सरीया नख़्ला (रजब 2 हि॰)
ग़ज़वात व सराया
नबी सल्ल० ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन जह्श रज़ि० को एक सीलबंद ख़त के साथ आठ मुहाजिरों की एक टुकड़ी देकर नख़्ला भेजा, जहां रजब के हराम महीने के आख़िरी दिन उनका एक क़ुरैशी व्यापारिक क़ाफ़िले से सामना हुआ। मशवरे के बाद हमला कर एक आदमी को क़त्ल किया, दो को क़ैद किया और माल लूटा, जिससे मुशरिकों ने प्रचार किया कि मुसलमानों ने हराम महीने की पवित्रता तोड़ दी, लेकिन अल्लाह ने आयत उतारकर बताया कि मुशरिकों के अपने जुर्म कहीं बड़े हैं। नबी सल्ल० ने ख़ुद इस हरकत को नापसंद किया था।
पूरी कहानी:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रजब सन् 2 हिजरी में हज़रत अब्दुल्लाह बिन जह्श रज़ि० को आठ मुहाजिरों की एक छोटी टुकड़ी की कमान सौंपी और एक सीलबंद ख़त देकर हुक्म दिया कि इसे दो दिन के सफ़र के बाद खोलें और उसमें लिखी हिदायत पर अमल करें, साथ ही यह भी ताकीद की कि किसी साथी को मजबूर न करें। ख़त खोलने पर मालूम हुआ कि उन्हें नख़्ला (मक्का व तायफ़ के बीच) जाकर क़ुरैश की गतिविधियों की ख़बर लाने का हुक्म है। नख़्ला पहुंचकर उनका सामना क़ुरैश के एक व्यापारिक क़ाफ़िले से हुआ, जिसमें अब्दुल्लाह बिन मुग़ीरा के दो बेटे उस्मान व नौफ़ल, अम्र बिन हज़रमी और हकीम बिन कैसान (मुग़ीरा का दास) शामिल थे। मुसलमानों ने आपस में मशवरा किया कि आज रजब के हराम महीने का आख़िरी दिन है, अगर लड़ते हैं तो हराम महीने की बेहुरमती होगी, और अगर रात भर रुकते हैं तो क़ाफ़िला हरम की हदों में दाख़िल होकर सुरक्षित निकल जाएगा। आख़िर हमला करने की राय बनी, जिसमें अम्र बिन हज़रमी तीर लगने से मारा गया, उस्मान व हकीम को क़ैद कर लिया गया, जबकि नौफ़ल भाग निकला। यह इस्लामी इतिहास का पहला ख़ुम्स (ग़नीमत का पांचवां हिस्सा), पहला क़त्ल और पहला क़ैदी था। जब यह टुकड़ी माल व क़ैदी लेकर मदीना पहुंची, तो नबी सल्ल० ने उनकी इस हरकत को नापसंद करते हुए फ़रमाया कि मैंने तुम्हें हराम महीने में लड़ने का हुक्म नहीं दिया था, और ग़नीमत के माल व क़ैदियों के मामले में हाथ रोक लिया। इस घटना से मुशरिकों को यह प्रचार करने का मौक़ा मिल गया कि मुसलमानों ने अल्लाह के हराम किए हुए महीने को हलाल कर लिया, जिस पर काफ़ी बहस हुई, यहां तक कि अल्लाह ने सूरः बक़रा की आयत उतारकर इस प्रचार की पोल खोल दी और बताया कि हराम महीने में लड़ना बड़ा गुनाह ज़रूर है, लेकिन अल्लाह की राह से रोकना, कुफ़्र करना, मस्जिदे हराम से रोकना और उसके निवासियों को वहां से निकाल देना, यह सब अल्लाह के नज़दीक इससे कहीं ज़्यादा बड़ा जुर्म है। इसके बाद नबी सल्ल० ने दोनों क़ैदियों को आज़ाद कर दिया और मक़तूल के वारिसों को उसका ख़ून-बहा (दियत) अदा किया। यह घटना बद्र की लड़ाई से पहले की आख़िरी फ़ौजी गतिविधि थी, जिसके बाद क़ुरैश को यह हक़ीक़त समझ आ गई कि उनकी शामी तिजारत अब स्थायी रूप से ख़तरे में है।

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