बद्र की लड़ाई - इस्लाम का निर्णायक युद्ध
ग़ज़वात व सराया
मक्का से आ रहे अबू सुफ़यान के मालदार क़ाफ़िले को रोकने के इरादे से नबी सल्ल० तीन सौ तेरह सहाबा लेकर निकले, पर अबू सुफ़यान बचकर निकल गया और उसकी मदद के लिए तेरह सौ की क़ुरैशी सेना बद्र के मैदान में आ पहुंची। मशवरे, दुआ और हज़ार फ़रिश्तों की मदद के बाद 17 रमज़ान सन् 2 हिजरी को हुई इस लड़ाई में अबू जहल समेत क़ुरैश के कई सरदार मारे गए और मुसलमानों की निर्णायक जीत हुई, जिसे क़ुरआन ने यौमुल फ़ुरक़ान (हक़ व बातिल में फ़ैसले का दिन) कहा।
पूरी कहानी:
रमज़ान सन् 2 हिजरी में जब नबी सल्ल० को ख़बर मिली कि अबू सुफ़यान की अगुवाई में एक हज़ार ऊंटों व पचास हज़ार दीनार के माल वाला क़ुरैशी क़ाफ़िला, जिसकी हिफ़ाज़त पर सिर्फ़ चालीस आदमी थे, शाम से मक्का वापस लौट रहा है, तो आपने सहाबा को निकलने का एलान किया, हालांकि इसे किसी पर अनिवार्य नहीं ठहराया। तीन सौ तेरह सहाबा (मुहाजिर व अंसार) दो घोड़ों और सत्तर ऊंटों के साथ रवाना हुए। उधर अबू सुफ़यान को रास्ते में ख़तरे की भनक लग गई, उसने दमदम नामी एक क़ासिद को मक्का दौड़ाकर मदद मांगी और ख़ुद क़ाफ़िले का रुख़ तटीय रास्ते की ओर मोड़कर बाल-बाल बच निकला। मक्का में दमदम की पुकार सुनकर क़ुरैश में जोश भड़क उठा और अबू जहल की अगुवाई में तेरह सौ की एक सेना, सौ घोड़ों व छह सौ कवचों के साथ, इतराते हुए, दिखावे व बदले के जज़्बे से भरकर मदीना की ओर रवाना हुई, सिर्फ़ बनू अदी क़बीले ने इसमें शिरकत नहीं की। जब नबी सल्ल० को मालूम हुआ कि क़ाफ़िला बच निकला है और उसकी जगह एक बड़ी फ़ौज सामने आ चुकी है, तो आपने सहाबा से मशवरा किया, जिसमें मुहाजिर व अंसार दोनों ने, ख़ासकर हज़रत मिक़दाद रज़ि० और हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० ने, हर हाल में साथ देने का भरोसा दिलाया। मुसलमान बद्र के कुओं तक पहुंचे, जहां हज़रत हुबाब बिन मुंज़िर रज़ि० के सुझाव पर मोर्चा उस कुएं के पास जमाया गया जो दुश्मन के सबसे नज़दीक और पानी से भरपूर था, ताकि पानी पर मुसलमानों का पूरा नियंत्रण रहे। मुहाजिरों के तीन नेता (अली, ज़ुबैर, साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हुम) की एक जासूसी टुकड़ी ने कुएं से पानी भरते दो मक्की ग़ुलामों को पकड़कर दुश्मन फ़ौज की सही तायदाद व हालात की ख़बर पहुंचाई। मुसलमानों ने युद्ध-स्थल के उत्तर-पूर्व में एक ऊंचे टीले पर नबी सल्ल० के नेतृत्व-केंद्र के लिए एक छप्पर बनाया, जिसकी निगरानी हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० के दस्ते के ज़िम्मे थी। लड़ाई से पहले क़ुरैश के तीन सूरमा उतबा, शैबा व वलीद बिन उतबा मैदान में निकले, तो मुक़ाबले के लिए हज़रत उबैदा बिन हारिस, हज़रत हमज़ा और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हुम आगे बढ़े, तीनों मुशरिक सरदार मारे गए, हालांकि हज़रत उबैदा रज़ि० भी बुरी तरह ज़ख़्मी हुए और बाद में शहीद हो गए। इसके बाद घमासान लड़ाई शुरू हुई और उसी वक़्त नबी सल्ल० ने छप्पर में गिड़गिड़ाकर दुआ मांगी, ऐ अल्लाह, अगर आज यह गिरोह हलाक हो गया तो तेरी इबादत करने वाला कोई न रहेगा, यहां तक कि दुआ के जोश में आपके कंधों से चादर गिर पड़ी और हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने उसे वापस ओढ़ाया। अल्लाह ने जवाब में एक हज़ार फ़रिश्तों की मदद भेजने का वादा किया और काफ़िरों के दिलों पर रोब तारी कर दिया। सहाबा ने बताया कि लड़ाई के दौरान उन्होंने बिना किसी हथियार के दुश्मन के सर कटते और गिरते देखे, यह फ़रिश्तों की सीधी मदद थी। नतीजतन क़ुरैश की सेना बुरी तरह हार गई, अबू जहल समेत क़ुरैश के सत्तर बड़े सरदार मारे गए और सत्तर क़ैद कर लिए गए, जबकि मुसलमानों के सिर्फ़ चौदह साथी शहीद हुए। नबी सल्ल० ने बद्र के कुछ मुर्दा सरदारों को एक कुएं में डलवाकर उन्हें सम्बोधित किया कि क्या तुमने अपने रब का वायदा सच पाया, मुझे तो मेरे रब का वायदा सच मिला। जीत की ख़ुशख़बरी हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा व हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहुमा के ज़रिए मदीना भेजी गई, जहां पहले यहूदियों व मुनाफ़िक़ों ने झूठा प्रचार कर हड़कंप मचाया था कि नबी सल्ल० क़त्ल हो गए, लेकिन जल्द ही असली ख़बर पहुंचते ही पूरा मदीना अल्लाहु अकबर के नारों से गूंज उठा। क़ैदियों के मामले में सहाबा किराम ने फ़िदया लेने का फ़ैसला किया, जो साढ़े चार हज़ार से एक हज़ार दिरहम तक था, और जिन क़ैदियों के पास फ़िदया नहीं था, उनसे मदीना के दस-दस बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की शर्त रखी गई। कुछ क़ैदियों को नबी सल्ल० ने बिना फ़िदया के ही एहसान करके छोड़ दिया, और अपने दामाद अबुल आस को इस शर्त पर रिहा किया कि वे हज़रत ज़ैनब रज़ि० की मदीना-यात्रा में रुकावट न बनें। यह लड़ाई इस्लाम की पहली बड़ी व निर्णायक जंग साबित हुई, जिसे क़ुरआन ने यौमुल फ़ुरक़ान यानी हक़ और बातिल के बीच फ़ैसले का दिन क़रार दिया, क्योंकि इसी के बाद मुसलमानों का रुतबा अरब में एक मज़बूत ताक़त के तौर पर स्थापित हो गया।

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