जब क़ुरैश ने देखा कि इस्लाम की दावत रुकने का नाम नहीं ले रही, तो उन्होंने वलीद बिन मुग़ीरा की सलाह पर क़ुरआन को जादू क़रार देकर लोगों को हज के मौसम में नबी सल्ल० से दूर रहने की चेतावनी देनी शुरू की और तरह-तरह के बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाए। इसके साथ ही कमज़ोर व ग़ुलाम मुसलमानों पर सीधा शारीरिक अत्याचार भी शुरू हो गया, हज़रत बिलाल, उम्मार परिवार, सुहैब और कई और सहाबा को बुरी तरह प्रताड़ित किया गया, जिनमें से कइयों को हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने ख़रीदकर आज़ाद कराया।
पूरी कहानी:
जैसे-जैसे इस्लाम की दावत फैलने लगी, क़ुरैश को यह ख़तरा महसूस हुआ कि हज के मौसम में बाहर से आने वाले अरब क़बीलों तक नबी सल्ल० की बात न पहुंच जाए। इसलिए उन्होंने मशवरे के लिए वलीद बिन मुग़ीरा के पास इकट्ठा होकर तय किया कि सब एक ही राय पर क़ायम रहें। जब लोगों ने बारी-बारी सुझाव दिए कि नबी सल्ल० को काहिन, पागल, कवि या जादूगर कहा जाए, तो वलीद ने हर बार दलील देकर इन्हें रद्द किया, क्योंकि उसने ख़ुद इन सबको देखा-परखा था और नबी सल्ल० का कलाम इनमें से किसी से मेल नहीं खाता था। आख़िर उसने ख़ुद ही यह राय सुझाई कि सबसे मुनासिब यही कहना है कि यह कलाम जादू है, क्योंकि इसका असर इतना गहरा है कि बाप-बेटे और भाई-भाई तक में फूट डाल देता है, इसी राय पर सब सहमत हो गए। इसके साथ ही मुशरिकों ने नबी सल्ल० पर पागल, जादूगर व झूठा होने के इल्ज़ाम लगाने और मज़ाक़ उड़ाने शुरू किए, यह एतराज़ भी उठाया कि यह कैसा रसूल है जो खाना खाता व बाज़ारों में फिरता है, और यह कि अल्लाह किसी यतीम-ग़रीब आदमी की बजाय मक्का-तायफ़ के किसी बड़े रईस को नुबूवत देता। जब बात मज़ाक़ से आगे बढ़ी, तो क़ुरैश ने कमज़ोर व ग़ुलाम मुसलमानों पर सीधा ज़ुल्म ढाना शुरू कर दिया, क्योंकि प्रतिष्ठित क़बीलों से जुड़े मुसलमानों को उनके क़बीले बचा लेते थे। अबू जहल किसी ताक़तवर आदमी के मुसलमान होने पर उसे ज़लील करता और माल के नुक़सान की धमकी देता, कमज़ोर आदमी को ख़ुद मारता-पीटता। हज़रत उस्मान रज़ि० को उनके चचा खजूर की चटाई में लपेटकर धुआं देते, हज़रत मुसअब रज़ि० की मां ने उनका खाना-पानी बन्द कर घर से निकाल दिया जिससे उनकी खाल उधड़ गई, हज़रत सुहैब रज़ि० को इतनी सज़ा दी जाती कि होश जाता रहता, और हज़रत बिलाल रज़ि० को उनका मालिक उमैया तपते कंकरों पर लिटाकर सीने पर भारी पत्थर रखवा देता, फिर भी वे सिर्फ़ अहद, अहद कहते रहते। बनू अदी के एक ग़ुलाम को हज़रत उमर रज़ि०, जो उस वक़्त अभी मुसलमान नहीं हुए थे, इतना मारते कि थककर ही छोड़ते। बनू अब्दुद्दार की एक लौंडी और उसकी बेटी नह्दिया, तथा आमिर बिन फुहैरा जैसे कई और ग़ुलाम भी सज़ाओं के शिकार हुए। हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० ने इनमें से कई ग़ुलामों व लौंडियों को अपने पैसे से ख़रीदकर आज़ाद कर दिया, जिस पर उनके बाप अबू क़हाफ़ा ने एतराज़ किया कि मज़बूत लोगों को आज़ाद करते तो वे तुम्हारा बचाव भी करते, जिसके जवाब में हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने कहा कि मैं तो सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा चाहता हूं, और इसी पर अल्लाह ने क़ुरआन में उनकी प्रशंसा की आयतें उतारीं।