि० को मुहाजिरों की एक टुकड़ी की कमान देकर रवाना किया। राबिग़ की घाटी में उनका सामना अबू सुफ़यान की दो सौ आदमियों की फ़ौज से हुआ। दोनों फ़रीक़ों ने एक-दूसरे पर तीर चलाए, लेकिन इससे आगे कोई लड़ाई नहीं हुई। इस झड़प में मक्की फ़ौज के दो आदमी, हज़रत मिक़दाद बिन अम्र बहरानी और उत्बा बिन ग़ज़वान अल-माज़नी रज़ि०, जो पहले से गुप्त रूप से मुसलमान हो चुके थे और इसी मक़सद से काफ़िरों के साथ निकले थे कि मौक़ा पाकर मुसलमानों से जा मिलें, वहीं मुसलमानों की सफ़ में शामिल हो गए। हज़रत अबू उबैदा का झंडा सफ़ेद था और झंडाबरदार हज़रत मिस्तह बिन असासा रज़ि० थे।