क़रीब तीन साल बाद अल्लाह ने सूरः अश-शुअरा की आयत में नबी सल्ल० को हुक्म दिया कि अपने क़रीबी रिश्तेदारों को खुलकर डराएं। नबी सल्ल० ने सफ़ा पहाड़ी पर चढ़कर क़ुरैश के सभी क़बीलों को बुलाया और अल्लाह के अज़ाब से आगाह किया; ज़्यादातर लोग ख़ामोश रहे, पर चचा अबू लहब ने बुरा-भला कहा, जबकि अबू तालिब ने खुलकर नबी सल्ल० की हिफ़ाज़त का ऐलान किया।
पूरी कहानी:
जब ईमान वालों की एक जमाअत तैयार हो गई, जो दावत का बोझ उठा सकती थी, तो अल्लाह की तरफ़ से खुले प्रचार का हुक्म आया। सबसे पहले सूरः अश-शुअरा की आयत उतरी, जिसमें फ़रमाया गया, आप अपने क़रीबी रिश्तेदारों को डराइए। इस सूरः में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम-फ़िरऔन की घटना का ज़िक्र इसलिए किया गया ताकि आने वाली झुठलाने और अत्याचार की कार्रवाइयों का एक नमूना पहले से मौजूद रहे। इस हुक्म को पूरा करने के लिए जब नबी सल्ल० को यक़ीन हो गया कि अबू तालिब उनका समर्थन करेंगे, तो एक दिन आप सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े और ऊंची आवाज़ में या सबाहा (हाय सुबह) पुकारा, यह वह पुकार थी जो अरब किसी बड़े ख़तरे से आगाह करने के लिए लगाते थे। फिर आपने क़ुरैश के हर क़बीले का अलग-अलग नाम लेकर पुकारा, बनू फ़िह्र, बनू अदी, बनू अब्दे मुनाफ़, बनू अब्दुल मुत्तलिब वग़ैरह। लोग जमा हो गए, जिनमें चचा अबू लहब भी था। नबी सल्ल० ने पूछा, अगर मैं तुम्हें बताऊं कि इस पहाड़ के पीछे घुड़सवारों की एक फ़ौज तुम पर हमला करने वाली है, तो क्या तुम मुझ पर यक़ीन करोगे? सबने कहा, हां, हमने आपको हमेशा सच्चा पाया है। इस पर आपने फ़रमाया कि मैं तुम्हें एक सख़्त अज़ाब से पहले डराने के लिए भेजा गया हूं, और तुम्हारी मिसाल उस आदमी जैसी है जो दुश्मन को देखकर अपने घरवालों को ख़बर करने दौड़ता है। यह सुनकर अबू लहब ने ग़ुस्से में कहा, तुम्हारा नाश हो, क्या इसीलिए हमें बुलाया था? और नबी सल्ल० की मुख़ालफ़त में खड़ा हो गया, जिस पर सूरः लहब नाज़िल हुई। इसके उलट, चचा अबू तालिब ने डटकर कहा कि ख़ुदा की क़सम, जब तक हममें जान है, हम इनकी हिफ़ाज़त करते रहेंगे, अलबत्ता उन्होंने ख़ुद अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब का दीन (धर्म) छोड़ने से इंकार कर दिया। इस तरह खुले प्रचार की शुरुआत के साथ ही मक्का में समर्थन और विरोध की दो साफ़ लकीरें खिंच गईं।