ग़ज़वा अबवा या वद्दान (सफ़र 2 हि॰)
ग़ज़वात व सराया
यह पहली फ़ौजी मुहिम थी जिसमें नबी सल्ल० ख़ुद सत्तर मुहाजिरों के साथ शरीक हुए, हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० को मदीना का स्थानापन्न बनाकर। मक़सद एक क़ुरैशी क़ाफ़िले को रोकना था, पर वद्दान तक पहुंचकर कोई मामला पेश नहीं आया, अलबत्ता वहां बनू ज़मरा के सरदार अम्र बिन मख़्शी से एक मैत्रीपूर्ण समझौता किया गया।
पूरी कहानी:
यह पहली फ़ौजी मुहिम थी जिसमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सत्तर मुहाजिरों के साथ स्वयं शरीक हुए और मदीने में हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० को अपना स्थानापन्न नियुक्त कर गए। मुहिम का मक़सद क़ुरैश के एक क़ाफ़िले की राह रोकना था। आप वद्दान तक पहुंचे, लेकिन कोई मामला पेश नहीं आया। इसी मुहिम के दौरान आपने बनू ज़मरा के उस वक़्त के सरदार अम्र बिन मख़्शी ज़मरी से एक मैत्रीपूर्ण संधि की, जिसमें तय हुआ कि यह क़बीला अपनी जान व माल के बारे में सुरक्षित रहेगा, इनकी मदद की जाएगी अगर कोई इन पर हमला करे, बशर्ते ये ख़ुद अल्लाह के दीन के ख़िलाफ़ किसी की मदद न करें, और यह संधि हमेशा के लिए मानी गई, साथ ही जब भी नबी सल्ल० उन्हें मदद के लिए बुलाएं, उन्हें आना होगा। यह मुहिम पन्द्रह दिन तक चली। झंडे का रंग सफ़ेद था और हज़रत हमज़ा रज़ि० झंडाबरदार थे।

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