गुप्त दावत के तीन साल और शुरुआती मुसलमान
मक्की दौर
नुबूवत के शुरुआती तीन साल तक दावत का काम पूरी तरह गुप्त रहा। सबसे पहले हज़रत ख़दीजा रज़ि०, फिर हज़रत अली रज़ि०, आज़ाद किए गए ग़ुलाम ज़ैद बिन हारिसा रज़ि० और क़रीबी दोस्त हज़रत अबूबक्र रज़ि० ईमान लाए, जिनकी दावत से उस्मान, ज़ुबैर, अब्दुर्रहमान बिन औफ़, साद बिन अबी वक़्क़ास और तल्हा जैसे कई और सहाबा भी इस्लाम में दाख़िल हुए। इसके अलावा बिलाल, अम्मार बिन यासिर व उनके माता-पिता जैसे कमज़ोर तबक़े के लोग भी शामिल हुए, और नमाज़ का तरीक़ा जिब्रील अलैहिस्सलाम ने सिखाया।
पूरी कहानी:
जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नुबूवत मिली, तो शुरुआती तीन साल तक दावत का काम पूरी तरह छिपकर, व्यक्तिगत स्तर पर चला, क्योंकि खुले प्रचार का हुक्म अभी नहीं आया था। सबसे पहले ईमान लाने वालों में हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा थीं, जिन्होंने बिना किसी हिचक के तुरंत तस्दीक़ की। इसके बाद बच्चों में हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ि०, आज़ाद किए हुए ग़ुलामों में हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ि०, और मर्दों में आपके गहरे दोस्त हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० ने इस्लाम क़बूल किया। हज़रत अबूबक्र रज़ि० बड़े मिलनसार और भरोसेमंद व्यक्ति थे, उन्होंने अपनी दावत से उस्मान बिन अफ़्फ़ान, ज़ुबैर बिन अव्वाम, अब्दुर्रहमान बिन औफ़, साद बिन अबी वक़्क़ास और तल्हा बिन उबैदुल्लाह जैसे कई प्रतिष्ठित लोगों को इस्लाम की तरफ़ मोड़ा, ये सभी नबी सल्ल० के पास पहुंचकर मुसलमान हुए। इनके अलावा अब्दुल्लाह बिन मसऊद, मसऊद बिन रबीआ, अब्दुल्लाह बिन जह्श व उनके भाई, बिलाल हब्शी, सुहैब रूमी, अम्मार बिन यासिर तथा उनके माता-पिता यासिर व सुमैया (जो इस्लाम के पहले शहीद माने जाते हैं) और आमिर बिन फुहैरा भी शुरुआती दौर में ईमान लाए। औरतों में हज़रत ख़दीजा के अलावा उम्मे ऐमन, हज़रत अब्बास की पत्नी उम्मुल फ़ज़्ल और हज़रत अबूबक्र की बेटी हज़रत अस्मा रज़ि० भी शामिल थीं। इन सबको साबिक़ूनल अव्वलीन (सबसे पहले ईमान लाने वाले) कहा जाता है, और इनकी कुल गिनती मर्द-औरत मिलाकर लगभग एक सौ तीस तक पहुंचती है। यह सभी लोग गुप्त रूप से मुसलमान हुए थे, और नबी सल्ल० भी उनसे छिपकर ही मार्गदर्शन व शिक्षा के लिए मिलते थे। इस दौरान वह्य लगातार आती रही, छोटी-छोटी आयतें उतरतीं जिनमें जन्नत-जहन्नम के दृश्य और मनोनिग्रह की तालीम दी जाती। शुरू में जो हुक्म आया, उनमें नमाज़ का हुक्म भी शामिल था, हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने ख़ुद नबी सल्ल० को वुज़ू का तरीक़ा सिखाया, और नबी सल्ल० व सहाबा किराम रज़ि० छिपकर मक्का की घाटियों में जाकर नमाज़ अदा करते थे। एक बार अबू तालिब ने नबी सल्ल० व हज़रत अली रज़ि० को नमाज़ पढ़ते देख लिया, हक़ीक़त जानने पर उन्होंने इस राह पर डटे रहने की हिदायत दी।

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